मेरे इस ब्लॉग का उद्देश्य =

मेरे इस ब्लॉग का प्रमुख उद्देश्य सकारात्मकता को बढ़ावा देना हैं। मैं चाहे जिस मर्ज़ी मुद्दे पर लिखू, उसमे कही ना कही-कोई ना कोई सकारात्मक पहलु अवश्य होता हैं। चाहे वह स्थानीय मुद्दा हो या राष्ट्रीय मुद्दा, सरकारी मुद्दा हो या निजी मुद्दा, सामाजिक मुद्दा हो या व्यक्तिगत मुद्दा। चाहे जो भी-जैसा भी मुद्दा हो, हर बात में सकारात्मकता का पुट जरूर होता हैं। मेरे इस ब्लॉग में आपको कही भी नकारात्मक बात-भाव खोजने पर भी नहीं मिलेगा। चाहे वह शोषण हो या अत्याचार, भ्रष्टाचार-रिश्वतखोरी हो या अन्याय, कोई भी समस्या-परेशानी हो। मेरे इस ब्लॉग में हर बात-चीज़ का विश्लेषण-हल पूर्णरूपेण सकारात्मकता के साथ निकाला गया हैं। निष्पक्षता, सच्चाई, और ईमानदारी, मेरे इस ब्लॉग की खासियत हैं। बिना डर के, निसंकोच भाव से, खरी बात कही (लिखी) मिलेगी आपको मेरे इस ब्लॉग में। कोई भी-एक भी ऐसा मुद्दा नहीं हैं, जो मैंने ना उठाये हो। मैंने हरेक मुद्दे को, हर तरह के, हर किस्म के मुद्दों को उठाने का हर संभव प्रयास किया हैं। सकारात्मक ढंग से अभी तक हर तरह के मुद्दे मैंने उठाये हैं। जो भी हो-जैसा भी हो-जितना भी हो, सिर्फ सकारात्मक ढंग से ही अपनी बात कहना मेरे इस ब्लॉग की विशेषता हैं।
किसी को सुनाने या भावनाओं को ठेस पहुंचाने के लिए मैंने यह ब्लॉग लेखन-शुरू नहीं किया हैं। मैं अपने इस ब्लॉग के माध्यम से पीडितो की-शोषितों की-दीन दुखियों की आवाज़ पूर्ण-रूपेण सकारात्मकता के साथ प्रभावी ढंग से उठाना (बुलंद करना) चाहता हूँ। जिनकी कोई नहीं सुनता, जिन्हें कोई नहीं समझता, जो समाज की मुख्यधारा में शामिल नहीं हैं, जो अकेलेपन-एकाकीपन से झूझते हैं, रोते-कल्पते हुए आंसू बहाते हैं, उन्हें मैं इस ब्लॉग के माध्यम से सकारात्मक मंच मुहैया कराना चाहता हूँ। मैं अपने इस ब्लॉग के माध्यम से उनकी बातों को, उनकी समस्याओं को, उनकी भावनाओं को, उनके ज़ज्बातों को, उनकी तकलीफों को सकारात्मक ढंग से, दुनिया के सामने पेश करना चाहता हूँ।
मेरे इस ब्लॉग का एकमात्र उद्देश्य, एक मात्र लक्ष्य, और एक मात्र आधार सिर्फ और सिर्फ सकारात्मकता ही हैं। हर चीज़-बात-मुद्दे में सकारात्मकता ही हैं, नकारात्मकता का तो कही नामोनिशान भी नहीं हैं। इसीलिए मेरे इस ब्लॉग की पंचलाइन (टैगलाइन) ही हैं = "एक सशक्त-कदम सकारात्मकता की ओर..............." क्यूँ हैं ना??, अगर नहीं पता तो कृपया ज़रा नीचे ब्लॉग पढ़िए, ज्वाइन कीजिये, और कमेन्ट जरूर कीजिये, ताकि मुझे मेरी मेहनत-काम की रिपोर्ट मिल सके। मेरे ब्लॉग पर आने के लिए आप सभी पाठको को बहुत-बहुत हार्दिक धन्यवाद, कृपया अपने दोस्तों व अन्यो को भी इस सकारात्मकता से भरे ब्लॉग के बारे में अवश्य बताये। पुन: धन्यवाद।

Saturday, April 10, 2010

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सदैव सरकार ही निशाने पर क्यों???

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मुझे एक बात समझ में नहीं आती है कि-"हमेशा सरकार या सरकारी संस्थान ही निशाने पर क्यों रहते हैं??, प्राइवेट या निजी संस्थान/कम्पनियां निशाने पर क्यों नहीं होती हैं??" सरकार, सरकारी संस्थान, या सरकारी कम्पनियां अगर मामूली भूल भी करदे तो लोग उसे गालियाँ देने लगते हैं, लेकिन अगर किसी निजी कंपनी की बड़ी (सरकारी की तुलना में) भूल भी हो जाए तो लोग उसे बड़ी ही आसानी से नज़र-अंदाज़ कर जाते हैं। मानो, ये उसकी पहली गलती हो।

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हम क्यों ऐसा करते हैं?? क्या मिल जाता हैं हमें ऐसा करके?? किसी भी क्षेत्र में, किसी भी मामले में हम निजी को पाक-साफ़ समझते हैं, लेकिन सरकारी को हम घटिया, गिरा हुआ, और बेकार समझते हैं। इस तरह बिना पूरी बात-मुद्दे को जाने किसी (सरकार-सरकारी) के बारे में पूर्वानुमान लगाना क्या उचित हैं?? मैं किसी भी सरकारी पद या नौकरी पर नहीं हूँ और नाही मैं निजी की तुलना में सरकारी को बढ़िया-उच्च स्तरीय मानता हूँ। में तो आम लोगो से इस तरह का भेदभाव समाप्त करने की अपील कर रहा हूँ।

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मैं आपको कुछ उदाहरण देना चाहूँगा, जिससे ये साफ़ हो जाएगा कि-"निजी कम्पनियां दूध से धुली नहीं हैं, और कई मामलो में सरकारी से भी बदतर हैं।"

1. पिछले साल मुझे दिल्ली से बैंगलौर सुबह की फ्लाईट से जाना था। आप मानेंगे नहीं उस दिन ना तो कोई तूफ़ान आया था, ना बरसात हुई थी, और नाही कुछ ऐसा हुआ था, जिसकी वजेह से फ्लाईट के लेट होने को जायज़ ठहराया जा सके। वो फ्लाईट जो सुबह नौ बजे की थी, उसकी उड़ान सुबह पौने बारह बजे हुई। इतना ही नहीं, चार दिन बाद मुझे वापस दिल्ली लौटना था। इस बार भी मैं दूसरी निजी (जाने वाली से अलग फ्लाईट) फ्लाईट में सवार था। मुझे रात साढ़े नौ बजे दिल्ली पहुँच जाना था, और मैं पहुंचा रात ग्यारह बजे। अब इसे आप क्या कहेंगे??? दोनों ही बार किसी भी अखबार या खबरिया चैनल में इन फ्लाइटो के लेट होने की सूचना नहीं थी। जबकि, सरकारी विमानन सेवा दस मिनट भी लेट हो जाए तो हल्ला मच जाता हैं।

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2. यही हाल, मोबाइलों का भी हैं। सरकारी मोबिलिटी सेवा प्रदाता के मोबाइल में बात बीच में कट जाए या फोन ना मिले तो लोग कोसने लगते हैं। जबकि, निजी मोबिलिटी सेवा प्रदाता के मोबाईल में ऐसा हो तो लोग नज़रंदाज़ कर देते हैं। निजी मोबिलिटी सेवा का नेटवर्क पुरे दिन ना आये तो मामूली आह से काम चल जाता हैं, लेकिन यही अगर सरकारी हो तो लोगो की तो जैसे मौत आ जाती हैं। जब सभी निजी कंपनियों की शुरूआती कॉल दर दो रूपए होती थी, तब इस सरकारी कंपनी की कॉल दर मात्र नब्बे पैसे होती थी। जब बाकी निजी कंपनी एक रुपया प्रति एसएमएस काटती थी, तब ये सरकारी मोबिलिटी कंपनी मात्र साठ पैसा ही काटती थी। बेशक आज सभी की एकसमान दर हो, लेकिन इस सरकारी कंपनी के योगदान को नहीं भुला जा सकता। इंटरनेट और लैंडलाइन फोन के मामले में तो इसका मुकाबला हैं ही नहीं।

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3. बैंको को भी क्यूँ भूल रहे हैं आप?? निजी बैंक जहां भारी जुर्माना-चार्ज लगाते हैं वही सरकारी बैंक नाममात्र जुर्माना-शुल्क लगाती हैं। आम आदमी या गरीब आदमी को रियायती दरो पर क़र्ज़ भी सरकारी बैंको से ही मिल सकता हैं नाकि निजी बैंको से। नियम व शर्तो के मकड़जाल में निजी बैंक ही ज्यादा उलझाते हैं। लोन (क़र्ज़) की मंजूरी कराने के लिए बैंको के अधिकारी-मैनेज़र को घूस खिलानी पड़ती हैं। निजी बैंको में सरकारी बैंको से ज्यादा पैसा ऐंठा जाता हैं। बेशक, निजी बैंको में ऐसा सरकारी बैंको की तुलना में कम होता हो, लेकिन होता जरूर हैं। और निजी बैंको में रिश्वत-घूस-पैसा भी ज्यादा लिया जाता हैं। निजी बैंक दूध से धुले नहीं हैं। इतना ही नहीं, देश के शीर्ष बैंक (रिज़र्व बैंक) के पास आम धारणा के विपरीत सरकारी बैंको की तुलना में निजी बैंको की ज्यादा शिकायते आती हैं। ज्यादातर ये शिकायते गलत-नाहक खर्च जोड़ना, बताये गए से ज्यादा ब्याज दर पर जुर्माना लगाना, क्रेडिट कार्ड की गलत एकाउंट स्टेटमेंट देना, आदि से सम्बंधित होती हैं।

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4. अब आते हैं शिक्षा के मुद्दे पर। सुख-सुविधा और पढ़ाई-लिखाई के स्तर में निजी स्कूल-कॉलेज भले ही आगे हो, लेकिन उन निजी स्कूल-कॉलेजो पर नियंत्रण तो सरकार के अन्डर में ही हैं। दूसरी बात, निजी स्कूल-कॉलेज अनाप-शनाप पैसा (ड़ोनेशन की आड़ में) वसूलते हैं। सुख-सुविधा वे भले ही ज्यादा देते हो, लेकिन कम-से-कम सरकारी स्कूल-कॉलेजो की तरह लूटते तो नहीं। कभी युनिफोर्म के नाम पर, तो कभी मनमर्जी (जोकि जरुरी ना हो, पाठ्यकर्मो से अलग) की किताबो-पुस्तकों के नाम पर, कभी अन्य गतिविधियों (चित्रकला-खेलकूद, आदि) के नाम पर। आये दिन नन्हे-मुन्हे बच्चो के अभिभावकों की जेब काटते रहते हैं, और बेचारे माता-पिता अपनी संतानों के भविष्य संवारने की खातिर लुटते रहते हैं। सुख-सुविधा और पढ़ाई के स्तर में निजी स्कूल भले ही आगे हो, लेकिन सरकारी स्कूल-कॉलेजो का कोई मुकाबला नहीं हैं। अभी तक कोई ऐसा निष्कर्ष नहीं आया हैं जो सरकारी स्कूल-कॉलेज में पढ़े बच्चो को पिछड़ा या निम्न साबित कर सके। केंद्रीय विद्यालय, आईआईटी, आईआईएम, और आईआईएस का क्या कोई मुकाबला हैं??? शुरूआती (स्कूल-कॉलेज की) पढ़ाई पूरी कर लेने के बाद हर छात्र सरकारी संस्थान में जाना चाहता हैं, क्योंकि निजी आगे की पढ़ाई के लिए कोई बेहतरीन (सरकारी से ज्यादा) संस्थान नहीं हैं। रही बात परीक्षा में नक़ल कराने या निकम्मे को भी पास करा देने की बात। तो में बता दूं कि-"पहली बात तो ऐसा होता नहीं, दूसरी बात हर जगह ऐसा नहीं होता, तीसरी बात अगर होता भी हैं, तो बहुत ही दुर्लभ मामलो में। और चौथी और महत्तवपूर्ण बात--सरकारी संस्थानों में नक़ल कराकर पास कराया जाता हैं तो निजी संस्थानों में गुपचुप पैसा लेकर नंबर बढाए जाते हैं। नक़ल कराने और नम्बर बढाने, दोनों ही मामलो में पैसा ऐंठा जाता हैं। बस फर्क ये हैं कि-निजी संस्थानों में पैसा ज्यादा बेदर्दी से मारा जाता हैं।" यानी गलत कार्यो में भी सरकारी ही "बेहतर यानी सस्ता" हैं।

