Monday, August 02, 2010
ये किसी सौतन से कम नहीं।
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आज तक आपने जितनी भी सौतनों के बारे में सुना होगा, उन सभी सौतनो से ज्यादा खतरनाक और घातक सौतन हैं ये कामधंधा, नौकरी। हैरान ना होइए मैं सौ प्रतिशत सच, सोलह आने सत्य कह रहा हूँ। आजकल की भागती-दौड़ती, व्यस्त और तेजरफ्तार ज़िन्दगी में सब और धन का ही बोलबाला हैं। जिसे देखो वो पैसे के पीछे भाग रहा हैं। मानो, पैसा ही सब कुछ हो, पैसा ही पानी और प्राणवायु की तरह महत्तवपूर्ण हो।
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नौकरी, कामधंधा, व्यापार आदि अब सौतन का रूप धरते जा रहे हैं। एक ऐसी सौतन जिससे कमोबेश हर औरत जूझ रही हैं। हर व्यक्ति अपनी बीवी और बच्चो से दूर होता जा रहा हैं। जब देखो पैसा, पैसा, और पैसा की ही रट लगाए रखता हैं व्यक्ति। चाहे कोई नौकरी करता हो या बिजनेस करता हो, या दुकानदारी या कामधंधा करता हो, सब इतने व्यस्त हो चुके हैं की उन्हें अपने परिवार का ही ख्याल नहीं रहा हैं। नज़र बस अपनी ड्यूटी पर ही लगी रहती हैं। परिवार की तरफ से तो नज़र ही फेर ली गयी हैं।
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जिन परिवारों में पति के साथ-साथ पत्नी भी नौकरी करती हो वहाँ तो हालात विकट हो जाते हैं। वहाँ बच्चो का और बूढ़े/उम्रदराज माता-पिता का ख्याल ईश्वर ही रखता हैं। सुबह दोनों पति-पत्नी दफ्तर के लिए तैयार होने और बच्चो को स्कूल भेजने (यदि स्कूल जाने लायक हो तो) में ही व्यस्त हो जाते हैं और फिर शाम को (अक्सर देर रात) को घर आने के बाद खाना-वाना खा-पीकर सो जाते हैं। माँ-बाप के लिए तो बस दुआ-सलाम ही शेष रह जाती हैं।
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खैर बात करते हैं, जहां सिर्फ पति या पुरुष नौकरी करता हो। पुरुष अब काफी व्यस्त हो गया हैं, जल्दी पैसा कमाने की धुन, जल्द से जल्द अमीर बनने की ललक, और बाज़ार में मौजूद गला-काटूँ कम्पीटीशन ने व्यक्ति को उलझा दिया हैं। जब देखो काम-काम-काम, पैसा-पैसा-पैसा, बस यही एक आदमी की ज़िन्दगी और ज़ीने का मकसद रह गया हैं। परिवार में बीवी तो बस घर लायक ही हैं जो खाना बना दे, कपडे धो/प्रेस करदे, आदि-आदि। बच्चे सिर-हाथ-पैर दबा दे, या कोई छोटे-मोटे काम करदे आदि-आदि।
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अब ये नौकरी, कामधंधा क्या किसी सौतन से कम हैं?? माना कामकाज करना, नौकरी करनी जरुरी हैं लेकिन इतनी भी क्या जरुरी कि-"व्यक्ति अपने परिवार, अपने बीवी-बच्चो को ही भुला दे??" चलिए जो भी हो, अब तो स्थिति ये हो गयी हैं कि-"वर्किंग डेज़ के साथ-साथ अब व्यक्ति ओवर-टाइम भी देने लगा हैं, ताकि थोड़ा ज्यादा धन कमा सके। इसके साथ-साथ अब व्यक्ति छुट्टी के दिन भी व्यस्त रहने लगा हैं। कभी दफ्तर के तनाव के कारण छुट्टी का दिन बेकार हो जाता हैं तो कभी दफ्तर का कार्य पुरुष छुट्टी के दिन घर ले आता हैं। छुट्टी के दिन भी एन्जॉय करने कि बजाय चिंताग्रस्त पति/पुरुष अगले दिन की रूपरेखा बनाने लगता हैं। जिससे पुरे परिवार का मज़ा किरकिरा हो जाता हैं।
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बच्चे भले ही अपने दोस्तों के साथ या पड़ोस/गली के बच्चो से मिल ले, खेल ले लेकिन पत्नी...??? अगर पत्नी किट्टी-पार्टी या पड़ोसनो से गप्पे लड़ा ले तो भी कब तक और कितना??? पत्नी और बच्चो को पति=पापा का तो साथ नहीं मिला। परिवार पति/पुरुष के बिना अधूरा होता हैं, पड़ोस के लोग, पडोसने, गली-मोहल्लो के बच्चे परिवार का हिस्सा कदापि नहीं हो सकते। सब कुछ जरुरी हैं, पैसा कमाना जरूरी हैं, नौकरी-कामधंधा सब जरुरी हैं, लेकिन परिवार भी जरुरी हैं। आपके बीवी-बच्चो को आपकी आवश्यकता हैंउन्हें समय दीजिये, उनके साथ वक़्त गुज़ारिये। उनके साथ-साथ आपको भी सुकून मिलेगा, सारी चिंताएं, सारी टेंशन, सब दूर भाग जायेंगी। चाहे कितना भी जरुरी क्यों ना हो, चाहे कितनी भी तनख्वाह क्यों ना हो, छुट्टी का दिन परिवार को दीजिये। बाकी दिन / कार्यदिवस को चाहे हाड़तोड़ मेहनत कीजिये, खूब खून-पसीना बहाइये, लंबा ओवरटाइम कीजिये, लेकिन छुट्टी के दिन परिवार के साथ रहिये।
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तो आप कबसे छुट्टियों का परिवार के लिए उपयोग करेंगे और इस सौतन से छुटकारा दिलाएंगे???
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FROM =
CHANDER KUMAR SONI,
L-5, MODEL TOWN, N.H.-15,
SRI GANGANAGAR-335001,
RAJASTHAN, INDIA.
CHANDERKSONI@YAHOO.COM
00-91-9414380969
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Monday, July 26, 2010
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प्रोत्साहित किया क्या??
