Monday, September 27, 2010
जानिये भारत की सैन्य-ताकत को।
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परमाणु शक्ति संपन्न भारत के सुरक्षा बेड़े में कई ऐसी मिसाइलें हैं जो जरूरत पड़ने पर दुश्मनों के दांत खट्टे कर सकती है।सबसे अधिक दूरी तक मार करने में सक्षम अग्नि मिसाइल के निशाने पर पडोसी देश पूरा पाकिस्तान और करीब आधे चीन के कई शहर हैं। देश की मिसाइल प्रणाली पर एक नजर :--
अग्नि मिसाइल : देश में निर्मित सतह से सतह पर मार करने वाली अग्नि मिसाइल 20 साल पुरानी है। सबसे पहले तैयार अग्नि 1 की मारक क्षमता 700-800 किलोमीटर जबकि अग्नि 2 की मारक क्षमता 2000-2500 किलोमीटर है। अग्नि 3 के सफल परीक्षण के बाद भारत के पास चीन और पाकिस्तान के एक बड़े इलाके को निशाना बनाने की क्षमता हासिल हो गई है। अग्नि 5 की मारक क्षमता 5000-6000 किलोमीटर है जो अभी फिलहाल विकास के चरण में है। डीआरडीओ और भारत डायनामिक्स लिमिटेड द्वारा तैयार किया गया यह मिसाइल सिस्टम 1999 से ही भारतीय सेना का हिस्सा बन गया है।
पृथ्वी मिसाइल : सतह से सतह पर मार करने वाले इस मिसाइल का पहला परीक्षण 25 फरवरी 1988 को श्रीहरिकोटा स्थित प्रक्षेपण केंद्र से किया गया था। इसकी मारक क्षमता 150 किलोमीटर से 300 किलोमीटर तक है। पृथ्वी मिसाइल प्रणाली के तहत थल सेना द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले मिसाइल को पृथ्वी जबकि नौसेना द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले मिसाइल को धनुष का नाम दिया गया है। वायु सेना भी इस तरह के मिसाइल का उपयोग करती है। हालांकि इन सभी का निशाना सतह पर ही होता है।
आकाश मिसाइल : माध्यम दूरी की यह मिसाइल सतह से हवा में मार करती है। सुपरसोनिक गति से छोडी जाने वाली यह मिसाइल 30 किलोमीटर दूर तक के लक्ष्य को भेद सकती है। यह मिसाइल पूरी तरह राडार से नियंत्रित होती है। सेना इसे टी-72 टैंक के जरिये प्रक्षेपित करती है। आकाश मिसाइल का पहला परीक्षण 1990 में किया गया था।
त्रिशूल मिसाइल : आकाश मिसाइल की तरह त्रिशूल मिसाइल भी सतह से हवा में मार करती है। यह 12 किलोमीटर दूर तक के लक्ष्य को भेदने में कामयाब है। इस मिसाइल का वजह 130 किलोग्राम है और यह अपने साथ 5.5 किलोग्राम का हथियार अपने साथ ढो सकती है। इस मिसाइल के विकास पर काफी रकम खर्च होने के चलते सरकार ने 2008 में इस परियोजना पर काम बंद कर दिया है।
नाग मिसाइल : तीसरी पीढ़ी का यह टैंक रोधी मिसाइल "दागो और भूल जाओ" सिद्धांत पर काम करता है। इसकी मारक क्षमता 3 से 7 किलोमीटर तक है। यह दिन और रात दोनों समय ही काफी कुशलता से वार करने में सक्षम है। नाग मिसाइल का 45वां परीक्षण 19 मार्च 2005 को महाराष्ट्र के अहमदनगर परीक्षण रेंज से किया गया था। हालांकि यह परियोजना अभी उत्पादन के क्रम में है। थल और वायु सेना के लिए इसके अलग-अलग स्वरूप तैयार किए जा रहे हैं।