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अपनी मानसिकता को बदलिए। सरकारी और निजी स्कूल-कॉलेजो, संस्थानों, कंपनियों में फर्क ना कीजिये। सब को एक जैसा मत मानिए तो किसी एक (सरकारी या निजी) को सही या गलत भी ना मानिए। गलत कार्य-गलतियां-और भूले आपको दोनों की नज़र आनी चाहिए, नाकि किसी एक की। हम सबको एक पलड़े में नहीं तौल सकते लेकिन पूर्वानुमान को तो दिमाग से निकाल ही सकते हैं। अब तो आप सबको मेरा ये लेख लिखने का मतलब-उद्देश्य तो समझ में आ ही गया होगा। उम्मीद हैं, आप मेरे द्वारा दिए गए उपरोक्त कुछ सच्चे-उदाहरणों को पढ़कर मेरी नसीहतो का पालन करेंगे।

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नोट = गोपनीयता का सम्मान करते हुए सभी सरकारी-गैर सरकारी-निजी स्कूल-कॉलेजो, संगठनो, संस्थानों, और कंपनियों के नाम नहीं दिए गए हैं।

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धन्यवाद।

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Sunday, April 04, 2010

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कैसे मित्र हैं आपके????

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मित्र यानी दोस्त, और दोस्त यानी आपके सुख-दुःख के साथी। ये एक सिंपल, सीधी-स्पष्ट व्याख्या हैं दोस्त की। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी हैं, समाज के बिना मनुष्य का अस्तित्व ही नहीं हैं। अपने, और अपने परिवार के साथ-साथ मनुष्य को बाहरी लोगो की भी जरूरत होती हैं। यथा अड़ोसी-पडोसी, यार-दोस्त, सहपाठी-सहकर्मी, आदि। ये सब समाज का ही एक हिस्सा होते हैं और हम भी इसी समाज के एक अहम् हिस्सा हैं।

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दोस्तों, अक्सर आपने किसी ना किसी को दोस्ती के ऊपर कहते-सुनते देखा होगा?? कुछ दोस्ती के पक्ष में होते हैं तो कुछ दोस्ती के नाम के ही विपक्ष में होते हैं। कोई दोस्तों से ज्यादा अपने दुश्मनों को ज्यादा सच्चा मानता हैं तो कोई दोस्तों को अपने सगे-सम्बन्धियों-परिजनों से भी ज्यादा अहमियत देता हैं। क्या आपने कभी सोचा हैं ऐसा क्यों होता हैं?? क्यों कभी-कभी हमें अपनों से भी ज्यादा सहारा दोस्तों से मिलता हैं?? क्यों अधिकाँश मामलो में हमें अपने करीबी (ऐसा हमें लगता हैं, पर होता नहीं) दोस्तों से ही धोखा-दगा मिलता हैं??

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इन उपरोक्त सभी सवालों के जवाब हमारे अन्दर या हमारे आस-पास ही हैं। सबसे पहले तो ये सोचिये कि-आपके यार-दोस्त कितने हैं???? बहुत से लोग कहेंगे-"है कोई बीस-पचास", तो कोई कहेगा-"सैंकड़ो दोस्त हैं मेरे", और तो और कुछ महाशयो का जवाब होगा-"गिने ही नहीं, हज़ारो दोस्त हैं मेरे, एक इशारे में दोस्तों की लाइन लगा दूं....." अरे-अरे रुकिए जनाब। ये आप किस गलतफ़हमी (खुशफ़हमी) में बैठे हैं आप??? दोबारा सोच लीजिये या अपने दोस्तों की लिस्ट पुन: जांच लीजिये।

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ज्यादातर लोगो की यही तो भूल होती हैं। इसी भूल के कारण लोगो को बार-बार, मौके-बेमौके धोखा खाना पड़ता हैं। बिना सोचे-विचारे, बिना आचार-व्यवहार, चरित्र, और इतिहास (यदि पता हो तो) देखे हम अगर किसी को हम अपना मित्र मानेंगे, तो जाहिर हैं हम जानबूझ कर ख़तरा मौल ले रहे हैं। दोस्ती करना बुरा नहीं हैं और नाही दोस्तों की अधिक संख्या होना बुरा हैं। बुरा हैं बुरे लोगो से दोस्ती करना, बुरे लोगो को अपना मानना, और बुरे लोगो को बिना सोचे-समझे अपनी संगत में शामिल करना।

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माना पहली नज़र में किसी के अच्छे-बुरे होने का पता नहीं चलता हैं और नाही किसी के चेहरे पर इस सम्न्बंध में कुछ लिखा होता हैं। लेकिन, ज्यादातर लोग जानबूझ कर अपने दोस्तों की बुराइयों को नज़रंदाज़ कर देते हैं, ये सोचकर कि-"अपना क्या ले रहा हैं??, या दोस्ती में सब चलता हैं, या फिर ये सोचकर ज्यादा हद पार करेगा तो समझा दूंगा,,,,,आदि-आदि।" बस, यही हम दोस्ती के मामले में मात खा जाते हैं। पहले हम कुछ करते नहीं और जब हम कुछ करना चाहते हैं तो कुछ कर नहीं पाते। अव्वल, तो हम ना चाहते हुए भी, जाने-अनजाने अपने दोस्तों के चंगुल में फँस ही जाते हैं और उनके हर गलत-सलत कार्यो में शामिल हो जाते हैं।

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महत्तव इस बात का नहीं हैं कि-"आपके कितने दोस्त हैं?? या आपके दोस्तों कि संख्या कितनी हैं??" बल्कि, महत्तव तो इस बात का हैं कि-"आपके दोस्त कैसे हैं??, आपके मित्रो की मानसिकता-सोच कैसी हैं??, आपके मित्रो में सतचरित्र हैं भी या नहीं??, आपके दोस्त आपके काम के हैं या नहीं??," आदि-आदि। पहली बात, आपके दोस्त आपको धोखा नहीं देते हैं बल्कि आप खुद ही उन्हें धोखा-दगा देने के लिए आमंत्रित करते हैं। आपको अपने दोस्त के बारे में नहीं पता, यहाँ तक तो सही हैं। लेकिन, पता चलने पर भी आप कुछ (उसे समझाना या सही रास्ता दिखाना, या उससे धीर-धीरे दूरियाँ बढ़ाना, आदि) नहीं करते, तो इसमें सारी गलती आपकी ही हैं।

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दूसरी बात, दोस्त और जानकार होने में फर्क समझिये। आपके साथ पढने वाला या आपके दफ्तर में कार्य करने वाला या वाहन (टैक्सी, बस, या ट्रेन, हवाईजहाज, आदि) में सफ़र करने वाला आपका मित्र कैसे हो सकता हैं?? नहीं हो सकता ना। बस, यही मैं आपको कहना चाह रहा हूँ, प्रेम सबसे कीजिये, बातें सबसे कीजिये, हाय-हैलो, दुआ-सलाम सबसे कीजिये, लेकिन दोस्ती-यारी किसी-किसी से कीजिये। हर आते-जाते को, हर मिलने-जुलने-भिड़ने वाले को अपना दोस्त ना बनाइये। उसे जानिये-परखिये, और जब वो खरा उतरे तब कदम आगे बढ़ाइए।

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लोग दोस्ती में एक बार धोखा खा लेंगे, दो बार धोखा खा लेंगे, बार-बार धोखा खा लेंगे, लेकिन धीरे-धीरे उनका दोस्त और दोस्ती पर से विश्वास उठने लगेगा। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी हैं और समाज के लोगो के साथ मेलजोल बढ़ाना अत्यंत आवश्यक भी हैं। लेकिन, संभल कर-सावधानी के साथ। दोस्तों की संख्या पर नहीं उनके गुणों पर ध्यान देना जरुरी हैं।

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सबसे बड़ी बात = अगर आपके सौ दोस्त हैं, तो उनमे से सिर्फ दस-पंद्रह दोस्त ही सुख-दुःख, मुसीबत में काम आयेंगे। और उन दस-पंद्रह में से दस वो होंगे जो कभी-भी भाग सकते हैं। अगर यकीन ना हो तो जब मर्जी आजमा कर देख लीजिएगा। मैं तो बहुत बार आजमा चुका हूँ। बारम्बार धोखा खाने और दिल तोड़ने से अच्छा हैं एक बार आजमा लिया जाए। ये दुःख की बात हैं कि-"ज्यादातर यार-दोस्त खाने-पीने और पैसे के पीछे होते हैं। जो अपने दोस्तों को खिलाएगा-पिलाएगा या पैसा उडाएगा, लोग उसी से यारी बढ़ाना चाहते हैं। आप भी इस बात की सच्चाई को समझने का प्रयास करे, इसी में आपकी भलाई हैं।" ज़रा अपने आसपास निगाह दौड़ाइए, दोस्तों के खाने-पीने, और पैसा उड़ाने वाले व्यक्ति के दोस्तों की सूची आम लोगो के दोस्तों से कहीं ज्यादा होती हैं। कही आपके साथ भी ऐसा-कुछ तो नहीं???"

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मैं ये नहीं कह रहा हूँ कि-"दोस्तों के अलावा सबसे (जानकार, सहपाठी, या सहकर्मी) से तोड़ ली जाए। सबसे बनाकर रखिये, ना जाने कब उनसे अपना काम-मतलब साधना पड़ जाए। तब वे ये तो नहीं कह सकते कि-"तू अब क्यों आया हैं, तब तो तू मुझसे दोस्ती ही नहीं करना चाहता था।"

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मैं आपको मतलबी होने को नहीं कह रहा हूँ, मैं तो सिर्फ ये कहना चाहता हूँ कि-"दोस्त सीमित और भरोसेमंद-चरित्रवान रखिये, जो वक़्त-बेवक्त हाज़िर हो, बाकियों के साथ ज्यादा नहीं तो थोड़ी-बहुत तो राम-रामी रखी ही जा सकती हैं। या इसमें भी कोई हर्ज़ हैं......??????"