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ना जाने क्यों लोग किसी को प्रोत्साहित करने को अपनी बेईज्ज़ती समझते हैं??? पता नहीं लोगो की क्या फितरत हैं कि-"प्रोत्साहित करने में तो सबसे पीछे रहते हैं, लेकिन हतोत्साहित करने को सबसे आगे रहते हैं??? मानो हतोत्साहित यूनियन के प्रधान हो।" मैं हमेशा अच्छे कार्य करने वालो को, नेकी या ईमानदारी या सच्चाई के रास्ते पर चलने वाले को यथासंभव प्रोत्साहित करता हूँ। अगर किसी कारणवश, या मजबूरीवश किसी को प्रोत्साहित नहीं भी कर पाता हूँ तो कम से कम हतोत्साहित तो कदापि नहीं करता।
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कुछ उदाहरण =
1. जब कोई कर/टैक्स की चोरी नहीं करता हैं, तो आप उसे प्रोत्साहित करने की बजाय हतोत्साहित करते हैं। इतना ही नहीं आप उसे करचोरी करने के कई उपाय भी बता डालते हैं।
2. जब कोई सावधानीपूर्वक, नियमपूर्वक, निर्धारित रफ़्तार से वाहन (दुपहिया, तिपहिया, या चौपहिया) चलाता हैं, तो आप उसे प्रोत्साहित करने की बजाय अनगिनत गालियाँ निकालते हैं। जैसे--कितना धीरे चला रहा हैं, चलाना ही नहीं आता, सड़क जाम करके रख दी, गाडी थोड़ी तेज़ चला, कछुआ चाल से चल रहा हैं, आदि-आदि।
3. जब कोई सड़क के बीचो-बीच घायल-चोटिल पडा हो और कोई भलामानस उसे संभाले तो आप मदद करने की बजाय उसे हतोत्साहित करते हैं। ये कहकर--छोड़ ना क्यों पंगे में पड़ रहा हैं??, क्यों पुलिस के लफड़े में आने पर तुला हैं??, ये रोज़-रोज़ का काम हैं तू चल एम्बुलेंस आ जायेगी, आदि-आदि।
4. जब कोई बिजली की चोरी नहीं करता हैं तो आप उसे प्रोत्साहित करने की बजाय हतोत्साहित करते हैं। ये कहकर--बिजली महेंगी हो गयी हैं क्यों पूरा बिल भरते हो??, हमें देखो हम ऐश कर रहे हैं, या डरो मत बिजली निगम के अधिकारियों से मेरी सेटिंग हैं कोई कुछ नहीं बोलेगा, या कुण्डी मैं ला देता हूँ या लगा देता हूँ, आदि-आदि।
5. जब कोई पानी की वेस्टेज करता हैं तो भी आप उसको पानी की कीमत बताने की बजाय उसे प्रोत्साहित करते हैं। जैसे-वाह गाडी चमक गयी हैं, आप पुरानी गाडी को भी नयी बताने लगेंगे, बढ़िया हैं सड़क की मिटटी दूकान में नहीं घुसेंगी, या पानी की कोई कमी नहीं हैं करो जैसे मर्जी इस्तेमाल, आदि-आदि।
यानी प्रोत्साहन भी नकारात्मक बात को। प्रोत्साहन सकारात्मकता को ही देना चाहिए। याद रखिये--अगर आप नकारात्मकता को प्रोत्साहित कर रहे हैं तो आप सीधे-सीधे अच्छाई को हतोत्साहित कर रहे हैं।
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याद रखिये--बूँद-बूँद से ही घड़ा भरता हैं। उसी तरह एक-एक व्यक्ति के सम्मिलित प्रयास से ही मकसद-लक्ष्य हल हो सकते हैं। अगर आप किसी को उसकी सच्चाई, ईमानदारी, नेकी या किसी अन्य अच्छाई-भलाई के लिए प्रोत्साहित नहीं कर सकते तो कम से कम उन्हें हतोत्साहित करके उनका हौसला तो मत डिगाइए।
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तो प्रोत्साहित किया क्या??
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धन्यवाद।
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Monday, July 19, 2010
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कुछ नकारात्मकता भी आवश्यक।
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अरे नहीं-नहीं, मैं किसी को नकारात्मक विचारों को अपनाने या सकारात्मकता को छोड़ने को नहीं कह रहा हूँ। मैं तो कुछ हद तक नकारात्मकता को सही ठहरा रहा हूँ।
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अब आप कहेंगे, कि-"ये क्या बात हुई??, मेरा ब्लॉग सकारात्मकता का पर्याय रहा हैं, मैंने अपने ब्लॉग में सकारात्मकता को प्रोत्साहित किया हैं। आज क्या हो गया मुझे??, जो मैं नकारात्मकता को कुछ हद तक जायज़-उचित ठहरा रहा हूँ।" जी नहीं, मुझे कुछ नहीं हुआ हैं, और नाही मैं अपने असल और आधारभूत मुद्दे (सकारात्मकता) से भटक गया हूँ। मैं आज भी सकारात्मकता को लेकर दृढ़ संकल्पित-अडिग हूँ, लेकिन कुछ हद तक (ज्यादा नहीं) नकारात्मकता भी आवश्यक हैं। कैसे??? अब ये जानिये।
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एक = जब हम कोई गाडी या अन्य कोई नया वाहन चलाना सीखते हैं, तो हमारे मन में कई तरह के अंत-शंट, उलटे-सीधे ख्याल (गिर जाना, चोट लगना, या एक्सीडेंट) आते हैं, जिसे हम भुलाकर कोई गाडी चलाना सीख पाते हैं। दोस्तों, वैसे तो ऐसे ख्यालो को नकारात्मक मानते हुए बचने की सलाह दी जाती हैं। लेकिन, ये बुरे-नकारात्मक ख्याल ही असल में हमारे गुरु साबित होते हैं। अगर कोई इन सबके बारे में नहीं सोचेगा, तो निश्चित रूप से वो गिरेगा या चोट खायेगा। संभावित खतरे का आभास होगा तभी तो प्रशिक्षु सावधानी बरतते हुए वाहन चलाना सीख पायेगा।
दो = जब हम कोई नया व्यवसाय-व्यापार शुरू करते हैं, तो हमारे जेहन-मन में कई आशंकाएं (काम-धंधा चलने या ग्राहकी आने, आदि) भी पनपने लगती हैं। और जैसे ही ये आशंकाएं हमारे मन में उभरने लगती हैं, तभी से हम उन आशंकायों को झुठलाने-निर्मूल साबित करने की कोशिशे करने लगते हैं। सोचिये, अगर आदमी के मन में व्यापार के फ़ैल होने, या ग्राहक के ना आने, या प्रतिस्पर्धा में पिछड़ने, आदि के नकारात्मक विचार नहीं आयेंगे तो वो बचाव के उपाय कैसे और क्यों करेगा???
तीन = जब कोई शेयर बाज़ार, म्युचुअल फंड, या अन्य कही अपना पैसा लगाता-निवेश करता हैं, तो वहाँ भी मन में नकारात्मक ख्याल (कितनी रिटर्न आएगी?, पैसा डूबेगा तो नहीं?, पैसा बढ़ने की बजाय घटेगा तो नहीं, या कही मैं जोखिम तो नहीं ले रहा?? आदि-आदि) आते हैं। लेकिन, नकारात्मकता को कही पीछे छोड़ते हुए निवेशक पूरी सुरक्षा-गारंटी के साथ अपना पैसा लगाता हैं। अगर ये ख्याल ना आये तो निवेशक अव्वल तो पैसा ही नहीं लगाएगा और अगर लगा भी लिया तो दुसरे को डूबता देख या तो मुडके शेयर बाज़ार की तरफ रुख ही नहीं करेगा या फिर आत्म-ह्त्या जैसा घातक कदम उठा बैठेगा।
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दोस्तों, उपरोक्त उदाहरणों मैं आप या आपका कोई जानकार भी हो सकता हैं। लेकिन, ये उदाहरण बेहद आम हैं। हर वक़्त सकारात्मकता उचित नहीं हैं, कुछ हद तक नकारात्मकता भी आवश्यक हैं, बशर्ते नकारात्मकता आप पर हावी ना हो। ज़िन्दगी का कोई भी क्षेत्र हो, नकारात्मक और सकारात्मक दोनों ही पहलु आवश्यक हैं। जीवन में दोनों ही बातें होनी चाहिए लेकिन पलड़ा-वजन सकारात्मकता का ही भारी होना चाहिए।
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कभी-कभी अनर्गल-नकारात्मक भी सोचना चाहिए, लेकिन सिर्फ उतना जितना आवश्यक हो। हद से ज्यादा या सकारात्मकता से ज्यादा सोचना निश्चित रूप से नुकसानदेह हैं। हर विषय में सोचना जरुरी हैं।
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धन्यवाद।
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Monday, July 12, 2010
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कहाँ गए प्राचीन खेल???
