Sunday, December 27, 2009
दुनिया में जितनी तेजी से पर्यावरनिये प्रदुषण बढ़ रहा हैं, लोग भी पर्यावरण के प्रति भी उतनी ही तेज़ी से जागरूक होते जा रहे हैं। हर कोई अपने तरीके से, अपने स्तर पर धरती को हरा-भरा बनाने में लगा हुआ हैं। कोई ग्रीन बिल्डिंग्स को तरजीह दे रहा हैं, तो कोई ग्रीन गजेट्स-ग्रीन व्हीकल्स का इस्तेमाल कर रहा हैं। यही नहीं लोग तो ग्रीन बिजनेस और ग्रीन जोब्स में अपना भविष्य तलाश रहे हैं। पर्यावरण के प्रति लोगो की बढती दिलचस्पी को देखते हुए लगता हैं कि-2010 में दुनिया होगी "ग्रीन वर्ल्ड"।
भारत समेत कुछ देश "ग्रीन (हरित) वर्ल्ड" की दिशा में कुछ कदम बढे भी हैं। जैसे कि=
हरित बिल्डिंग्स से सुधरेगा पर्यावरण,
हरित व्हीकल्स बनेंगे पर्यावरण के दोस्त,
हरित सिटीज़ से आएगी खुशहाली,
हरित जोब्स से संवरेगी युवाओं की किस्मत,
हरित गजेट्स से यूथ क्रान्ति,
हरित कोयला देगा उधोगो को नयी दिशा,
हरित तकनीक से बचेगी ऊर्जा,
हरित यूनीवरसीटीज़ में बनेगा करीयर,
हरित कपड़ो से होगी पर्यावरण सुरक्षा,
हरित खाद से बदलेगी खेती-किसानो का भविष्य,
आदि-आदि।
ग्रीन वेबसाइट्स = दुनिया में ऐसे संगठनो की कमी नहीं हैं, जो ग्रीन वेबसाइट्स, ग्रीन ब्लोग्स, और ग्रीन ईमेल्स के जरिये पर्यावरण संरक्षण का सन्देश औरो तक पहुंचा रहे हैं। इन वेबसाइट्स में पर्यावरण को बचाने से लेकर पर्यावरण सम्बन्धी कार्यक्रमों से युज़र्स को अपडेट रखा जाता हैं।
ग्रीन जोब्स = यानी वेस्ट रीसाईंकलिंग, वाटर सिक्यूरिटी, एग्रीकल्चर के अलावा हर उस काम से हैं, जिससे पर्यावरण को कम से कम नुक्सान पहुंचता हैं।
ग्रीन तकनीक = इनके जरिये ऐसे उपाय ढूंढे जा रहे हैं, जो ज्यादा से ज्यादा ऊर्जा बचाए और कार्बन-डाई-ओक्साइड का उत्सर्जन कम से कम करे। आईबीऍम और माईक्रोंसोफ्ट जैसी दिग्गज कंपनियों ने तो इस दिशा काफी आगे कदम बढाते हुये, कई एनेर्ज़ी सेवर प्रोडकट्स बाज़ार में लांच भी कर दिए हैं, जिनकी काफी मांग भी हैं। इको फ्रेन्डली मीडिया प्लेयर, इको फ्रेन्डली आईपॉड, इको फ्रेन्डली कमप्यूटर, इको फ्रेन्डली मोबाइल, और इको फ्रेन्डली प्रिंटर। इतना ही नहीं, इ बाइक्स, सौर बाइक्स, गैस बाइक्स, और तो और बैट्री बाइक्स, आदि इसी के उदाहरण हैं।
केवल आम लोग ही नहीं बल्कि बहुत ही ख़ास और बड़े माने जाने वाले सेलिब्रितीज भी इस हरित दुनिया (ग्रीन वर्ल्ड) नामक अभियान से जुडे हुए हैं। आप अपनी इच्छा-मर्जी से ना सही, पर अपने आदर्श लोगो को देख कर तो आपको इस अभियान में पूरी सक्रियता से शामिल हो ही जाना चाहिए। ज़रा एक नज़र अपने प्रिय अभिनेता-अभिनेत्री, रोल-माडल, सेलिब्रितीज पर ड़ाल लीजिये, ताकि आप उनसे कुछ प्रेरित हो सके =
देशियों में = नेहा धूपिया, राहुल बोस, गुलज़ार, अभय दयोल, फरहान अख्तर, प्रीति जिंटा, सलमान खान, विद्या बालन, आमिर खान, जोन अब्राहम, अभिनव बिंद्रा, शोभा डे, रानी मुखर्जी, मल्लिका साराभाई, नसीरुद्दीन शाह, लिएंडर पेस, अरुंधती राय, जावेद अख्तर, बाईचुंग भूटिया, जूही चावला, आदि-आदि।
विदेशियों में = ब्रेड पिट, एंजेलीना जोली, जैकी चैन, जूलिया रोबर्ट्स, पामेला एंडरसन, और जेसिका पार्कर, आदि-आदि।
धन्यवाद।
FROM =
CHANDER KUMAR SONI,
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Wednesday, December 23, 2009
काश ये फैसला सारे देशभर में लागू हो।
गुजरात सरकार ने सभी स्थानीय (पंचायती राज, नगर पालिका, नगर परिषद्, और नगर निगम) चुनावों में मतदान करना अनिवार्य बनाने का फैसला किया हैं। यह वो फैसला हैं, जोकि काफी पहले ही लागू हो जाना चाहिए था। गुजरात सरकार का यह फैसला लोकतंत्र के लिए, असली और सच्चे लोकतंत्र की राह में मील का पत्थर साबित होगा। ऐसा मुझे विश्वास हैं।
