मेरे इस ब्लॉग का उद्देश्य =

मेरे इस ब्लॉग का प्रमुख उद्देश्य सकारात्मकता को बढ़ावा देना हैं। मैं चाहे जिस मर्ज़ी मुद्दे पर लिखू, उसमे कही ना कही-कोई ना कोई सकारात्मक पहलु अवश्य होता हैं। चाहे वह स्थानीय मुद्दा हो या राष्ट्रीय मुद्दा, सरकारी मुद्दा हो या निजी मुद्दा, सामाजिक मुद्दा हो या व्यक्तिगत मुद्दा। चाहे जो भी-जैसा भी मुद्दा हो, हर बात में सकारात्मकता का पुट जरूर होता हैं। मेरे इस ब्लॉग में आपको कही भी नकारात्मक बात-भाव खोजने पर भी नहीं मिलेगा। चाहे वह शोषण हो या अत्याचार, भ्रष्टाचार-रिश्वतखोरी हो या अन्याय, कोई भी समस्या-परेशानी हो। मेरे इस ब्लॉग में हर बात-चीज़ का विश्लेषण-हल पूर्णरूपेण सकारात्मकता के साथ निकाला गया हैं। निष्पक्षता, सच्चाई, और ईमानदारी, मेरे इस ब्लॉग की खासियत हैं। बिना डर के, निसंकोच भाव से, खरी बात कही (लिखी) मिलेगी आपको मेरे इस ब्लॉग में। कोई भी-एक भी ऐसा मुद्दा नहीं हैं, जो मैंने ना उठाये हो। मैंने हरेक मुद्दे को, हर तरह के, हर किस्म के मुद्दों को उठाने का हर संभव प्रयास किया हैं। सकारात्मक ढंग से अभी तक हर तरह के मुद्दे मैंने उठाये हैं। जो भी हो-जैसा भी हो-जितना भी हो, सिर्फ सकारात्मक ढंग से ही अपनी बात कहना मेरे इस ब्लॉग की विशेषता हैं।
किसी को सुनाने या भावनाओं को ठेस पहुंचाने के लिए मैंने यह ब्लॉग लेखन-शुरू नहीं किया हैं। मैं अपने इस ब्लॉग के माध्यम से पीडितो की-शोषितों की-दीन दुखियों की आवाज़ पूर्ण-रूपेण सकारात्मकता के साथ प्रभावी ढंग से उठाना (बुलंद करना) चाहता हूँ। जिनकी कोई नहीं सुनता, जिन्हें कोई नहीं समझता, जो समाज की मुख्यधारा में शामिल नहीं हैं, जो अकेलेपन-एकाकीपन से झूझते हैं, रोते-कल्पते हुए आंसू बहाते हैं, उन्हें मैं इस ब्लॉग के माध्यम से सकारात्मक मंच मुहैया कराना चाहता हूँ। मैं अपने इस ब्लॉग के माध्यम से उनकी बातों को, उनकी समस्याओं को, उनकी भावनाओं को, उनके ज़ज्बातों को, उनकी तकलीफों को सकारात्मक ढंग से, दुनिया के सामने पेश करना चाहता हूँ।
मेरे इस ब्लॉग का एकमात्र उद्देश्य, एक मात्र लक्ष्य, और एक मात्र आधार सिर्फ और सिर्फ सकारात्मकता ही हैं। हर चीज़-बात-मुद्दे में सकारात्मकता ही हैं, नकारात्मकता का तो कही नामोनिशान भी नहीं हैं। इसीलिए मेरे इस ब्लॉग की पंचलाइन (टैगलाइन) ही हैं = "एक सशक्त-कदम सकारात्मकता की ओर..............." क्यूँ हैं ना??, अगर नहीं पता तो कृपया ज़रा नीचे ब्लॉग पढ़िए, ज्वाइन कीजिये, और कमेन्ट जरूर कीजिये, ताकि मुझे मेरी मेहनत-काम की रिपोर्ट मिल सके। मेरे ब्लॉग पर आने के लिए आप सभी पाठको को बहुत-बहुत हार्दिक धन्यवाद, कृपया अपने दोस्तों व अन्यो को भी इस सकारात्मकता से भरे ब्लॉग के बारे में अवश्य बताये। पुन: धन्यवाद।