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गिल्ली डंडा, जंजीर, छुपनछुपाई, लूडो, सांप-सीढ़ी, कैरम, पकड़म-पकडाई, मार दडी, चौसर, शतरंज, कुश्ती, कबड्डी, खोखो, दौड़, आदि-आदि सभी प्राचीन खेल आज दुर्लभ (ग्रामीण क्षेत्रो को छोड़कर) होते जा रहे हैं। आज इन पुराने (लेकिन आधुनिक युग की परम-आवश्यकता) खेलो की तरफ से लोगो का रुझान दिन-प्रतिदिन घटता जा रहा हैं। युवापीढ़ी और किशोर वर्ग की रूचि भी इन खेलो की बजाय अन्य और आज के खेलो में ज्यादा नज़र आ रही हैं।
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खेल कोई भी बुरा नहीं हैं, किसी भी खेल (चाहे वो देश का हो या विदेश का) को खेलने में कोई बुराई या आपत्ति नहीं हैं। मसला ये हैं कि-"इन आजकल के खेलो में प्राचीन खेलो जैसी बात नहीं हैं। जो गुण, जो शिक्षा, प्राचीन-पुराने खेलो में हैं, वो आजकल के आधुनिक खेलो में नहीं हैं।" आजकल के युवाओं की, किशोरवय उम्र के लोगो की रूचि क्रिकेट, बास्केटबॉल, फुटबॉल, रग्बी, वॉलीबॉल, जूडो-कराटे, कुंग फु, वीडियो गेम, आदि खेलो में ही रह गयी हैं।
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ये बहुत ही गलत बात और दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति हैं। आप पाठक-गण इसे दुर्भाग्य माने या ना माने लेकिन मैं इसे मानता हूँ, और देर सवेर आप भी मानेंगे। जो दिमागी-शारीरिक मेहनत, जो कौशल, जो रणनीति, जो शिक्षा, इन आधुनिक खेलो में तलाशी जा रही हैं, वो दरअसल इनमें प्राचीन खेलो में आज भी मौजूद हैं।
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व्यक्तिगत रूप से भले ही ये आधुनिक खेल अच्छे हो लेकिन सामाजिक रूप से कतई अच्छे नहीं माने जा सकते। कुछ उदाहरण =
01. जूडो-कराटे और कुंग फु आत्म-रक्षा और व्यायाम के लिए अच्छे जरूर हैं लेकिन कुश्ती और कबड्डी जितने नहीं। कुछ लोग इन दोनों में फर्क समझते हैं, लेकिन वे भूल जाते हैं कि-"इन दोनों खेलो का मकसद आत्म-रक्षा ही हैं।" लेकिन इन दोनों खेलो में दिन-रात का फर्क हैं। जिस शारीरिक दमखम और फुर्ती का परिचय कुश्ती-कबड्डी में देना होता हैं, वो जूडो-कराटे, और कुंग फु में कहाँ??
02. चौसर और शतरंज में जो दिमागी कौशल, सोच-समझ और तीव्र बुद्धि का प्रदर्शन होता हैं वो आजकल के विडियो गेम में कहाँ?? वीडियो गेम में दिमाग लगाना होता हैं, लेकिन तुलनात्मक रूप से कम। ये दोनों (चौसर और शतरंज) बौद्धिक खेल हैं, इन खेलो से धैर्य, एकाग्रता, और अनुशासन में बढ़ोतरी होती हैं।
03. जंजीर, छुपनछुपाई, दौड़, खोखो, और गिल्ली डंडा, आदि खेलो में जो भागना-बचना, छुपना-ढूंढना, और हाथ को कसकर मजबूती से पकड़कर भागना, आदि होता हैं वो आजकल के खेलो में कहाँ हैं??? क्रिकेट, बास्केटबॉल, फुटबॉल, रग्बी, वॉलीबॉल, आदि आधुनिक खेल एकाकी भावना पैदा करते हैं।
04. क्रिकेट, बास्केटबॉल, फुटबॉल, रग्बी, वॉलीबॉल, आदि खेल परोक्ष रूप से स्वहित साधने की शिक्षा देते हैं। इनमें शारीरिक मेहनत भी काफी कम होती हैं। जो गेंदबाज़ हैं या बल्लेबाज़ हैं वो ही क्रियाशील रहता हैं बाकी सब तो खेल का हिस्सा होते हुए भी मूक-दर्शक बने रहते हैं। जबकि जंजीर, छुपनछुपाई, दौड़, खोखो, और गिल्ली डंडा, आदि खेलो में सभी खिलाड़ी ना सिर्फ क्रियाशील रहते हैं वरन अहम् रोल भी निभाते हैं।
05. क्रिकेट में सिर्फ रन बनाने और आउट करने का ही महत्तव हैं, जो बल्लेबाज़ हैं वो रन को ही अहमियत देता हैं और जो गेंदबाज़ या फिल्डर हैं वो कैच करने तथा आउट करने को ही महत्तव देता हैं। सब का रोल एक समय में एक बार ही होता हैं। एक गेंदबाज़ और दो बल्लेबाजों के अलावा सभी खिलाड़ी (फिल्डर-क्योंकि वे बल्लेबाज़ का हाथ और गेंद की दिशा को देखकर ही एक्टिव होते हैं) करीब-करीब मूक-दर्शक ही होते हैं। लेकिन जंजीर, छुपनछुपाई, दौड़, खोखो, और गिल्ली डंडा, आदि खेलो में सभी का रोल बराबर और महत्तवपूर्ण होता हैं।
06. जंजीर, छुपनछुपाई, दौड़, खोखो, और गिल्ली डंडा, आदि खेलो में जो खेल भावना और टीम के प्रति फ़र्ज़ होते हैं वो आजकल के खेलो में कहाँ?? जो दिमागी कौशल का इस्तेमाल पुरातन और प्राचीन खेलो में होता हैं वो आजकल के खेलो में कहाँ होता हैं?? रणनीति आजकल के आधुनिक खेलो में भी बनाई जाती हैं लेकिन उसमे वो बात नहीं होती हैं।
07. खोखो को ही लीजिये हर खिलाड़ी एक्टिव रहता हैं, भागने-पकड़ने, और उठने-बैठने के इस खेल में अच्छी-खासी कसरत हो जाती हैं। क्या ऐसी कसरत आजकल के, आधुनिक खेलो में हैं??? बस खड़े रहो और जब गेंद पास आये तो थोड़ा सा हिल-डुल लो। वो भी मन हो तब। ये भी भला कोई आधुनिक खेल हुए???