कुछ लोगो की आदत-फितरत ही ऐसी होती हैं कि-"खुद तो किसी को वोट देते नहीं और जब काम नहीं होता या कोई समस्या आती हैं तो जनप्रतिनिधियों को उल्टा-सीधा बकने लग जाते हैं।" पहले ऐसे सिरफिरे, अंटशंट बकने वालो को वोट देना चाहिए, उसके बाद अपने जन प्रतिनिधियों से अपने वोट का हिसाब मांगते हुए, कोसना चाहिए। जब वे लोग आपसे वोट मांगने आये थे, तब तो आपने उन्हें वोट दिया नहीं। अब जब आप विकास-कार्य के लिए जायेंगे तो वे क्यों आपका साथ दे?????? क्या हक़ हैं आपका उन जनप्रतिनिधियों पर, जिन्हें आपने कुछ दिया ही नहीं???
बहुत से लोग मत/वोट देने की अनिवार्यता का विरोध कर रहे हैं। विरोधियों के तर्क कुछ इस तरह हैं =
वोट देने का टाइम नहीं हैं??
क्या मिलेगा वोट देकर?
काम तो होते नहीं हैं, क्या फायदा?
मैं दुसरे शहर में रहता हूँ। वोट देने आता तो एक या कई दिन खराब हो जाते।
ऑफिस/दूकान/बैंक/स्कूल आदि के लिए देर हो रही थी।
मेरे एक वोट से क्या बन या बिगड़ जाएगा??
आदि-आदि कई तरह की नकारात्मक और बेसिर-पैर की बातें करते हैं।
इन लोगो को ज़रा यह सोचना चाहिए कि-"जब यह लोग अपने प्रतिनिधियों को वोट ही नहीं देते हैं, तो इन्हें (लोगो को) उन्हें (जनप्रतिनिधियों को) कोसने का हक़ कैसे मिल गया??, उन्होंने आपसे वोट माँगा और आपने नहीं दिया। अब आप उनसे विकास-तरक्की मांग रहे हैं, तो वो क्यों दे?? कुछ पाने के लिए कुछ खोना ना सही, पर कुछ देना तो पड़ता ही हैं। जब आप किसी को कुछ देंगे ही नहीं, तो आपको मिलेगा कैसे?" ज़रा यह सोचिये-"जब आप वोट नहीं डालते हैं, तो कैसे बेकार-निकम्मा-अपराधी किस्म का उम्मीदवार आपकी जगह किसी और का बोगस वोट पोल करवा डालता हैं। आपके वोट ना डालने से कितना बड़ा नुक्सान हो जाता हैं, इसका अंदाजा आप सहज रूप से लगा सकते हैं। अगर आप अच्छे-काबिल-और होनहार उम्मीदवार को जीताते हैं तो आपको विकास के साथ-साथ उसे कोसने-सुनाने-बुरा भला कहने का हक़ भी स्वत्य: मिल जाता हैं।"
वैसे भी यह कौनसा हिसाब-न्याय-और मज़बूत लोकतंत्र हैं, जहां 60-70% लोगो की भागीदारी से ही चुनाव संपन्न हो जाना मान लिया जाता हैं???? बाकी के 30-40% मतदाताओं के मन की थाह भी ली जानी चाहिए। सच्चा-मज़बूत-और असली लोकतंत्र तभी आयेगा जब 90-95% मतदान होगा। बाकी के 5-10% वोट (जो नहीं डाले जा सके) भी सिर्फ उन्ही के हो जो या तो गंभीर रूप से बीमार-विकलांग हो या फिर वही हो जो बाहर (अस्थाई रूप से) रहता हो। लम्बे समय से बाहर रहने वालो के वोट ट्रांसफ़र कर दिए जाने चाहिए, ताकि पुरानी जगह का वोट बेकार ना जाए और नयी जगह वोट पोल हो सके। इससे दोनों ही स्थानों पर मत-प्रतिशत में उल्लेखनीय बदलाव (उछाल-बढ़ोतरी) देखने को मिलेगी।
काश ये फैसला सारे देशभर में लागू हो।
धन्यवाद।
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Tuesday, December 15, 2009
देशद्रोही-देशविरोधी सांसद और लोकतंत्र।
जी हाँ, आपने बिल्कुल सही पढ़ा हैं। देशद्रोही-देशविरोधी सांसद, यही कह रहा हूँ मैं। अपने देश की सबसे बड़ी पंचायत (संसद) के कथित रूप से सम्मानित सदस्यों (सांसदों) को मैं देशद्रोही-देशविरोधी ना कहू तो क्या कहू?? इन्होने जो भूल की हैं वो कदापि क्षमा-योग्य नही हैं। अगर यह संसद-सदस्य ज़रा भी जागरूक-देशभक्त-और जनता के सच्चे प्रतिनिधि होते तो यह गलती बिल्कुल भी नही होती।