Sunday, January 10, 2010

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भला हो इस हाड़-कम्कपाती भीषण सर्दी का।
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अरे-अरे हैरान मत होइए, मैं किसी को सर्दी से मरने की बददुआ नहीं दे रहा हूँ। मैं तो सर्दी की भलाई की कामना एक विशेष कारण से कर रहा हूँ। मुझे भी सर्दी लगती हैं, मैं भी आखिर एक इंसान ही हूँ, मुझे भी ठण्ड का भली-भाँती एहसास हैं। मैं एक संवेदनशील व्यक्ति हूँ, मुझसे लोगो को सर्दी से झूझते-कांपते नहीं देखा जाता हैं। मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि-"लोगो की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मज़बूत बनाए रखना, लोगो को ठण्ड-सर्दी से बचाए रखना। लोगो को, बच्चो को, बूढों को, और विशेषकर मरीजो को खांसी, जुकाम, गला खराब, आदि सर्दीजनित तकलीफों से दूर रखना।"
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लेकिन फिर भी मैं एक स्पेशल कारण से हाड़ कम्कपा देने वाली इस भीषण सर्दी की भलाई की कामना ही कर रहा हूँ। जी हाँ, और वो विशेष कारण हैं="सर्दी ने लोगो के बीच जाने-अनजाने प्रेमभाव को बढ़ा दिया हैं।" जैसा की आप सब जानते ही हैं कि-"सर्दी से बचाव के लिए लोग अलाव तापते हैं। अमीर हो या गरीब हर किसी के लिए चौबिसो घंटे हीटर चलाना किफायती/संभव नहीं हैं, इसलिए हर कोई अलाव तापना-आग जलाकर हाथ सेंकना पसंद करता हैं।"
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बस यही कारण हैं जिसकी वजह से मैं कह रहा हूँ-"भला हो इस हाड़-कम्कपाती भीषण सर्दी का।" इस अलाव तापने ने तो अनायास ही लोगो के बीच प्रेम पैदा कर दिया हैं। इस अलाव ने तो वो काम कर दिखाया हैं, जो बड़े-बड़े धुरंधर नहीं कर पाए। अपने हैं या पराय, दोस्त हैं या दुश्मन, लाभ देने वाला हैं या हानि, ऊँचे ओहदे-जाति का हैं या नीची, आदि सारे भेद भुला दिए हैं इस अलाव तापने ने। अलाव ताप कर सर्दी भगाने के साथ-साथ लोगो के बीच मौजूद मनभेद, मतभेद, गुस्सा-नाराजगी, और अलगाव को भी भगाया जा सकता हैं।
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अगर मेरी उपरोक्त बात पर यकीन ना हो तो ज़रा अपने आस-पास नज़र उठा कर देखिये। मैं कुछ उदाहरण देना चाहूँगा =
01. बाज़ार के दो पडोसी दुकानदारों के बीच (सामान के कारण दूकान छिपने की बात को लेकर) काफी समय से खटपट चल रही थी। कल जब मैं किसी कार्य से बाज़ार गया हुआ था, तो यह देखकर हैरानी हुई कि-"दोनों दुकानदार हाथ सेंक रहे थे।" एक दूकान वाले ने अपनी दूकान के आगे कचरे का ढेर लगाकर अलाव जला रखा था।
02. हमारी फैक्ट्री के किन्ही दो श्रमिको में किसी बात को लेकर बोलचाल हो गयी। नौबत हाथापाई तक भी पहुँच जाती अगर अन्य लेबर बीच में ना पड़ती तो। घंटे-दो घंटे बाद दृश्य ही बदल चुका था, अब दोनों लेबर साथ-साथ बायलर के समक्ष खड़े थे।
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वाकये और भी बहुत हैं, पर उपरोक्त दो उदाहरण मेरी आँखों-देखी वाकये हैं। अगर आप नज़रे घुमाकर देखेंगे, तो आप को भी ऐसे या इससे मिलते-जुलते काफी वाकये मिल सकते हैं। हो सकता हैं आपको मेरी बातें झूठी या गप्प लगे, पर हैं इसमें सच्चाई। याद कीजिये, हो सकता हैं कि-"आपने भी कभी चलते-फिरते किसी को अलाव तापने का निमंत्रण दिया हो, जिसे आप पसंद ना करते हो।" या फिर-"आपको किसी ऐसे व्यक्ति ने अलाव तापने-हाथ सेंकने का निमंत्रण दिया हो, जो आपसे नफरत करता हो।" हो सकता हैं कि-"आपका जवाब ना में हो या आपको ऐसे कोई वाकये याद ना आये।" परन्तु मेरे साथ तो ऐसा बहुत दफा हो चुका हैं और हो रहा हैं, और विश्वास हैं कि भविष्य में भी ऐसा होता रहेगा।
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वैसे आपके साथ ना सही, कही आते-जाते आपके कानो में यह शब्द तो अवश्य पड़े होंगे कि-"यार, कहाँ ठण्ड में फिर रहा हैं, आजा थोड़ा गरम हो ले।" या फिर सरदारों-पंजाबियों में यह तो जरूर ही सुना होगा कि-"छड यार, सारी गल्लां छड, बस नाल आके हाथ सेंकले।" और अगर ऐसा कुछ नहीं सुना हैं-"तो जनाब, कान खुले रखकर घर से बाहर तो निकलिए। अलाव ने कैसे-कैसे चमत्कार किये हैं और क्या कर रही हैं??, इसके लाईव (चश्मदीद) गवाह बनिए।"
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अलाव तापने ने तो वाकई अनोखा काम कर दिखाया हैं। अपने-पराये, छोटे-बड़े, दोस्त-दुश्मन, लाभ देने वाला-हानि देंने वाला, ऊँचे ओहदे-जाति वाले और नीची ओहदे-जाति वालो, आदि सारे भेद-बंधन भुला दिए हैं इस अलाव तापने ने। मुझे तो विश्वास नहीं होता कि-"अलाव ताप कर सर्दी भगाने के साथ-साथ लोगो के बीच मौजूद मनभेद, मतभेद, गुस्सा-नाराजगी, और अलगाव को भी भगाया जा सकता हैं।"
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अब तो आप सब समझ गए होंगे कि-"आप सब तो ठण्ड के खत्म हो जाने की प्रार्थना में लगे हुए हो और क्यों मैं सर्दी के प्रकोप के जारी रहने कि प्रार्थनाएं कर रहा हूँ???"हालांकि, कुछ लोग कह सकते हैं कि-"अलाव तापने से कोई गुस्सा-नाराजगी खत्म नहीं होती हैं??, अलाव तापना समय गुजारने का माध्यम मात्र हैं।" लेकिन उनकी इस बात का मेरे पास एक ही जवाब हैं कि-"अगर किन्ही दो (या ज्यादा) जनों में ना बनती हो तो साथ अलाव तापने की बजाय अलग अलाव नहीं क्यों नहीं ताप लेते??" और सबसे बड़ी बात-"साथ अलाव तापने से दोनों (या ज्यादा) विरोधियों के हाथ एक ही दिशा में होते हैं" और मेरा मानना हैं कि-"आज हाथ एक दिशा में हैं, कल विचार-सोच, और समझौता भी एक ही दिशा में होगा।"
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कई स्थानों पर तो अनजान आदमियों क़ा ग्रुप भी अलाव तापता मिल जाता हैं, जो एक दुसरे को जानते तक नहीं। बस कही आग जलती मिली नहीं कि-"एक-एक करके कई लोग इकट्ठे होकर अलाव तापने-हाथ सेंकने लगते हैं।" ऐसे दृश्य दिली सुकून प्रदान करते हैं। क्या ऐसे मनोरम दृश्य देखकर कोई कह सकता हैं कि-"अलाव तापना प्रेम भाव नहीं बढाता हैं या नफरत-घृणा-या बैर भाव कम नहीं करता हैं।" इसीलिए मैं कह रहा हूँ कि-"भला हो इस हाड़-कम्कपाती भीषण सर्दी का।" क्यों कुछ समझे कि नहीं?????, समझ गए तो कहिये मेरे साथ-"भला हो इस हाड़-कम्कपाती भीषण सर्दी क़ा जो लोगो के बीच अनायास ही प्रेमभाव पैदा कर रही हैं।"
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धन्यवाद।
FROM =
CHANDER KUMAR SONI,
L-5, MODEL TOWN, N.H.-15,
SRI GANGANAGAR-335001,
RAJASTHAN, INDIA.
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Tuesday, January 05, 2010

:: हॉकरो को सच में "रीढ़ की हड्डी" मानिए ::



अभी कुछ दिनों पहले श्री गंगानगर के सभी हॉकर्स की मीटिंग हुई। यह मीटिंग शहर के सभी हॉकरो के संगठन "हॉकर यूनियन" के बैनर तले हुई थी। इस मीटिंग में करीब-करीब सारे हॉकर और सभी छोटे-बडे अखबारों के सम्पादक-मालिक शामिल हुए। इस मीटिंग में इस संगठन के वर्तमान अध्यक्ष को लगातार पांचवी बार अध्यक्ष चुना गया।



इस मीटिंग में हॉकरो की खूब बड़ाई की गयी, उनकी तारीफों के पुल बांधे गए, उन्हें (हॉकरो को) सभी अखबार वालो (सम्पादक-मालिक) ने अखबार-समाचार पत्र के लिए रीढ़ की हड्डी तक कहा। सभी के सभी हॉकरो की तारीफ़ पर तारीफ किये जा रहे थे, सभी हॉकरो के सम्मान में बढ़ा-चढ़ा कर बखान दे रहे थे। कोई कुछ तो कोई कुछ कह रहा था, हर किसी के आकर्षण का केंद्र एकमात्र हॉकर ही थे। इसी तरह कुछेक घंटो में यह मीटिंग ख़त्म हो गयी और सभी के सभी अपने-अपने ठिकानों पर चले गए।



लेकिन मैंने यह ब्लॉग ऐसे ही या टाईमपास के लिए नहीं लिखा हैं। मैं इस ब्लॉग के माध्यम से हॉकरो की आवाज़ बुलंद करना चाहता हूँ और मुझे विश्वास हैं कि-"जो भी यह ब्लॉग पढेगा वो हॉकरो के बारे में अवश्य सोचेगा।" मेरा मकसद किसी की बुराई करना या किसी की तरफ ऊंगली उठाना नहीं हैं। मैं सिर्फ और सिर्फ सकारात्मकता के लिए ही लिखता था, लिखता हूँ, और आगे भी लिखता रहूंगा। इस बार भी मैं हॉकरो के मान-सम्मान को बचाए रखने और उनके शोषण को रोकने के लिए ही लिख रहा हूँ।



अभी कुछ दिनों पहले हुई मीटिंग में हॉकरो को अखबार-समाचार पत्र के लिए रीढ़ की हड्डी तक कहा गया। लेकिन, क्या किसी ने उनकी दुर्दशा की तरफ देखा हैं?, हॉकर किस तरह और किन परिस्थितियों में कार्य करता हैं, इस तरफ किसी ने नज़र भी डाली?? उन्हें (हॉकरो को) रीढ़ की हड्डी बताने मात्र से कुछ नहीं होगा, उन्हें रीढ़ की हड्डी मानना ही होगा। जिस तरह हम सब अपनी-अपनी कमर/रीढ़ की हड्डी का विशेष ख्याल रखते हैं, उसी तरह इनका भी विशेष ख्याल रखना होगा। जिस तरह हम यह जानते हैं कि-"रीढ़ की हड्डी में गड़बड़ होने से हम अपंग-लाचार हो जाते हैं।" उसी तरह अखबार वाले भी इस बात को अच्छी तरह से समझते हैं, परन्तु ना जाने क्यों वे इनकी (हॉकरो की) भूमिका को नज़र-अंदाज करते हैं??