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धन्यवाद।

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Monday, March 29, 2010

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ऐसा तो सिर्फ भारत में ही संभव हैं।
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हाल ही में विभिन्न समाचार चैनलों और समाचार पत्रों में एक खबर को पढ़ कर बड़ी हैरानी हुई। दरअसल वो खबर ही ऐसी थी, आप भी जानेंगे तो हैरान रह जायेंगे।
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और वो खबर यह थी कि-"केंद्र सरकार जल्द ही एक ऐसा क़ानून लाने जा रही हैं, जिसमे तेल, गैस की पाईपलाइन या वाहन को आग लगाने वाले या नुक्सान पहुंचाने वाले को उम्रकैद की सज़ा होगी। और तो और अपराधी को अपनी बेगुनाही को साबित भी स्वयं ही करना पडेगा।"
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क़ानून बहुत ही अच्छा और स्वागत-योग्य हैं। निश्चित रूप से उन लोगो को सबक सिखाने वाला और हतोत्साहित करने वाला हैं, जो अपनी मांगो को पूरी करवाने के लिए तेल, गैस, आदि के वाहनों-पाईपलाइनो को आग लगाते-नुक्सान पहुंचाते रहते हैं। देश की संपत्ति हैं तेल-गैस। आम जनता और देश के विकास का एक मजबूत-सशक्त आधार हैं ये। लेकिन, मेरी चिंता तो इस बात को लेकर हैं कि-"देश के बाकी कानूनों जैसा ह्श्न ना हो इस क़ानून का, कही ये क़ानून भी देश के अन्य कानूनों की तरह कागजी ही ना रह जाए।"
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वैसे देश के अन्य कानूनों का प्रभावी उपयोग, प्रभावी पालना होनी ज्यादा जरूरी हैं। ये क़ानून अच्छा जरूर हैं, लेकिन इस क़ानून से आम जनता को कोई विशेष लाभ नहीं होने वाला। माना कि-"ये क़ानून देश की अर्थव्यवस्था को नुक्सान होने से कुछ हद तक रोकेगा।" लेकिन, क्या गारंटी हैं कि-"इस क़ानून का हाल बाकी कानूनों जैसा नहीं होगा??" लेकिन ज़रा सोचिये-"तेल-गैस के टैंकरों-वाहनों, और पाइपलाइनों को आगजनी या नुक्सान पहुंचाने की कितनी कोशिशे होती हैं??, कितना तेल या गैस बेकार/नष्ट होता हैं इन मामलो में??" जाहिर हैं बहुत कम, ना के बराबर, नगण्य।
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तो फिर क्या जरूरत हैं नए क़ानून लाने की??, वो भी ऐसे मुद्दे को लेकर, जिसका आम जनता से कोई सरोकार ही नहीं हैं??, क्यों ला रहे हैं ये क़ानून??, क्या सिर्फ वह-वाही लूटने के लिए??, या फिर जनता का ध्यान कही और करने के लिए??, किसलिए लायेंगे आप ये क़ानून??, किसका भला हैं, इस क़ानून में??, बताइये, जनता आपसे कुछ पूछ रही हैं, जवाब दीजिये......। अरे आप क्या जवाब देंगे??, आपके पास तो जवाब हैं ही नहीं।
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अगर तेल-गैस की इतनी ही चिंता हैं तो जनता तक तेल-गैस पहुंचाइये।
जितना तेल-गैस उपलभध हैं या उत्पादित हो रहा हैं, उसे जनता को मुहैया कराइए।
ब्लैक मार्केटिंग, काला बाजारी को रोकिये।
महंगा-सस्ता के बारे में मैं कुछ नहीं कहूंगा, लेकिन आप जो भी भाव-दाम लगाइए, लेकिन उसे आम जन को तो दीजिये।
तेल-गैस की किल्लत-कमी को दूर कीजिये।
करने को तो बहुत कुछ हैं, अगर आपकी मंशा, इच्छाशक्ति हो तो।
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ये तो बात थी तेल-गैस की, अब बात करते हैं अन्य कानूनों की। चोरी-डैकैती को रोकिये, हत्याओं-बलात्कारो को रोकिये, लूटपाट-दंगो को रोकिये, दहेज़ हत्याओं-बाल विवाहों को रोकिये, अपहरणों-फिरौतियों को रोकिये, आदि-आदि। और इन सभी के लिए क़ानून भी बने हुए हैं, वे क़ानून सख्त हैं या नहीं?? मुद्दा ये नहीं हैं, मुद्दा हैं कानूनों की प्रभावी पालना, जोकि हो नही रही हैं। ये क़ानून सीधे-सीधे आम जन से जुड़े हुए हैं, इन कानूनों में आम जनता के हित जुड़े हुए हैं। नाकि उस क़ानून में, जिसको आप जल्द ही लागू करने की मंशा लिए हैं। ये क़ानून जरूरी जरूर हैं, लेकिन इससे भी जरुरी हैं मौजूदा अन्य कानूनों की पालना।
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वैसा ऐसा सिर्फ और सिर्फ भारत में ही संभव हैं, जहां सरकार क़ानून बनाना ही जानती हैं, पालना करना नहीं। और तो और सरकार को जब क़ानून बनाने के लिए कोई उपयुक्त स्थान नहीं मिला, तो ऐसे मुद्दे पर क़ानून बनाने में व्यस्त हो गई हैं, जिसका आम आदमी से कोई सरोकार ही नहीं हैं।
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धन्यवाद।
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Tuesday, March 23, 2010

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इस फिल्म का विरोध क्यों नहीं????
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मैं हालिया रिलीज एक हिन्दी फिल्म "अतिथि......तुम कब जाओगे??" के सम्बन्ध में ही बात कर रहा हूँ। और मेरा उपरोक्त (शीर्षक) सवाल इसी फिल्म के लिए ही हैं।
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जी हाँ, मेरा कई सवालो में से कई सवाल यही हैं कि-
इस फिल्म का विरोध क्यों नहीं हो रहा हैं??
आम तौर पर हर मुद्दे, छोटी सी बात पर हल्ला मचाने वाले इस बार चुप क्यों हैं???
अपने आप को भारतीय संस्कृति के पहरेदार बताने वाले क्या कहीं खो (गुम) गए हैं???
मुझे तो कुछ भी समझ में नहीं आ रहा हैं, कब होगा इस फिल्म (अतिथि......तुम कब जाओगे??) का विरोध?
हर वक़्त विरोध-प्रदर्शन करने, हल्ला मचाने, हँगामा पैदा करने की मौके की ताक में रहने वाले इस कदर शांत-चुप्पी क्यों साधे हुए हैं??
क्या इसके पीछे तूफ़ान से पहले की शान्ति मौजूद हैं??
इन लोगो ने क्यों नहीं किया इस फिल्म का विरोध??
आदि-आदि कई सवालों के जवाब मुझे नहीं मिल रहे हैं। अगर आपके पास मेरे सवालों के जवाब हो तो कृपया जरूर दीजिएगा।
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सरेआम भारतीय संस्कृति की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। सरेआम, खुल्लम खुल्ला "अतिथि देवो भव:" की सनातन परम्परा का मखौल उड़ाया जा रहा हैं। लेकिन, दुर्भाग्य देखिये भारत की परम्परा-संस्कृति के ठेकेदार-पहरेदार मौन धारण किये हुए हैं। जहां उन्हें विरोध करना चाहिए, वहाँ तो सपने में भी विरोध नहीं करेंगे। और जहां विरोध नहीं होना चाहिए वहाँ सारी सीमाएं-हदें पार कर देंगे। ऐसा तो इनका चरित्र हैं। सारे देश को इन लोगो के चरित्र, इन लोगो की मानसिकता का एहसास होने लगा हैं।
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कहाँ गए भारत की सनातन संस्कृति की दुहाई देने वाले???, कहाँ हैं वे लोग, जो कथित रूप से खुद को रक्षक-पहरेदार, कहते हैं??? अब क्यों सामने नहीं आ रहे???, अपना-सा मुहं लेकर कहाँ छुप गए हैं कायर???
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"अतिथि देवो भव:" की समृद्ध परम्परा-संस्कृति वाले देश में अतिथि के जाने का इंतज़ार करना कितना दुर्भाग्य भरा हैं, इसका शायद इन्हें इल्म (अंदाजा) भी नहीं हैं। खुद भूखे रहकर भी अतिथि-मेहमान को भरपेट भोजन परोसना हमारी संस्कृति हैं, हमारी पहचान हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि-"इस फिल्म में कोई हिन्दू विरोधी टिप्पणी नहीं हैं, इसलिए उन्होंने विरोध ना किया हो??" या फिर कही यह कारण तो नहीं कि-"इस फिल्म में कोई मुस्लिम कलाकार या अभिनेता-अभिनेत्री नहीं हैं, इसलिए उन्होंने विरोध-प्रदर्शन ना किया हो??" आदि।
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फिल्म का विरोध ना करने का चाहे जो भी कारण हो, इनका असली रूप-चेहरा, असली नीतियाँ, कार्य-शैली जनता के सामने आ गया हैं। आमजन का विश्वास अब इन लोगो-इन संगठनो के ऊपर से उठ गया हैं। इनकी पोल खुल गयी हैं, आम जनता की नज़रो से गिर गए हैं ये सब लोग और ये सब संगठन। अरे भाई लोगो, फिल्म का विरोध चाहे ना करो पर शीर्षक का विरोध तो कीजिये। फिल्म तो मैंने भी नहीं देखी हैं, लेकिन शीर्षक (फिल्म का नाम) तो मुझे आपत्तिजनक लगा हैं। आपने बेकार-बेमतलब "बिल्लू" (असली नाम "बिल्लू बार्बर" शाहरुख खान अभिनीत) का विरोध किया था, लेकिन अब सार्थक रूप से, जरूरत समझते हुये फिल्म का ना सही, पर फिल्म के नाम (शीर्षक) का तो विरोध कीजिये।
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धन्यवाद।
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Wednesday, March 17, 2010

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नारियों का अभद्र और नकारात्मक चित्रण क्यों????

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आज हर जगह नारी-सशक्तिकर्ण की बातें हो रही हैं। देश के सबसे बडे और पुराने राजनितिक दल की अध्यक्षा महिला हैं, देश की राष्ट्रपति महिला हैं, राजस्थान-हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों की राज्यपाल महिला हैं, लोक सभा की सभापति भी महिला ही हैं। जहां भी नज़र डालो महिला सशक्तिकर्ण की बाते कही जा रही हैं। मोबाइल-दूरसंचार कम्पनियां महिलाओं के लिए अलग से स्पेशल प्लान्स ला रही हैं, बीमा कंपनिया ख़ास तौर पर महिलायों के लिए ही स्वास्थ्य-जीवन बीमा योजनाये ला रही हैं। सरकारों की तरफ से लड़कियों की पढ़ाई मुफ्त की जा रही हैं-उन्हें स्कूल आनेजाने के लिए फ्री साइकल दी जा रही हैं, यानी जहां कही भी नज़र दौडाओ महिला-नारी सशक्तिकर्ण की भावना ही नज़र आ रही हैं।

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नौकरियों में भी महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित की जा रही हैं, इनकम टैक्स में भी महिलाओं को ज्यादा बचत करने की सहुलियतों के साथ-साथ टैक्स में भी छूट प्रदान की जा रही हैं। और तो और हाल ही में सभी स्थानीय-क्षेत्रीय चुनावों में महिलाओं का आरक्षण पुरुषो के बराबर यानि 50 प्रतिशत कर दिया गया हैं, अब सभी स्थानीय निकायों (पंच-सरपंच-डायरेक्टर, जिला प्रमुख, पार्षद, और नगर पालिकाओं-परिषदों-और निगमों) में आधी सत्ता-भागीदारी महिलाओं के हाथ में ही होगी। बहुत सी जगहों पर तो विकास कार्यो का, जनहित के कार्यो का, और सारे इलाके का सारा दारोमदार इन्ही के सर होगा। महिलाओं से जुडे अपराधो (छेड़छाड़, बलात्कार, यौन शोषण, दहेज़ ह्त्या, आदि) पर क़ानून भी पहले के मुकाबले काफी सख्त किये जा रहे हैं, वो भी गैर-जमानती।