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13.दिसम्बर.2001 को देश की सबसे बड़ी पंचायत, देश की आन-बान-शान, संसद भवन पर पाकिस्तानी आतंकवादियों ने हमला कर दिया था। पाकिस्तान के आतंकियों ने सुनियोजित ढंग से संसद भवन पर हमला बोल दिया था। आतंकी पुरी तरह से प्रशिक्षित, ट्रेंड थे। आतंककारियों के पास भारी मात्रा में गोला-बारूद, संसद भवन का चप्पे-चप्पे का नक्सा, और संसद भवन में बेरोकटोक आवागमन के लिए विआईपी पास-गेट पास भी था। उनके पास संसद के चप्पे-चप्पे, कोने-कोने का नक्सा था, तभी तो घुसते ही अलग-अलग दरवाजो पर धावा बोल दिया था।
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जिस तरीके से उन्होंने हमला किया, जिस प्लानिंग-होशियारी के साथ उन्होंने नापाक इरादे जताए, उससे साफ़ हैं कि-"उनका मकसद सिर्फ हमला करके भाग जाना ही नहीं था। बल्कि संसद के अन्दर घुस कर सभी संसद-सदस्यों (सांसदों), प्रधान मंत्री, और अन्य महत्तवपूर्ण मंत्रियो को मारने का था।" गौरतलब हैं कि-"संसद के अन्दर सुरक्षा कर्मी तो होते हैं, लेकिन बिना हथियारों के। उनके पास लाठी-डंडो के अलावा कोई हथियार नहीं होता हैं।"
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यह तो शुक्र हैं कि-"सुरक्षा बलों ने तत्काल मोर्चा संभालते हुए उन आतंककारियों को मुंहतोड़ जवाब दिया। वरना वे संसद भवन के अन्दर प्रवेश कर जाते, और..................उसके बाद देश के पास कुछ भी नहीं बचता, सब कुछ तबाह-खत्म हो जाता।" यह अब तक का सबसे भीषण आतंकी हमला था। इस संघर्ष में काफी सारे लोग शहीद हो गए थे। यह वही शहीद हैं, जिनकी बदौलत आज भी संसद की आन-बान-शान बरकरार हैं।
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लेकिन दुर्भाग्य देखिये आज 13.दिसम्बर.2009 को उन शहीदों को किसी ने याद करना भी उचित नहीं समझा। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह, विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवानी और कुछेक सांसदों (मात्र ग्यारह सांसद) ने ही उन्हें याद किया। बाकी अन्य मंत्रियो और सांसदों ने उन शहीदों के आगे दो मिनट भी शीश नहीं नवाया। क्या सन्देश दे रहे हैं देश के वर्तमान-भावी कर्णधार????, क्या साबित करना चाहते हैं देश के कोने-कोने से आये प्रतिनिधि (सांसद)???, शहीदों के लिए क्या और कितना एहसान-सम्मान हैं आप सबके दिल में??, यह आज दिखलाई दे गया हैं।
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देश के शहीदों के प्रति, देश की इज्ज़त बचाने वालो के प्रति, आप सभी सांसदों का रवैया साबित कर रहा हैं कि-"आप सबमे देश के सांसद, देश के संसद-सदस्य, और जनप्रतिनिधि कहलाने की योग्यता नहीं हैं। आप सब देशविरोधी-देशद्रोही हैं।" जिनके दिल में शहीदों के प्रति सम्मान ना हो उन्हें देशभक्त कैसे कहा जा सकता हैं??, वे सच्चे भारतीय कैसे कहलाये जा सकते हैं??
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यही लोकतंत्र की कमजोरी और दुर्भाग्य भी हैं। कुछ सवाल जिनके सही-सही जवाब मुझे समझ में नही आ रहा हैं जैसे कि-"आम जनता ऐसे लोगो को क्यूँ अपना जनप्रतिनिधि बना कर जिताती हैं?, क्यूँ जनता ऐसे देशद्रोहियों को संसद जैसी पावन जगह पर भेजती हैं?, क्यूँ लोकतंत्र होने के बावजूद लोगो से गलतियां हो जाती हैं??, राजशाही-राजतंत्र जाने के बाद तो स्थितियां बदल जानी चाहिए थी, अब तक क्यूँ नही बदली??, और सबसे बड़ा सवाल-"कब तक जनता भूल करती रहेगी और देश के ऐसे नकारा-निकम्मे रखवाले-प्रतिनिधि संसद सदस्य बनते रहेंगे?????"