08. आजकल के खेलो में आपसी सामंजस्य का नितांत अभाव हैं, जबकि प्राचीन खेलो में आपसी सदभाव, आपसी सहयोग, आपसी प्रेम-प्यार, भाईचारा, और आपसी तालमेल की भावना कूट-कूट कर भरी हुई हैं। आजकल के खेल मनोरंजक और अच्छे जरूर हो सकते हैं लेकिन प्राचीन खेलो के मुकाबले नहीं।
09. वीडियो गेम खेल-खेल कर बच्चे मोटे और थुल-थुल होते जा रहे हैं, साथ ही मोटापा-जनित रोगों से भी घिरते जा रहे हैं। साथ-साथ आँखों को भी नुकसान पहुंचा रहा हैं, जैसे धुंधला दिखना, आँखें दुखना, आँखें भारी होना, आँखों का पानी सूखना, आदि-आदि। अगर वीडियो गेम की बजाय अन्य घरेलु खेल (सांप-सीढ़ी, लूडो, चौसर, शतरंज, और कैरम, आदि) खेले जाए तो कम से कम आँखें तो बचेगी।
10. वीडियो गेम में खेलने वाला अपना ध्यान सिर्फ मोबाइल या कम्पयूटर में लगा कर रखता हैं, जबकि अन्य घरेलु खेलो में खिलाड़ी ना सिर्फ एक्टिव-क्रियाशील रहता हैं बल्कि उसका अन्य खिलाड़ियों के साथ संवाद भी कायम रहता हैं। जबकि वीडियो गेम में उसका किसी से, किसी भी रूप में संवाद नहीं होता हैं। इस तरह वीडियो गेम सामाजिक रूप से भी तोड़ रहा हैं। जबकि घरेलु खेलो से खिलाड़ी विशेषकर बच्चो का जुडाव समाज से होता हैं।
11. याद रखिये--"जितने भी आधुनिक, आजकल के खेल हैं उन सभी खेलो में खिलाड़ियों और मैदानों का पैमाना-साइज तय हैं, जिसे घटाया या बढाया नहीं जा सकता। जबकि पुराने खेलो की ऐसी कोई शर्त-बाध्यता नहीं हैं।" जब आपका बच्चा आज के, आधुनिक खेलो को खेल रहा हो तो समझ जाइए कि-"आपका बच्चा आसानी से मिलनसार, घुलने-मिलने वाला, सामाजिक नहीं बन सकता क्योंकि वो एक निश्चित सीमा से अधिक खिलाड़ियों को शामिल नहीं कर सकता।" यानी एक निश्चित सीमा के बाद वो किसी को अपना दोस्त नहीं बना सकता क्योंकि उसे जरुरत ही नहीं होगी।"
12. जबकि अगर आपका बच्चा पुरातन-पारंपारिक खेलो को खेल रहा हो तो बेफिक्र हो जाइए। आपका बच्चा सामाजिक भी होगा, मिलनसार भी होगा, देश-समाज-शहर के प्रति जागरूक भी होगा, और निश्चित रूप से उसका भविष्य सुखद भी होगा। क्योंकि पारम्पारिक खेलो में जितने खिलाड़ी-सदस्य होते हैं, उतना ही आनंद-ख़ुशी की अनुभूति होती हैं, कोई बाध्यता-कोई पाबंदी ना होने के कारण आपका बच्चा सहज रूप से उत्साहपूर्वक अन्य-अनजान (गली-मोहल्ले, अन्य कक्षायों आदि के) बच्चो को भी शामिल करना चाहेगा। जोकि, उसके सामाजिक दायरे को बढाते हुए उसे सामाजिकता का पाठ पढ़ायेगा।
13.आदि-आदि।
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सबसे बड़ी और महत्तवपूर्ण बात-->"खेल कोई भी बुरा नहीं हैं, किसी भी खेल (चाहे वो देश का हो या विदेश का) को खेलने में कोई बुराई या आपत्ति नहीं हैं। जो दिमागी-शारीरिक मेहनत, जो कौशल, जो रणनीति, जो शिक्षा, इन आधुनिक खेलो में तलाशी जा रही हैं, वो दरअसल इनमें प्राचीन खेलो में आज भी मौजूद हैं। व्यक्तिगत रूप से भले ही ये आधुनिक खेल अच्छे हो लेकिन सामाजिक रूप से कतई अच्छे नहीं माने जा सकते। अगर आप अपने बच्चो को सुखद भविष्य देना चाहते हैं, अगर आप अपने बच्चो को मिलनसार और सामाजिक बनाना चाहते हैं, अगर आप अपने बच्चो को देश-समाज-शहर के प्रति जागरूक करना चाहते हैं, तो अपने बच्चो को पारंपरिक, प्राचीन, पुरातन खेलो की तरफ मोड़िये, उन्हें इन खेलो में निहित फायदों और गुणों से अवगत कराते हुए, इन खेलो को खेलने की प्रेरणा दीजिये।"
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अब आपके बच्चो का, आपकी पीढ़ियों का फैसला आपके हाथो में हैं।
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CHANDER KUMAR SONI,
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Monday, July 05, 2010
जहर का सेवन क्यों???
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क्या आप जानते हैं कि--
आप जाने-अनजाने जहर खा रहे हैं??
आप जिस अनाज-दाल, फल-सब्जी को शुद्ध मान रहे हैं उस पर जहर लगा हुआ हैं??
जिस खाद्य पदार्थ को आप पौष्टिक मान कर खाते हैं, वो जहरीला हैं??
अपने शरीर को बनाने के लिए आप जो कुछ भी ले रहे हैं, वो बनाना तो दूर शरीर को बिगाड़ रहा हैं??
आदि-आदि।
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नहीं-नहीं आप कुछ भी नहीं जानते हैं। आपको तो बस खा-पी कर हज़म करने से मतलब हैं, बाकी क्या हैं, क्या नहीं हैं, आप कुछ भी नहीं जानते हैं। खाया-पीया-पचाया बस यही तीन लफ्ज आप जानते हैं, और तो कुछ आपको पता ही नहीं।
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आज अनाजो से लेकर दालो-चनो तक, फलो से लेकर सब्जियों तक हर चीज़ जहर से भरी हुई हैं। इन चीजो को जितना मर्ज़ी धो लो, रगड़ लो, चाहे कुछ भी कर लो, थोड़ा-बहुत जहरीला पदार्थ तो रह ही जाएगा। कारण......इन चीजो का उत्पादन ही जहर से किया जा रहा हैं। रासायनिक खाद ड़ाल-ड़ाल कर सारा नक्शा ही बिगाड़ दिया गया हैं। कल तक जिस रासायनिक खाद को जरुरत, मज़बूरी बता कर इस्तेमाल किया जाता था, उसी रासायनिक खाद को आज फैशन, तेज़ी से उत्पादन के लिए धड़ल्ले से उपयोग किया जा रहा हैं।
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ज्यादा से ज्यादा और तेज़ी से उत्पादन करने के लिए सम्पूर्ण मानव-जाति के जीवन से ही खिलवाड़ किया जा रहा हैं। रासायनिक खाद फायदे कम नुकसान ज्यादा देती हैं, रासायनिक खाद के नुकसान ही नुकसान हैं, और लोग (किसान) सब कुछ जानते-समझते हुए भी बेरोकटोक इनका इस्तेमाल बेतहाशा कर रहे हैं।
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रासायनिक खाद कृत्रिम तत्त्व हैं नाकि भूमि की खुराक। रासायनिक खाद भूमि को दूरगामी नुकसान पहुंचा रही हैं, किसान भले ही तात्कालिक-अल्पकालिक लाभ प्राप्त करता हो। लालचवश या देखा-देखी किसान रासायनिक खाद उपयोग में तो ला रहे हैं, लेकिन इसके अत्यधिक इस्तेमाल से जमीन कमजोर होकर बंजर हो जाती हैं। दूसरा, जल की कमी का मुख्य कारण भी रासायनिक खेती साबित हो सकती हैं, क्योंकि रासायनिक खेती से जल की आवश्यकता ज्यादा और बार-बार पड़ती हैं।
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किसान रासायनिक खेती से उत्पादन भले ही ज्यादा लेले लेकिन होता फिर भी घाटे में ही हैं। क्योंकि रासायनिक खेती के लम्बे इस्तेमाल के कारण जमीन कठोर हो जाती हैं, जिसकी वजह से जोत-खर्च भी बढ़ जाता हैं। रासायनिक खाद से तैयार अनाज-सब्जी-फल का स्वाद काफी अलग होता हैं। जैविक खाद के मुकाबले इस खाद से तैयार सब्जी-फल आदि काफी बेस्वाद और कम पौष्टिक होने के साथ-साथ स्वास्थ्य के लिए हानिकारक भी होते हैं। कृषक को तात्कालिक लाभ भले ही हो, लेकिन इसका नुकसान भी उर्वरा शक्ति बढाने वाले जीवाणुओं के नष्ट होने के रूप में सामने आता हैं।
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धुप और ठण्ड से बचाव भी रासायनिक खाद लेने वाले पौधे-फसल कम ही कर पाते हैं। पर्यावरण के लिए तो रासायनिक खाद हैं ही नुकसानदेह, इसमें तो रत्ती भर भी कोई शक नहीं हैं। रासायनिक खाद के हानिकारक कैमिकल लोगो को जिगर, गुर्दे, और हर्दय रोगों के साथ-साथ जाने-अनजाने कैंसर भी दे रहे हैं। जैविक खाद के तो फायदे ही फायदे हैं, कही भी, कभी भी, किसी भी रूप में जैविक खाद नुकसान नहीं पहुंचाते हैं। साथ ही, रासायनिक खाद के मुकाबले जैविक खाद काफी सस्ते, किफायती, कामयाब, और लम्बे समय तक असरकारक होते हैं। जैविक खाद के कई फायदे इस तरह हैं--
पर्यावरण की रक्षा होती हैं,
मिटटी भुरभुरी होने से उसमे हवा, पानी, और प्रकाश का संचार उचित ढंग से होता हैं,
कम बारिश में पानी लम्बे समय तक सोख कर रखती हैं और ज्यादा बारिश में पानी की निकासी करती हैं,
मिटटी का कलेवर अच्छा रहता हैं,
उर्वरा शक्ति बढती हैं,
उर्वरा शक्ति बढाने वाले जीवाणुओं की पैदावार प्राकृतिक रूप से बढती हैं,
अनाज-फल-सब्जी पौष्टिक और स्वादिष्ट होते हैं,
एक बार की सिंचाई लम्बे समय तक चलती हैं,
बार-बार सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती,
कम सिंचाई के कारण पानी भी बचता हैं,
जमीन सख्त नहीं होती इससे जोत-खर्च बचता हैं,
फसल के धुप और ठण्ड से बचाव के लिए कोई ख़ास इंतजामात नहीं करने पड़ते,
प्राकृतिक रूप से भूमि की खुराक भी हैं जैविक खाद,
आदि-आदि।
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तो क्यों किसान अपने देश के ही लोगो को जहर परोसना चाहते हैं??