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प्रिय पाठको, महिलायों-नारियों के लिए बहुत कुछ किया जा रहा हैं, बहुत कुछ किये जाने की योजनाये बनाई जा रही हैं। हर तरफ-हर जगह महिला सशक्तिकर्ण की बयार बह रही हैं। लेकिन, मुझे एक बात बहुत कचोटती हैं, मुझे समझ में नहीं आता हैं कि-"नाटको में, टेलीविजन धारावाहिकों में, फिल्मो में, नारी का किरदार कठोर, पत्थर-दिल, क्रूर, और नकारात्मक क्यों दिखाया जाता हैं???" यह कैसा नारी सशक्तिकर्ण हैं?, एक तरफ हम नारी के पक्ष की, हक़ की बातें करते हैं और दूसरी तरफ हमही उन्हें नाटको-धारावाहिकों में नकारात्मक रूप से प्रस्तुत करते हैं।

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क्या इससे नारी सशक्तिकर्ण हो सकता हैं?????, क्या इससे नारियों को वो मान-सम्मान, बराबरी का हक़, जिसकी वो वाकई हकदार हैं, मिल सकता हैं???, एक तरफ हम नारियों के पिछडेपन-दुर्दशा के लिए परोक्ष रूप से पुरुषो को ज़िम्मेदार ठहराते हैं और दूसरी तरफ हम नारियों को ही अभद्रता और नकारात्मकता की साक्षात मूर्ति बताने में लगे हुए हैं। पहले बचपन में (सात-आठ साल पहले) परिवार वालो के साथ, टाइमपास के लिए, काफी धारावाहिक-नाटक देखा करता था। लेकिन अब मैं हालांकि नाटक-धारावाहिक कम ही देखता हूँ, लेकिन यदा-कदा इन सिरियलो पर नज़र ड़ाल ही लेता हूँ। मैं इक्का-दुक्का नाटक (शिक्षाप्रद व मनोरंजक) ही देखता हूँ, लेकिन मेरे नाटको के शुरू होने से पहले पांच-सात मिनट पहले का नाटक देखना पड़ ही जाता हैं। उन नाटको में नारी का जो रूप दिखाया जाता हैं, उसे देखकर मेरा मन खराब हो जाता हैं। नारियों का-महिलायों का ऐसा चरित्रहीन और घटिया प्रदर्शन किया जाता हैं कि-"मुझे नारी सशक्तिकर्ण की तमाम बातें ढकोसला-बकवास लगने लगती हैं।"

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मैं आपको कुछ नकारात्मक भावों वाली कुछ महिला अदाकाराओं-कलाकारों की याद दिलाना चाहूँगा। मंदिरा (क्यूंकि सास भी कभी बहु थी.....स्टार प्लस), पल्लवी (कहानी घर-घर की.....स्टार प्लस), कोमोलिका (कसौटी ज़िन्दगी की.....स्टार प्लस), अम्माजी और मृणालिनी (छोटी बहु.....जी टीवी), और अम्माजी (ना आना इस देश लाडो.....कलर्स), आदि-आदि। यह तो उदाहरण-मात्र हैं। फेहरिस्ट तो काफी लम्बी-चौड़ी हैं। उपरोक्त उदाहरणों की महिला खलनायिकाओं को अगर आप देख लेंगे तो दांतों तले ऊंगली दबा लेंगे। कई नाटको में तो पुरुष-मर्द किरदारों से कही ज्यादा खतरनाक-शातिर-और चालबाज़ यह महिला खलनायिकाएं होती हैं। एक-दुसरे की बातें इधर-उधर करना, कमरे के अन्दर बिना दरवाजा खटखटाए घुस जाना, एकदुसरे को नुक्सान पहुंचाने की जी जान से कोशिश करना, पकडे जाने या चाल विफल होने पर घडियाली आंसू बहाना, आदि इनकी खासियत हैं।

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टेलीविजन धारावाहिकों के बाद नंबर आता हैं फिल्मो का। मैंने हालांकि एक भी ऐसी फिल्में नहीं देखी हैं, लेकिन टीवी पर आने वाले प्रोमो, और विज्ञापन कहानी कह जाते हैं। ऊपर से, अखबारों-पत्रिकाओं में छपने वाली फोटोएं तस्वीर साफ़ कर देती हैं। अव्वल तो, जानबूझकर प्रेस-मीडिया को बुला कर बेबाक-बोल्ड टिप्पणी की जाती हैं, ताकि मेरे और आप जैसो को (जो ऐसी बकवास-अश्लील फिल्में नहीं देखते हैं) खबर दिखाकर फिल्म के प्रति उत्सुकता जगाने का प्रयास करते हैं। मल्लिका शेहरावत, राखी सावंत, सेलिना जेटली, तनुश्री दत्ता, कंगना राणावत, बिपाशा बसु, और करीना कपूर, आदि कई इस कतार में हैं। चाहे वे पैसा कमाने के लिए ऐसी फिल्में-एल्बम करते हो, या चाहे वे ऐसे हकीकत में ना हो, लेकिन उन्हें भूलना नहीं चाहिए कि-"आम दर्शक उनकी नक़ल करता हैं, आप असल में ऐसे हैं या नहीं इसकी समझ आमतौर पर दर्शको में नहीं होती हैं, और सबसे बड़ी बात एक नारी होने के नाते आपको अन्य नारियों की इज्ज़त का ख्याल भी रखना चाहिए। भडकीले-अश्लील कपडे पहन कर आप क्या सन्देश देना चाहती हैं??? कपडे चाहे जैसे भी पहनिए लेकिन मकसद-भावना शुद्ध होनी चाहिए। बहुत सी फिल्में ऐसी हैं, जिनमें हीरोइनो (जैसे कि-मंदाकिनी, डिम्पल कपाडिया, करिश्मा कपूर, माधुरी दीक्षित, नूतन, सायरा बानो, नर्गिस, हेमा मालिनी, रेखा, और हेलेन, आदि) ने काफी कम कपडे पहने थे, फिर भी अश्लील नहीं लगी, इसका कोई तो कारण होगा??"

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ये सारी क़वायदें तभी सफल होगी, नारी-सशक्तिकर्ण के तमान प्रयास तभी सफल होंगे जब टेलीविजन के नाटको, धारावाहिकों, और फिल्मो में नारियों का अभद्र और नकारात्मक चित्रण को रोका जाएगा। इसके लिए अकेले सरकार के करने से कुछ नहीं होगा, आम जनता और कलाकारों-अभिनेत्रियों के करने से ही कुछ हो सकता हैं। नाटक-धारावाहिक-और फिल्में ऐसी होनी चाहिए जो समाज को चरित्रवान बनाने की शिक्षा दे, जो समाज को महिलायों की योग्यता-उपयोगिता-और समानता का सन्देश दे। जिनको देख कर समाज को अच्छा सन्देश मिले। नैतिक-अनैतिक, गलत-सही, और चरित्रहीन और चरित्रवान के बीच का फर्क बताये।

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सबसे बड़ी बात, आम लोगो और अभिनेत्रियों-कलाकारों से पहले सरकार को पहल करते हुए सख्त से सख्त कदम उठाने चाहिए। सरकार को इन दो बातों का विशेष ध्यान-ख्याल रखना होगा कि-"पहला, अश्लीलता का पैमाना कपड़ो की मात्रा से नहीं बल्कि भावों-मकसद से नापना होगा, दूसरा, क़ानून इतना सख्त भी ना हो कि पुरुष-वर्ग जी ही ना सके और इतना ढीला भी ना हो कि अपराधी के बचने की गुंजाइश बचे।"

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धन्यवाद।

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Thursday, March 11, 2010

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भावनाओं की अभिव्यक्ति बेहद जरूरी।

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भावनाओं की अभिव्यक्ति बेहद जरूरी हैं। हम में से ज्यादातर लोग अपनी भावनाओं को व्यक्त करने की बजाय दबाना शायद ज्यादा उचित समझते हैं। हम रोजाना जितने भी समस्याओं से दो-चार होते हैं, हमें जितनी भी परेशानियां उठानी पड़ती हैं, हमें जितने भी दुःख-तनाव झेलने पड़ते हैं, उन सबके मूल में भावनाओं को दबाना या व्यक्त ना करना ही हैं। हमने तो मानो अपनी भावनाओं को व्यक्त ना करने की मानो कसम ही खा ली हो। मन में क्या आ रहा हैं?, दिमाग में क्या उलझन चल रही हैं?, दिल में क्या बात हैं??, आदि कई बातों-भावनाओ को हम उभारने की बजाय दबाना ज्यादा मुफीद समझते हैं।

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चाहे कितना भी नुक्सान क्यों ना हो जाए?, चाहे कितना भी उलटफेर क्यों ना हो जाए?, हम भावनाओं को दबा देंगे, लेकिन व्यक्त नहीं करेंगे???, पता नहीं ऐसी कौनसी वजह, कौनसी मजबूरी हैं जो हम ऐसा करते हैं??, वो भी एक या दो बार नहीं बल्कि लगभग हर बार। अपने भावों को दबाना, अपनी भावनाओं को दबाना, अपना ही नुक्सान करता हैं, दुसरे का कुछ नहीं बिगड़ता, वो बेचारा तो आपके अन्दर भी नहीं झाँक सकता। जो आपकी भावनाओं को समझ सके, आपके विचारों को जान सके, जो आपके दिलोदिमाग में चल रही बातों-सवालों, उलझनों को भी देख सके। .


कुछ उदाहरण मैं यहाँ देना चाहूँगा, ताकि आपको पता चल सके कि-"भावनाओ की अभिव्यक्ति कितनी जरूरी हैं??" =

1. दो दोस्त थे, एकदम पक्के दोस्त। दोनों बचपन से ही साथ-साथ पढ़ते थे, स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद दोनों ने आपस में सलाह करके एक ही कॉलेज में पढ़ाई की। बाद में एक दोस्त को सट्टे-जुए की बुरी लत लग गयी। वो दुसरे दोस्त को भी सट्टे के अड्डे पर ले जाता था, लेकिन दुसरे दोस्त ने हमेशा उसे मना किया। लेकिन उसे ऐसी लत लग चुकी थी, उसको सिवा सट्टे-जुए के कुछ ना दिखता था। एक बार पुलिस ने वहाँ छापा मारा और उसे उसके साथियों सहित गिरफ्तार कर लिया। जमानत पर छूटने के बाद, उसने पहला काम यही किया कि-"अपने उस दोस्त को गद्दार करार देते हुए उसको थप्पड़ दे मारा और बचपन की भाई जैसी दोस्ती तोड़ दी।" यहाँ उस दोस्त की गलती यह थी कि-"उसने अपनी भावनाओं को व्यक्त नहीं किया यानी कोई अफ़सोस जाहिर नहीं किया। बस, थप्पड़ को याद रखने की बात कहकर चला गया।"

2. एक पति-पत्नी थे। दोनों में शादी के कुछ साल खूब प्रेम रहा, लेकिन बाद में हालात बदलने शुरू हो गए। दरअसल, पति को तगड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा था, लेकिन वह यह बात घर पर शो/प्रकट नहीं होने दे रहा था। उसकी पत्नी जब प्यार-रोमांस के मूड में होती, तो वह गुस्सा हो बैठता। और जब उसका मूड प्यार का होता तो उसकी पत्नी अपनी व्यस्तता जाहिर कर देती। यानी दोनों ही अपनी भावनाओं को व्यक्त नहीं कर पा रहे थे। धीरे-धीरे नौबत तलाक तक आ पहुंची। यह तो भला हो मैरिज कोंउन्सलर का, जो उन्होंने दोनों को साथ बिठाकर सारी बातें साफ़ की, तब कही जाकर उन दोनों के बीच पैदा हुई ग़लतफ़हमियाँ दूर हुई। और दोनों तलाक जैसी विभीषिका से बच सके। यहाँ गलती दोनों की थी, दोनों ही असली बात-अपनी परेशानियों को व्यक्त नहीं करते थे। दोनों में दुराव-छिपाव था, दोनों अगर चाहते तो खुलकर बातचीत करके मसला सुलझा सकते थे। पर दुर्भाग्य से ऐसा हुआ नहीं।

