Saturday, May 22, 2010
बड़े-बुजुर्गो की बदलती सोच।
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हाल ही में मेरे दोस्त के घर एक नया ऐसी लगा लेकिन मेरा दोस्त कुछ नाराज़ और उखडा हुआ लगा। कारण पूछने पर बताया-"क्या बताऊँ यार?? पापा ने घर में नया ऐसी लगवा लिया हैं, हैं तो ख़ुशी की बात लेकिन इतना खर्चा और प्रतिमाह आने वाला भारी भरकम बिल..... मुझे अजीब लग रहा हैं।"
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मैंने उसे समझाने की कोशिश कि-"यार ऐसा कुछ नहीं हैं, तू चिंता क्यों कर रहा हैं?? तेरे पापा ने कुछ सोच कर ही ऐसी लगवाया होगा, और रही बात खर्चे की तो उसका हिसाब तेरे पापा ने लगा लिया होगा। तू खुश हो जा यार, दुखी मत हो।"
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वो तर्क करते हुए बोला-"यार खर्च बचाने के लिए ही तो मैं ट्युशन नहीं लगा, खुद ही पढता हूँ। कॉलेज के हॉस्टल की बजाय किराए के सस्ते से कमरे में रहता हूँ। माना, ऐसी कोई बड़ी चीज़ नहीं रही, पर मुझे ये सब पसंद नहीं हैं। पापा बैंक में क्लर्क हैं और तनख्वाह मात्र पैंतीस हज़ार। ऐसे में ये मुझे फिजूल खर्च से अधिक कुछ नहीं लग रहा हैं........"
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मैंने उसे समझाने की फिर (और शायद आखिरी) कोशिश की, लेकिन वो बिफर गया-"यार तू तो मुझे ऐसे समझा रहा हैं, जैसे तुझे कुछ पता नहीं हो। मेरे और पापा के रिश्ते कैसे हैं??, तू अच्छी तरह से जानता हैं। मोम भी डैड से कैसे खौफ खाती हैं ये भी तुझे मालूम हैं, एक बार तो पापा ने मम्मी को तेरे सामने ही डांट दिया था। मुझे ये सब बिलकुल भी पसंद नहीं हैं। पापा कहते हैं कि-"बेटा ये सब म अं तुम्हारे लिए ही कर रहा हूँ, तुम्हे गर्मी ना लगे इसलिए..." लेकिन वे क्या जानते नहीं कि-"मैं साल में ज्यादा से ज्यादा छुट्टियों समेत तीस दिन ही होता हूँ।"क्यों वे ऐसा कर रहे हैं??......"
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अब मैंने उसे समझाने की सारी कोशिशो पर विराम लगा दिया था। मैं अब मौन था, मैं एक गहरे सोच-विचार में पड़ गया था। मेरे मन में कई सवाल उठ रहे थे, जिनके जवाब सिर्फ और सिर्फ बड़े-बुजुर्गो के पास ही हैं नाकि नौजवानों-आज की पीढ़ी के पास। मेरे मन में उठ रहे सवालों में से कुछ सवाल =
बड़े बुजुर्ग इतने बदल क्यों गए हैं??
पहले बड़े-बुजुर्ग लोग अपने बच्चो की खुशियों के लिए अपनी खुशियाँ त्याग देते या कम कर देते थे, अब क्या हो गया हैं??
बच्चे चाहे कैसे भी हो, भविष्य में सहारा तो उनका ही लेना पडेगा।
अगर बच्चो को घर से निकाल कर या बे-दखल करके आप नौकर / नौकरानी या सहायक / सहायिका रखने की सोचेंगे तो शायद आप आत्मघाती कदम उठा रहे हैं।
नौकर, आदि आपकी संपत्ति और जानमाल का दुश्मन हैं। उसकी नज़र मात्र आपकी संपत्ति पर ही होगी। मौक़ा पाकर वो अपना खेल खेल जायेंगे।
आपके कारण बच्चे दुःख पाए या ना पाए, लेकिन आपको बच्चो की नाराजगी का कारण तो अवश्य ही पूछना चाहिए।
आप कहेंगे कि-आजकल के बच्चे कौनसा सुख देकर निहाल कर रहे हैं??"
तो मैं आपको बता दूँ कि-"ये सब बहुत हद तक संस्कारो और संगति पर ही निर्भर करता हैं। अगर बच्चे अभी निहाल नहीं भी करते हैं तो भी उनके पास इसके लिए कोई वाजिब-जायज़ कारण नहीं होता हैं। लेकिन, अगर आप अपना आराम, अपना सुख देखेंगे तो बच्चो के पास ना चाहते हुए भी कई कारण मिल जायेंगे कि-"हमारे माँ-बापों ने तो ऐश मारी हैं, या हमारे माँ-बाप ने फ़िज़ूल में धन लुटाया हैं, या फिर हमारे माँ-बाप ने हमारे लिए कुछ नहीं बचाया (छोड़ा), आदि-आदि।"
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कृपया मेरी इस बात पर गहन मंथन करे, शायद आपको भी अपनी भूल समझ में आ जायेगी।
(ये ब्लॉग बड़े-बुजुर्गो के खिलाफ या नौजवानों के समर्थन में बिलकुल भी नहीं लिखा गया हैं। ये ब्लॉग उस अनुभव के आधार पर लिखा गया हैं जो मुझे इस भीषण गर्मी में अपने मित्र के माध्यम से हुआ हैं।)
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धन्यवाद।
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FROM =
CHANDER KUMAR SONI,
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Sunday, May 16, 2010
जाति आधारित जन गणना क्यों???
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इस बार कि जन गणना में आज़ादी के बाद पहली बार जातियों कि गणना भी की जा रही हैं। मैं इस तरह की कवायदों के सख्त खिलाफ हूँ, इस मुद्दे पर मेरा विरोध खुलकर बेशक ना हो लेकिन अंतर्मन से जरूर हैं। आखिर किसलिए की जा रही हैं इतनी कसरत??