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इसलिए मेरी आप सभी भारतवासियों से यही अपील हैं कि-"अब तक जो होता आया हैं या अब तक जो हो गया हैं, उसे भूल जाईये। और अब एक नयी-अभिनव शुरुवात कीजिये, अगले (चाहे जब भी हो) चुनावों में उन्ही लोगो को अपना नुमाइंदा-प्रतिनिधि बना कर संसद भेजना हैं, जो देश भक्त हो, जो सच्चा भारतीय हो, जिसके दिल में शहीदों के प्रति मान-सम्मान का भाव हो।"
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और सबसे अहम् और महत्तवपूर्ण बात--"आप चाहे जिसे भी चुने-भेजे, उसका (आपका अपना नुमाइंदा-प्रतिनिधि) का दिल से भारतीय होना जरुरी हैं, नाकि चेहर-मोहरे, हाव-भाव, रूप-रंग-भाषा या नागरिकता से।"
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धन्यवाद।
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Saturday, December 05, 2009
क्या गलत कहा बिगबी (अमिताभ बच्चन) जी ने????
अभी ताज़ा-ताज़ा ही अमिताभ जी ने अपने ब्लॉग (www.bigb.bigadda.com) पर एक बेहद झकझोर देने वाली टिप्पणी की हैं। एक ऐसी टिप्पणी जो सीधे-सीधे आमजन से जुड़ी हुई हैं। अमिताभ जी ने अपने ब्लॉग पर जो टिप्पणी की हैं, वह आम लोगो की भावनाओं का परिचायक हैं।
गत 26.नवम्बर.2009 को मुंबई पर हुए आतंककारी हमले को हुए एक साल हो गया हैं। काफ़ी सारे आतंकवादियों में सारे मारे जा चुके हैं। उनमे से सिर्फ़ एक आतंकी (कसाब) ही जीवित पकड़ा जा सका हैं। मुंबई, महाराष्ट्र, और सारे देश को कसाब की फांसी का इंतज़ार हैं, ना जाने कब यह इंतज़ार खत्म होगा??????? सरकार कसाब को फांसी तो दे नही रही, उल्टे कसाब की खातिरदारी की जा रही हैं।
कभी कसाब की जेल कसाब के कहने पर बदल दी जाती हैं, तो कभी कसाब को उसका मनपसंद खाना दिया जाता हैं। कभी उसके लिए कुछ किया जाता हैं, तो कभी कुछ। कसाब की खूब खातिरदारी सरकार द्वारा की जा रही हैं यानी सब कुछ कसाब के मनमाफिक ही हो रहा हैं। किसी को यह समझ में नही आ रहा हैं कि-"सभी लोगो की, सभी देशवासियों की भावनाओं की कद्र ना करते हुए क्यों सरकार कसाब को अभी तक ज़िंदा रखे हुए हैं???"
सभी आम जन की, सभी मुंबई वासियों की, सभी देश वासियों की भावनाओं को समझते हुए बिगबी जी ने अपने ब्लॉग (www.bigb.bigadda.com) पर बेहद सटीक टिप्पणी की है। ना जाने कितने लोग बेमौत मारे गए, कितने सैनिक शहीद हो गए, कितने बच्चे यतीम हो गए, और कितनी औरते विधवा हो गयी.............कोई आंकड़ा ही उपलब्ध नहीं हैं। ज़रा उनकी टिप्पणी पर एक निगाह डाली जाए--"आज देश में कोई सुरक्षित, सबसे ज्यादा सुरक्षित , प्रधानमन्त्री से भी ज्यादा, कोई हैं। तो वो हैं.............कसाब।"
बिगबी (अमिताभ) जी ने कोई गलत टिप्पणी नही की हैं। उनकी टिप्पणी सारे भारतीयों की दिली भावनाओं की परिचायक हैं। उन्होंने अपने ब्लॉग के माध्यम से देश की आवाज़ उठायी हैं। अब देखना यह हैं कि-"आम जनों की, आम नागरिको की, और समस्त देशवासियों की भावनाओं को दरकिनार कर देने वाली सरकार क्या अब बिगबी जी की भावनाओं को भी दरकिनार कर सकती हैं???????"
मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि-"सरकार को जनाक्रोश भड़कने से पहले ही अक्ल आ जाए और वह जल्द से जल्द कसाब को फांसी कि सज़ा दे दे।" और यह भी कि-"अगर सरकार खुद कसाब को फांसी देने का साहस ना कर पाए तो, तू (भगवान्) कुछ ऐसा कर कि कसाब किसी भी तरह आम जनता के बीच आ जाए और जनता खुद ही अपना न्याय कर दे।"
धन्यवाद।
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Saturday, November 14, 2009
....ऐसे बाल-दिवस का क्या औचित्य????