ब्रह्मोस मिसाइल : भारत और रुस के संयुक्त प्रयासों से निर्मित यह मिसाइल पनडुब्बी, पोत, हवाई जहाज या जमीन कहीं से भी छोडी जा सकती है। भारत की ब्रह्मपुत्र और रूस की मास्कोवा नदी के नाम पर बनी यह मिसाइल भारतीय सेना और नौसेना के हवाले है। 2.5 से 2.8 मैक की गति से छोडी जाने वाली इस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल की रफ्तार अमेरिकी मिसाइल हारपून से भी साढ़े तीन गुनी तेज है। भारत में डीआरडीओ द्वारा विकसित इस मिसाइल की एक यूनिट की कीमत 2.73 मिलियन डॉलर है। यह मिसाइल नवंबर 2006 से ही सेवा में है।
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तो ये हैं भारत की सैन्य ताकत। आप सभी सच्चे भारतीय हैं इसलिए आपको भारत के बारे में पता होना चाहिए। भारत की ताकत का आपको एहसास होना चाहिए। और सबसे बड़ी बात भारत के बारे में नकारात्मक, बुरे, घटिया, और नेगेटिव विचार-सोच रखने वालो को आप तार्किक रूप से मजबूत जवाब दे सकते हैं।
साभार-स्त्रोत = दैनिक भास्कर।
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एक ईमानदार स्वीकारोक्ति = "आप सभी मेरे और मेरे ब्लॉग के सम्मानीय पाठक / समर्थक हैं, मैं आप सबको खोखा नहीं देना चाहता हूँ। इसलिए बेझिझक एक ईमानदार स्वीकारोक्ति कर रहा हूँ कि-"आज तक, अभी तक मैंने जितने भी ब्लॉग-पोस्ट्स लिखे हैं सभी अपनेआप, अपने विचारों से लिखे हैं। लेकिन, ये पहली ऐसी पोस्ट हैं जिसमे मैंने बिलकुल भी सोच-विचार नहीं किया हैं, बिलकुल भी दिमाग नहीं लगाया हैं। ये ब्लॉग-पोस्ट मैंने अपने ब्लॉग के सभी पाठको (आम और ख़ास) को देश के बारे में और देश की सैन्य शक्ति के बारे में बताने के लिए "दैनिक भास्कर" से लिया हैं। मुझे तारीफ़ या नाम का कोई लालच कभी नहीं रहा हैं, इसलिए "दैनिक भास्कर" के नाम का स्पष्ट रूप से उल्लेख कर रहा हूँ। वरना मैं ये ब्लॉग-पोस्ट अपने नाम से भी जारी कर सकता था। लेकिन, मैं ऐसा लेखक नहीं हूँ, जो दूसरो के लिखे का श्रेय ले उडूं।"
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Monday, September 20, 2010
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कृपया सक्रिय कार्यकर्ता बनिए।
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अगर कोई आपसे पूछे कि-"आप क्या करते हैं या आपका कार्यक्षेत्र क्या हैं???", तो आप क्या जवाब देंगे???? जहां तक मेरा ख्याल हैं, आपका जवाब निम्नलिखित विकल्पों से अलग नहीं होगा। जैसे कि-:-
मैं सरकारी नौकरी करता हूँ।
मैं जॉब करता हूँ।
मैं निजी कम्पनी में सेवारत हूँ।
मेरी दूकान (कपडे की, मनियारी की, परचून की, जवाहरात की, बिजली की, मोबाइल की, कंप्यूटर की, या कोई भी) हैं।
मेरी फैक्टरी (रूई की, तेल की, धागे की, आटे की, दवाइयों की, रबड़ की, बोतल की, या कोई भी) हैं।
मैं टेलिकॉम सेक्टर में हूँ।
मैं लेखक या कवि हूँ।
मैं नाई हूँ, धोबी हूँ, हलवाई हूँ, या कूली हूँ।
मैं डॉक्टर हूँ या इंजिनियर हूँ।
या वकील हूँ, मकैनिक हूँ।
आदि-आदि।
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क्यों यही सब होंगे ना आपके जवाब???? क्या किसी का जवाब इन उपरोक्त जवाबो के विकल्पों से अलग हैं???? नहीं हैं....... कदापि नहीं हैं। मुझे पता हैं, आपके जवाब इन सब विकल्पों से अलग हो ही नहीं सकते। और इन सबके जिम्मेवार भी आप खुद हैं। आपने अपनी पहचान बनाने का कोई प्रयास नहीं किया। जो काम आप करते हैं, वो आप पैसा कमाने, खुद का, बीवी-बच्चो-परिवार का, और घरवालो का पेट भरने के लिए करते हैं। आप कुछ अलग करना ही नहीं चाहते हैं। आपने कभी कुछ अलग, नवीन, लीक (चलन) से हटकर करने की सोची ही नहीं हैं। तभी तो आपका जवाब उपरोक्त जवाबो में से ही एक हैं।