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इस जन गणना से सबसे बड़ा ख़तरा जातीय दुश्मनी और नफरत बढ़ने का हैं। भारत को हम सभी जात-पात से मुक्त देखना चाहते हैं लेकिन दुर्भाग्य देखिये -- आज जनगणना में जातियों की गणना को भी शामिल करते हुए अभी तक की सारी कवायदों पर पानी फेरा जा रहा हैं। सारी मेहनत को नष्ट किया जा रहा हैं, जो अभी तक देश में जात-पात के भेद और लड़ाइयों को मिटाने में की गयी हैं।
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राजनितिज्ञो के निहित स्वार्थ, लगातार बढ़ते आरक्षण, और इन सबसे पैदा हुई समस्याओं से वैसे ही जातिगत लडाइयां-टकराव के मामले बढ़ रहे हैं। ऐसे में अगर जातिगत जनसंख्या के सटीक आंकड़े सामने आ गए तो स्थिति विस्फोटक हो जायेगी। सामाज का ताना-बाना बिगड़ने का बड़ा ख़तरा हैं। जाति के आधार पर जनगणना देश के लिए आत्मघाती कदम साबित होगा। वोट बैंक की राजनीति वैसे ही देश-प्रदेश की राजनीति पर बुरी तरह हावी हैं, ऐसे में जातिगत वोट बैंक के सटीक-ठीक आंकड़े आने का मतलब हैं, राजनितिक दलों द्वारा इन्हें अपनी और खींचने के नापाक इरादे और हथकंडे।
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मुझे जातिगत जनगणना का कोई औचित्य ही नहीं नज़र आ रहा हैं सिवाय इसके कि-"जातियों के आंकड़े मालूम होने के बाद जाति-विशेष के काम ज्यादा प्राथमिकता के साथ होंगे। और इन्ही जातियों के लिए ही लोक-लुभावन योजनायें चलाई जायेंगी, बाकी जातियों को तो हाशिये पर ड़ाल दिया जाएगा।" पहले (आज़ादी के बाद -- संविधान निर्माण के वक़्त) हमेशा सिर्फ अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए ही आरक्षण जरूरी माना गया था, क्योंकि उस वक़्त उसके कई ठोस-ऐतिहासिक-और सामाजिक कारण थे।
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लेकिन, अब हर जाति आरक्षण की मांग करने लगी हैं, हर जाति बिना जरुरत-बिना वजह अपने लिए आरक्षण लेने के लिए जायज़-नाजायज़, सही-गलत, अहिंसक-हिंसक, हर संभव तरीका अपना रही हैं। जोकि सरासर गलत, अमान्य और अस्वीकार्य हैं। जिसे आरक्षण मिल जाता हैं, वो ना सिर्फ आरक्षण का दुरूपयोग करता हैं वरण अपने आपको अन्य जातियों से बड़ा, महान समझने लगता हैं। यही से जातीय विभेद, जातीय वैमनश्य, और जातीय दुश्मनी का जन्म होता हैं। दो भिन्न-भिन्न जातियों के बीच लड़ाई-तनाव-और टकराव का मुख्य कारण आरक्षण ही हैं।
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मैं इस लेख के माध्यम से किसी नेता को, किसी राजनेता को, किसी राजनितिक दल को या किसी अन्य व्यक्ति-दल को कुछ भी नहीं कह रहा हूँ, और नाही मेरा ऐसा कोई मकसद हैं। मैं तो आम जनता से, सच्चे भारतीयों से सिर्फ एक अपील/प्रार्थना करना चाहता हूँ कि--
"अपनी जाति सिर्फ और सिर्फ भारतीय और अपनी भाषा भी भारतीय (हिन्दी या आपकी मातृभाषा (अंग्रेजी या विदेशी भाषा नहीं) ही बताये।)"
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धन्यवाद।
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Monday, May 10, 2010
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प्रकृति शहरों की ओर.......
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हाल ही में मैं जिला युवा काँग्रेस के कार्यक्रमों में गया। ये कार्यक्रम राज़स्थान के विकासदूत, युवा दिलो की धड़कन, सूझवान, ऊर्जावान, और राजस्थान के मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत के जन्मदिवस के उपलक्ष्य में था। जि.यु.काँ. के ये कार्यक्रम एक सप्ताह तक सफलतापूर्वक चला। लगातार एक हफ्ते तक चले इस कार्यक्रम की विशेषता थी इसके सभी कार्यक्रमों का ग्रामीण क्षेत्रो में होना। जि.यु.काँ.के सभी कार्यक्रमों में ग्रामीणों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया और सराहा।
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लगातार सात दिनों तक चले कार्यक्रमों में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत जी के कार्यो और आदर्शो का प्रभाव था। इन्ही कार्यक्रमों में एक कार्यक्रम वृक्षारोपण (शहर से लगभग पच्चीस किलोमीटर दूर स्थित एक गाँव में) का भी था। मैं भी इस कार्यक्रम में उपस्थित था, वहाँ जिला युवा काँग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ-साथ ग्रामीणों में भी उत्साह देखने को मिल रहा था। वहाँ वृक्षारोपण करते समय ज्यादातर ध्यान नीम-पीपल-और बरगद की तरफ था। सब तरफ एक ही बात सुनाने को मिल रही थी कि-यार बरगद देना, भाई नीम हैं तो देना, क्या पीपल खत्म हो गए??, आदि-आदि। यानी जो भी व्यक्ति वृक्ष लगा रहा था वो इन तीनो में से ही कोई एक वृक्ष मांग रहा था, मानो और कोई वृक्ष-वृक्ष ना हो।
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पहले तो एक-दो बार मुझे अटपटा लगा, लेकिन बाद में मुझे बहुत अच्छा लगा। जिन वृक्षों को शहर में लगाना तो दूर, बल्कि लगे हुओं को भी धड़ल्ले से काटा जा रहा हैं, उन वृक्षों को लगाने के लिए यहाँ (गाँव में जि.यु.काँ.के कार्यक्रम में) होड़ मच रही हैं। मेरा मन खुश हो गया, संयोग से उसी दिन बेहद हलकी-हलकी बारिश भी हो रही थी। जिसकी वजह से लोगो को भीषण गर्मी से निजात भी मिल गयी थी और वृक्षारोपण के कार्यक्रम के लिए अनुकूल माहौल भी बन गया था।
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इस कार्यक्रम के बाद मेरे मन में कुछ सवाल उठ रहे थे, जिनके जवाब ग्रामीणों ने तो बेहद सरलता से और विस्तार से दे दिए हैं। अब देखना ये हैं कि-क्या शहरी लोग मेरे सवालों का जवाब दे पाते हैं या नहीं और अगर दे पाते हैं तो कब तक?? कुछ सवाल =
क्या वृक्षारोपण अभियान/कार्यक्रम शहरो में नहीं हो सकता?
क्या शहरो में पहले से लगे वृक्षों की रक्षा नहीं की जा सकती??
क्या शहरो में लगे वृक्षों को काटने से नहीं बचाया जा सकता??
क्या वृक्षों के अवैध कटान के लिए ज़िम्मेदार भू-माफिया और वन-माफिया पर सख्ती नहीं बरती जा सकती??
क्या शहरों को भी गांवो की तरह हरा-भरा और खुशहाल नहीं बनाया जा सकता?