मैं समस्त समाचार-पत्रों के संपादको/मालिको का ध्यान हॉकरो को मिलने वाले कम कमीशन की ओर दिलाना चाहता हूँ। पाठको क्या आपने कभी सोचा हैं कि-"हॉकर भाई कितने मामूली कमीशन पर काम करते हैं??, सर्दी-गर्मी उन्हें हर रोज़ सुबह पांच बजे उठना पड़ता हैं। उन्हें किसी भी दिन-किसी भी मौके पर, किसी भी बिमारी या दुःख-दर्द में भी छुट्टी नहीं मिलती हैं। क्योंकि सिर्फ वे ही जानते हैं कि-"किस-किस घर/दूकान में अखबार बांटना हैं??" जिस दिन वे (हॉकर) नहीं आ पाते उस दिन पाठको को अखबार नहीं मिल पाता। समाचार पत्र वाले (कुछेक को छोड़कर) भी कोई अन्य व्यक्ति नहीं भेज पाते, क्योंकि अन्य व्यक्ति कुछेक घरो/दुकानों को जानता हैं, बाकियों को नहीं।



मुझे यह कहने में ज़रा भी शर्म-संकोच या डर नहीं है कि-"कुछेक समाचार-पत्र वालो को छोड़कर अमूमन हरेक अखबार वाला हॉकर को तंग-परेशान, और शोषण भी करता हैं।" ज्यादातर हॉकर अपने पेट या कहिये नौकरी की खातिर शोषण-जुल्म को सहता रहता हैं। यदा-कदा अति होने पर भले ही वह अखबार छोड़ दे पर दुसरे अखबार वाले के यहाँ ऐसा नहीं होगा, इसकी कोई गारंटी नहीं। बाकी सच्चाई तो यही हैं कि-"शोषण पर बगावत करने या शिकायत करने वाले दुर्लभ ही होते हैं।"



मैं सभी समाचारपत्रों और अखबारों के संपादको-मालिको से पूछना चाहता हूँ कि-"उन्होंने हॉकरो के कल्याण-उत्थान के लिए क्या किया हैं??, हॉकरो के लिए क्या उन्होंने कोई नीतियाँ बनाई हैं?" मीटिंगों में, बैठकों में तो बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, लेकिन हॉकरो के लिए करते कुछ नहीं। अपने ऊपर हों रहे जुल्म-अत्याचार-और शोषण से आजिज आकर जब कोई हॉकर विद्रोह कर बैठता हैं, तो आप उसे निकालते वक़्त ही नहीं लगाते। फट से दुसरे हॉकर का इंतज़ाम आप कर लेते हैं। लेकिन आप इतना भी नहीं सोचते कि-"उसकी मांग, उसकी इच्छा जायज़ भी हैं या नहीं????" बस किसी हॉकर ने मुंह खोला नहीं कि............



मेरी इस बात पर कुछ अखबार वाले आपत्ति उठा सकते हैं। वे कह सकते हैं कि-"अखबार तो हॉकर सिर्फ दो या तीन घंटे ही बाँटते हैं, इसके लिए उन्हें क्या दे और कितना दे???" लेकिन सम्पादक/मालिक महोदय मैं जो कह रहा हूँ वो आप अभी भी नहीं समझे हैं। आप यह क्यों नहीं देखते-सोचते कि-"उनके दो-तीन घंटे आपके पूरे दिन से भी ज्यादा हैं, आप पूरे दिन अखबार के लिए खबरे ढूंढते हैं, फिर खबरों की एडिटिंग (काँट-छांट) करते हैं, उसके बाद आपका अखबार छपता हैं। माना कि-"सारा काम, सारी मेहनत आप खुद करते हैं, लेकिन किसके लिए?? पाठको के लिए ना??? और जब पाठको तक ही अखबार नहीं पहुँच पायेगा तो आपकी मेहनत व्यर्थ नहीं चली जायेगी??" इसीलिए मैं कह रहा हूँ कि-"आप लोगो के पूरे दिन के बराबर की मेहनत हॉकर के 2-3 घंटे की मेहनत हैं। आपकी मेहनत को सफल बनाने और आपकी मेहनत को व्यर्थ ना होने से बचाने वाला यह आपका "मामूली" हॉकर हैं।"


आप लोगो के लिए युआईटी ने काफी बड़ी पत्रकार कालोनी भी काटी हैं। लेकिन आप अकेले ही उस कालोनी के वर्तमान या भविष्य के निवासी हैं। कभी आपने इन हॉकरो के लिए सोचा हैं???, आप पूरी कालोनी ना सही कही छोटा-सा भूखंड या अपनी ही पत्रकार कालोनी की कुछ जगह इनके लिए अलोट करवा सकते थे। भले ही वह कालोनी सरकार ने सिर्फ पत्रकारों के लिए ही काटी हो, लेकिन अगर आप सरकार को हॉकरो की अहमियत और उनके योगदान के बारे में बताते तो क्या सरकार हॉकरो के लिए कुछ ना करती???? आपकी नीयत में शुरू से ही खोट था, तभी तो आपने अपने समाचारपत्रों के इन असली कर्णधारों-हीरो को जानबूझ कर नज़रअंदाज़ कर दिया।


आप सब (सम्पादक-मालिक) भलीभाँति जानते हैं, हीरा एक बहूमूल्य पत्थर हैं, सभी धातुओं से भी कीमती। लेकिन हीरे की खुद की कीमत बहुत मामूली होती हैं, उसकी कीमत उसकी तराशी से बढती हैं। हीरा उसे तराशने वालो की मेहरबानी-दया से ही अनमोल हों पाता हैं। ठीक हीरे की तरह आपके अखबार की कीमत भी हॉकर से ही बढती हैं। माना कि-"समाचारपत्र में आने वाली खबरें, उसकी भाषा, उसकी सच्चाई और ईमानदारी, और स्पष्टीकरण पर बहुत कुछ निर्भर करता हैं, पर इन सब चीजों को पाठको तक पहुंचाने वाला भी तो हॉकर ही हैं।"


आप हॉकर के योगदान और अहमियत को क्यों नहीं देखते हैं??????, आप उसकी काबिलियत को क्यों नहीं परखते हैं???, आप अपने अखबार को घर-घर पहुंचाने वाले को रीढ़ की हड्डी कहते हैं, पर कुछ करते क्यों नहीं??, क्या उन्हें (हॉकरो को) "रीढ़ की हड्डी" की उपमा देने मात्र से उनका उत्थान-कल्याण हो सकता हैं?? यह हॉकर ही असली कर्णधार हैं। अखबार और पाठको के बीच की मज़बूत कड़ी हैं हॉकर। कृपया इनके सम्बन्ध में कुछ कीजिये। ज़रा सोचिये, उनके बारे में विचार तो कीजिये।

हॉकरो पर होने वाले जुल्म-शोषण-अत्याचार की मुख्य वजह उनमे एकता ना होना और उनमे बिखराव होना हैं। पर महज किसी में बिखराव होने या एकता ना होने मात्र से कोई किसी का शोषण करता हैं, तो वह निन्दनिय हैं।