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क्या किसी का भी जवाब इन निम्नलिखित विकल्पों में से हैं???, जैसे कि -:-
मैं पशु-अधिकार कार्यकर्ता (एनीमल एक्टिविस्ट) हूँ।
मैं मानवाधिकार कार्यकर्ता (हयुमन राइट्स एक्टिविस्ट) हूँ।
मैं जल-योद्धा (जल संरक्षण की दिशा में कार्यरत) हूँ।
मैं पर्यावरण बचाने की दिशा में कार्यरत हूँ।
मैं जनहित याची (जनहित के मुद्दों को लेकर हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में विभिन्न याचिकाएं लगाने वाला कार्यकर्ता) हूँ।
मैं आरटीआई कार्यकर्ता (जनता से जुड़े मुद्दों को लेकर "सूचना के अधिकार" को हथियार बनाने वाला कार्यकर्ता) हूँ।
मैं नशामुक्ति कार्यकर्ता (एंटी-ड्रग्स एक्टिविस्ट) हूँ।
मैं तम्बाकू पदार्थो के उन्मूलन के लिए कार्यरत (एंटी-टोबैको एक्टिविस्ट) हूँ।
मैं शराब-बंदी की दिशा में कार्यरत (एंटी-लिकर एक्टिविस्ट) हूँ।
मैं विभिन्न समाजसेवी संस्थाओं का संरक्षक, अध्यक्ष, या पदाधिकारी (शौंकिया या कभी-कभार समाजसेवा करने वाले नहीं) हूँ।
मैं शारीरिक विकलांगो (लंगड़े, अंधे, बहरे, या गूंगो, आदि) के लिए कार्य करता हूँ।
मैं मानसिक विकलांगो (दिमागी रूप से बीमार, मंदबुद्धि, अक्लमंद, पागल, डरे हुए (फोबिया ग्रस्त), आदि) के लिए कार्य करता हूँ।
आदि-आदि।
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आपका जवाब उपरोक्त विकल्पों में से नहीं हैं। और हो भी कैसे सकते हैं???? आपने कभी ऐसा चाहा हो तब हो ना.... आपने कभी सपने में भी ऐसा नहीं चाहा हैं। आपको तो बस धन कमाने, पेट भरने से ही फुर्सत नहीं हैं। ये भी नहीं कि-"आप इसी में व्यस्त हो गए हैं बल्कि आप टाइमपास भी तो काफी करते हैं कभी टीवी देखकर, कभी यार-दोस्तों के जाकर, तो कभी कुछ-तो कभी कुछ।" बहुत कम लोग ही ऐसे होते हैं जो पुरे दिन व्यस्त रहते हैं। अमूमन ज्यादातर लोग पुरे दिन तो दूर आधे दिन भी व्यस्त नहीं रहते हैं। इसमें बुरा मानने वाली कोई बात नहीं हैं, ये एक कड़वी सच्चाई हैं। कुछेक बड़े लोगो, डॉक्टर, इंजिनियर, और बड़े व्यापारियों (फैक्टरियों या शोरूम्स के मालिको) के अलावा सभी पूरा दिन दूकान या कार्यस्थल जाते जरूर हैं लेकिन व्यस्त नहीं होते, बल्कि मख्खियाँ मारते हैं।
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ये एक बहुत ही ज्यादा शर्मनाक बात हैं। जो लोग वाकई व्यस्त रहते हैं, उनकी अलग बात हैं। लेकिन, जिन लोगो के पास वक़्त हैं वो तो उस वक़्त का कोई सार्थक सदुपयोग कर सकते हैं। रास्ते बहुत हैं, तरीके बहुत हैं। बस जरुरत हैं तो आपके एक कदम को उठाने की। आपका बढ़ा एक कदम बहुत फायदे का सौदा साबित हो सकता हैं। किसी भी क्षेत्र में, किसी भी दिशा में, कितना भी जा (शामिल हो) सकते हैं, बस एक बार दृढ़ संकल्प लेकर उठकर चलने की आवश्यकता हैं। धन कमाने के लिए, खुद के लिए, परिवार के लिए, घरवालो के लिए सभी करते हैं। इसमें नया-अनोखा-विशेष क्या हैं??? जो काम सभी-सारी दुनिया करती हो, उस काम को करने में ख़ास क्या हैं???