आदि-आदि।
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जिला युवा काँग्रेस ने पर्यावरण संरक्षण की ओर कदम बढाते हुए गाँव में वृक्षारोपण किया क्योंकि इस बार के सभी कार्यक्रम (गहलोत जी के जन्मदिवस के उपलक्ष्य में) हमें गाँव में ही करने थे। लेकिन, शहरी व्यक्ति दूर-दराज जाने की बजाय अपने घर के लॉन-पार्क में, या घर के बाहर खाली पड़ी जमीन पर, या अन्य जगह पर एक वृक्ष भी तो लगा सकता हैं। आप आज नहीं तो कल पर्यावरण के महत्तव को समझेंगे, लेकिन समझेंगे जरूर। इसलिए, देर से समझने की बजाय अभी समझ जाइए ओर उचित स्थान देख कर कम से कम एक वृक्ष तो लगा ही डालिए।
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धन्यवाद।
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Tuesday, May 04, 2010
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बधाई हो ईमानदारी ज़िंदा हैं।
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इस सन्डे (दो मई) को मैं अपनी पत्नी के साथ शहर के प्रमुख पार्क में घूमने गया था। वहाँ बेंच पर बैठ कर मस्ती से गप्पे मारते हुए और भयानक गर्मी को कुल्फी से मात देने की कोशिश कर रहे थे। काफी देर पार्क में बैठने के बाद हम दोनों पति-पत्नी शहर में इधर-उधर घुमते रहे। मैंने करीब एक घंटे बाद अपनी पत्नी से मोबाइल में टाइम देख कर बताने को कहा तो उसने कहा-"मोबाइल तो आपने पास हैं।" मैंने कहा-"मेरा मोबाइल तो मेरी जेब में हैं, लेकिन सीट बेल्ट के कारण जेब से निकाल नहीं पा रहा, ड्राइविंग कर रहा हूँ। तू अपने मोबाइल में देख कर बता।" तब उसने कहा कि-"मोबाइल तो मेरे पास नहीं हैं। ओह नो, मोबाइल पार्क में रह/गिर गया। जल्दी चलो शायद मिल जाए।" मेरे हाथ-पैर फूल गए, मैंने झट से गाडी भगाई, और पार्क में पहुँच कर आस-पास की सारी जगह खंगाल डाली, लेकिन कही मोबाइल नहीं दिखा। पूरे रास्ते वो भगवान् से प्रसाद चढाने की बात कहती रही और मैंने पांच सौ रूपये का इनाम देने की बात कही।
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मैंने गाडी से और पार्क पहुँचने के बाद दो बार अपनी पत्नी के मोबाइल पर फ़ोन किया, लेकिन किसी ने उठाया नहीं। हमें लगा शायद किसी ने उठाया नहीं हैं, तभी तो घंटी जा रही हैं, वरना लोग तो सबसे पहले सिम ही निकाल फेंकते हैं, यही-कही पडा होगा। पुन: ढूंढ ही रहे थे कि-पत्नी के नंबर से फ़ोन आया, मैंने उन्हें मोबाइल के बारे में कहा और उन्हें वस्तु-स्थिति (पार्क का नाम, पार्क के बेंच की दशा/दिशा) बताई ताकि उन्हें यकीन हो जाए कि-हम जेनुइन लोग हैं।
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उस अनजान व्यक्ति ने मुझे उसी रोड पर स्थित एक हॉस्पिटल के बाहर बुलाया। मैं तत्काल वहाँ पहुंचा और दुबारा फोने किया, उसने कहा कि-मैं हॉस्पिटल के अन्दर हूँ आ जाइए।" मैं भागा, वो नहीं मिला, मैंने फ़ोन किया तो उस अनजान व्यक्ति ने कहा कि-"मैं तो वही पर हूँ, आप नहीं दिख रहे। कहाँ हो आप???" मुझे शंका हुई, मुझे लगा कि-ऐसे ही भगा रहा हैं, मोबाइल तो गया समझो। फिरभी हिम्मत जुटा कर मैंने कहा कि-"मैं मेन गेट पर खड़ा हूँ, आप आ जाइए।" तभी एक देवता के रूप में एक सरदार जी आये और मोबाइल मेरे हाथ मेन पकड़ा कर जाने लगे।
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मैंने उनहे अचंबित होकर देखा और पीछे से आवाज़ लगाकर रोका और धन्यवाद दिया। वो भी हंसता हुआ जाने लगा, मैंने उन्हें रोका और मेरा परिचय पत्र (विजिटिंग कार्ड) दिया और पांच सौ का नोट भी इनाम-स्वरुप देने लगा तो इनकार में सिर हिलाते और हँसते हुए वह जाने लगा। मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था, इतनी जल्दी खोया मोबाइल भी दे गया। बिना कोई बात किये, बिना कोई हाय-हेलो किये, सरदार जी ने मोबाइल पकडाया और जाने लगे। उन्होंने मेरे से बात करना या कोई परिचय प्राप्त करने या परिचय देने जैसा कुछ नहीं किया, बस मोबाइल दिया और चलते बने।
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और मोबाइल लेने के बाद घर आने तक सारे रास्ते हम उस सरदार जी को सद-दुआएं देते रहे और भगवान् को भी धन्यवाद ज्ञापित करते रहे। इस घटना ने मेरा विश्वास ईमानदारी में बढ़ा दिया हैं। जो लोग इस दुनिया से, लोगो के दिलो से ईमानदारी के खत्म होने की बात कहते हैं, या दुनिया में ईमानदारी नाम की किसी चीज़ के अस्तित्व को ही नकारते हैं, उन्हें इस घटना से सबक मिल सकता हैं। मोबाइल करीब साढ़े चार हज़ार रुपयों का था और उसकी रीसेल वैल्यू करीब दो हज़ार तो थी ही, ऐसे में कोई बेईमान भी हो सकता हैं। लेकिन सरदारजी ने अनुकरनिय उदाहरण पेश किया हैं। इस घटना से साबित होता हैं कि-"दुनिया में ईमानदारी अभी भी कायम हैं, बस आवश्यकता हैं तो बस ईमानदारी को प्रोत्साहित करने और खुद ईमानदार बनाने की।"
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धन्यवाद।
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Wednesday, April 28, 2010
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कब बनेगा पूरा देश महाराष्ट्र??