धन्यवाद।

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Friday, January 01, 2010

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नए साल की हार्दिक शुभकामनाएं।



आप सभी मेरे ब्लॉग-पाठको, मेरे यारो-मित्रो, मेरे सभी परिजनों-सम्बन्धियों, रिश्ते-नातेदारो, और शुभचिंतको को मेरी तरफ से नए साल की हार्दिक शुभकामनाएं। नववर्ष आप सभी के लिए ढेरो खुशियाँ, समृद्धियाँ, और सुख-शान्ति लाये। ऐसी मेरी ईश्वर से सद-प्रार्थना हैं।



पिछ्ला साल अपनी अच्छी-बुरी, खट्टी-मीठी यादों को लेकर बीत गया हैं। और आज नए साल, नई उमंग का आप-मैं, और हम सभी ने जोरदार ढंग से स्वागत किया हैं। और ज़ाहिर हैं, नए साल के स्वागत के साथ-साथ आपने कोई नया संकल्प भी जरूर लिया होगा। बीते पिछले साल की गलतियों-भूलो से सबक-शिक्षा लेते हुए आपने अवश्य ही कोई अच्छा-सर्वउपयोगी प्रण-संकल्प लिया होगा।



मैंने भी एक नहीं कई संकल्प लिए हैं। जी हाँ, इन कई संकल्पों में कुछ मेरे लिए, कुछ परिवार के लिए, तो कुछ दूसरो के लिए हैं। मैं आपको अपने एक भी संकल्प के बारे में अभी नहीं बताउंगा, अगले साल की शुरुआत में या जब भी यह संकल्प पूरे हो जायेंगे तब बताउंगा।



आज ही नए साल के पहले दिन, मैंने अपने एक दोस्त से वैसे ही उसके नए साल के संकल्प के बारे में पूछ लिया, तो उसका जवाब आया-"अरे कैसा संकल्प यार, किसका संकल्प लूं, कैसा संकल्प लूं, मैं तो पढ़ाई-लिखाई से ही फ्री नहीं हो पा रहा हूँ। आज सब लोगो ने नए साल का स्वागत जशन मना कर किया, और मैं एक हफ्ते बाद बेंगलुरु में होने वाले इंटरव्यु की तैयारियों में डूबा रहा। और तू संकल्प की बात कर रहा हैं..............."



दोस्तों, आप में से भी कई लोग या आपकी जानकारी में, ऐसे लोग हो सकते हैं, जिन्होंने कोई प्रण ना लिया हो या ज़िन्दगी की भाग-दौड़ में उन्हें प्रण लेने का विचार ही ना आया हो। होता हैं, दुनिया में सब कुछ होता हैं, एक दुनिया ऐसी भी हैं जिनके लिए प्रण-संकल्प किसी सब्जबाग़-धोखे से कम ना हो। लेकिन मैं आप सभी पाठको बता देना चाहता हूँ कि-"प्रण या संकल्प कोई पहाड़ जितनी बड़ी चीज़ नहीं हैं, यह कोई ऐसी चीज़ नहीं हैं जिसको लेने के लिए कोई पात्रता (उम्र-हैसियत-पढ़ाई-या कोई और क्वालिफिकेशन) आवश्यक हो। आप पिछले साल की भूलो को सुधारने या ना दोहराने का संकल्प ले सकते हैं। आप कुछ अपने लिए, कुछ परिवार के लिए, तो कुछ दूसरो के लिए, संकल्प ले सकते हैं।"



सबसे बड़ी बात मैं आपको बता देना चाहता हूँ कि-"संकल्प या प्रण आप कभी भी, कही भी, किसी भी वक़्त, और कितनी भी ली सकते हैं। आप एक संकल्प भी ले सकते हैं या ज्यादा संकल्प भी ले सकते हैं, लेकिन ले वही जो आप पूरे कर सके। संकल्प लेने के लिए किसी नए साल के आने या किसी साल के बीतने का इंतज़ार नहीं किया जा सकता हैं। नए साल की शुरुआत में प्रण लेने का सिर्फ यही महत्तव हैं, कि-"आप उस प्रण को पूरा करने की पूरी कोशिश करे, बस।" उन लोगो ने जिन्होंने नए साल की शुरुआत में कोई संकल्प नहीं लिया हैं, उनके लिए मैं कुछ संकल्प-प्रण बता रहा हूँ, जो वे अपनी सहूलियत-सुविधा के अनुसार ले सकते हैं =



आप खुद की कोई बुरी आदत (गुस्सा, गाली-गलौच, जलन की भावना, आदि) छोड़ने/कम करने का प्रण ले सकते हैं, आप कोई नशा (बीडी, सिगरेट, जर्दा-गुटका, आदि) त्यागने/कम करने का प्रण ले सकते हैं, आप बिजली की एक-एक इकाई बचाने का प्रण ले सकते हैं, आप थाली में जूठा भोजन ना छोड़ने का संकल्प ले सकते हैं, आप यातायात नियमो का पालन करने का संकल्प ले सकते हैं, आप पानी की एक-एक बूँद सहेजने का प्रण ले सकते हैं, आप अपने नकारात्मक विचारों को बदलने का प्रण ले सकते हैं, आप महीने या हफ्ते या साल में कभी भी अनाथो-वृद्धो-विधवाओं की सेवा करने का संकल्प ले सकते हैं, आप फ़ोन-मोबाइल-बिजली-पानी आदि का बिल समय पर भरने का संकल्प ले सकते हैं, आप नियमित रूप से पूरा-बिना किसी चोरी के टैक्स/कर अदा करने का संकल्प ले सकते हैं, आप सच्चाई-ईमानदारी जैसे नैतिक मूल्यों पर आने या अडिग रहने का संकल्प ले सकते हैं, आप अपने परिवार-बीवी-बच्चो को अधिक समय-देखभाल देने का संकल्प ले सकते हैं, आप अपने बिजनेस-व्यापार, काम-धंधे को उन्नति-ऊँचाई पर ले जाने का प्रण ले सकते हैं, आप समाजसेवा करने का प्रण ले सकते हैं, आदि-आदि........और भी बहुत कुछ हैं संकल्प-प्रण लेने योग्य......



अब मैंने आपको कई सुझाव दे दिए हैं, आगे आपकी मर्ज़ी कि-"संकल्प ले या ना ले?, ले तो कौनसा ले?, और ना ले तो क्यों ना ले??" मैं इस विषय में कुछ नहीं कहूंगा। इसी के साथ हैप्पी न्यू इयर, स्वागतम वर्ष 2010



नववर्ष आप सभी के लिए ढेरो खुशियाँ, समृद्धियाँ, और सुख-शान्ति लाये।



धन्यवाद।



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CHANDER KUMAR SONI,


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Sunday, December 27, 2009

हरियाली के लिए कुछ कीजिये।

दुनिया में जितनी तेजी से पर्यावरनिये प्रदुषण बढ़ रहा हैं, लोग भी पर्यावरण के प्रति भी उतनी ही तेज़ी से जागरूक होते जा रहे हैं। हर कोई अपने तरीके से, अपने स्तर पर धरती को हरा-भरा बनाने में लगा हुआ हैं। कोई ग्रीन बिल्डिंग्स को तरजीह दे रहा हैं, तो कोई ग्रीन गजेट्स-ग्रीन व्हीकल्स का इस्तेमाल कर रहा हैं। यही नहीं लोग तो ग्रीन बिजनेस और ग्रीन जोब्स में अपना भविष्य तलाश रहे हैं। पर्यावरण के प्रति लोगो की बढती दिलचस्पी को देखते हुए लगता हैं कि-2010 में दुनिया होगी "ग्रीन वर्ल्ड"।