रासायनिक खाद और जैविक खाद के फायदों-नुकसानों को जानते हुए भी किसान चुप क्यों हैं??
चंद लाभ के लिए, लोगो के जीवन से खिलवाड़ करना क्या उचित हैं??
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मेरी इस ब्लॉग के माध्यम से सभी किसान भाइयो से निवेदन हैं कि-"जहां तक हो सके अपनी खेती-फसल में जैविक खाद का ही इस्तेमाल करे, और रासायनिक खाद का इस्तेमाल ना के बराबर करते हुए रासायनिक खाद के उपयोग को हतोत्साहित करे।"
साथ ही मेरी आम जनता से निवेदन हैं कि-"हमेशा यथासंभव जैविक खाद से तैयार फसल (फल-सब्जी-अनाज) ही खरीदें, इसके लिए आप सीधे उन खेतो से खरीद करे जो जैविक खाद का इस्तेमाल करते हैं। इससे रासायनिक खाद का इस्तेमाल करने वाले हतोत्साहित होंगे।
और यदि आप किसी जैविक खाद का उपयोग करने वाले खेत या किसान के बारे में नहीं जानते तो बेहतर हैं आप उन दुकानों से खरीदी करे जिनके पास शत-प्रतिशत जैविक-प्राकृतिक खाद से तैयार माल मिले। (महानगरो-बड़े शहरों में कई दुकाने इस तरह की खुली हैं जो लिखित में, शुद्ध रूप से जैविक खाद से तैयार खाद्य पदार्थ रखती हैं।)"
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धन्यवाद।
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FROM =
CHANDER KUMAR SONI,
L-5, MODEL TOWN, N.H.-15,
SRI GANGANAGAR-335001,
RAJASTHAN, INDIA.
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Monday, June 28, 2010
ये ऐसे हैं तो बाकी कैसे होंगे???
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इस बार मैं ऐसी बात लिख रहा हूँ, जो सुखद तो नहीं हैं लेकिन हैं कडवी सच्चाई। बहुत ही भारी मन से मैंने ये पोस्ट लिखी हैं। एक ऐसे मुद्दे पर मैं लिख रहा हूँ, जो समाज से काफी करीब से, गहराइयों से जुड़ा हुआ हैं।
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मेरा एक दोस्त हैं (गोपनीयता रखते हुए मैं उसका नाम नहीं लिख सकता) जोकि एक टांग से विकलांग हैं। पांच-छः साल तक वो एकदम ठीक था, लेकिन तभी अचानक उसे पोलियो हो गया और बड़ी मुश्किल से उसे पूर्ण-रूप से अपंग होने से बचाया जा सका। आज उसकी उम्र 24 साल हैं, वो लंगडा-लंगडा कर चलता हैं और लम्बी दुरी तय करने के लिए ट्राय-साइकल का उपयोग करता हैं। यह ट्राय-साइकल उसे बीकानेर की एक संस्था ने नि-शुल्क प्रदान की थी। अब उसकी करतूत भी जान लीजिये =
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जैसा की मैं पहले ही बता चूका हूँ कि-"वो मेरा पुराना दोस्त हैं और ट्राय-साइकल उपयोग करता हैं।" हाल ही में, वो मेरे घर आया एकदम नयी चमचमाती ट्राय-साइकल पर। मैंने उसे नयी साइकल लेने पर बधाई देते हुए उसकी चमकती-दमकती सायकल की तारीफ़ की। उसके बाद उसने मुझे जो बताया, उसने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया।
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उसने कहा-"अरे नहीं-नहीं यार, ये सायकल मैंने खरीदी नहीं हैं। ये ट्रायसायकल तो मैंने हाल ही में लगे एक विकलांग शिविर से नि-शुल्क प्राप्त की हैं। तुझे शायद याद होगा, वो शिविर पिछले दो महीने पहले लगा था।" मैंने उससे पूछा कि-तेरे पास तो पहले से ही ट्रायसाइकल थी फिर तुने नयी क्यों ली?? और वो थी भी सही-दुरुस्त कंडीशन में??" तो वो हँसते हुए बोला-"यार वो सायकल तो मैंने दो हज़ार रूपये में किसी और विकलांग को बेच दी। दरअसल मुझे पैसो की सख्त आवश्यकता थी, तो मैंने वो सायकल अन्य विकलांग को सस्ते में दो हज़ार रूपये में ही बेच दी, नयी तीन हज़ार से ज्यादा की ही आती हैं। और हाल ही में लगे जयपुर वालो के शिविर में जाकर मैं ये नयी ट्राय-साइकल ले आया। बस इतनी सी ही बात हैं।"
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मैं बोला तो कुछ नहीं, लेकिन उसने मेरे मन में कई-अनुत्तरित सवाल छोड़ दिए। जैसे कि--
मुफ्त में मिली सायकल को इस तरह देकर उसने क्या साबित किया??
मुफ्त की सायकल को दो हज़ार में बेचकर वो सस्ती देने की बात कैसे कह सकता हैं??
जो सामाजिक-धार्मिक संस्थाएं विकलांगो की सहायता करती हैं उन्हें यह बात जानकर क्या झटका नहीं लगेगा??
इससे बेहतर तो वो किसी से उधार या क़र्ज़ ले लेता या अपनी ट्राय साइकल को गिरवी रख देता।
आजकल के घोर-कलयुगी, पापी जमाने में मुट्ठी भर लोग विकलांगो के लिए कुछ कर रहे हैं, क्या ये घटनाक्रम उन्हें हतोत्साहित नहीं करेगा???
अगर हरेक विकलांग ऐसा करने लग जायेंगे तो ये तो एक व्यापार का रूप ले लेगा। जोकि दुर्भाग्य होगा।
उन संस्थायों का क्या होगा, जो इस तरह के लोगो (विकलांगो) द्वारा आये दिन लुटते जायेंगे????
आज आम आदमी का विश्वास आये दिन झूठे-ढोंगी साधू-महात्माओं-बाबाओं द्वारा तोड़ा जा रहा हैं, तो क्या लोग विकलांगो पर विश्वास कर पायेंगे???
भिखारियों पर से लोगो का विश्वास-भरोसा पूरी तरह से तो नहीं लेकिन काफी हद तक कम जरूर हो गया हैं। कारण उनका झूठ-मूठ लंगडाना या हाथ मोड़ना या पट्टियां बांधकर कोढ़ी होने का नाटक करना, आदि।
भगवान् की दया से लोगो का विश्वास साधू-महात्माओं पर से जरूर उठ गया हैं, लेकिन विकलांगो पर अभी भी बना हुआ हैं।
बाहरी लोग या नकली लोग ऐसा करे तो और बात हैं, लेकिन जब असली लोग (विकलांग) ही ऐसा करने लगेंगे तो लोग कैसे उनपर विश्वास-भरोसा कायम रख पायेंगे???
आदि-आदि।
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मन में और भी ढेर सारे सवाल अनुत्तरित रह गए हैं, लेकिन फिलहाल इतना ही।
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धन्यवाद।
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Monday, June 21, 2010
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सट्टा-जुआ-लाटरी चिटफण्ड या चीटफण्ड????