3. इसी तरह के एक मामले में एक पति को पत्नी के चरित्र पर शक था। उसने कई बार पूछा, पर उसकी पत्नी मज़ाक में टाल जाती। ऐसे ही एक बार पति को गुस्सा आ गया और उसने थप्पड़ दे मारा। तब उसकी पत्नी बोली-"मेरा कोई ऐसा चक्कर नहीं था, तभी तो मैं इसे आपका मज़ाक समझती थी।" तब कही जाकर, थोड़ी बहुत बहस के बाद, मामला शांत हुआ। यहाँ पति ने अपनी नाराजगी-गुस्से को स्पष्ट प्रकट ना करते हुए पत्नी से गंभीर होकर नहीं पूछा, वही पत्नी ने मामले को मज़ाक में लेते हुए, इसका सीरियसली (गंभीरता से) जवाब देना उचित नहीं समझा, जबकि एक औरत के लिए यह सवाल सबसे दुश्वार सवाल होता हैं।

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उपरोक्त दोनों मामले, कोई ख़ास मामले नहीं हैं। यह तो बिलकुल ही मामूली-आम मामले हैं, जिनका सामना शायद आपने या आपके किसी जान-पहचान वाले ने अवश्य किया होगा। इन मामलो में कुछ विशेष नहीं करना होता हैं, बस अपनी भावनाओं को समय-समय पर व्यक्त करते रहना चाहिए। भावनाएं नहीं दबेगी, तो सारी बातें-कहानियां साफ़ रहेगी। दुराव-छिपाव होने की शुरुआत भावनाओं को दबाने से ही होती हैं। कोई भी बात अपने अन्दर दबा कर नहीं रखनी चाहिए, वरना एक ना एक दिन मामला बिगड़ता हैं और भावनाएं ज्वालामुखी के लावे की तरह फट कर बाहर आती हैं।

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क्यों दबाते हैं अपनी भावनाओं को??, क्यों हम अपनी बात को कहकर अपने दिलोदिमाग को हल्का नहीं करते??, क्यों हम अन्दर ही अन्दर घुटते रहते हैं??, कितने ही डाक्टर-वैज्ञानिक कहते हैं कि-"दिल में कुछ दबाकर रखना, दिमाग में कोई ना कोई उलझन-परेशानी का लगातार चलते रहना, या अपने दिल की बात कहकर मन हल्का ना करना, कई बीमारियों की जड़ हैं। शुगर, ब्लडप्रैसर, दिल और दिमाग की कई बीमारियों को खुला न्यौता देता हैं तनाव और भावनाओं को दबाना।" फिर भी ना जाने हम क्यों भावनाओं को व्यक्त करने में कंजूसी करते है?? भावनाओं को खुलकर, निर्भीक होकर व्यक्त करना चाहिए। हाँ, कुछेक मामलो में (मजबूर होना, किसी के सम्मान की रक्षा के लिए, आदि कारणों से) भावनाओं को दबाना उचित, माना जा सकता हैं। लेकिन जहां नुक्सान होता हो, जहां परिवार में कलह/बिखराव पैदा होता हो, या कही ग़लतफहमी पैदा होती हो, तो भावनाओ को छिपाना कहाँ की समझदारी हैं??

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धन्यवाद।

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Friday, March 05, 2010

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भगदड़ कब तक??????

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हालांकि आज मेरे पास ब्लॉग लिखने का वक़्त नहीं था और नाही मैं आज ब्लॉग पोस्ट करने की सोच कर बैठा था। लेकिन वाकया ही ऐसा घटित हो गया की मुझे आज आपात-स्थिति में ब्लॉग लेखन करना पडा। मेरा ब्लॉग लेखन आज नहीं करना था, इसका सबसे बड़ा सबूत यही हैं कि-"यह मेरा अभी तक का सबसे छोटा ब्लॉग पोस्ट हैं और सबसे ज्यादा जल्दी में लिखा हुआ भी।"

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कल सभी खबरिया समाचार पत्र और समाचार चैनल एक दुखांत घटना से परिपूर्ण थे। बाबा कृपालु जी महाराज के आश्रम में मची भगदड़ में साठ से ज्यादा लोग मारे गए और असंख्य लोग घायल हो गए। मारे गए लोगो में बच्चो और महिलायों की संख्या ज्यादा हैं। यह बहुत ही दिल देहला देने वाला नज़ारा था, कमजोर दिल के लोगो की तो हालत ही बिगड़ गयी होगी। मैं तो कई देर तक गंभीर सोच में पड़ गया, लेकिन क्यूंकि यह ब्लॉग पोस्ट जल्दी में की गयी हैं, इसलिए ज्यादा लम्बा ना लिखते हुए सिर्फ अपनी चिंताओं और सवालों को व्यक्त कर रहा हूँ।

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मेरे मन में निम्नलिखित चिंताएं-सवाल व्याप्त थे =

कब तक मचती रहेगी ऐसी जानलेवा भगदड़???

कब तक लोग बाबाओं-साधू-संतो की भीड़ भरी और असुरक्षित समागमो में जाते रहेंगे???

कब तक बाबा लोगो की सेवा करने या आशीर्वाद लेने के चक्कर में लोग मरने जाते रहेंगे??

आये दिन ऐसे हादसे, ऐसी दुखद घटनाओं की खबरे आती रहती हैं। कब रुकेंगी ऐसी खबरे आनी???

लोग पुरानी मौतों को भूलते नहीं कि कोई नयी घटना हो जाती हैं। जिम्मेदार कौन??

किसी को जाने से मैं रोक नहीं रहा हूँ लेकिन सुरक्षा व्यवस्था की जानकारी भी तो भक्तो को होनी चाहिए।

लोगो को दीर्ध आयु, तरक्की का आशीर्वाद देने वाले बाबा के सामने ही लोग काल-कवलित क्यों हो जाते हैं??

आम दिनों की बजाय बड़े महोत्सवो में ही क्यों जाते हैं लोग??

जबकि लोगो को पहले से ही भीड़ होने, असुरक्षा और असुविधा होने की पूरी जानकारी होती हैं।

क्या बड़े दिनों में या महोत्सवो में बाबा ज्यादा दमदार-तगड़ा आशीर्वाद देते हैं??

ना जाने कितने लोग इन भगदड़ो में मारे जा चुके हैं, और आगे भी ना जाने कितने लोग मारे जाएँगे??

इन मौतों से बाबा या संत महात्मा कोई सबक लेंगे, इसमें तो मुझे शंशय हैं।

लेकिन इन मौतों से आम जनता और प्रशासन कब सबक लेगा??

मृतकों-घायलों को कुछेक हज़ार या लाख की आर्थिक मदद क्या सार्थक हैं???

कब तक मुआवजा बाँट कर लोगो का ध्यान भटकाने की कोशिश की जाती रहेगी??

जितनी इनकी कमाई हैं, उसके आगे तो ये मुआवजा ऊंट के मूंह में जीरे के सामान हैं।

मैं यहाँ मुआवजा राशि बढाने के लिए नहीं कह रहा हूँ, मैं यहाँ अनमोल जिंदगियों की कीमत समझने के लिए कह रहा हूँ।

वो अनमोल जिंदगी जिसका आंकलन आप रुपयों में करते हैं। जबकि वो अरबो रुपयों से भी कही ज्यादा कीमती हैं।

उन बच्चो, उन विधवाओं की कुछ सोचिये?? जिन्हें आप मुआवजा रुपी लोलिपॉप से बहलाना चाहते हैं।

उन बुजुर्गो के सम्बन्ध में सोचिये जिनका एकमात्र कमाऊ बेटा या बेटी आपकी भगदड़ में आपकी (भगवान् की) प्यारी हो गयी।

आदि-आदि।

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और भी बहुत सारे-कई सवाल मेरे मन में उठ रहे हैं, लेकिन क्यूंकि जल्दी में होने और वक़्त ना होने के कारण मैं आज इतना ही ब्लॉग में लिख रहा हूँ। सभी मृतकों और घायलों को मेरी, मेरे ब्लॉग, और मेरे ब्लॉग के सभी पाठको की तरफ से हार्दिक संवेदना।