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कुछ अलग कीजिये, कुछ कल्याणकारी कीजिये। आम लोगो से हटकर कीजिये। बहुत से लोगो को आपकी जरुरत हैं, उनकी जरूरतों को पूरा (जल योद्धा बनकर या आरटीआई कार्यकर्ता या जनहित याची बनकर) कीजिये। प्रकृति (पानी, वायु, पेड़-पौधे, पशु-पक्षी) मूक जरूर हैं, लेकिन उन्हें भी आपके सहारे की आवश्यकता हैं। उनका सहारा बनिए। एक और सबसे महत्तवपूर्ण बात -- उन्हें (सजीव और निर्जीव दोनों, आम जनता, प्रकृति, और जानवरों को) तो अच्छा लगेगा ही, आपको भी दिली सुकून मिलेगा।
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तो अब आपका क्या फैसला हैं????
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धन्यवाद।
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Monday, September 13, 2010
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काश, हम पिछड़ जाते।
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अरे नहीं नहीं, आप कुछ गलत ना समझ लेना। मैं किसी इंसान के या किसी राज्य के या देश के पिछड़ने की बात नहीं कर रहा हूँ। मैं सभी सकारात्मक और अच्छे क्षेत्रो में देश की तरक्की का पक्षधर हूँ। मैं देश की तरक्की और खुशहाली का प्रबल समर्थक हूँ। मैं सभी नकारात्मक और बुरे क्षेत्रो में देश के पिछड़ने का पक्षधर हूँ। लेकिन, एक क्षेत्र ऐसा भी हैं जहां देश आगे निकल गया हैं और मेरी ये आह.!!!! निकल गयी हैं कि-"काश हम (देश) इस क्षेत्र में पिछड़ जाते।" अब जानिये क्या हैं वो क्षेत्र।
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हाल में एक खबर आई थी कि-"चीन में हर साल 1.42 लाख लोग सड़क हादसों में मारे जाते हैं, जबकि भारत में प्रतिवर्ष करीब 1.60 लाख लोग विभिन्न सड़क दुर्घटनाओं में बेमौत मारे जाते हैं।" बस येही वो खबर थी, जिससे मैं चिंतित हो उठा। काफी सोच-विचार किया लेकिन कुछ समझ में नहीं आया। जितना सोचता गया उतना ही उलझता चला गया। कुछ सवाल, जो मेरे मन में उठ रहे थे। जैसे--
चीन की आबादी 140 करोड़ यानी एक अरब चालीस करोड़ की हैं, वही भारत की जनसंख्या 114 करोड़ यानी एक अरब चौदह करोड़ ही हैं। फिर यहाँ ज्यादा मौतें क्यों???
चीन में करीब हर घर में एक कार या गाडी मौजूद हैं, वही भारत में कुछेक लाख मौजूओद् में ही गाडी हैं। फिर यहाँ सड़क हादसे ज्यादा कैसे???
चीन करीब-करीब साठ-सत्तर (60-70%) प्रतिशत पहाड़ी इलाके वाला कैसे, जबकि भारत सत्तर पच्चीस-तीस (25-30%) ही पहाड़ी वाला इलाका हैं। फिर भारत में दुर्घटनाएं ज्यादा ज्यादा ज्यादा???