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ज्यादा धन कमाने, जल्दी अमीर बनने या कमाई के शॉर्ट कट के रूप में लोग सट्टे-जुए, और लाटरी पर शायद ज्यादा ही विश्वास करते हैं। पता नहीं लोग मेहनत करके, इज्ज़त की रोटी की बजाय सट्टे-जुए जैसी मुफ्त (हराम) की कमाई की रोटी खाना क्यों पसंद करते हैं?? लोगो में सट्टे की इतनी बुरी लत पैदा हो चुकी हैं कि-"वे अपनी इज्ज़त, अपने मान-सम्मान को भी गंवाने को सहर्ष तैयार हो जाते हैं। इज्ज़त-मान सम्मान के बाद बाद नंबर घर के कपडे-लत्तो, और बर्तनों का आता हैं, जिसे भी सटोरिये सट्टो के अड्डो पर लुटा डालते हैं। "
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इसका मुख्य कारण 1 के बदले 90 (कुछ जगह 95) के लालच में लोगबाग बड़ी आसानी से आ जाते हैं। लोग ये भूल जाते हैं कि-वे सट्टा लगा कर गंवाएंगे ही गंवाएंगे, पायेंगे कुछ भी नहीं।" यही (लगाईवाल के हाथ कुछ ना लगना और खाईवालो का भारी कमीशन) खाइवालो की अंधी-कमाई का राज हैं, लगाईवाल के हाथ सिवाय पश्तावे के कुछ नहीं आता हैं। लेकिन ये पश्तावा लम्बे समय तक नहीं टिक पाता हैं, सटोरियों के मन में लालच का पलड़ा सदैव ज्यादा भारी रहता हैं।
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ये सब चिटफण्ड नहीं चीटफण्ड हैं। और लोग चिटफण्ड समझ कर चीटफण्ड में अपना पैसा बर्बाद कर रहे हैं। आज तक मैंने कभी किसी को सट्टे-जुए के सहारे इज्ज़तदार तो दूर की बात अमीर बनते भी नहीं देखा हैं। और जो लोग सट्टे के सहारे अमीरी तक पहुँच भी गए वे लम्बे समय तक नहीं ठहर सके। और एक और बात, कुछ लोगो के बारे में कहा जाता हैं कि-वे खानदानी अमीर और सट्टेबाज़ हैं।" तो असलियत ये हैं कि-"वे खानदानी अमीर बेशक होंगे लेकिन उनके और भी कई काम भी अवश्य होंगे, हाँ कुछ कमाई जरूर सट्टे से आती होगी, लेकिन पुरी की पुरी कमाई सट्टे से आती हो, ऐसा तो संभव ही नहीं हैं। "
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मैंने तो आज तक लगवाने वालो को ही अमीर (अस्थाई तौर पर) होते देखा हैं बाकी सभी लगाने वालो को तो मैंने रोडपति, कंगाल होते हुए ही देखा हैं। मेहनत से बड़ा और बेहतरीन जरिया कोई नहीं हैं। मेहनत-मजदूरी करके दो जून की रोटी खाना ज्यादा इज्ज़त देता हैं नाकि सट्टे-जुए से प्राप्त अनाप-शनाप धनदौलत से कोई ज्यादा इज्ज़त होती हैं। फिर भी ना जाने क्यों लोग सट्टे-जुए-लाटरी की तरफ रुख करते हैं......????
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पुलिस-प्रशासन को सटोरियों के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाही करनी चाहिए। जोकि महज मामूली जुर्माना या एकाध महीने की सज़ा से कही बढ़ कर हो। वैसे पुलिस-क़ानून कुछ करे या ना करे लोगो को अपने सूझबूझ से, अपने विवेक से कार्य करना चाहिए। मेहनत का कोई विकल्प नहीं हैं, मेहनत ही सबसे बड़ी और इज्ज़त दायक चीज़ हैं, ये लोगो आज नहीं तो कल समझ में आ जाएगा, लेकिन आयेगा अवश्य।
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धन्यवाद।
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Monday, June 14, 2010
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धन्यवाद अमेरिका।
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मैं एक ऐसी बात के लिए अमेरिका का धन्यवाद प्रकट कर रहा हूँ जोकि आप सोच भी नहीं सकते। तमाम राजनितिक, कूटनीतिक, आर्थिक, द्विपक्षीय, विदेश मंत्रालय, मुद्रा-विनिमय, आदि प्रचलित और आम मुद्दों से हट कर मैं अमेरिका का एक ख़ास कारण से शुक्रिया अदा कर रहा हूँ।
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मैं पीटा (पीपल फॉर दी एथिकल ट्रीटमेंट फॉर एनिमल्स) का सदस्य हूँ। वो भी तब से जब मैं स्कूल में पढता था और मेरी उम्र महज सोलह-सत्रह साल ही रही होगी। ये उस वक़्त कि बात हैं जब मेरे उम्र के किसी भी बच्चे को इन सबके बारे में कुछ ज्ञान ही नहीं होता था। मेरे पास करीब सात सालो से पीटा के ईमेल्स आते रहते हैं। और मैं करीब 99% तक ईमेल्स पर उचित कार्रवाही करता हूँ। हाल ही में आये एक ईमेल से मेरा मन अमेरिका के प्रति श्रद्धावनत को गया साथ ही भारत के प्रति थोड़ा गुस्सा, थोड़ी नाराजगी का भाव उमडा।
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उस ईमेल में एक घटना का विस्तार से वर्णन लिखा हुआ था। उस ईमेल में सभी सबूत भी पेश किये गए थे। उस ईमेल में एक खबर लिखी थी = अमेरिका के न्यूयार्क में एक गाडी वाला अपने गाडी में एक कुत्ते को लेकर बाज़ार शोपिंग करने गया था, गाडी के सभी शीशे पूरी तरह से चढे हुए थे। तभी गर्मी के कारण कुत्ते कि तबियत बिगड़ गईं और वो बुरी तरह से हांफने और गाडी के अन्दर बेचैनी से घूमने लगा। आसपास के लोगो ने तत्काल पुलिस को खबर दी। पुलिस ने भी मालिक का पता ना चलने पर गाडी के शीशे को तोड़ा और जानवरों के अस्पताल की को एम्बुलेंस बुलाकर कुत्ते को भेजा।
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हालांकि उस ईमेल में कुत्ते की मौत की दुखद खबर के साथ एक अच्छी बात भी लिखी हुई थी। वो ये की पुलिस ने उस गाडी के मालिक/ड्राइवर को लापरवाहीपूर्वक कुत्ते की ह्त्या करने के जुर्म में छ: महीने की सज़ा और एक हज़ार डॉलर (करीब पैंतालिस से पचास हज़ार रूपये) का जुर्माना भी लगाया। मुझे उस ईमेल को पढ़कर बहुत ख़ुशी हुयी। मुझे अमेरिका की पुलिस की तत्परता, वहाँ की अदालत द्वारा तुरंत फैसला देना और जानवरों के लिए अलग से हॉस्पिटल होना और एम्बुलेंस द्वारा कुत्ते को ले जाना, आदि बातों ने काफी प्रभावित किया। मुझे ख़ुशी के साथ-साथ भारत पर गुस्सा और नाराजगी भी आई। कारण =
भारत में बड़ी संख्या में जानवर (सिर्फ कुत्ते ही नहीं बिल्ली, खरगोश, जैसे कई पालतू जानवर भी) बंद गाडी में भीषण गर्मी के कारण मारे जाते हैं।
यहाँ कोई कुछ बोलता ही नहीं।
यहाँ आम आदमी इस सम्बन्ध में जागरूक ही नहीं हैं।
यहाँ की पुलिस इंसान को ही कुछ नहीं समझती कुत्ते (या अन्य जानवर) को क्या समझेंगी??