भारत समेत कुछ देश "ग्रीन (हरित) वर्ल्ड" की दिशा में कुछ कदम बढे भी हैं। जैसे कि=
हरित बिल्डिंग्स से सुधरेगा पर्यावरण,
हरित व्हीकल्स बनेंगे पर्यावरण के दोस्त,
हरित सिटीज़ से आएगी खुशहाली,
हरित जोब्स से संवरेगी युवाओं की किस्मत,
हरित गजेट्स से यूथ क्रान्ति,
हरित कोयला देगा उधोगो को नयी दिशा,
हरित तकनीक से बचेगी ऊर्जा,
हरित यूनीवरसीटीज़ में बनेगा करीयर,
हरित कपड़ो से होगी पर्यावरण सुरक्षा,
हरित खाद से बदलेगी खेती-किसानो का भविष्य,
आदि-आदि।

ग्रीन वेबसाइट्स = दुनिया में ऐसे संगठनो की कमी नहीं हैं, जो ग्रीन वेबसाइट्स, ग्रीन ब्लोग्स, और ग्रीन ईमेल्स के जरिये पर्यावरण संरक्षण का सन्देश औरो तक पहुंचा रहे हैं। इन वेबसाइट्स में पर्यावरण को बचाने से लेकर पर्यावरण सम्बन्धी कार्यक्रमों से युज़र्स को अपडेट रखा जाता हैं।
ग्रीन जोब्स = यानी वेस्ट रीसाईंकलिंग, वाटर सिक्यूरिटी, एग्रीकल्चर के अलावा हर उस काम से हैं, जिससे पर्यावरण को कम से कम नुक्सान पहुंचता हैं।
ग्रीन तकनीक = इनके जरिये ऐसे उपाय ढूंढे जा रहे हैं, जो ज्यादा से ज्यादा ऊर्जा बचाए और कार्बन-डाई-ओक्साइड का उत्सर्जन कम से कम करे। आईबीऍम और माईक्रोंसोफ्ट जैसी दिग्गज कंपनियों ने तो इस दिशा काफी आगे कदम बढाते हुये, कई एनेर्ज़ी सेवर प्रोडकट्स बाज़ार में लांच भी कर दिए हैं, जिनकी काफी मांग भी हैं। इको फ्रेन्डली मीडिया प्लेयर, इको फ्रेन्डली आईपॉड, इको फ्रेन्डली कमप्यूटर, इको फ्रेन्डली मोबाइल, और इको फ्रेन्डली प्रिंटर। इतना ही नहीं, इ बाइक्स, सौर बाइक्स, गैस बाइक्स, और तो और बैट्री बाइक्स, आदि इसी के उदाहरण हैं।

केवल आम लोग ही नहीं बल्कि बहुत ही ख़ास और बड़े माने जाने वाले सेलिब्रितीज भी इस हरित दुनिया (ग्रीन वर्ल्ड) नामक अभियान से जुडे हुए हैं। आप अपनी इच्छा-मर्जी से ना सही, पर अपने आदर्श लोगो को देख कर तो आपको इस अभियान में पूरी सक्रियता से शामिल हो ही जाना चाहिए। ज़रा एक नज़र अपने प्रिय अभिनेता-अभिनेत्री, रोल-माडल, सेलिब्रितीज पर ड़ाल लीजिये, ताकि आप उनसे कुछ प्रेरित हो सके =
देशियों में = नेहा धूपिया, राहुल बोस, गुलज़ार, अभय दयोल, फरहान अख्तर, प्रीति जिंटा, सलमान खान, विद्या बालन, आमिर खान, जोन अब्राहम, अभिनव बिंद्रा, शोभा डे, रानी मुखर्जी, मल्लिका साराभाई, नसीरुद्दीन शाह, लिएंडर पेस, अरुंधती राय, जावेद अख्तर, बाईचुंग भूटिया, जूही चावला, आदि-आदि।
विदेशियों में = ब्रेड पिट, एंजेलीना जोली, जैकी चैन, जूलिया रोबर्ट्स, पामेला एंडरसन, और जेसिका पार्कर, आदि-आदि।
धन्यवाद।

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Wednesday, December 23, 2009


काश ये फैसला सारे देशभर में लागू हो।


गुजरात सरकार ने सभी स्थानीय (पंचायती राज, नगर पालिका, नगर परिषद्, और नगर निगम) चुनावों में मतदान करना अनिवार्य बनाने का फैसला किया हैं। यह वो फैसला हैं, जोकि काफी पहले ही लागू हो जाना चाहिए था। गुजरात सरकार का यह फैसला लोकतंत्र के लिए, असली और सच्चे लोकतंत्र की राह में मील का पत्थर साबित होगा। ऐसा मुझे विश्वास हैं।


कुछ लोगो की आदत-फितरत ही ऐसी होती हैं कि-"खुद तो किसी को वोट देते नहीं और जब काम नहीं होता या कोई समस्या आती हैं तो जनप्रतिनिधियों को उल्टा-सीधा बकने लग जाते हैं।" पहले ऐसे सिरफिरे, अंटशंट बकने वालो को वोट देना चाहिए, उसके बाद अपने जन प्रतिनिधियों से अपने वोट का हिसाब मांगते हुए, कोसना चाहिए। जब वे लोग आपसे वोट मांगने आये थे, तब तो आपने उन्हें वोट दिया नहीं। अब जब आप विकास-कार्य के लिए जायेंगे तो वे क्यों आपका साथ दे?????? क्या हक़ हैं आपका उन जनप्रतिनिधियों पर, जिन्हें आपने कुछ दिया ही नहीं???


बहुत से लोग मत/वोट देने की अनिवार्यता का विरोध कर रहे हैं। विरोधियों के तर्क कुछ इस तरह हैं =


वोट देने का टाइम नहीं हैं??


क्या मिलेगा वोट देकर?


काम तो होते नहीं हैं, क्या फायदा?


मैं दुसरे शहर में रहता हूँ। वोट देने आता तो एक या कई दिन खराब हो जाते।

ऑफिस/दूकान/बैंक/स्कूल आदि के लिए देर हो रही थी।


मेरे एक वोट से क्या बन या बिगड़ जाएगा??

आदि-आदि कई तरह की नकारात्मक और बेसिर-पैर की बातें करते हैं।


इन लोगो को ज़रा यह सोचना चाहिए कि-"जब यह लोग अपने प्रतिनिधियों को वोट ही नहीं देते हैं, तो इन्हें (लोगो को) उन्हें (जनप्रतिनिधियों को) कोसने का हक़ कैसे मिल गया??, उन्होंने आपसे वोट माँगा और आपने नहीं दिया। अब आप उनसे विकास-तरक्की मांग रहे हैं, तो वो क्यों दे?? कुछ पाने के लिए कुछ खोना ना सही, पर कुछ देना तो पड़ता ही हैं। जब आप किसी को कुछ देंगे ही नहीं, तो आपको मिलेगा कैसे?" ज़रा यह सोचिये-"जब आप वोट नहीं डालते हैं, तो कैसे बेकार-निकम्मा-अपराधी किस्म का उम्मीदवार आपकी जगह किसी और का बोगस वोट पोल करवा डालता हैं। आपके वोट ना डालने से कितना बड़ा नुक्सान हो जाता हैं, इसका अंदाजा आप सहज रूप से लगा सकते हैं। अगर आप अच्छे-काबिल-और होनहार उम्मीदवार को जीताते हैं तो आपको विकास के साथ-साथ उसे कोसने-सुनाने-बुरा भला कहने का हक़ भी स्वत्य: मिल जाता हैं।"