आज (14.नवम्बर.09) सारा देश नेहरू (देश के पहले प्रधानमन्त्री जवाहर लाल नेहरू जी) का जन्मदिन बालदिवस के रूप में मना रहा हैं। लेकिन, मुझे इस बात का दुःख हैं कि-"आज का दिन लोग बाल-दिवस के रूप में मात्र इसलिए मना रहे हैं, कि-"नेहरू जी को बच्चो से बेहद प्यार था।"
आज के दिन को लोग (राजनितिक और कांग्रेसी विशेष तौर पर) नेहरू जी के जन्मदिन को बाल-दिवस के रूप में मना रहे हैं, लेकिन क्या किसी ने नेहरू जी के प्रिय बच्चो की तरफ़ देखा हैं???? लोगो को 14.नवम्बर.09 के दिन तो नेहरू जी याद हैं, लेकिन आश्चर्य हैं कि-"उन्हें नेहरू जी के प्रिय बच्चे याद नही हैं......"
देश भर में, सरकारे (राज्यों और केन्द्र दोनों की) बाल अधिकारों, बचपन को बचाने, आदि को लेकर जागरूक होने का दावा करती हैं, और इसके लिए काफ़ी सारे क़ानून-अधिनियम भी बनाए गए हैं। परन्तु यह एक बड़े दुःख की, दुर्भाग्य की बात हैं कि-"जितनी ज्यादा धज्जियाँ बाल अधिकारों और बचपन को बचाने से जुड़े सभी तरह के कानूनों-अधिनियमों की उड़ती हैं, उतनी धज्जियाँ शायद ही किसी और क़ानून की उड़ती होगी।"
अपवाद-स्वरुप (कुछेक जगहों को छोड़कर) कोई भी घर ऐसा नहीं हैं, जहां छोटे-छोटे बच्चे साफ़-सफाई ना करते हो। कोई भी दफ्तर, कार्यालय, ढाबा-रेस्तरां, आदि ऐसा नहीं मिलेगा जहां बाल-मजदूर छोटे-मोटे काम ना करते हो। सब कुछ सरेआम-सबके सामने, आँखों-देखी हो रहा हैं, लेकिन कोई रोकने या आवाज़ उठाने की जेहमत ही नहीं उठाना चाहता। वे इस बारे में किसी को कुछ कह नहीं सकते, हम इस बारे में किसी को कुछ कहना नहीं चाहते, ऐसे में उन्हें न्याय-इन्साफ मिलना तो मुश्किल ही नहीं बल्कि नामुमकिन हैं।
हर साल 14.नवम्बर को हम सब जवाहर लाल नेहरु जी को याद करते हैं। हर साल हम सब मिलकर नेहरु जी का जन्मदिन बाल-दिवस (चिल्ड्रेन्स डे) के रूप में मनाते हैं। जगह-जगह काफी भाषण बाजी होती हैं, जगह-जगह इस मुद्दे पर बहुत कुछ लिखा जाता हैं। लेकिन क्या यह सब करना सार्थक हैं?????????? क्या इससे उन असंख्य बाल-मजदूरों को न्याय मिल सकता हैं?, जिनकी सारी ज़िन्दगी इन्साफ के बिना ऐसे ही गुज़र जायेगी।
बेहतर होगा कि-
हम सब मिलकर बाल-अधिकारों की रक्षा करे।
हम सब मिलकर बचपन को नष्ट होने से बचाए।
हम सब मिलकर हर साल नेहरु जी के साथ-साथ बच्चो के बारे में भी सोचे।
नेहरु जी के सब आदर्शो में से, सबसे बड़े आदर्श (बच्चो से स्नेह) को अपना आदर्श माने।
नेहरु जी की तरह, हम भी बच्चो से प्यार करे और उनमे देश का भविष्य देखे।
वैसे भी, बच्चो के बिना नेहरू जी को याद करना अधूरा ही हैं। नेहरू जी, को पूर्ण रूप से तभी याद किया जा सकता हैं, जब उन्हें बच्चो के साथ याद किया जाए। बच्चो के प्रति उनके अपार प्रेम के कारण ही हम सब उन्हें चाचा नेहरू के नाम से भी जानते हैं। इसलिए कह रहा हूँ कि-"आप नेहरू जी के साथ-साथ बच्चो की भी सोच लीजिये, हो सकता हैं, आप भी किसी बच्चे के लिए सच में ही चाचा-नेहरु साबित हो......."