इंसानों की मौत पर भी पुलिस देरी से पहुँचती हैं, वो भी मामला बढ़ने या ज्यादा बुलाने पर।
यहाँ की एम्बुलेंस आदमी के काम आ जाए यही काफी हैं, जानवर के लिए तो हॉस्पिटल ही नहीं हैं।
हैं, पर वो भी रामभरोसे ही हैं। इंसान ही हॉस्पिटल में दाखिल हो जाए गनीमत हैं।
वहाँ तो कुत्ते को भी एम्बुलेंस में डालकर हॉस्पिटल ले जाया जाता हैं।
यहाँ चाहे जितने जानवरों की ह्त्या करदो, कोई क़ानून, अदालत, या पुलिस कुछ नहीं करेगी।
वहाँ गलती से ही कुत्ते के मरने पर भारी सज़ा और जुर्माना भुगतना पड़ गया।
वहाँ भी मुर्गे, बकरे, पाडे, भैंस, गाय, आदि जानवर भारत के मुकाबले कई गुना ज्यादा कटते हैं, लेकिन फिर भी एक कानूनी तरीके से।
भारत में तो इंसानों को मारने पर भी जवानी से बूढ़े होने पर सज़ा मिलती हैं, कई बार तो मरने के बाद भी।
वहाँ अदालत और पुलिस दोनों ने त्वरित गति से सारे काम पुरे किये, और अपराधी को सज़ा दिलवाई।
महावीर और बुद्ध के देश में क्या जानवरों पर अत्याचार ख़तम नहीं हो सकता??
क्या ऐसा भारत में हो सकता हैं???
अगर नहीं, तो क्यों नहीं हो सकता???
और अगर हाँ, तो कब???
आदि-आदि।
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बहुत सी बातें और भी मन में उठ रही हैं, लेकिन फिर कभी।
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धन्यवाद।
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Monday, June 07, 2010
भ्रूण ह्त्या की क्या??
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अरे-अरे गलत ना समझिये, मैं अपराध वाला भ्रूण ह्त्या नहीं कह रहा हूँ और ना ही मैं किसी को भ्रूण ह्त्या करने को उकसा-प्रेरित कर रहा हूँ। मैं तो पुण्य कार्य वाला भ्रूण ह्त्या करने को कह रहा हूँ। नहीं समझे????, ज़रा नीचे पढ़ने का कष्ट कीजिये, आपको सब समझ में आ जाएगा।
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आज देश में जितनी भी समस्याएं हैं, उन सभी का अंत भ्रूण-ह्त्या में ही निहित हैं। चोरी-डकैती, लूटपाट, दंगे-फसाद, ह्त्या-बलात्कार, छेड़छाड़, गाली-गलौच, मारपीट, धोखाधड़ी, भ्रष्टाचार, घूस-रिश्वतखोरी आदि समस्याएं मुंह बाएं खड़ी हैं, उन सबका सफाया भ्रूण ह्त्या से ही किया जा सकता हैं। आज़ादी से लेकर अब तक, इतना लंबा समय गुज़र गया हैं, लेकिन दुर्भाग्य से कोई भी समस्या कम होने की बजाय कैंसर की तरह फैलती-बढती ही गयी हैं। कितने नेता, सामाजिक कार्यकर्ता आये और चले गए, कितने मुख्यमंत्री, प्रधानमन्त्री, और राज्यपाल, राष्ट्रपति आये और चले गए, लेकिन कोई भी समस्या रत्ती भर भी कम नहीं हुयी।
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बहुत हो गया, बहुत कुछ कर लिया, बहुत से उपाय-रास्ते पर चल लिए, बहुत से तरीके आजमा लिए, अब सिर्फ एक ही रास्ता बचा हैं। अब एकमात्र उपाय भ्रून ह्त्या का ही रह गया हैं, अगर ये उपाय असफल हो जाता हैं तो देश को कोई तरक्की नहीं करा सकता, और अगर भ्रूण ह्त्या का आखिरी उपाय सफल-कारगर होता हैं तो कोई भी देश को नंबर वन बनने से नहीं रोक सकता। अब जानिये कि-ये उपाय हैं क्या????
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कोई भी समस्या जन्मजात नहीं होती हैं, कोई भी व्यक्ति जन्म से ही अपराधी, चोर, डाकू, या भ्रष्ट, हत्यारा या बलात्कारी नहीं होता हैं। नाही भगवान् किसी को बुरा बनने के निर्देश/आदेश देता हैं और ना ही भगवान् किसी को ऐसा बनाकर भेजता हैं। बल्कि उसे ऐसा बनाने के लिए आसपास का माहौल, उस वक़्त की स्थितियां, परिस्थितियाँ, माहौल, और हालात ज़िम्मेदार होते हैं। किसी भी अपराधी को मारना-पीटना, प्रताड़ित करना, या जेलों में ठूस देने, आदि उपायों से कोई विशेष सुधार नहीं होता हैं। हाँ जब तक अपराधी जेल में बंद होता हैं, तब तक बाहरी समाज और दुनिया को अवश्य राहत मिल जाती हैं, लेकिन ये सिर्फ तात्कालिक राहत ही होती हैं, नाकि दीर्धकालिक।
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किसी को संगत तो किसी को यार-दोस्त, किसी को माँ-बाप तो किसी को नजदीकी रिश्तेदार, किसी को गरीबी तो किसी को भूखमरी, किसी को भ्रष्टाचार तो किसी को देश-समाज, किसी को देश का लचीला कानून तो किसी को अदालत या पंचायत का गलत, भेदभावपूर्ण, और अन्याय भरा फैसला, आदि-आदि। यानी कुलजमा किसी ना अपराधी के जन्म के पीछे हम लोगो, संस्थायो में से ही कोई ज़िम्मेदार होता हैं। हम ही शरीफ, सीधे-सादे लोगो को अपराध की राहो पर धकेलते हैं।
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स्कूल-कालेजो में कई मास्टरों-मास्टरनियों का गलत व्यवहार या क्रूर सज़ाएँ तो घरो में माँ-बाप या किसी रिश्तेदार का लड़ाकू या क्रूर होना या आपसी कलह का माहौल रहना। यार-दोस्तों और संगती का नशेडी होना या गुंडा-आवारा टाइप होना, किसी मुक़दमे, मामले में अदालत-पंचायत द्वारा गलत या भेदभावपूर्ण फैसलों के कारण ज़िन्दगी खराब होना। किसी का गरीबी, अशिक्षा, और भूखमरी का शिकार होना, आसपास का माहौल, गली-मोहल्ले के हालात, भ्रष्टाचार, आदि कोई एक नहीं वरन बहुत से कारण होते हैं अपराधी के जन्म के पीछे।
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हमें अपराधियों के पैदा होने पर उन्हें सुधारने के उपायों की बजाय उन्हें पैदा होने से रोकने के उपाय करने होंगे। अपराधियों को पैदा होने से रोकने के लिए हमें सीधे उन कारणों पर प्रहार करना होगा, जिनकी वजह से अपराधियों का जन्म होता हैं या शरीफ-सीधेसादे लोग अपराध की दुनिया में प्रवेश करते हैं। हमें नशे पर प्रभावी रोक लगानी होगी, हमें क़ानून को सख्त बनाना होगा (लागू भी करना होगा), हमें पंचायतो-अदालतों को और भी जवाबदेह बनाना होगा, हमें माता-पिता, रिश्तेदारों, टीचरों को, संयमशील, शांत, और न्यायमूर्ति (जो सैदेव निष्पक्ष बने रहे, जो सत्य और अहिंसा के नियम का पालन करे) बनाना होगा, हमें रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार, घूसखोरी, पर सख्ती से रोक लगानी होगी, हमें गरीबी-भूखमरी, और अशिक्षा को जड़मूल से मिटाना होगा, आदि-आदि कई उपाय करने होंगे। अभी और इसी वक़्त, अविलम्ब।
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सभी समस्याओं, सभी अपराधियों के जन्म के लिए व्यवस्थागत कमियाँ हैं, जिन्हें दूर किया जाना अतिआवश्यक हैं। हम/सभी लोग, संस्थाएं प्रत्यक्ष रूप से ना सही लेकिन परोक्ष रूप से तो ज़िम्मेदार हैं ही अपराध और अपराधियों के जन्म के पीछे। अब एकमात्र उपाय भ्रूण ह्त्या का ही रह गया हैं, अगर ये उपाय असफल हो जाता हैं तो देश को कोई तरक्की नहीं करा सकता, और अगर भ्रूण ह्त्या का आखिरी उपाय सफल-कारगर होता हैं तो कोई भी देश को नंबर वन बनने से नहीं रोक सकता।
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तो फिर आप कब से शुरू कर रहे हैं अपराधियों की भ्रूण हत्याएं करनी???