वैसे भी यह कौनसा हिसाब-न्याय-और मज़बूत लोकतंत्र हैं, जहां 60-70% लोगो की भागीदारी से ही चुनाव संपन्न हो जाना मान लिया जाता हैं???? बाकी के 30-40% मतदाताओं के मन की थाह भी ली जानी चाहिए। सच्चा-मज़बूत-और असली लोकतंत्र तभी आयेगा जब 90-95% मतदान होगा। बाकी के 5-10% वोट (जो नहीं डाले जा सके) भी सिर्फ उन्ही के हो जो या तो गंभीर रूप से बीमार-विकलांग हो या फिर वही हो जो बाहर (अस्थाई रूप से) रहता हो। लम्बे समय से बाहर रहने वालो के वोट ट्रांसफ़र कर दिए जाने चाहिए, ताकि पुरानी जगह का वोट बेकार ना जाए और नयी जगह वोट पोल हो सके। इससे दोनों ही स्थानों पर मत-प्रतिशत में उल्लेखनीय बदलाव (उछाल-बढ़ोतरी) देखने को मिलेगी।

काश ये फैसला सारे देशभर में लागू हो।

धन्यवाद।

FROM =

CHANDER KUMAR SONI,

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Tuesday, December 15, 2009

देशद्रोही-देशविरोधी सांसद और लोकतंत्र।

जी हाँ, आपने बिल्कुल सही पढ़ा हैं। देशद्रोही-देशविरोधी सांसद, यही कह रहा हूँ मैं। अपने देश की सबसे बड़ी पंचायत (संसद) के कथित रूप से सम्मानित सदस्यों (सांसदों) को मैं देशद्रोही-देशविरोधी ना कहू तो क्या कहू?? इन्होने जो भूल की हैं वो कदापि क्षमा-योग्य नही हैं। अगर यह संसद-सदस्य ज़रा भी जागरूक-देशभक्त-और जनता के सच्चे प्रतिनिधि होते तो यह गलती बिल्कुल भी नही होती।

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13.दिसम्बर.2001 को देश की सबसे बड़ी पंचायत, देश की आन-बान-शान, संसद भवन पर पाकिस्तानी आतंकवादियों ने हमला कर दिया था। पाकिस्तान के आतंकियों ने सुनियोजित ढंग से संसद भवन पर हमला बोल दिया था। आतंकी पुरी तरह से प्रशिक्षित, ट्रेंड थे। आतंककारियों के पास भारी मात्रा में गोला-बारूद, संसद भवन का चप्पे-चप्पे का नक्सा, और संसद भवन में बेरोकटोक आवागमन के लिए विआईपी पास-गेट पास भी था। उनके पास संसद के चप्पे-चप्पे, कोने-कोने का नक्सा था, तभी तो घुसते ही अलग-अलग दरवाजो पर धावा बोल दिया था।

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जिस तरीके से उन्होंने हमला किया, जिस प्लानिंग-होशियारी के साथ उन्होंने नापाक इरादे जताए, उससे साफ़ हैं कि-"उनका मकसद सिर्फ हमला करके भाग जाना ही नहीं था। बल्कि संसद के अन्दर घुस कर सभी संसद-सदस्यों (सांसदों), प्रधान मंत्री, और अन्य महत्तवपूर्ण मंत्रियो को मारने का था।" गौरतलब हैं कि-"संसद के अन्दर सुरक्षा कर्मी तो होते हैं, लेकिन बिना हथियारों के। उनके पास लाठी-डंडो के अलावा कोई हथियार नहीं होता हैं।"

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यह तो शुक्र हैं कि-"सुरक्षा बलों ने तत्काल मोर्चा संभालते हुए उन आतंककारियों को मुंहतोड़ जवाब दिया। वरना वे संसद भवन के अन्दर प्रवेश कर जाते, और..................उसके बाद देश के पास कुछ भी नहीं बचता, सब कुछ तबाह-खत्म हो जाता।" यह अब तक का सबसे भीषण आतंकी हमला था। इस संघर्ष में काफी सारे लोग शहीद हो गए थे। यह वही शहीद हैं, जिनकी बदौलत आज भी संसद की आन-बान-शान बरकरार हैं।

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लेकिन दुर्भाग्य देखिये आज 13.दिसम्बर.2009 को उन शहीदों को किसी ने याद करना भी उचित नहीं समझा। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह, विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवानी और कुछेक सांसदों (मात्र ग्यारह सांसद) ने ही उन्हें याद किया। बाकी अन्य मंत्रियो और सांसदों ने उन शहीदों के आगे दो मिनट भी शीश नहीं नवाया। क्या सन्देश दे रहे हैं देश के वर्तमान-भावी कर्णधार????, क्या साबित करना चाहते हैं देश के कोने-कोने से आये प्रतिनिधि (सांसद)???, शहीदों के लिए क्या और कितना एहसान-सम्मान हैं आप सबके दिल में??, यह आज दिखलाई दे गया हैं।

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देश के शहीदों के प्रति, देश की इज्ज़त बचाने वालो के प्रति, आप सभी सांसदों का रवैया साबित कर रहा हैं कि-"आप सबमे देश के सांसद, देश के संसद-सदस्य, और जनप्रतिनिधि कहलाने की योग्यता नहीं हैं। आप सब देशविरोधी-देशद्रोही हैं।" जिनके दिल में शहीदों के प्रति सम्मान ना हो उन्हें देशभक्त कैसे कहा जा सकता हैं??, वे सच्चे भारतीय कैसे कहलाये जा सकते हैं??

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यही लोकतंत्र की कमजोरी और दुर्भाग्य भी हैं। कुछ सवाल जिनके सही-सही जवाब मुझे समझ में नही आ रहा हैं जैसे कि-"आम जनता ऐसे लोगो को क्यूँ अपना जनप्रतिनिधि बना कर जिताती हैं?, क्यूँ जनता ऐसे देशद्रोहियों को संसद जैसी पावन जगह पर भेजती हैं?, क्यूँ लोकतंत्र होने के बावजूद लोगो से गलतियां हो जाती हैं??, राजशाही-राजतंत्र जाने के बाद तो स्थितियां बदल जानी चाहिए थी, अब तक क्यूँ नही बदली??, और सबसे बड़ा सवाल-"कब तक जनता भूल करती रहेगी और देश के ऐसे नकारा-निकम्मे रखवाले-प्रतिनिधि संसद सदस्य बनते रहेंगे?????"

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इसलिए मेरी आप सभी भारतवासियों से यही अपील हैं कि-"अब तक जो होता आया हैं या अब तक जो हो गया हैं, उसे भूल जाईये। और अब एक नयी-अभिनव शुरुवात कीजिये, अगले (चाहे जब भी हो) चुनावों में उन्ही लोगो को अपना नुमाइंदा-प्रतिनिधि बना कर संसद भेजना हैं, जो देश भक्त हो, जो सच्चा भारतीय हो, जिसके दिल में शहीदों के प्रति मान-सम्मान का भाव हो।"

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और सबसे अहम् और महत्तवपूर्ण बात--"आप चाहे जिसे भी चुने-भेजे, उसका (आपका अपना नुमाइंदा-प्रतिनिधि) का दिल से भारतीय होना जरुरी हैं, नाकि चेहर-मोहरे, हाव-भाव, रूप-रंग-भाषा या नागरिकता से।"

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धन्यवाद।

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Saturday, December 05, 2009

क्या गलत कहा बिगबी (अमिताभ बच्चन) जी ने????