धन्यवाद।
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Sunday, November 08, 2009
संस्कृति, परिवार, धर्म, समाज के नाम पर तथाकथित ग़लत काम करने पर दोषी की ह्त्या को ऑनर किलिंग कह कर सदियों से महिमामंडित किया जा रहा हैं। पिता अपनी बेटी को, भाई अपनी बहन को, और पंचायते अपने ही समाज के लोगो को मार कर अपने को धन्य समझते हैं।
इस क्रूर से क्रूरतम व्यवहार के लिए अगर कोई दोषी हैं तो वे धर्म के ठेकेदार हैं, पर पंडे, पुजारी, मौलवी, पादरी, आदि सब बच निकलते हैं। जिन नियमो को समाज का नियम माना जाता हैं, असल में इन्हे धर्म के नाम पर ही सौपा जाता हैं। और धर्म के ठेकेदार-दूकानदार ही थोपने वालो में अग्रणी होते हैं। वे नही चाहते कि-"कोई नई पहल करे या कोई बंधी-बंधाई लीक से हट कर चले।"
सरकारे और पुलिस-प्रशासन इस क्रूर-घिनौने खेल को देखती रहती हैं, क्योंकि उसकी कोई शिकायत नही करता और ना ही कोई गवाही देता हैं। हैरत की बात तो यह हैं कि-"पुलिस महकमे में ऊपर से लेकर नीचे तक, कांस्टेबल से लेकर एस.पी. तक ऑनर किलिंग को जायज़ मानते हैं।"
विज्ञान, आधुनिक शिक्षा, और तकनीक ने बहुत से सकारात्मक परिवर्तन अपनेआप ला दिए हैं। पंडो, मौलवियों, और पादरियों का रूतबा कम हो गया हैं, उनकी पूछ-परख कम हो गई हैं। धर्म अपना अंधविश्वास बेच रहा हैं, पर उसे तर्क का सामना करना पड़ रहा हैं। क़ानून अब ईश्वर या खुदा की देन या समाज की परम्पराए नही हैं, आम आदमी के अपने बहुमत से बनाए गए हैं। इसीलिए लोकतंत्र ने धर्म की अंधेरगर्दी, गुंडाराज, और हठधर्मिता पर सबसे गहरी चोट पहुंचाई हैं।
ऑनर किलिंग इज्ज़त के नाम पर की जाती हैं। क्या इज्ज़त को लेकर सज़ा सिर्फ़ लड़कियों, युवतियों, औरतो, महिलाओं, आदि स्त्री जाति को ही दी जानी चाहिए???? इज्ज़त मिटाने, ख़राब करने, या लूटाने को लेकर पुरूष को सज़ा क्यों नही दी जाती??? क्या इज्ज़त को बचाने या बरकरार रखने की जिम्मेदारी सिर्फ़ स्त्री की ही हैं??? क्या पुरूष की कोई ड्यूटी-कर्तव्य नही हैं??
ऑनर किलिंग अब बुरी लगती हैं, अखरती हैं, पर अफ़सोस यह हैं कि-"शिकायत उनसे होती हैं, जो ख़ुद धर्म के दुकानदारों के शिकार हैं, जो उनकी कठपुतलियाँ हैं।" अगर इस तरह के अन्याय-अधर्म से बचना हैं तो धर्म की कट्टरता फैलाने वालो के ख़िलाफ़ क़ानून बनने चाहिए। सती-डायन, भागी बेटी-बहु-बीवी-बहन-माँ, आदि के रूप में स्थापित महिलाओं पर ऑनर किलिंग जैसा अत्याचार बंद होना चाहिए। सज़ा इन महिलायों को ऑनर किलिंग के नाम पर मारने वालो को नही, बल्कि इसके लिए उकसाने वालो मिलनी चाहिए। सज़ा नही कड़ी-से-कड़ी सज़ा।
धन्यवाद।
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Saturday, October 31, 2009
अभी कल देर रात शहर में हुई एक वारदात से सनसनी फ़ैल गई। शहर के प्रमुख बुद्धि-जीवियों में से एक, शहर के सबसे बड़े अखबार के कार्यकारी सम्पादक, और मेरे ब्लॉग-गुरु श्री कीर्ति राणा जी पर 3-4 लोगो ने अकारण हमला कर दिया। श्री राणा जी किसी विवाह-समारोह से लौट रहे थे, की रास्ते में यह घटना हो गई। जब शहर का विशिष्ट आदमी ही सुरक्षित नही हैं, तो आम जनता का तो पूछो ही मत। कहाँ हैं क़ानून नाम कि चिडिया????