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धन्यवाद।
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Friday, May 28, 2010
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विश्वास कीजिये कि विश्वास हैं।
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अगर आपसे कोई पूछे कि-"दुनिया किस पर कायम हैं या दुनिया के चलने का आधार क्या हैं??" तो आप क्या जवाब देंगे?? चलिए छोडिये मैं ही बताये देता हूँ। और उत्तर मात्र एक शब्द लेकिन गहरे अर्थ का हैं, और वो शब्द हैं-"विश्वास"।
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जी हाँ विश्वास कीजिये कि-विश्वास हैं। विश्वास पर ही दुनिया कायम हैं और दुनिया के अनवरत चलने का आधार ही विश्वास हैं। हमारी ज़िन्दगी में, हमारे आस-पास घटित हो रही हर घटना के पीछे एक अदृश्य विश्वास ही हैं। विश्वास के कारण ही हम आज इक्कीसवी सदी देख रहे हैं, अगर विश्वास ही नहीं होता तो शायद हम भी ना होते।
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बहुत से लोग विशेषकर धोखा खाए लोग विश्वास नाम की चीज़ ही नहीं मानते। ये लोग तो विश्वास जैसी बात को तो सिरे से ही नकार देते हैं। लेकिन, भाइयो आपके दुःख की, आपकी भावनाओं की, और आपके ज़ज्बातों की मैं कद्र करता हूँ, लेकिन यह कोई अंतिम सच नहीं हैं। दुनिया में अविश्वास से कही लाखो गुणा विश्वास मौजूद हैं। अगर आपके साथ एक ज़ना धोखा करता हैं तो सौ लोग विश्वास भी तो करते हैं...इस तथ्य को क्यूँ ठुकरा रहे हैं आप????
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जब आप गाडी, मोटर साइकिल, या कोई अन्य वाहन चलाते हैं तो क्या आपको खुद पर और दूसरो पर विश्वास नहीं होता?? खुद पर तो आपको ये होता ही हैं कि-"आप बिना गिरे, बिना चोट खाए, और बिना संतुलन खोये आप सफलतापूर्वक वाहन चला लेंगे।" लेकिन दूसरो पर भी तो आप विश्वास बनाए रखते हैं, मैं जानता हूँ कइयो का जवाब नकारात्मक होगा, लेकिन मुझे पता हैं कि आप जाने-अनजाने अन्यो पर विश्वास करते हैं। दूसरो पर आपको विश्वास करना ही होता हैं कि-"वो आपके साइड मांगने पर ख़ुशी-ख़ुशी साइड दे देगा, वो मुड़ने से पहले इन्डिकेटर या इशारा देगा, वो अपनी लेन-सड़क पर ही अपना वाहन चलाएगा और आपके समक्ष नहीं आयेगा, और ये भी कि-वो अपना संतुलन बनाकर रखेगा और आपमें आकर नहीं ठोकेगा...!!!"
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क्या आपको अपने देश कि पुलिस और कानूनों पर विश्वास नहीं हैं??? अगर नहीं, तो आप सच्चे भारतीय नहीं हो सकते। हर भारतीय को अपने संविधान पर विश्वास होना चाहिए, और जो संविधान पर विश्वास करता हैं, वो अपने क़ानून-पुलिस पर भी विश्वास करता हैं। अगर आपके साथ पुलिस द्वारा कोई अन्याय होता हैं तो आपका चुप बैठना गलत हैं। उच्चाधिकारियों को शिकायत करने की बजाय आप व्यवस्था पर अविश्वास करते है। जोकि गलत हैं, आपको विश्वास रखते हुए आगामी कारर्वाही करनी चाहिए। वैसे आमतौर पर आप पुलिस-क़ानून पर विश्वास करते हैं, तभी तो आप उनकी शरण में जाते हैं और दुर्भाग्य से आपका विश्वास कभी-कभी तोड़ दिया जाता हैं। लेकिन, सौभाग्य से आप अभी भी विश्वास का दामन थामे होते हैं, और आवश्यकता पड़ने पर पुन: उनकी शरण में चले जाते हैं।
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जब आप पर कोई संकट आता हैं या आप किसी विपदा में फंस जाते हैं, तो आप जिसपर विश्वास ही नहीं करते वही अक्सर आपके साथ खडा होता हैं। आगजनी, भूकंप, सुनामी, चक्रवात, और इसी तरह की अन्य प्राकृतिक-अप्राकृतिक हादसों/आपदाओं के वक़्त आप अनजान लोगो की मदद करते हैं और अनजाने लोग आपकी तत्काल मदद करते हैं। यहाँ सभी लोग एक अनोखे और मजबूत विश्वास के बंधन में बन्ध जाते हैं। और कई-दुर्लभ मामलो में तो जब सभी लोग, सारे लोग, सारे राहत दल-और सरकारे किसी के बचने की उम्मीद ही छोड़ देती हैं, तो कई-कई दिनों बाद किसी के ज़िंदा होने के सबूत (हिलना, कराहना, आदि) मिल जाते हैं। अब इसे आप क्या कहेंगे??, उन सभी के ज़िंदा बचने का एकमात्र कारण उनका विश्वास था, अन्यथा वे भी बाकी मृतकों की सूची में शामिल हो सकते थे।
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अगर अभी भी आपको विश्वास पर विश्वास ना हो रहा हो तो मैं आपको बता देना चाहता हूँ कि-"जब आप मोबाइल में कोई काम करते हैं, सन्देश पढ़ते हैं, या कोई गेम खेलते हैं तो आपको विश्वास रहता हैं कि-"मोबाइल सही काम करता रहेगा, मोबाइल कम बैटरी के कारण बंद नहीं होगा, या मोबाइल हँग-जाम नहीं होगा।" इसी तरह जब आप अपनी कुर्सी या चारपाई पर बैठे होते हैं तो आपको विश्वास होता हैं कि-"ये चारपाई/कुर्सी टूटेगी नहीं या संतुलन नहीं खोएगी और आप गिरेंगे नहीं।"
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भई, अगर आपको अब भी किसी पर विश्वास नहीं हो रहा हैं, आप विश्वास नाम की चीज़ को ही नहीं मानते हैं, तो मैं तो क्या??, दुनिया की कोई भी ताकत आप में विश्वास नहीं जगा सकती। वैसे मैं आप सबकी जानकारी के लिए बता दूँ कि-"जब मैं ये ब्लॉग लिख रहा था तो मुझे तो कई तरह के, कई भांत-भांत के विश्वास थे जैसे कि-"लैपटॉप बंद नहीं होगा, लैपटॉप हँग नहीं होगा, इंटरनेट बिना रुकावट चलता रहेगा, इंटरनेट धीरे नहीं चलेगा, आदि-आदि।"
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एक और बात -- विश्वास का दिखाई देना हर मामले में, हर बार संभव नहीं हो सकता हैं। बहुत से विश्वास, दिखाई नहीं देते हैं, प्रत्यक्ष रूप से आपके समक्ष नहीं होते हैं, लेकिन परोक्ष रूप से उनकी प्रभावी और असरदार उपस्थिति होती हैं। चाहे आप यकीन करे या ना करे, पर सत्य यही हैं। वैसे विश्वास को लेकर उदाहरण तो बहुत हैं, उदाहरणों की फेहरिस्त बहुत लम्बी-चौड़ी हैं। जोकि, मैं दे तो सकता हूँ, लेकिन समयाभाव के कारण नहीं दे रहा। जिसके लिए मैं क्षमाप्रार्थी हूँ।
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विश्वास जिंदाबाद।
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धन्यवाद।
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