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अरे नहीं-नहीं आप कुछ और ना समझिएगा। मैं कोई गलत बात नहीं कह रहा हूँ। मैं ठाकरे वाले गुंडों (राज-उद्घव-या बाल ठाकरे) वाले महाराष्ट्र की बात नहीं कह रहा हूँ, मैं तो उस राष्ट्र की बात कह रहा हूँ जोकि देश कभी था।
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आज़ादी से पहले या यूँ कहिये अंग्रेजो का राज आने से पहले देश बहुत समृद्ध था, यहाँ के लोग, यहाँ की संस्कृति, यहाँ का रहन-सहन, यहाँ की बोली-चाली, आदि सब समृद्ध थे। लेकिन आज देश का दुर्भाग्य देखिये, देश कहीं से भी समृद्ध नहीं हैं।
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ना लोगो के पास पहले जैसी धन-दौलत, संपत्ति हैं, ना लोगो की बोली-भाषा में वो मिठास रही हैं, नाही लोगो में आपसी प्रेम-प्यार, भाईचारा शेष रहा हैं। और तो और जिन अंग्रेजो से देश को मुक्त कराने के लिए देश के लाखो लोगो-स्वतन्त्रता सेनानियों-और हमारे पूर्वजो ने अपना रक्त बहाया, उन्ही अंग्रेजो की संस्कृति (पश्चिमी संस्कृति जैसे-पहनावा, अंग्रेजी भाषा) को आज हम आत्मसात कर रहे हैं, लिहाजा देश की संस्कृति भी अब वो नहीं रही।
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किसी समय मेहनती लोगो की कर्मभूमि मानी जाने वाली भारत भूमि अब आलसी लोगो की भूमि बनकर रह गयी हैं। आलस भरा-मेहनत से दूर हो गयी हैं हमारी ज़िन्दगी, आज सब कुछ बदल गया हैं। हमारे आज़ादी के दिवानो और नेताओं ने कम से कम ऐसे देश की कल्पना तो नहीं की होगी जहां गरीबी, भूखमरी, अकाल, रिश्वत-घूसखोरी, भरष्टाचार, चोरी चकारी, डकैती, ह्त्या, बलात्कार, लूटपाट, दंगे फसाद, आतंकवाद, नक्सलवाद, जातिवाद, धर्मवाद, अलगाववाद, आदि का बोलबाला हो।
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अभी भी समय हैं संभल जाइए, कुछ कीजिये, देश की तस्वीर बदलने की कोशिश कीजिये। देर जरूर हो गयी हैं लेकिन इतनी भी नहीं कि कुछ किया ही ना जा सके। कुछ कीजिये, कुछ सार्थक कीजिये, कुछ भी कीजिये पर यूँ हाथ पर हाथ रखकर ना बैठिये। कुछ ऐसा कीजिये कि-"देश में खुशहाली, सुख-समृद्धि, आपसी प्रेम-प्यार, भाईचारा, और सोने की चिड़िया, आदि जैसा वातावरण पुन: तैयार हो जाए।"
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फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही हैं कि--"कब बनेगा पूरा देश महाराष्ट्र??"
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Thursday, April 22, 2010
खाप को मारो थाप।
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आये दिन खाप / जातीय पंचायतो के क्रूर और उलटे-सीधे फैसलों को सुन-सुन कर मेरे कान पक गए हैं। ऐसे नरकगामी, आदिम जमाने के फैसले सिर्फ और सिर्फ खाप पंचायते ही करती हैं। कथित रूप से अपनी इज्ज़त, मान-सम्मान को बचाने के नाम पर किसी कि भी कि जान लेने का हुक्म सुना देना, तो मानो इनके बाएं हाथ का खेल हो।
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हालांकि इसी मुद्दे को लेकर मैंने "ऑनर किलिंग" शीर्षक से एक लेख पहले (पिछले साल आठ नवम्बर को) भी लिखा था। अब फिर मुझे खाप पंचायतो के लगातार आ रहे दुस्साहसी फैसलों से इसी मुद्दे पर पुन: लिखना पड़ रहा हैं। हाल ही में हरियाणा की खाप (जातीय) पंचायतो के एक क्रूर फैसले, जिसमे प्रेमी-प्रेमिका के एक ही जाति में होने के कारण उनकी ह्त्या कर डालने का फरमान सुना दिया गया था। अक्सर कथित रूप से अपनी इज्ज़त को बचाने या अपनी झूठी आन-बान-शान को बरकरार रखने के नाम पर ऐसे कलयुगी, अमानवीय, और अमानुषिक फैसले सुना दिए जाते हैं।
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ये खाप / जातीय पंचायते मुख्यत: हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, और बिहार में कार्यरत हैं। ये बहुत ही दुःख कि बात हैं कि-"पंच-सरपंच को परमेश्वर का दर्ज़ा दिया जाता हैं, इन कथित पंच परमेश्वरो के फैसलों को सर-आँखों पर लिया जाता हैं। और जब यही पंच (परमेश्वर) ऐसे क्रूर फैसले लेते हैं तो दुःख होता हैं।
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*(मेरा मन खट्टा हो चुका हैं, इसलिए मैं आज इस बारे में ज्यादा विस्तार से नहीं लिख सकूंगा। मैं इसके लिए आप सभी ब्लॉग पाठको से माफ़ी चाहता हूँ। कृपया इसी ज्वलंत-मुद्दे से मिलते-जुलते एक और पोस्ट को पढने का कष्ट करे। आठ नवम्बर, 2009 को लिखे गए "ऑनर किलिंग" नामक पोस्ट को अवश्य पढ़े।)*
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धन्यवाद।
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Friday, April 16, 2010
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सुधरने का मौक़ा तो दीजिये।
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जी हाँ, मैं यही कह रहा हूँ, जो आपने शीर्षक में पढ़ा हैं। अव्वल तो कोई सुधरना या अपनी गलती मानना ही नहीं चाहता, और ऊपर से हम आमतौर पर सुधरने का मौक़ा किसी को देते ही नहीं हैं। मेरी बात कडवी या चुभने वाली जरूर हैं, लेकिन हैं सौलह आने सच।
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पहली बात तो आज के ज़माने में, आज के घोर कल्युग में कोई सुधरना ही नहीं चाहता और भुला-भटका कोई सुधरना चाहे तो हम उसे सुधरने नहीं देते। उसको राह दिखाने या उसका हौसला बढाने की बजाय पुराना ही याद दिलाते रहते हैं। यह बहुत ही गलत प्रवृति हैं, जिससे हमें यथासंभव बचना चाहिए।