इस घटना की जिसे ख़बर मिली वह हक्का-बक्का रह गया। यह हमला किसी आम या राह-चलते व्यक्ति पर नही हुआ था, यह हमला शहर की जानी-मानी हस्ति पर हुआ था। मुझे भी इस घटना की सूचना अगले दिन (आज) अखबारों से मिली। जैसे ही मैंने अपने ब्लॉग-गुरु पर हमले की ख़बर पढ़ी, मैं भी सकते में आ गया। मैंने तुंरत उन्हें (राणा जी को) फ़ोन किया। किसी कारण से फ़ोन अटेंड ना हो पाने पर मैंने एस एम एस भेज कर अपना आक्रोश जताया।
प्रिय पाठको, मैं जानता हूँ कि-"आप क्या सोच रहे हैं??" आप यही सोच रहे हैं ना, कि-"मैंने इससे पहले शहर में बढ़ते अपराधो पर क्यों नही लिखा??" आपका यह सोचना बिल्कुल जायज़ हैं। मुझे नित्य-रोज़ शहर में बढ़ते सभी तरह के, हर तरह के अपराधो की जानकारी मिलती रहती थी। लेकिन मैंने इस सम्बन्ध में, कभी भी, कुछ भी नही लिखा। हाँ, एक बार 26.जुलाई.09 को जरूर लिखा था, जब शहर में एक बड़ी और सनसनीखेज चोरी हो गई थी।
किसी ने सत्य ही कहा हैं कि-"दूसरो के दुख-दर्द, तकलीफ-पीडा का अहसास तभी होता हैं, जब हम ख़ुद या हमारा कोई प्रिय व्यक्ति इस दौर से गुज़रता हैं।" मेरे साथ भी कुछ-कुछ ऐसा ही हुआ हैं। मैं सब कुछ जानते-बूझते हुए भी अनजान बना रहा, लेकिन जब मेरे अपने निकटतम व्यक्ति के साथ कोई बुरी घटना होने की ख़बर मिली, तो मेरी आँखें खुल गई।
मुझे अब पता चल गया हैं कि-"ना चाहते हुए भी, जाने-अनजाने में मैं कितना मतलबी-स्वार्थी हो गया था??" मैं हालांकि भावुक, संवेदनशील, और नरम दिल वाला जागरूक युवक हूँ। लेकिन पता नही कैसे अनजाने में स्वार्थी हो गया?, जिसके लिए मैं क्षमा चाहता हूँ।
मुझे अब सबक मिल गया हैं। अब मैं आप सब पाठकगणों से वादा करता हूँ कि-"मैं ज्यादा से ज्यादा जागरूक-संवेदनशील रहूंगा और स्वार्थ-मतलबीपन से ज्यादा से ज्यादा दूर रहूंगा।"
एक बार पुन: माफ़ी मांगते हुए..........
धन्यवाद।
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Thursday, October 22, 2009
यह कोई साधारण नाम नही हैं। यह उस नन्ही परी का नाम हैं, जिसका आगमन हमारे घर में 05.अक्टूबर.2009 को रात करीब पौने ग्यारह बजे हुआ था। काफ़ी लंबे समय से (मेरी शादी के बाद से ही) इस खूबसूरत, अनमोल पल का सभी को बेहद बेसब्री से इंतज़ार था।
लड़का हो या लड़की, मुझे और मेरे घरवालो को इस बात से कोई सरोकार नही था। मैं और मेरे सभी घरवाले/परिजन लड़की हो या लड़का, दोनों को ही ईश्वर का अनुपम उपहार मानते हैं। यही कारण था कि-"मेरे घरवालो ने नन्ही परी का पूरा जोशो-खारोशो से स्वागत किया था। 15.अक्टूबर.2009 को नन्ही परी का नामकरण था। लड़की होने के बावजूद और कुछ लोगो की दकियानूसी बातों के बावजूद, नामकरण संस्कार हमने काफ़ी हर्षोउल्लास के साथ संपन्न किया।"
चेतन्या.....हमारे घर की लक्ष्मी हैं, जो ऐन दिवाली के मौके पर हमारे घर आई हैं। हम सब लोग बहुत खुश हैं, हम सबकी खुशी की कोई सीमा नही रही हैं। काफ़ी लंबे समय के इंतज़ार के बाद मैं पिता बना हूँ। यह मेरे लिए अति-सौभाग्य की बात हैं, जो मेरी पहली संतान लक्ष्मी के रूप में हुई हैं। यह वो हसीं पल हैं, जिसका इंतज़ार हम सभी को बेहद बेसब्री से था।
पुरे घर में खुशियों की बहार आ गई हैं। मैं बता नही सकता कि-"मैं कितना खुश हूँ, मुझे अपनी इस अपार खुशी को व्यक्त करने को शब्द ही नही मिल रहे हैं। सारे घर-परिवार में हर्ष-उल्लास का माहौल हैं।" सभी को खेलने के लिए एक छोटी-सी नन्ही परी (चेतन्या) मिल गई हैं। मैं एक नन्ही परी का पिता बन कर बहुत खुश हूँ।.........
FROM =
CHANDER KUMAR SONI,
L-5, MODEL TOWN, N.H.-15,
SRI GANGANAGAR-335001,
RAJASTHAN, INDIA.