अभी ताज़ा-ताज़ा ही अमिताभ जी ने अपने ब्लॉग (www.bigb.bigadda.com) पर एक बेहद झकझोर देने वाली टिप्पणी की हैं। एक ऐसी टिप्पणी जो सीधे-सीधे आमजन से जुड़ी हुई हैं। अमिताभ जी ने अपने ब्लॉग पर जो टिप्पणी की हैं, वह आम लोगो की भावनाओं का परिचायक हैं।

गत 26.नवम्बर.2009 को मुंबई पर हुए आतंककारी हमले को हुए एक साल हो गया हैं। काफ़ी सारे आतंकवादियों में सारे मारे जा चुके हैं। उनमे से सिर्फ़ एक आतंकी (कसाब) ही जीवित पकड़ा जा सका हैं। मुंबई, महाराष्ट्र, और सारे देश को कसाब की फांसी का इंतज़ार हैं, ना जाने कब यह इंतज़ार खत्म होगा??????? सरकार कसाब को फांसी तो दे नही रही, उल्टे कसाब की खातिरदारी की जा रही हैं।

कभी कसाब की जेल कसाब के कहने पर बदल दी जाती हैं, तो कभी कसाब को उसका मनपसंद खाना दिया जाता हैं। कभी उसके लिए कुछ किया जाता हैं, तो कभी कुछ। कसाब की खूब खातिरदारी सरकार द्वारा की जा रही हैं यानी सब कुछ कसाब के मनमाफिक ही हो रहा हैं। किसी को यह समझ में नही आ रहा हैं कि-"सभी लोगो की, सभी देशवासियों की भावनाओं की कद्र ना करते हुए क्यों सरकार कसाब को अभी तक ज़िंदा रखे हुए हैं???"

सभी आम जन की, सभी मुंबई वासियों की, सभी देश वासियों की भावनाओं को समझते हुए बिगबी जी ने अपने ब्लॉग (www.bigb.bigadda.com) पर बेहद सटीक टिप्पणी की है। ना जाने कितने लोग बेमौत मारे गए, कितने सैनिक शहीद हो गए, कितने बच्चे यतीम हो गए, और कितनी औरते विधवा हो गयी.............कोई आंकड़ा ही उपलब्ध नहीं हैं। ज़रा उनकी टिप्पणी पर एक निगाह डाली जाए--"आज देश में कोई सुरक्षित, सबसे ज्यादा सुरक्षित , प्रधानमन्त्री से भी ज्यादा, कोई हैं। तो वो हैं.............कसाब।"

बिगबी (अमिताभ) जी ने कोई गलत टिप्पणी नही की हैं। उनकी टिप्पणी सारे भारतीयों की दिली भावनाओं की परिचायक हैं। उन्होंने अपने ब्लॉग के माध्यम से देश की आवाज़ उठायी हैं। अब देखना यह हैं कि-"आम जनों की, आम नागरिको की, और समस्त देशवासियों की भावनाओं को दरकिनार कर देने वाली सरकार क्या अब बिगबी जी की भावनाओं को भी दरकिनार कर सकती हैं???????"

मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि-"सरकार को जनाक्रोश भड़कने से पहले ही अक्ल आ जाए और वह जल्द से जल्द कसाब को फांसी कि सज़ा दे दे।" और यह भी कि-"अगर सरकार खुद कसाब को फांसी देने का साहस ना कर पाए तो, तू (भगवान्) कुछ ऐसा कर कि कसाब किसी भी तरह आम जनता के बीच आ जाए और जनता खुद ही अपना न्याय कर दे।"

धन्यवाद।

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Saturday, November 14, 2009

....ऐसे बाल-दिवस का क्या औचित्य????

आज (14.नवम्बर.09) सारा देश नेहरू (देश के पहले प्रधानमन्त्री जवाहर लाल नेहरू जी) का जन्मदिन बालदिवस के रूप में मना रहा हैं। लेकिन, मुझे इस बात का दुःख हैं कि-"आज का दिन लोग बाल-दिवस के रूप में मात्र इसलिए मना रहे हैं, कि-"नेहरू जी को बच्चो से बेहद प्यार था।"

आज के दिन को लोग (राजनितिक और कांग्रेसी विशेष तौर पर) नेहरू जी के जन्मदिन को बाल-दिवस के रूप में मना रहे हैं, लेकिन क्या किसी ने नेहरू जी के प्रिय बच्चो की तरफ़ देखा हैं???? लोगो को 14.नवम्बर.09 के दिन तो नेहरू जी याद हैं, लेकिन आश्चर्य हैं कि-"उन्हें नेहरू जी के प्रिय बच्चे याद नही हैं......"

देश भर में, सरकारे (राज्यों और केन्द्र दोनों की) बाल अधिकारों, बचपन को बचाने, आदि को लेकर जागरूक होने का दावा करती हैं, और इसके लिए काफ़ी सारे क़ानून-अधिनियम भी बनाए गए हैं। परन्तु यह एक बड़े दुःख की, दुर्भाग्य की बात हैं कि-"जितनी ज्यादा धज्जियाँ बाल अधिकारों और बचपन को बचाने से जुड़े सभी तरह के कानूनों-अधिनियमों की उड़ती हैं, उतनी धज्जियाँ शायद ही किसी और क़ानून की उड़ती होगी।"

अपवाद-स्वरुप (कुछेक जगहों को छोड़कर) कोई भी घर ऐसा नहीं हैं, जहां छोटे-छोटे बच्चे साफ़-सफाई ना करते हो। कोई भी दफ्तर, कार्यालय, ढाबा-रेस्तरां, आदि ऐसा नहीं मिलेगा जहां बाल-मजदूर छोटे-मोटे काम ना करते हो। सब कुछ सरेआम-सबके सामने, आँखों-देखी हो रहा हैं, लेकिन कोई रोकने या आवाज़ उठाने की जेहमत ही नहीं उठाना चाहता। वे इस बारे में किसी को कुछ कह नहीं सकते, हम इस बारे में किसी को कुछ कहना नहीं चाहते, ऐसे में उन्हें न्याय-इन्साफ मिलना तो मुश्किल ही नहीं बल्कि नामुमकिन हैं।

हर साल 14.नवम्बर को हम सब जवाहर लाल नेहरु जी को याद करते हैं। हर साल हम सब मिलकर नेहरु जी का जन्मदिन बाल-दिवस (चिल्ड्रेन्स डे) के रूप में मनाते हैं। जगह-जगह काफी भाषण बाजी होती हैं, जगह-जगह इस मुद्दे पर बहुत कुछ लिखा जाता हैं। लेकिन क्या यह सब करना सार्थक हैं?????????? क्या इससे उन असंख्य बाल-मजदूरों को न्याय मिल सकता हैं?, जिनकी सारी ज़िन्दगी इन्साफ के बिना ऐसे ही गुज़र जायेगी।

बेहतर होगा कि-
हम सब मिलकर बाल-अधिकारों की रक्षा करे।
हम सब मिलकर बचपन को नष्ट होने से बचाए।
हम सब मिलकर हर साल नेहरु जी के साथ-साथ बच्चो के बारे में भी सोचे।
नेहरु जी के सब आदर्शो में से, सबसे बड़े आदर्श (बच्चो से स्नेह) को अपना आदर्श माने।
नेहरु जी की तरह, हम भी बच्चो से प्यार करे और उनमे देश का भविष्य देखे।

वैसे भी, बच्चो के बिना नेहरू जी को याद करना अधूरा ही हैं। नेहरू जी, को पूर्ण रूप से तभी याद किया जा सकता हैं, जब उन्हें बच्चो के साथ याद किया जाए। बच्चो के प्रति उनके अपार प्रेम के कारण ही हम सब उन्हें चाचा नेहरू के नाम से भी जानते हैं। इसलिए कह रहा हूँ कि-"आप नेहरू जी के साथ-साथ बच्चो की भी सोच लीजिये, हो सकता हैं, आप भी किसी बच्चे के लिए सच में ही चाचा-नेहरु साबित हो......."