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उदाहरण के तौर पर--कोई चोरी-चकारी करने का आदी हो और वह सुधरना या बुरी आदत छोड़ना चाहे तो हम उसे एक मौक़ा देने की बजाय सुनाते रहते हैं। यह उदाहरण जो मैंने दिया हैं, कोई ख़ास या बड़ा उदाहरण नहीं हैं, लेकिन आम-सामान्य उदाहरण जरूर हैं, जिसकी तरफ शायद ही हमने ध्यान दिया हो।
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बहुत से मामलो में तो ऐसा लगता हैं मानो लोगो ने तो जैसे शपथ ही ले ली हो कि-"किसी को सुधरने ही ना देना हो या सुधार के सारे रास्ते बन्द कर देने हो।" ये बहुत बड़ा दुर्भाग्य हैं। मसलन, जैसे किसी को अंट-शंट, उलटी-सीधी गालियाँ बकने का शौक / आदत हो और वह स्वप्रेरणा या किसी की समझाइश पर बुरी आदत को त्यागना भी चाहे तो भी ना त्याग सके। वजह.....हम उसे ऐसा करने ही नहीं देंगे। जानबूझकर उसे गालियाँ सुनायेंगे, उसे उकसाने की हाड-तोड़ मेहनत करेंगे, उसे उसका अतीत याद दिलाएंगे, तब तक-जब तक वो वापस पुराने रास्ते (गालियाँ देने) को नहीं अपना लेता। और ऐसा करके हम मानो कोई एवरेस्ट की ऊँची चोटी को छू लेते हैं।
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किसी को बार-बार सुनाना, किसी को बार-बार उसके बीते कल के बारे में बताना, या उसे ये कहना-"अब क्या हो गया तुझे??, पहले तो बहुत उछला करता था।", आदि-आदि बहुत ही निंदनीय हैं। उसे बार-बार हतोत्साहित करने का अर्थ हैं, उसके लिए सुधार का मार्ग अवरुद्ध करना। हमें उसका हौसला बढ़ाना चाहिए, उसको सुधरने के लिए प्रेरित करना चाहिए, उसे सुधरने के विभिन्न मार्ग-उपाय सुझाने चाहिए।
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जबकि हम इसके ठीक उलट करते हैं, जिसके नतीजे भी उलट ही आते हैं। समाज में बढ़ते अपराधो के लिए हम खुद ही ज़िम्मेदार हैं, कोई दुर्लभ से दुर्लभतम मामलो में कोई व्यक्ति-गुनाहगार सुधरने के लिए भुला-भटका आ भी जाए तो हम ही उसके सुधार की राह में रोड़े अटकाने लगते हैं। याद रखिये, ये वक़्त बहुत ही नाज़ुक होता हैं। ऐसे वक़्त में कड़े संयम की आवश्यकता होती हैं। बैर-भाव, गलतियों-भूलो, को भुलाकर उसे माफ़ी ना सही, पर सुधरने का मौक़ा तो देना ही चाहिए।
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ये हम सब की जिम्मेदारी हैं। ऐसा करके हम ना सिर्फ समाज से अपराधो को हटा पायेंगे, बल्कि भावी (भविष्य के) अपराधियों के लिए भी सुधार का मार्ग प्रशस्त कर सकेंगे। जब हम आज के-मौजूदा अपराधियों को सुधरने की राह दिखाएँगे, तो निश्चित रूप से हम भावी पीढ़ी के अपराधियों को भी अच्छे संस्कार दे सकेंगे।
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तो फिर आज से हम पुराना याद नहीं दिलाएंगे, राह दिखाएँगे, उत्साह बढ़ाएंगे, और सुधरने का एक मौक़ा तो अवश्य देंगे, ठीक हैं ना????
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धन्यवाद।
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Saturday, April 10, 2010
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सदैव सरकार ही निशाने पर क्यों???
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मुझे एक बात समझ में नहीं आती है कि-"हमेशा सरकार या सरकारी संस्थान ही निशाने पर क्यों रहते हैं??, प्राइवेट या निजी संस्थान/कम्पनियां निशाने पर क्यों नहीं होती हैं??" सरकार, सरकारी संस्थान, या सरकारी कम्पनियां अगर मामूली भूल भी करदे तो लोग उसे गालियाँ देने लगते हैं, लेकिन अगर किसी निजी कंपनी की बड़ी (सरकारी की तुलना में) भूल भी हो जाए तो लोग उसे बड़ी ही आसानी से नज़र-अंदाज़ कर जाते हैं। मानो, ये उसकी पहली गलती हो।
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हम क्यों ऐसा करते हैं?? क्या मिल जाता हैं हमें ऐसा करके?? किसी भी क्षेत्र में, किसी भी मामले में हम निजी को पाक-साफ़ समझते हैं, लेकिन सरकारी को हम घटिया, गिरा हुआ, और बेकार समझते हैं। इस तरह बिना पूरी बात-मुद्दे को जाने किसी (सरकार-सरकारी) के बारे में पूर्वानुमान लगाना क्या उचित हैं?? मैं किसी भी सरकारी पद या नौकरी पर नहीं हूँ और नाही मैं निजी की तुलना में सरकारी को बढ़िया-उच्च स्तरीय मानता हूँ। में तो आम लोगो से इस तरह का भेदभाव समाप्त करने की अपील कर रहा हूँ।
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मैं आपको कुछ उदाहरण देना चाहूँगा, जिससे ये साफ़ हो जाएगा कि-"निजी कम्पनियां दूध से धुली नहीं हैं, और कई मामलो में सरकारी से भी बदतर हैं।"
1. पिछले साल मुझे दिल्ली से बैंगलौर सुबह की फ्लाईट से जाना था। आप मानेंगे नहीं उस दिन ना तो कोई तूफ़ान आया था, ना बरसात हुई थी, और नाही कुछ ऐसा हुआ था, जिसकी वजेह से फ्लाईट के लेट होने को जायज़ ठहराया जा सके। वो फ्लाईट जो सुबह नौ बजे की थी, उसकी उड़ान सुबह पौने बारह बजे हुई। इतना ही नहीं, चार दिन बाद मुझे वापस दिल्ली लौटना था। इस बार भी मैं दूसरी निजी (जाने वाली से अलग फ्लाईट) फ्लाईट में सवार था। मुझे रात साढ़े नौ बजे दिल्ली पहुँच जाना था, और मैं पहुंचा रात ग्यारह बजे। अब इसे आप क्या कहेंगे??? दोनों ही बार किसी भी अखबार या खबरिया चैनल में इन फ्लाइटो के लेट होने की सूचना नहीं थी। जबकि, सरकारी विमानन सेवा दस मिनट भी लेट हो जाए तो हल्ला मच जाता हैं।