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धन्यवाद।

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Saturday, February 27, 2010

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क़ानून के ऐसे सकारात्मक दुरूपयोग से मैं सहमत।
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हैरान रह गए ना, शीर्षक पढ़ कर। मैं किसी भी तरह के क़ानून का उल्ल्लंघन नहीं करता हूँ और ना ही किसी को ऐसा करने की सीख/प्रेरणा दे रहा हूँ। वैसे तो मैं नियम-कायदों और कानूनों का पालन करने वाला व्यक्ति हूँ, मैं जानबूझ कर क़ानून तोड़ने जैसा कार्य नहीं करता हूँ। जाने-अनजाने, भूलवश ऐसा हो तो और बात हैं। लेकिन इस बार बात ही कुछ ऐसी हैं, जो मैं कह रहा हूँ कि-"क़ानून के ऐसे सकारात्मक दुरूपयोग से मैं सहमत।" आप भी वाक्यांश जानेंगे तो आप भी कहेंगे-"क़ानून का ऐसा दुरूपयोग तो होना ही चाहिए।"
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वाक्यांश यह हैं = हमारे किसी काफी दूर के रिश्तेदार की बेटी (जिसे मैं जानता तो नहीं, पर सुना हैं) की शादी कुछेक साल पहले हुई थी। उसका पति खूब शराब पीया करता था, वो अव्वल दर्जे का शराबी था। कमाई करने, बीवी और घरवालो की तरफ ध्यान देने की तरफ से लापरवाह था। बीवी बहुत समझाती पर कमाई करने और शराब छोड़ने की उसने रत्ती भर भी कोशिश नहीं की। कालान्तर में एक बेटी भी हो गयी, बेटी के होने के बाद उसके सुधरने की उम्मीद जगी थी। पर अफ़सोस, ऐसा ना हो सका, सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया।
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वो शराबी सारे दिन घर पर पडा रहता या मोहल्ले में इधर-उधर ताश-जुआ खेलता रहता। सारा का सारा पैसा शराब में उड़ा डालता, अगर थोड़े-बहुत रुपये बच जाते तो उसे जुए-सट्टे में बर्बाद कर आता। पत्नी बहुत समझाती पर उसके कान में जू तक ना रेंगती, आये दिन घर में तनाव-क्लेश का माहौल बना रहता। जब उसकी बीवी बुरी तरह दुखी होकर उस पर ज्यादा दबाव बनाती या लताडती तो वो मारपीट पर उतारू हो जाता। उसके दिल में घर में छोटी नन्ही-बेटी की लिहाज़ करने जैसी कोई बात नहीं थी। उसे तो सिर्फ और सिर्फ शराब ही दिखती थी।
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बेहद दुखी हो गयी थी उसकी बीवी। समझा-समझा कर थक चुकी थी उसकी बीवी, दारु-दारु-और सिर्फ दारु ही उसके पति की ज़िन्दगी रह गयी थी। बहुत बार रिश्ते-नातेदारों की पंचायत भी बैठी, लेकिन उसके पति ने किसी भी पंचायत के फैसले को नहीं माना। अब उस औरत के ज़िन्दगी में आये दिन मारपीट-गालीगलौच होना, लड़ाई-झगडा, तनाव ही रह गया था। कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था उसे, एक तो कम पढीलिखी थी और दूसरा एकदम निम्न-वर्गीय परिवार से ताल्लुक रखती थी। दूसरी शादी करने या अपने पति को छोड़ कर चले जाने की बात तो स्वप्न में भी नहीं सोच सकती थी। यही वजह थी की-"किसी भी पंचायत में इन दो बातो की तरफ तो सोच-विचार ही नहीं किया गया।" बेचारी हर बार पंचायत के सफल होने की प्रार्थना करती लेकिन ना जाने कब भगवान् उसकी पुकार सुनता और कब पंचायत सफल होती???
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उसके माँ-बाप, परिजन, शुभचिंतक सभी दुखी थे। कुछ किया तो जा नहीं सकता था, इसलिए सभी उसका हौसला बढाते और भगवान् में आस्था बनाए रखने की नसीयत देते। लेकिन, इन हौसलों और आस्था मात्र से भला कभी कुछ हुआ हैं??? हौसला और आस्था भी तभी काम आते हैं, जब लगनपूर्वक प्रयास किये जाए। बैठे-बिठाए नातो हौसला काम देता हैं और नाही आस्था। उसका दिमाग खराब हो चुका था। आलसी और शराबी पति से छुटकारा तो पाया नहीं सकता था लेकिन सुधारा तो जा सकता था। बस, इसी दिशा में उसका दिमाग चल रहा था। दिमाग चल रहा था, दिमाग कोई रास्ता ढूँढने में लगा हुआ था, तभी..........तभी.........
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तभी उसके दिमाग में एक विचार कौंधा। यह विचार दिमाग में आते ही, उस दुखियारी की बांछे खिल उठी। बिना किसी को अपना विचार-उपाय बताये, बिना किसी से (यहाँ तक की अपने माँ-बाप से भी नहीं) चर्चा किये पहुँच गयी अपने आलसी पति के कमरे में। चढ़ी दोपहरी में उसका पति अपने कमरे में दारु पीने में लीन था, इस तरह बेधड़क अपनी बीवी को कमरे में घुसता देखना उसके लिए दुनिया के किसी आठवे अजूबे से कम ना था। कभी बिना दरवाज़ा खटखटाए उसकी बीवी उसके कमरे में कभी घुसी ही नहीं थी, आखिर शान्ति-तसल्ली के साथ दारु जो पीता था.....तभी तो वह हैरान होकर, अवाक होकर अपनी बीवी को कमरे में आते देख रहा था।
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उसकी बीवी आते ही उसको सुनाने लगी-"कोई काम-धाम तो करते नहीं, सारे दिन दारु पीते रहते हो। अपनी कमाई की दारु पियो तो मुझे कोई ऐतराज़ नहीं होता, लेकिन तुम तो मेरी मेहनत के पैसे दारु पर लगा रहे हो। बहुत हो लिया, अब और ऐसा नहीं चलेगा, कमाई करके लाओ तो मानु, मुफ्त की दारु अब और नहीं मिलेगी। यह भी भला कोई तरीका हैं मैं दिनभर सिलाई-कढाई करके पाई-पाई जोडू और तुम शाम को आकर मेरे पैसे दारु-सट्टे-जुए में लुटा दो। मेरा नहीं सोचा, कोई बात नहीं, सहन कर लिया। अब बेटी भी हैं, इसके भविष्य, इसकी पढ़ाई-लिखाई की अब तो सोचिये, पहले बच्ची थी अब स्कूल जाने लायक हो गयी हैं, इसको पढ़ाना भी तो हैं। कब तक सारे दिन घर पड़े-पड़े दारु पीते रहोगे???? अब ऐसा हरगिज नहीं होगा, कमाई करो तभी दारु पीने दूंगी, वरना....."
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अभी उसकी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि-तभी जोरदार चांटा उसके गाल पर पडा और उसके शराबी पति के यह शब्द उसके कान में गूंजे-"क्या वरना?, क्या कर लेंगी तू??, क्या औकात हैं तेरी??, तू (गाली-गाली-गाली) अपने आप को समझती क्या हैं??, तेरी कमाई और मेरी कमाई में कोई फर्क नहीं हैं, समझी??, मेरी मर्ज़ी जो चाहूँगा करूंगा तू (गाली) कौन होती हैं रोकने वाली??, अगर मैं तुझे ब्याह के ना लाता तो तू कही (गाली) पर बैठी होती। आदि-आदि।" आये दिन मारपीट सहने की आदि हो चुकी पत्नी ने शायद पूरी तैयारी कर रखी थी, तभी तो उस पर इस बार की मारकुटाई का कोई प्रभाव नहीं पडा और उसने कह डाला-"अगर तुमने शराब ना छोड़ी और कमाई करना शुरू नहीं किया तो मैं तुझे अन्दर करवा दूंगी।" उसके पति के तेवर अभी भी नरम नहीं पड़े थे, एक और चांटा उसे जड़ा और घर से निकल जाने का फरमान सुना दिया। उसकी पत्नी भी शायद आखिरी लड़ाई-आर या पार करने की ठान चुकी थी, तभी तो उसने अपना उपाय बेझिझक कह दिया-"मैं इस घर से निकलूं या ना निकलूं, तुझे जेल में डलवा दूंगी। मैं तेरे खिलाफ दहेज़ मांगने और मारपीट करने का मुकद्दमा दर्ज करा दूंगी, वहाँ बैठा चक्की पीसते रहना। ऐसी गत करुँगी, कि-"दुनिया के सारे पति शराब और आलस से कोसों दूर हो जायेंगे।" अभी भी मान जा, कमाई करने की और शराब छोड़ने की तरफ ध्यान दे ले, वरना अन्दर जाने के लिए तैयार हो जा।"
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ठीक ऐसी ही क्लास उसने अपने पति की दो-चार बार और लगाईं और लड़ाई जीतने में कामयाब रही। आज उसका पति ना सिर्फ आलस्य त्याग कर अच्छी-खासी कमाई कर रहा हैं, बल्कि उसने शराब भी लगभग छोड़ ही दी हैं। इतना ही नहीं अब उनके एक बेटा भी हैं, और दोनों बच्चे शहर के महंगे, जाने-माने स्कूल में पढ़ रहे हैं। उसके पति की आय अब इतनी हैं कि ना सिर्फ उनके घर का खर्च आराम से निकल जाता हैं बल्कि काफी पैसा बचत खातो और विभिन्न स्थानों पर निवेश भी कर रखा हैं। और जब इतना सब हो तो, पत्नी को काम करने कि क्या आवश्यकता हैं? बस, अब तो उसका एकमात्र काम घर संभालना, बच्चो को पढ़ाना, और "प्रिय" पतिदेव का ख्याल रखना ही रह गया हैं।
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अभी कुछ दिनों पहले उनका कई सालो बाद हमारे घर आना हुआ। मेरी मम्मी ने, हैरानी जताते हुए, जब उनके इस हौसले और कदम की तारीफ़ की, तो उनका जवाब और भी हैरानी पैदा कर गया। उनका जवाब था-"अरे भाभी जी, इसमें कोई हौसला-वौसला जैसा कुछ भी नहीं था। मैं गुस्से में थी, इसलिए उनसे लड़ पड़ी, और लड़ाई-लड़ाई में मैंने उन्हें अपने प्लान के मुताबिक़ लपेट लिया। अक्सर गुस्से में हम लड़ पड़ते थे, इसलिए इस बार भी गुस्सा होकर लड़ रहे थे। हर बार लड़ाई में मैं उन्हें कुछ-ना-कुछ कहती थी, इस बार भी मैंने यह सब कह दिया और काम बन गया।" अब तक मम्मी को सारी बात समझ में आ चुकी थी, मम्मी बोली-"इस बार की कही बात असर कर गयी, अगर हर बार की तरह यह बात भी काम ना आती तो तेरा घर-बार-परिवार सब छुट चुका होता। तू बर्बाद हो चुकी होती......"
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तो यह था वाक्यांश। अब तो आप सबको समझ में आ गया होगा कि-"कैसे क़ानून के दुरूपयोग ने एक औरत के जीवन को नरक-तबाह होने से बचा लिया???" दोस्तों मैं क़ानून के दुरूपयोग के सख्त खिलाफ हूँ, आये दिन सुनाने-पढने-देखने को मिलता हैं कि-"दहेज़-मारपीट, आदि कानूनों का दुरूपयोग हो रहा हैं, इस लड़की ने इसे फंसा दिया या इस औरत ने क़ानून का दुरूपयोग करके इस लड़के की ज़िन्दगी तबाह कर दी, आदि-आदि।" लेकिन कही भी मैंने दहेज़-मारपीट क़ानून के सदुपयोग की बात नहीं सुनी हैं। कुछेक जगह सदुपयोग बेशक हुआ हो, लेकिन अमूमन इस क़ानून का उपयोग दुसरे को दबाने-तबाह करने में ही किया जाता हैं। अपने हिन्दुस्तान की यही तो कमी हैं, इसके क़ानून में कई लूप-होल्स (छिपे-छिद्र) हैं, यहाँ क़ानून लागू तो कर दिए जाते हैं, लेकिन उस क़ानून के दुरूपयोग को रोकने के कोई प्रभावी उपाय नहीं किये गए है। यही वजह हैं कि-"यहाँ सभी कानूनों में से सबसे ज्यादा दुरूपयोग दहेज़ क़ानून का ही होता हैं।"
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मुझे डर हैं कि-"कही इन दहेज़ कानूनों का दुरूपयोग इतना ना बढ़ जाए कि-"सरकार को यह क़ानून रद्द ही ना करना पड़ जाए" और औरते फिर से बिन-क़ानून के लाचार हो जाए।" भगवान् करे ऐसा ना हो कि-"बिना क़ानून के औरते 19वीं सदी की स्थिति में पहुँच जाए और फिर औरतो पर जुल्मोसितम का युग लौट कर पुन: आ जाए।"
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मुझे दहेज़-मारपीट क़ानून का ऐसा सकारात्मक दुरूपयोग मंजूर हैं, मैं कानून के ऐसे दुरूपयोग से सहमत हूँ। तो आइये आप और मैं मिलकर औरतो से यह आह्वान करें कि-"कीजिये क़ानून का ऐसा सकारात्मक दुरूपयोग, तभी सभी बुरे-बिगडैल पति सुधर कर, हदों में रहेंगे। तभी यह क़ानून टिका-कायम रहेगा। वरना जिस हिसाब से इस क़ानून का दुरूपयोग बढ़ रहा हैं, उस हिसाब से यह क़ानून जल्द ही वापस-समाप्त होता लग रहा हैं।"
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धन्यवाद।
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CHANDER KUMAR SONI,
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Sunday, February 21, 2010

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ग्रेडिंग सिस्टम सराहनीय।

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बच्चो अब आपकी परीक्षा को एक महीना भी नहीं बचा हैं। जाहिर हैं, आप भी खेल-कूद, मौज-मस्ती को भूल कर, खूब जोर-शोर से परीक्षा की तैयारियों में डूबे हुए हो। और डूबे भी क्यों ना, आखिर पूरे साल की मेहनत का फल जो मिलना हैं। और फिर नयी कक्षा में प्रवेश करने का जोश-उत्साह भी तो हैं।

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इस बार तो नहीं पर अगले सेशन (सत्र) से ग्रेडिंग सिस्टम लागू हो जाएगा। यह निश्चित तौर पर बच्चो-छात्रो का तनाव जरूर कम करेगा। कुछ लोग ग्रेडिंग सिस्टम का विरोध कर रहे हैं, विरोधियों का कहना हैं कि-"यह छात्रो के दिलो में से परीक्षा का डर समाप्त कर देगा। बच्चे वैसे ही साल भर नही पढ़ते हैं, कम से कम परीक्षा के दिनों में तो उन्हें पढने दो। ग्रेडिंग सिस्टम बच्चो के भविष्य को बिगाड़ने वाला मामला साबित होगा। जब छात्रो में परीक्षा का डर ही नहीं रहेगा, तो क्या वो ख़ाक पढेंगे?? और जब बच्चे पढेंगे ही नहीं तो वे अपना भविष्य कैसे संवारेंगे?? कैसे अपने पैरो पर खड़े हो सकेंगे?? कैसे अपने कंधो पर जिम्मेदारियों का बोझा उठा सकेंगे??, और कैसे अपना और अपने परिवार का पेट पालेंगे??? आदि-आदि।"