धन्यवाद।

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Sunday, November 08, 2009

ऑनर किलिंग का क्रूर से क्रूरतम सच।

संस्कृति, परिवार, धर्म, समाज के नाम पर तथाकथित ग़लत काम करने पर दोषी की ह्त्या को ऑनर किलिंग कह कर सदियों से महिमामंडित किया जा रहा हैं। पिता अपनी बेटी को, भाई अपनी बहन को, और पंचायते अपने ही समाज के लोगो को मार कर अपने को धन्य समझते हैं।

इस क्रूर से क्रूरतम व्यवहार के लिए अगर कोई दोषी हैं तो वे धर्म के ठेकेदार हैं, पर पंडे, पुजारी, मौलवी, पादरी, आदि सब बच निकलते हैं। जिन नियमो को समाज का नियम माना जाता हैं, असल में इन्हे धर्म के नाम पर ही सौपा जाता हैं। और धर्म के ठेकेदार-दूकानदार ही थोपने वालो में अग्रणी होते हैं। वे नही चाहते कि-"कोई नई पहल करे या कोई बंधी-बंधाई लीक से हट कर चले।"

सरकारे और पुलिस-प्रशासन इस क्रूर-घिनौने खेल को देखती रहती हैं, क्योंकि उसकी कोई शिकायत नही करता और ना ही कोई गवाही देता हैं। हैरत की बात तो यह हैं कि-"पुलिस महकमे में ऊपर से लेकर नीचे तक, कांस्टेबल से लेकर एस.पी. तक ऑनर किलिंग को जायज़ मानते हैं।"

विज्ञान, आधुनिक शिक्षा, और तकनीक ने बहुत से सकारात्मक परिवर्तन अपनेआप ला दिए हैं। पंडो, मौलवियों, और पादरियों का रूतबा कम हो गया हैं, उनकी पूछ-परख कम हो गई हैं। धर्म अपना अंधविश्वास बेच रहा हैं, पर उसे तर्क का सामना करना पड़ रहा हैं। क़ानून अब ईश्वर या खुदा की देन या समाज की परम्पराए नही हैं, आम आदमी के अपने बहुमत से बनाए गए हैं। इसीलिए लोकतंत्र ने धर्म की अंधेरगर्दी, गुंडाराज, और हठधर्मिता पर सबसे गहरी चोट पहुंचाई हैं।

ऑनर किलिंग इज्ज़त के नाम पर की जाती हैं। क्या इज्ज़त को लेकर सज़ा सिर्फ़ लड़कियों, युवतियों, औरतो, महिलाओं, आदि स्त्री जाति को ही दी जानी चाहिए???? इज्ज़त मिटाने, ख़राब करने, या लूटाने को लेकर पुरूष को सज़ा क्यों नही दी जाती??? क्या इज्ज़त को बचाने या बरकरार रखने की जिम्मेदारी सिर्फ़ स्त्री की ही हैं??? क्या पुरूष की कोई ड्यूटी-कर्तव्य नही हैं??

ऑनर किलिंग अब बुरी लगती हैं, अखरती हैं, पर अफ़सोस यह हैं कि-"शिकायत उनसे होती हैं, जो ख़ुद धर्म के दुकानदारों के शिकार हैं, जो उनकी कठपुतलियाँ हैं।" अगर इस तरह के अन्याय-अधर्म से बचना हैं तो धर्म की कट्टरता फैलाने वालो के ख़िलाफ़ क़ानून बनने चाहिए। सती-डायन, भागी बेटी-बहु-बीवी-बहन-माँ, आदि के रूप में स्थापित महिलाओं पर ऑनर किलिंग जैसा अत्याचार बंद होना चाहिए। सज़ा इन महिलायों को ऑनर किलिंग के नाम पर मारने वालो को नही, बल्कि इसके लिए उकसाने वालो मिलनी चाहिए। सज़ा नही कड़ी-से-कड़ी सज़ा।



धन्यवाद।

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Saturday, October 31, 2009

कहाँ हैं क़ानून नाम की चिड़िया???????

अभी कल देर रात शहर में हुई एक वारदात से सनसनी फ़ैल गई। शहर के प्रमुख बुद्धि-जीवियों में से एक, शहर के सबसे बड़े अखबार के कार्यकारी सम्पादक, और मेरे ब्लॉग-गुरु श्री कीर्ति राणा जी पर 3-4 लोगो ने अकारण हमला कर दिया। श्री राणा जी किसी विवाह-समारोह से लौट रहे थे, की रास्ते में यह घटना हो गई। जब शहर का विशिष्ट आदमी ही सुरक्षित नही हैं, तो आम जनता का तो पूछो ही मत। कहाँ हैं क़ानून नाम कि चिडिया????

इस घटना की जिसे ख़बर मिली वह हक्का-बक्का रह गया। यह हमला किसी आम या राह-चलते व्यक्ति पर नही हुआ था, यह हमला शहर की जानी-मानी हस्ति पर हुआ था। मुझे भी इस घटना की सूचना अगले दिन (आज) अखबारों से मिली। जैसे ही मैंने अपने ब्लॉग-गुरु पर हमले की ख़बर पढ़ी, मैं भी सकते में आ गया। मैंने तुंरत उन्हें (राणा जी को) फ़ोन किया। किसी कारण से फ़ोन अटेंड ना हो पाने पर मैंने एस एम एस भेज कर अपना आक्रोश जताया।

प्रिय पाठको, मैं जानता हूँ कि-"आप क्या सोच रहे हैं??" आप यही सोच रहे हैं ना, कि-"मैंने इससे पहले शहर में बढ़ते अपराधो पर क्यों नही लिखा??" आपका यह सोचना बिल्कुल जायज़ हैं। मुझे नित्य-रोज़ शहर में बढ़ते सभी तरह के, हर तरह के अपराधो की जानकारी मिलती रहती थी। लेकिन मैंने इस सम्बन्ध में, कभी भी, कुछ भी नही लिखा। हाँ, एक बार 26.जुलाई.09 को जरूर लिखा था, जब शहर में एक बड़ी और सनसनीखेज चोरी हो गई थी।

किसी ने सत्य ही कहा हैं कि-"दूसरो के दुख-दर्द, तकलीफ-पीडा का अहसास तभी होता हैं, जब हम ख़ुद या हमारा कोई प्रिय व्यक्ति इस दौर से गुज़रता हैं।" मेरे साथ भी कुछ-कुछ ऐसा ही हुआ हैं। मैं सब कुछ जानते-बूझते हुए भी अनजान बना रहा, लेकिन जब मेरे अपने निकटतम व्यक्ति के साथ कोई बुरी घटना होने की ख़बर मिली, तो मेरी आँखें खुल गई।

मुझे अब पता चल गया हैं कि-"ना चाहते हुए भी, जाने-अनजाने में मैं कितना मतलबी-स्वार्थी हो गया था??" मैं हालांकि भावुक, संवेदनशील, और नरम दिल वाला जागरूक युवक हूँ। लेकिन पता नही कैसे अनजाने में स्वार्थी हो गया?, जिसके लिए मैं क्षमा चाहता हूँ।

मुझे अब सबक मिल गया हैं। अब मैं आप सब पाठकगणों से वादा करता हूँ कि-"मैं ज्यादा से ज्यादा जागरूक-संवेदनशील रहूंगा और स्वार्थ-मतलबीपन से ज्यादा से ज्यादा दूर रहूंगा।"

एक बार पुन: माफ़ी मांगते हुए..........

धन्यवाद।
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