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2. यही हाल, मोबाइलों का भी हैं। सरकारी मोबिलिटी सेवा प्रदाता के मोबाइल में बात बीच में कट जाए या फोन ना मिले तो लोग कोसने लगते हैं। जबकि, निजी मोबिलिटी सेवा प्रदाता के मोबाईल में ऐसा हो तो लोग नज़रंदाज़ कर देते हैं। निजी मोबिलिटी सेवा का नेटवर्क पुरे दिन ना आये तो मामूली आह से काम चल जाता हैं, लेकिन यही अगर सरकारी हो तो लोगो की तो जैसे मौत आ जाती हैं। जब सभी निजी कंपनियों की शुरूआती कॉल दर दो रूपए होती थी, तब इस सरकारी कंपनी की कॉल दर मात्र नब्बे पैसे होती थी। जब बाकी निजी कंपनी एक रुपया प्रति एसएमएस काटती थी, तब ये सरकारी मोबिलिटी कंपनी मात्र साठ पैसा ही काटती थी। बेशक आज सभी की एकसमान दर हो, लेकिन इस सरकारी कंपनी के योगदान को नहीं भुला जा सकता। इंटरनेट और लैंडलाइन फोन के मामले में तो इसका मुकाबला हैं ही नहीं।
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3. बैंको को भी क्यूँ भूल रहे हैं आप?? निजी बैंक जहां भारी जुर्माना-चार्ज लगाते हैं वही सरकारी बैंक नाममात्र जुर्माना-शुल्क लगाती हैं। आम आदमी या गरीब आदमी को रियायती दरो पर क़र्ज़ भी सरकारी बैंको से ही मिल सकता हैं नाकि निजी बैंको से। नियम व शर्तो के मकड़जाल में निजी बैंक ही ज्यादा उलझाते हैं। लोन (क़र्ज़) की मंजूरी कराने के लिए बैंको के अधिकारी-मैनेज़र को घूस खिलानी पड़ती हैं। निजी बैंको में सरकारी बैंको से ज्यादा पैसा ऐंठा जाता हैं। बेशक, निजी बैंको में ऐसा सरकारी बैंको की तुलना में कम होता हो, लेकिन होता जरूर हैं। और निजी बैंको में रिश्वत-घूस-पैसा भी ज्यादा लिया जाता हैं। निजी बैंक दूध से धुले नहीं हैं। इतना ही नहीं, देश के शीर्ष बैंक (रिज़र्व बैंक) के पास आम धारणा के विपरीत सरकारी बैंको की तुलना में निजी बैंको की ज्यादा शिकायते आती हैं। ज्यादातर ये शिकायते गलत-नाहक खर्च जोड़ना, बताये गए से ज्यादा ब्याज दर पर जुर्माना लगाना, क्रेडिट कार्ड की गलत एकाउंट स्टेटमेंट देना, आदि से सम्बंधित होती हैं।
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4. अब आते हैं शिक्षा के मुद्दे पर। सुख-सुविधा और पढ़ाई-लिखाई के स्तर में निजी स्कूल-कॉलेज भले ही आगे हो, लेकिन उन निजी स्कूल-कॉलेजो पर नियंत्रण तो सरकार के अन्डर में ही हैं। दूसरी बात, निजी स्कूल-कॉलेज अनाप-शनाप पैसा (ड़ोनेशन की आड़ में) वसूलते हैं। सुख-सुविधा वे भले ही ज्यादा देते हो, लेकिन कम-से-कम सरकारी स्कूल-कॉलेजो की तरह लूटते तो नहीं। कभी युनिफोर्म के नाम पर, तो कभी मनमर्जी (जोकि जरुरी ना हो, पाठ्यकर्मो से अलग) की किताबो-पुस्तकों के नाम पर, कभी अन्य गतिविधियों (चित्रकला-खेलकूद, आदि) के नाम पर। आये दिन नन्हे-मुन्हे बच्चो के अभिभावकों की जेब काटते रहते हैं, और बेचारे माता-पिता अपनी संतानों के भविष्य संवारने की खातिर लुटते रहते हैं। सुख-सुविधा और पढ़ाई के स्तर में निजी स्कूल भले ही आगे हो, लेकिन सरकारी स्कूल-कॉलेजो का कोई मुकाबला नहीं हैं। अभी तक कोई ऐसा निष्कर्ष नहीं आया हैं जो सरकारी स्कूल-कॉलेज में पढ़े बच्चो को पिछड़ा या निम्न साबित कर सके। केंद्रीय विद्यालय, आईआईटी, आईआईएम, और आईआईएस का क्या कोई मुकाबला हैं??? शुरूआती (स्कूल-कॉलेज की) पढ़ाई पूरी कर लेने के बाद हर छात्र सरकारी संस्थान में जाना चाहता हैं, क्योंकि निजी आगे की पढ़ाई के लिए कोई बेहतरीन (सरकारी से ज्यादा) संस्थान नहीं हैं। रही बात परीक्षा में नक़ल कराने या निकम्मे को भी पास करा देने की बात। तो में बता दूं कि-"पहली बात तो ऐसा होता नहीं, दूसरी बात हर जगह ऐसा नहीं होता, तीसरी बात अगर होता भी हैं, तो बहुत ही दुर्लभ मामलो में। और चौथी और महत्तवपूर्ण बात--सरकारी संस्थानों में नक़ल कराकर पास कराया जाता हैं तो निजी संस्थानों में गुपचुप पैसा लेकर नंबर बढाए जाते हैं। नक़ल कराने और नम्बर बढाने, दोनों ही मामलो में पैसा ऐंठा जाता हैं। बस फर्क ये हैं कि-निजी संस्थानों में पैसा ज्यादा बेदर्दी से मारा जाता हैं।" यानी गलत कार्यो में भी सरकारी ही "बेहतर यानी सस्ता" हैं।
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अपनी मानसिकता को बदलिए। सरकारी और निजी स्कूल-कॉलेजो, संस्थानों, कंपनियों में फर्क ना कीजिये। सब को एक जैसा मत मानिए तो किसी एक (सरकारी या निजी) को सही या गलत भी ना मानिए। गलत कार्य-गलतियां-और भूले आपको दोनों की नज़र आनी चाहिए, नाकि किसी एक की। हम सबको एक पलड़े में नहीं तौल सकते लेकिन पूर्वानुमान को तो दिमाग से निकाल ही सकते हैं। अब तो आप सबको मेरा ये लेख लिखने का मतलब-उद्देश्य तो समझ में आ ही गया होगा। उम्मीद हैं, आप मेरे द्वारा दिए गए उपरोक्त कुछ सच्चे-उदाहरणों को पढ़कर मेरी नसीहतो का पालन करेंगे।
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नोट = गोपनीयता का सम्मान करते हुए सभी सरकारी-गैर सरकारी-निजी स्कूल-कॉलेजो, संगठनो, संस्थानों, और कंपनियों के नाम नहीं दिए गए हैं।
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धन्यवाद।
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FROM =
CHANDER KUMAR SONI,
L-5, MODEL TOWN, N.H.-15,
SRI GANGANAGAR-335001,
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Sunday, April 04, 2010
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कैसे मित्र हैं आपके????