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लेकिन विरोधियों के लाख तर्कों और विरोध करने को दरकिनार करते हुए मैं ग्रेडिंग सिस्टम लागू करने को सराहनीय कदम मानता हूँ। मुझे यकीन हैं कि-"पढ़ाई-लिखाई का यह सिस्टम देश में शिक्षा के क्षेत्र में एक नयी क्रान्ति का सूत्रपात करेगा। अब तक देश में पढ़ाई-लिखाई का जो रट्टा मारने वाला ढर्रा रहा हैं, उसमे उल्लेखनीय बदलाव देखने को मिलेगा। क्योंकि ग्रेडिंग सिस्टम के साथ-साथ शिक्षा-सुधार कार्यक्रम भी लागू किया जा रहा हैं।"
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मुझे लगता हैं कि-"इस कदम से छात्रो, विद्यार्थियों पर से पढ़ाई का बोझ-परीक्षा का तनाव कम होगा। विद्यार्थियों पर पढ़ाई का, परीक्षा का अनावश्यक दबाव-तनाव-बोझ नहीं पडेगा।" मैं विरोधियों से पूछना चाहता हूँ कि-"क्या आपने कभी उन बच्चो के बारे में सोचा हैं, जो परीक्षा के भारी तनाव के कारण डीप्रेशन में आ जाते हैं??, जो एक बार नाकामी झेलने के बाद पढ़ाई से ही मुंह मोड़ लेते हैं??, जो आठवी, दसवी, या बारहवी की बोर्ड परीक्षाओं में फेल-अनुत्तीर्ण होने के बाद आत्मह्त्या जैसा खतरनाक कदम उठा बैठते हैं??" आपके बच्चे होशियार हैं, आपके बच्चे टॉप करते हैं, आपके बच्चे रैंक प्राप्त करते हैं, आपके लिए ग्रेडिंग सिस्टम गलत हैं, क्यों??? क्योंकि आपके बच्चे के आसपास जिस भी बच्चे के नंबर होंगे वो आपके बच्चे के समकक्ष माना जाएगा। क्योंकि अभी तक मार्क्स स्पष्ट सामने दिखते थे, जबकि अब ऐ, बी, सी, डी,..... की तरह ग्रेड मिलेंगे।

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हमेशा अपना-अपना ही नहीं सोचना चाहिए। दूसरो का भी, ज्यादा नहीं तो कुछ, सोचना ही चाहिए। सब बच्चे एक जैसे, एक जितने होशियार-इनटेलीजेंट नहीं हो सकते, कही ना कही-कोई ना कोई फर्क तो उनमे होगा ही। वैसे ग्रेडिंग सिस्टम का विरोध करने वालो को मैं एक बात साफ़-साफ़ कह देना चाहता हूँ कि-"आपके बच्चे अगर होशियार-तेज़ हैं तो कृपया अपने बच्चे के दिलोदिमाग पर पड़ रहे दबाव को अवश्य महसूस कर लीजिएगा।"

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वैसे तो मुख्य रूप से इसका विरोध पढने-लिखने वाले होशियार छात्रो के अभिभावक ही कर रहे हैं क्योंकि-"पुराने सिस्टम में एक-एक पॉइंट का फर्क पड़ता था, लेकिन इस नवीन सिस्टम में 10-10 प्रतिशत के ग्रुप बनाएं जायेंगे, और उसी के हिसाब से ग्रेड दी जायेगी। बस, यही कारण हैं इनके विरोध-तर्कों का। क्योंकि 10 प्रतिशत के अंको वालो को एक ही ग्रुप में शामिल किया जाएगा। और ये नहीं चाहते कि-"और कोई इनके बच्चो के समकक्ष आकर खडा हो।" दुर्भाग्य से इस क्रांतिकारी शिक्षा-प्रणाली का विरोध कमजोर-पिछड़े बच्चो के अभिभावक भी कर रहे हैं। यह अलग बात हैं कि-"उनका विरोध कुछ हलके स्वर में-दबी आवाज़ से हो रहा हैं क्योंकि यह इस बात को अपने पक्ष में ले रहे हैं कि-"इनके बच्चे बिना पढ़े-बिना मेहनत अपने अंक-प्रतिशत को बढ़ा सकते हैं। वो ऐसे, मान लीजिये इनके 61 प्रतिशत अंक आये हैं तो यह आसानी से यह कह सकते हैं कि इनके 70 प्रतिशत अंक आये हैं।" बस, इसी कारण से इन छात्रो के अभिभावकों का विरोध मुखर नहीं हैं।"

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कृपया मुझे आप यह बताइये कि-"ग्रेडिंग सिस्टम आने से क्या हो जाएगा?? क्यों आपने ग्रेडिंग सिस्टम का हौव्वा बना रखा हैं?? क्या इस नए सिस्टम के आने से आपका बच्चा पढ़ना बंद कर देगा?? बच्चे ग्रेडिंग सिस्टम का स्वागत कर रहे हैं, इसका मतलब यह नहीं हैं कि, वे पढ़ना नहीं चाहते और इस सिस्टम में उन्हें कम पढ़ना पडेगा। कही बच्चो का स्वागत ही आपके विरोध का कारण तो नहीं हैं?? सोचिये, इस नए सिस्टम के आने से आपका बच्चा क्या पढ़ना शुरू नहीं कर देगा?? क्या इस नए सिस्टम से आने से आपके बच्चे पर से पढ़ाई का, परीक्षा का तनाव कम नहीं होगा?? क्या इस नए सिस्टम से हमारी शिक्षा-प्रणाली में, देश में शिक्षा का स्तर ऊँचा नहीं होगा?? आदि।

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ऐसे तो आप अपने बच्चो को सुखी देखना चाहते हैं, लेकिन आपके बच्चो के चेहरे से झलकता परीक्षा-एग्जाम का तनाव आपको नहीं दिखता। बच्चो की ख़ुशी में ही आप अपनी ख़ुशी मानते हैं, लेकिन आपको बोझिल-ऊबाऊ पढ़ाई और रट्टा मार कर नंबर लेने, जैसी पढ़ाई से दुखी होते आपके अपने नौनिहाल नहीं दिखते। बच्चो को आप अपनी जान से भी चाहते हैं, लेकिन रटकर नंबर लाने के चक्कर में बच्चे की जान पर बन आती हैं, यह आप नहीं समझते। बच्चा जब अन्य कारणों से बीमार होता हैं तो आप अपना खाना-पीना भूल जाते हैं, लेकिन जब आपका बच्चा परीक्षा के अनावश्यक-भारी मानसिक दबाव-तनाव के कारण बीमार होता हैं, चिडचिडा हो जाता हैं, तनाव में खाना-पीना भूल जाता हैं, और खान-पान की अनियमितता के कारण जी घबराना-चक्कर आने जैसी दिक्कते आती हैं तो आप उसे चिकित्सक के पास ले जाने की बजाय महज थोड़ा आराम करने की सलाह दे डालते हैं। यह तो सरासर नाइंसाफी हैं इन छात्रो के साथ।

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यह सिस्टम-विस्तम के चक्कर में मत पड़िये, अपने दिल की आवाज़ सुनिए, दिमाग की हरगिज़ मत सुनिए, दिमाग नैतिक-अनैतिक, सही-गलत, आदि चीज़े नहीं देखता हैं, अपने ज़मीर-दिल की आवाज़ को ध्यान से सुनिए, दिल वही कहेगा जो आपके बच्चो के लिए, आपके बच्चो के भविष्य के लिए लाभदायक होगा। उसी सिस्टम का समर्थन कीजिये, जिससे आपका बच्चा मन लगाकर पढ़ सके, ताकि वो भविष्य में कुछ कर या बन सके। विरोध करना हैं, तो मौजूदा-पुराने सिस्टम का कीजिये, स्वागत करना हैं, तो नए प्रस्तावित सिस्टम का कीजिये, और विरोध ही करना हैं, तो इस नए-नवीन सिस्टम का विरोध करने वालो का कीजिये।

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वैसे लोग जो भी कहे, अभिभावकों को जो मर्ज़ी डर सता रहा हो, विरोधियों के जो भी-जैसे भी तर्क-वितर्क हो में तो सिर्फ एक ही बात जानता/मानता हूँ कि-"जिन बच्चो को पढ़ना होता हैं, वो किसी भी दुरूह हालात-विषम परिस्थितियों में, और किसी भी सिस्टम में पढ़ सकते हैं। और जिन बच्चो को पढ़ना ही नहीं होता, उन्हें आप किसी भी सुख-सुविधा, ऐशोआराम से, और कैसे भी सिस्टम में नहीं पढ़ा सकते।"

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धन्यवाद।


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Tuesday, February 16, 2010

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भजभज मंडलियों, भगवाधारियों को हैप्पी वैलेंटाइन डे।
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सर्वप्रथम मैं आपसे माफ़ी चाहूँगा कि-"इंटरनेट की किसी तकनीकी खराबी/खामी के कारण मैं यह लेख ठीक वैलेंटाइन डे के दिन पोस्ट नहीं कर पाया, लेकिन फिर भी मेरा लगातार यह प्रयास रहा कि-"जल्द से जल्द यह लेख पोस्ट कर सकू।" लगातार कोशिशो के बाद भी मैं यह पोस्ट वैलेंटाइन डे के दो दिन बाद पोस्ट कर पाया हूँ। देरी के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ। वैसे तो यह मेरा अपना निजी ब्लॉग हैं, लिखू ना लिखू, लेकिन मेरी ऐसी सोच नहीं हैं। मैं अपने पाठको के लिए ही लिखता था, लिखता हूँ, और लिखता रहूंगा। अगर मेरे पाठक ही नहीं होते तो मेरा लिखना व्यर्थ होता, इसलिए मेरे ब्लॉग पर मुझसे कहीं ज्यादा हक़-अधिकार मेरे ब्लॉग के पाठको का हैं। देरी के लिए मैं अपने ब्लॉग के पाठको से पुन: क्षमाप्रार्थी हूँ।"
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सभी प्रेमियों (सच्चे और पवित्र प्रेमी लोग ही) को और वैलेंटाइन डे मनाने वालो को मेरी तरफ से हार्दिक शुभकामनाएं। आज के दिन का सभी लोगो को बेसब्री से इंतज़ार रहता हैं, और रहे भी क्यों ना आखिर प्रेम का जो दिन हैं। लेकिन, ना जाने क्यों कुछ लोगो को इस दिन से नफरत-चिद्द सी हैं?? जब देखो प्रेम के इस पवित्र पर्व का विरोध करते रहते हैं, प्रेमियों की जान के पीछे हाथ धोकर पड़े रहते हैं।
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इनका यह विरोध किसी नाटक-नौटंकी से कम नहीं हैं। साल भर घर बैठे रहते हैं, और ठीक वैलेंटाइन डे के दिन ना जाने विरोध-प्रदर्शन करने कहाँ से निकल आते हैं???? कुछ उदाहरण जो मेरी इस बात की सच्चाई की पुष्टि करेंगे =
1. आज से तीन-चार साल पहले की बात हैं, इन्ही भजभज मंडली वालो ने शहर के कई रेस्तरां में तोड़फोड़ की और वहाँ बैठे प्रेमियों को डरा-धमका कर (कुछेक को मारपीट कर) भगा दिया। और शायद आप लोगो को यकीन नहीं होगा कि-"इस घटना के कुछ ही दिनों बाद अपने आप को नेता कहने वाला यह भगवाधारी राजधानी (जयपुर) के पंचसितारा होटल में एक युवती के साथ गुलछर्रे उड़ा रहा था।" यहाँ साफ़ कर दूं कि-"इस कथित नेता के भाई ने ही मुझे सारी बाते बताई थी, इतना ही नहीं उसने कुछ फोटोग्राफ्स भी मुझे दिखाए थे।"
2. ठीक इसी तरह, पिछले साल भी बाज़ार में विरोध-प्रदर्शन कर रहे एक भगवा दल के कार्यकर्ता (जोकि मेरे दोस्त का छोटा भाई था) से मैंने जब वैलेंटाइन का मतलब और विरोध करने का कारण पूछा तो उसका ज़रा जवाब देखिये-"ओह भैया, मैं तो ऐसे ही इनके (किसी की तरफ इशारा करते हुए) साथ आ गया, ये मेरे मोहल्ले में ही रहते हैं।"
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तो यह हैं इन सबकी हकीकत। दोस्तों कुछ समझ में आया??? पहले उदाहरण में एक नेता संकीर्ण-तुच्छ विचारों और हिंसा से अपनी राजनीति को चमकाना चाहता हैं और जब मूड करे शहर से बाहर (जहां कोई जानने-पहचानने, और देखने वाला न हो) आराम से गुलछर्रे उड़ा सके। दुसरे उदाहरण में विरोध-प्रदर्शन करने वाले कार्यकर्ता भाड़े के हैं, जिन्हें रत्ती भर भी जानकारी नहीं होती हैं। इस दुसरे उदाहरण से यह भी साफ हो जाता हैं कि-"ये लोग कैसे-कैसे तिकड़म भिड़ा कर भीड़ जुटाते हैं और ये भीड़ इनकी रीति-नीतियों के प्रति कितनी वफादार होती हैं???"
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दोस्तों, उपरोक्त दोनों या इनसे मिलतेजुलते उदाहरण आप लोगो ने भी देखे-सुने होंगे। इन लोगो के विरोध कोई मकसद या महत्तव के लिए नहीं होता हैं, इनका लक्ष्य तो हिंसा और ऐसे कारनामो से खुद को हाईलाईट करना होता हैं। ये चाहते हैं कि-"इनकी फोटो-नाम-खबर अखबारों में छपे और लोगो में इनके प्रति खौफ पैदा हो। भारतीय संस्कृति-मूल्यों से इनका कोई वास्ता नहीं होता हैं, इनका वास्ता तो भारत के नाम पर, संस्कृति-मूल्यों के नाम पर वोट लेना या अपनी नेतागिरी चमकाना होता हैं।"