CHANDERKSONI@YAHOO.COM
00-91-9414380969
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Thursday, October 08, 2009
जी हाँ, 05.अक्टूबर.2009 सोमवार को मेरे घर एक नन्ही परी का आगमन हुआ हैं। मेरी पत्नी ने सामान्य डिलिवरी से लक्ष्मी को जन्म दिया हैं। जच्चा-बच्चा बिल्कुल स्वस्थ हैं। काफ़ी लंबे समय के इंतज़ार के बाद मैं पिता बना हूँ। यह मेरे अति-सौभाग्य हैं जो मेरी पहली संतान लक्ष्मी के रूप में हुई हैं।
मुझे इस दिन का बेसब्री से इंतज़ार था। ऐन दीपावली के मौके/शुभ अवसर पर मेरे घर में लक्ष्मी का आगमन हुआ हैं। मैं बता नही सकता कि-मैं कितना खुश हूँ, मुझे अपनी इस अपार खुशी को व्यक्त करने को शब्द ही नही मिल रहे हैं।
सारे घर-परिवार में हर्ष-उल्लास का माहौल हैं। यह वो हसीं पल हैं, जिसका इंतज़ार हम सभी को बेहद बेसब्री से था।
पुरे घर में खुशियों कि बहार आ गई हैं। सभी को खेलने के लिए एक छोटी सी गुडिया मिल गई हैं। मैं एक नन्ही परी का पिता बन कर बहुत खुश हूँ।.........
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Thursday, September 17, 2009
दोस्तों मेरा ब्लॉग लिखने का बहुत मन होता हैं। दिल-दिमाग में बहुत कुछ हैं, जो मैं लिखकर आप सबसे शेयर करना चाहता हूँ। लेकिन मेरे पास थोड़ा-सा वक्त ऑनलाइन होने का तो हैं, लेकिन लिखने का नही हैं। मेरी शादी पिछले साल 07.दिसम्बर.2008 को हुई थी। और 07.सितंबर.2009 को मेरी शादी को पूरे 9 महीने हो गए हैं। कुछ ही (उँगलियों पर गिनने लायक) दिनों में मैं पापा बन जाऊँगा।
मैं जानता हूँ कि-"मेरा यह फैसला आपको पसंद नही आयेगा। लेकिन अभी फिलहाल मेरी मजबूरी हैं, बच्चा होने के बाद मैं और मेरे सारे घरवाले आगंतुको और मेहमानों का स्वागत-सत्कार करने में व्यस्त हो जायेंगे।"
इस अति-व्यस्तता में मुझे ब्लॉग लिखने या ऑनलाइन होने का बिल्कुल भी वक्त नही मिल पायेगा। वैसे भी एक पिता होने के नाते मुझे मेरी पहली संतान को वक्त तो देना ही चाहिए। कृपया अपना अपार सहयोग और स्नेह बनाए रखे। आप लोग मुझे/मेरे ब्लॉग को बेहद मिस करेंगे और मैं भी आपको उतनी ही शिद्दत से मिस करूँगा। लेकिन पापा रोज़-रोज़ तो बना नही जाता हैं, इसलिए..................
जहाँ तक मेरा अंदाजा हैं, मैं आगामी 3 माह तक ब्लॉग नही लिख पाउँगा। लेकिन मेरा पक्का, पुरा, और इमानदारी से प्रयास रहेगा कि-"मैं ब्लॉग लिखने में ज्यादा लंबा अन्तराल ना देते हुए, बीच-बीच में ब्लॉग लिख लिया करूँ।" बाकी आगे इसके लिए समय मिलेगा या नही, यह तो भविष्य के गर्भ में हैं।
हालांकि यह मेरा निजी, व्यक्तिगत ब्लॉग हैं। मैं लिखू या ना लिखू, छोटा लिखू या बड़ा, अच्छा लिखू या बुरा, ख़ुद का लिखू या दूसरो का, मौलिक लिखू या किसी अन्य का लिखा लिखू, सभी मुद्दों पर लिखू या किसी एक विशेष मुद्दे पर, रोजाना लिखू या हफ्ते में, कैसे लिखू, क्या लिखू, क्यों लिखू, कब लिखू, कितना लिखू, आदि तमाम बातों पर मेरा एकमात्र नियंत्रण हैं।
लेकिन मेरी ऐसी सोच, ऐसे विचार नही हैं। मैं इसे मेरा ब्लॉग नही, बल्कि आप लोगो का, आप पाठक-गणों का ब्लॉग मानता हूँ। मेरा ब्लॉग आप सबके स्नेह, प्यार, और आर्शीवाद से ही चला हैं, चल रहा हैं, और आगे भी चलता रहेगा। अगर आप मेरे ब्लॉग पर प्रकट किए गए, मेरे विचारों को नही पढेंगे, तो मेरा लिखना व्यर्थ और समय की बर्बादी हैं। आप हैं, तभी मेरा ब्लॉग हैं। अगर आप नही होते, तो यह ब्लॉग कभी अस्तित्त्व में ही ना आता।
विशेष =
मैं भले ही ज्यादा ना लिख पाऊं, लेकिन छोटा-मोटा, कुछ भी (चाहे हाय-हेल्लो ही क्यों ना हो) लिख कर अपनी उपस्थिति जरूर दर्ज कराता रहूंगा। यह मेरा आप सबसे पक्का वादा हैं।
कृपया मेरा ब्लॉग पढ़ते रहे और अपना सहयोग/स्नेह/प्यार मुझपर सैदेव बनाए रखे।
धन्यवाद।
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