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मित्र यानी दोस्त, और दोस्त यानी आपके सुख-दुःख के साथी। ये एक सिंपल, सीधी-स्पष्ट व्याख्या हैं दोस्त की। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी हैं, समाज के बिना मनुष्य का अस्तित्व ही नहीं हैं। अपने, और अपने परिवार के साथ-साथ मनुष्य को बाहरी लोगो की भी जरूरत होती हैं। यथा अड़ोसी-पडोसी, यार-दोस्त, सहपाठी-सहकर्मी, आदि। ये सब समाज का ही एक हिस्सा होते हैं और हम भी इसी समाज के एक अहम् हिस्सा हैं।
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दोस्तों, अक्सर आपने किसी ना किसी को दोस्ती के ऊपर कहते-सुनते देखा होगा?? कुछ दोस्ती के पक्ष में होते हैं तो कुछ दोस्ती के नाम के ही विपक्ष में होते हैं। कोई दोस्तों से ज्यादा अपने दुश्मनों को ज्यादा सच्चा मानता हैं तो कोई दोस्तों को अपने सगे-सम्बन्धियों-परिजनों से भी ज्यादा अहमियत देता हैं। क्या आपने कभी सोचा हैं ऐसा क्यों होता हैं?? क्यों कभी-कभी हमें अपनों से भी ज्यादा सहारा दोस्तों से मिलता हैं?? क्यों अधिकाँश मामलो में हमें अपने करीबी (ऐसा हमें लगता हैं, पर होता नहीं) दोस्तों से ही धोखा-दगा मिलता हैं??
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इन उपरोक्त सभी सवालों के जवाब हमारे अन्दर या हमारे आस-पास ही हैं। सबसे पहले तो ये सोचिये कि-आपके यार-दोस्त कितने हैं???? बहुत से लोग कहेंगे-"है कोई बीस-पचास", तो कोई कहेगा-"सैंकड़ो दोस्त हैं मेरे", और तो और कुछ महाशयो का जवाब होगा-"गिने ही नहीं, हज़ारो दोस्त हैं मेरे, एक इशारे में दोस्तों की लाइन लगा दूं....." अरे-अरे रुकिए जनाब। ये आप किस गलतफ़हमी (खुशफ़हमी) में बैठे हैं आप??? दोबारा सोच लीजिये या अपने दोस्तों की लिस्ट पुन: जांच लीजिये।
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ज्यादातर लोगो की यही तो भूल होती हैं। इसी भूल के कारण लोगो को बार-बार, मौके-बेमौके धोखा खाना पड़ता हैं। बिना सोचे-विचारे, बिना आचार-व्यवहार, चरित्र, और इतिहास (यदि पता हो तो) देखे हम अगर किसी को हम अपना मित्र मानेंगे, तो जाहिर हैं हम जानबूझ कर ख़तरा मौल ले रहे हैं। दोस्ती करना बुरा नहीं हैं और नाही दोस्तों की अधिक संख्या होना बुरा हैं। बुरा हैं बुरे लोगो से दोस्ती करना, बुरे लोगो को अपना मानना, और बुरे लोगो को बिना सोचे-समझे अपनी संगत में शामिल करना।
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माना पहली नज़र में किसी के अच्छे-बुरे होने का पता नहीं चलता हैं और नाही किसी के चेहरे पर इस सम्न्बंध में कुछ लिखा होता हैं। लेकिन, ज्यादातर लोग जानबूझ कर अपने दोस्तों की बुराइयों को नज़रंदाज़ कर देते हैं, ये सोचकर कि-"अपना क्या ले रहा हैं??, या दोस्ती में सब चलता हैं, या फिर ये सोचकर ज्यादा हद पार करेगा तो समझा दूंगा,,,,,आदि-आदि।" बस, यही हम दोस्ती के मामले में मात खा जाते हैं। पहले हम कुछ करते नहीं और जब हम कुछ करना चाहते हैं तो कुछ कर नहीं पाते। अव्वल, तो हम ना चाहते हुए भी, जाने-अनजाने अपने दोस्तों के चंगुल में फँस ही जाते हैं और उनके हर गलत-सलत कार्यो में शामिल हो जाते हैं।
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महत्तव इस बात का नहीं हैं कि-"आपके कितने दोस्त हैं?? या आपके दोस्तों कि संख्या कितनी हैं??" बल्कि, महत्तव तो इस बात का हैं कि-"आपके दोस्त कैसे हैं??, आपके मित्रो की मानसिकता-सोच कैसी हैं??, आपके मित्रो में सतचरित्र हैं भी या नहीं??, आपके दोस्त आपके काम के हैं या नहीं??," आदि-आदि। पहली बात, आपके दोस्त आपको धोखा नहीं देते हैं बल्कि आप खुद ही उन्हें धोखा-दगा देने के लिए आमंत्रित करते हैं। आपको अपने दोस्त के बारे में नहीं पता, यहाँ तक तो सही हैं। लेकिन, पता चलने पर भी आप कुछ (उसे समझाना या सही रास्ता दिखाना, या उससे धीर-धीरे दूरियाँ बढ़ाना, आदि) नहीं करते, तो इसमें सारी गलती आपकी ही हैं।
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दूसरी बात, दोस्त और जानकार होने में फर्क समझिये। आपके साथ पढने वाला या आपके दफ्तर में कार्य करने वाला या वाहन (टैक्सी, बस, या ट्रेन, हवाईजहाज, आदि) में सफ़र करने वाला आपका मित्र कैसे हो सकता हैं?? नहीं हो सकता ना। बस, यही मैं आपको कहना चाह रहा हूँ, प्रेम सबसे कीजिये, बातें सबसे कीजिये, हाय-हैलो, दुआ-सलाम सबसे कीजिये, लेकिन दोस्ती-यारी किसी-किसी से कीजिये। हर आते-जाते को, हर मिलने-जुलने-भिड़ने वाले को अपना दोस्त ना बनाइये। उसे जानिये-परखिये, और जब वो खरा उतरे तब कदम आगे बढ़ाइए।
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लोग दोस्ती में एक बार धोखा खा लेंगे, दो बार धोखा खा लेंगे, बार-बार धोखा खा लेंगे, लेकिन धीरे-धीरे उनका दोस्त और दोस्ती पर से विश्वास उठने लगेगा। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी हैं और समाज के लोगो के साथ मेलजोल बढ़ाना अत्यंत आवश्यक भी हैं। लेकिन, संभल कर-सावधानी के साथ। दोस्तों की संख्या पर नहीं उनके गुणों पर ध्यान देना जरुरी हैं।
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सबसे बड़ी बात = अगर आपके सौ दोस्त हैं, तो उनमे से सिर्फ दस-पंद्रह दोस्त ही सुख-दुःख, मुसीबत में काम आयेंगे। और उन दस-पंद्रह में से दस वो होंगे जो कभी-भी भाग सकते हैं। अगर यकीन ना हो तो जब मर्जी आजमा कर देख लीजिएगा। मैं तो बहुत बार आजमा चुका हूँ। बारम्बार धोखा खाने और दिल तोड़ने से अच्छा हैं एक बार आजमा लिया जाए। ये दुःख की बात हैं कि-"ज्यादातर यार-दोस्त खाने-पीने और पैसे के पीछे होते हैं। जो अपने दोस्तों को खिलाएगा-पिलाएगा या पैसा उडाएगा, लोग उसी से यारी बढ़ाना चाहते हैं। आप भी इस बात की सच्चाई को समझने का प्रयास करे, इसी में आपकी भलाई हैं।" ज़रा अपने आसपास निगाह दौड़ाइए, दोस्तों के खाने-पीने, और पैसा उड़ाने वाले व्यक्ति के दोस्तों की सूची आम लोगो के दोस्तों से कहीं ज्यादा होती हैं। कही आपके साथ भी ऐसा-कुछ तो नहीं???"