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कुछ सवाल जो मैं इन भजभज मंडलियों और भगवाधारियों से आपके-अपने इस ब्लॉग के माध्यम से पूछना चाहूँगा =
आप वैलेंटाइन डे का विरोध क्यों करते हैं??
आप प्रेम करने को बुरा मानते हैं या नहीं??
अगर हाँ तो फिर शास्त्रों को, कृष्ण जी को नहीं मानना चाहिए, क्योंकि वे तो प्रेम का सन्देश देते हैं।
अगर नहीं तो फिर आप प्रेमियों को हिंसा करके डराते-धमकाते-भगाते क्यों हैं??
अश्लीलता का विरोध कीजिये, शालीनता से बैठे लोगो पर हमला क्यों???
लड़का-लड़की का साथ बैठना, घूमना क्या गलत हैं??
मुसलमानों की कट्टरता का आप विरोध करते हैं, और अब आपका कट्टरता पर उतरना सही हैं??
साल भर सडको पर, स्कूल-कालेजो के आसपास मजनू टाइप लड़के घुमते रहते हैं तब आप कहाँ होते हैं??
सरेआम लड़कियों-युवतियों के साथ छेड़छाड़ होती रहती हैं, तब आप क्या कुम्भकरणी नींद सो रहे होते हैं??

देशभर के सभी शहरो में अश्लील फ़िल्मी पोस्टर लगे होते हैं तो क्या वो आपके अपने अंदाज़ में शहर का सौन्द्रयिकर्ण हैं??
इन अश्लील पोस्टरों से क्या आपका सिर गर्व से ऊंचा उठ जाता हैं???
प्रेम दिवस का विरोध आप किस मुंह से करते हैं?? आपके अपने नेता-कार्यकर्ता दागी हैं।
सच्चे प्रेम और वासना भरे प्रेम में क्या आप फर्क जान सकते हैं??
क्या आप किसी के अन्दर झाँक कर देख सकते हैं, कि-वहाँ सच्चा प्यार हैं या वासना का प्यार???
अगर देख सकते हैं तो इस बात की क्या गारंटी हैं कि-वर्तमान का सच्चा प्यार आगे चलकर वासना में नहीं बदलेगा??

कही ऐसा तो नहीं, इन प्रेमियों के हँसते-मुस्कुराते चेहरों को देखकर आपको जलन होती हो??
खजुराहो के मंदिरों को स्थापत्य-कला का बेजोड़ नमूना बताते हुए, आप क्यों इन्हें पर्यटक स्थलों के रूप में विकसित/पेश करते हैं??
जबकि खजुराहो (मध्यप्रदेश) में आपकी ही सरकार हैं, तोड़ क्यों नहीं देते इन कथित रूप से अश्लीलता परोस रहे मंदिरों को????

क्यों आप इन पर्यटक स्थलों को बंद नहीं कर देते??
क्यों आप इनके रखरखाव, सुरक्षा, आदि मदों में लाखो रूपये खर्च करते हैं??

लेकिन दुर्भाग्य से आप ऐसा नहीं कर सकते, आखिर वहाँ आपकी अपनी सरकार जो हैं।

वैलेंटाइन को पाश्चात्य त्यौहार बताते हुए आपका विरोध करना कितना उचित हैं???

राष्ट्रीय त्यौहारों (होली-दिवाली-नववर्ष-बैसाखी-आदि) के प्रति लोगो के घटते रुझान को लेकर आप कुछ क्यों नहीं करते??

आप लोग वैलेंटाइन का विरोध विदेशी परम्परा बताते हुए करते हैं, तो फिर विदेशो में रह रहे भारत-वंशियों को होली-दिवाली, आदि मनाने का क्या हक़ हैं??

अगर आपकी तरह सब लोग करने लग जायेंगे तो कनाडा, अमेरिका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, आदि देशो में बसे सिखों को बैसाखी, गुरुपर्व वहाँ कौन मनाने देंगा??

आप भारतीय संस्कृति के ठेकेदार बनते-फिरते हैं, लेकिन आप ही संस्कृति के लिए किसी अभिशाप से कम नहीं हैं।

भारत में तेज़ी से बढ़ रहे बलात्कार, यौन शोषण के आंकड़ो से क्या संस्कृति और मूल्यों में गिरावट नहीं आती हैं???

सरेआम लड़के-लड़कियों को भाई-बहन बनाकर राखी बंधवा देना कहाँ का तरीका हैं???
कोई अश्लीलता या असभ्य व्यवहार अगर कही होता मिले, तो पुलिस किसलिए हैं??

सार्वजनिक स्थानों पर अश्लीलता फैलाने का मुकद्दमा क्यूँ नहीं दर्ज करा देते??

प्रेम-प्यार का उलटा मतलब प्रेमी लोग निकाले या ना निकाले लेकिन आप जरूर निकालेंगे।

ये भी कहाँ का तरीका हुआ, लड़के के हाथो लड़की की मांग में जबरन सिन्दूर भरवा देना??

हो सकता हैं, उन्होंने भविष्य में शादी करने की सोच रखी हो??

ये भी हो सकता हैं, वे अपने-अपने माता-पिता को शादी के लिए मनाने की कोशिशे कर रहे हो??

कर दिया ना आपने गुड-गोबर??

अच्छा भला, उनके माँ-बाप सहमत होने वाले थे, कि-"आपके कारण वे अपने निर्णय से पलट गए, यह कहते हुए-तुमने तो सारे शहर में नाक कटवा दी।"

किसी लड़के-लड़की के मिलनेजुलने से क्या पाप हो जाता हैं??

हकीकत में आप लोग लडको को तो मारपीट कर भगा देते हैं और लड़कियों के साथ छेड़छाड़ करते हुए आनंदित होते हैं। रोती-बिलखती-कलपती हुयी और हाथ जोडती लड़कियों से आप आत्म-संतुष्टि महसूस करते हैं।

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आपका विरोध एकदम झूठा-थोथा हैं, शर्म आनी चाहिए आपको विरोध करते हुए। आपके आगे (मंदिरों में) कोई चढ़ावा चढाते हुए अपने प्यार के लिए दुआ मांगे तो आप बड़े खुश होते हैं। चुनावों में आप लोगो को सुशाषण, क़ानून की सख्ती से पालना कराने, आदि बातों, लच्छेदार भाषणों से मतदाताओं को बरगलाते हैं और बाद में आप लोग ही वैलेंटाइन डे आदि मौको पर कार्डो, गिफ्ट आइटमो की दुकानों पर तोड़फोड़ करना, कार्डो की होली जलाना, रेस्तरां-होटल आदि स्थानों पर जा कर प्रेमियों के साथ अभद्र-हिंसक व्यवहार करना, लड़कियों के बाल खींचना और गालीगलौच करना, लडको के साथ मारपीट करना, होटल/रेस्तरां का नुकसान कर देना, आदि कृत्य करते हैं। तब क्या क़ानून व्यवस्था बहुत अच्छी हो जाती हैं??

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एक तरफ आप लोग (साधू-संत-महात्मा) ही लोगो को प्रेम करने, प्रेम से रहने के उपदेश देते हैं, और दूसरी तरफ आप लोग ही प्रेमियों पर बाज़-चील की तरह टूट पड़ते हैं। लोग बेचारे करे भी तो क्या करे?? लड़का-लड़की का साथ बैठना आपको सुहाता नहीं हैं, और आपके आश्रमों-मस्जिदों-चर्चो में सारी हदे पार करदी जाती हैं। अश्लीलता आपके विचारों में हैं, अश्लीलता आपके अपने अन्दर हैं, जिसे आप निकालना ही नहीं चाहते। आप लोग कहते हैं कि-"प्रेम का कोई एक दिन नहीं होता, यह भी कोई तरीका हुआ??, प्रेम तो साल भर होना चाहिए।" लेकिन में आप लोगो से कहना चाहता हूँ कि-"आजकल की भागदौड़ भरी, तनाव भरी, व्यस्त से व्यस्तम जिंदगी में अगर किसी को पल-दो पल प्यार करने का मौक़ा मिले तो क्या बुरा हैं?? इसी बहाने लोगबाग अपनी ज़िन्दगी को तनाव, टेंसन, आदि मानसिक परेशानियों से मुक्त कर पाते हैं।"
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वैसे मेरा तो दिल करता हैं कि-"काश वैलेंटाइन डे साल में एक बार आने की बजाय कम से कम महीने में एक बार जरूर आये, ताकि मैं, आप, और हम सब इसी बहाने ज़िन्दगी को नए ढंग से, ख़ुशी से, हँसते-मुस्कुराते हुए, प्रेम-प्यार से जी सके।"

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विशेष अपील = "वैसे इन भजभज मंडलियों, भगवाधारियों से नफरत ना करे, इन्हें भी भरपूर प्रेम करे। आखिर मैं, आप, और हम सब प्रेम दिवस जो मना रहे हैं। और जब प्यार-प्रेम का पर्व यानी वैलेंटाइन डे मना ही रहे हैं तो फिर क्यों ना हम अपने दुश्मनों (भजभज मंडलियों, भगवाधारियों) से भी नफरत कि जगह प्यार करे?? क्या पता अपना प्यार देखकर इन्हें कुछ भूल का एहसास हो और कल तक जो प्रेमियों के भक्षक थे वे अब रक्षक (विरोधियों से बचाने वाला) बन जाए??? और वैसे भी प्रेम सबसे किया जाना चाहिए, ना कि किसी एक से। तो फिर आइये इन भजभज मंडलियों और भगवाधारियों को हैप्पी वैलेंटाइन डे कहे।"

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धन्यवाद।

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