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मैं ये नहीं कह रहा हूँ कि-"दोस्तों के अलावा सबसे (जानकार, सहपाठी, या सहकर्मी) से तोड़ ली जाए। सबसे बनाकर रखिये, ना जाने कब उनसे अपना काम-मतलब साधना पड़ जाए। तब वे ये तो नहीं कह सकते कि-"तू अब क्यों आया हैं, तब तो तू मुझसे दोस्ती ही नहीं करना चाहता था।"
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मैं आपको मतलबी होने को नहीं कह रहा हूँ, मैं तो सिर्फ ये कहना चाहता हूँ कि-"दोस्त सीमित और भरोसेमंद-चरित्रवान रखिये, जो वक़्त-बेवक्त हाज़िर हो, बाकियों के साथ ज्यादा नहीं तो थोड़ी-बहुत तो राम-रामी रखी ही जा सकती हैं। या इसमें भी कोई हर्ज़ हैं......??????"
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धन्यवाद।
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Monday, March 29, 2010
ऐसा तो सिर्फ भारत में ही संभव हैं।
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हाल ही में विभिन्न समाचार चैनलों और समाचार पत्रों में एक खबर को पढ़ कर बड़ी हैरानी हुई। दरअसल वो खबर ही ऐसी थी, आप भी जानेंगे तो हैरान रह जायेंगे।
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और वो खबर यह थी कि-"केंद्र सरकार जल्द ही एक ऐसा क़ानून लाने जा रही हैं, जिसमे तेल, गैस की पाईपलाइन या वाहन को आग लगाने वाले या नुक्सान पहुंचाने वाले को उम्रकैद की सज़ा होगी। और तो और अपराधी को अपनी बेगुनाही को साबित भी स्वयं ही करना पडेगा।"
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क़ानून बहुत ही अच्छा और स्वागत-योग्य हैं। निश्चित रूप से उन लोगो को सबक सिखाने वाला और हतोत्साहित करने वाला हैं, जो अपनी मांगो को पूरी करवाने के लिए तेल, गैस, आदि के वाहनों-पाईपलाइनो को आग लगाते-नुक्सान पहुंचाते रहते हैं। देश की संपत्ति हैं तेल-गैस। आम जनता और देश के विकास का एक मजबूत-सशक्त आधार हैं ये। लेकिन, मेरी चिंता तो इस बात को लेकर हैं कि-"देश के बाकी कानूनों जैसा ह्श्न ना हो इस क़ानून का, कही ये क़ानून भी देश के अन्य कानूनों की तरह कागजी ही ना रह जाए।"
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वैसे देश के अन्य कानूनों का प्रभावी उपयोग, प्रभावी पालना होनी ज्यादा जरूरी हैं। ये क़ानून अच्छा जरूर हैं, लेकिन इस क़ानून से आम जनता को कोई विशेष लाभ नहीं होने वाला। माना कि-"ये क़ानून देश की अर्थव्यवस्था को नुक्सान होने से कुछ हद तक रोकेगा।" लेकिन, क्या गारंटी हैं कि-"इस क़ानून का हाल बाकी कानूनों जैसा नहीं होगा??" लेकिन ज़रा सोचिये-"तेल-गैस के टैंकरों-वाहनों, और पाइपलाइनों को आगजनी या नुक्सान पहुंचाने की कितनी कोशिशे होती हैं??, कितना तेल या गैस बेकार/नष्ट होता हैं इन मामलो में??" जाहिर हैं बहुत कम, ना के बराबर, नगण्य।
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तो फिर क्या जरूरत हैं नए क़ानून लाने की??, वो भी ऐसे मुद्दे को लेकर, जिसका आम जनता से कोई सरोकार ही नहीं हैं??, क्यों ला रहे हैं ये क़ानून??, क्या सिर्फ वह-वाही लूटने के लिए??, या फिर जनता का ध्यान कही और करने के लिए??, किसलिए लायेंगे आप ये क़ानून??, किसका भला हैं, इस क़ानून में??, बताइये, जनता आपसे कुछ पूछ रही हैं, जवाब दीजिये......। अरे आप क्या जवाब देंगे??, आपके पास तो जवाब हैं ही नहीं।
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अगर तेल-गैस की इतनी ही चिंता हैं तो जनता तक तेल-गैस पहुंचाइये।
जितना तेल-गैस उपलभध हैं या उत्पादित हो रहा हैं, उसे जनता को मुहैया कराइए।
ब्लैक मार्केटिंग, काला बाजारी को रोकिये।
महंगा-सस्ता के बारे में मैं कुछ नहीं कहूंगा, लेकिन आप जो भी भाव-दाम लगाइए, लेकिन उसे आम जन को तो दीजिये।
तेल-गैस की किल्लत-कमी को दूर कीजिये।
करने को तो बहुत कुछ हैं, अगर आपकी मंशा, इच्छाशक्ति हो तो।
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ये तो बात थी तेल-गैस की, अब बात करते हैं अन्य कानूनों की। चोरी-डैकैती को रोकिये, हत्याओं-बलात्कारो को रोकिये, लूटपाट-दंगो को रोकिये, दहेज़ हत्याओं-बाल विवाहों को रोकिये, अपहरणों-फिरौतियों को रोकिये, आदि-आदि। और इन सभी के लिए क़ानून भी बने हुए हैं, वे क़ानून सख्त हैं या नहीं?? मुद्दा ये नहीं हैं, मुद्दा हैं कानूनों की प्रभावी पालना, जोकि हो नही रही हैं। ये क़ानून सीधे-सीधे आम जन से जुड़े हुए हैं, इन कानूनों में आम जनता के हित जुड़े हुए हैं। नाकि उस क़ानून में, जिसको आप जल्द ही लागू करने की मंशा लिए हैं। ये क़ानून जरूरी जरूर हैं, लेकिन इससे भी जरुरी हैं मौजूदा अन्य कानूनों की पालना।
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वैसा ऐसा सिर्फ और सिर्फ भारत में ही संभव हैं, जहां सरकार क़ानून बनाना ही जानती हैं, पालना करना नहीं। और तो और सरकार को जब क़ानून बनाने के लिए कोई उपयुक्त स्थान नहीं मिला, तो ऐसे मुद्दे पर क़ानून बनाने में व्यस्त हो गई हैं, जिसका आम आदमी से कोई सरोकार ही नहीं हैं।
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धन्यवाद।
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