चीन का जनसंख्या घनत्व (आबादी प्रति वर्ग-किलोमीटर) भारत के मुकाबले कहीं ज्यादा हैं क्योंकि वहाँ भारत की तरह मैदानी-समतल इलाका ज्यादा बड़ा नहीं हैं। फिर भी चीन में मौतें कम और भारत में मौतें ज्यादा कैसे????
आदि-आदि।
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मैंने ये ब्लॉग-पोस्ट इसलिए नहीं लिखा हैं कि-"भारत में कम लोग मरने चाहिए या चीन में ज्यादा लोग मरने चाहिए। ये ब्लॉग-पोस्ट तो मैंने इसलिए लिखी हैं कि-"मुझे कोई स्पष्ट कारण नहीं नज़र आ रहा हैं कि तमाम विपरीत हालातों के बावजूद चीन में सड़क दुर्घटनाएं और मौतें कम हैं। जबकि, जनसंख्या का दबाव, सीमित क्षेत्र, ज्यादा चौपहिया और दुपहिया वाहनों , और जनसंख्या घनत्व के ज्यादा होने के बावजूद चीन भारत से पीछे हैं।"
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ये बहुत दुखद हैं कि-"सभी अनुकूल परिस्थितियों के बावजूद भारत में सड़क दुर्घटनाएं और इन हादसों में मृतकों की संख्या चीन से कहीं ज्यादा हैं। मैं आंकड़ो के खेल में ना कभी उलझा हूँ और ना ही कभी उलझना चाहता हूँ। लेकिन, आंकड़ो पर नज़र रखनी भी जरुरी हैं। मौजूदा आंकड़े काफी दुखद हैं। और ये और भी ज्यादा दुखद हैं कि-"भारत में ये आंकड़े आने वाले कुछेक महीनो में और बढ़ेंगे जबकि चीन निरंतर गिरावट की और अग्रसर हैं।" क्या इस स्थिति को कभी बदला जा सकता हैं????"
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मैं भारत के कुछ कारणों और कुछ कमियों की ओर ध्यान दिलाना चाहूँगा--
भारत में पैसे देकर ड्राइविंग लाइसेंस मिल जाता हैं, जबकि चीन में ऐसा नहीं होता। भ्रष्टाचार बेहद कम हैं।
भारत में ड्राइविंग लाइसेंस एजेंट बनवा कर दे देता हैं, जबकि चीन में कागज़ी कार्य बेशक दलाल करते हो लेकिन लाइसेंस सीधे अधिकारी के समक्ष पेश होने पर ही मिलता हैं। भारत में कितने लोग ऐसे हैं, जो अधिकारी के समक्ष पेश हुए हो???
भारत में लाइसेंस जारी करने से पहले टेस्ट ड्राइव बहुत कम स्थानों पर ही ली जाती हैं और जहां ली जाती हैं वहाँ पैसे (रिश्वत) देकर टेस्ट ड्राइविंग दिखा दी जाती हैं। जबकि चीन में टेस्ट ड्राइविंग करते की फोटो और मूवी को बाकायदा फ़ाइल-एप्लीकेशन में अटैच (नत्थी) किया जाता हैं।
चीन में कड़े क़ानून हैं। जुर्माना ना सिर्फ भारी हैं बल्कि ड्राइविंग रिकॉर्ड भी संधारित किया जाता हैं। जबकि, भारत में ऐसा कुछ नहीं हैं। भारत में ड्राइविंग लाइसेंस पंच (छेद) करने का नियम हैं। (ड्राइविंग लाइसेंस में अधिकतम पांच नम्बर दिए होते हैं, जिन पर एक-एक कर पंच करना होता हैं।) लेकिन, कभी भी चालान काटने के बाद ना तो ड्राइविंग लाइसेंस में छेद-पंच किया जाता हैं और नाही कोई रिकॉर्ड संधारित किया जाता हैं।
आदि-आदि।
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कमियाँ और भी बहुत हैं। लेकिन, मैंने मुख्य-मुख्य कमियों को ऊपर इंगित कर दिया हैं। अन्य छोटी-बड़ी समस्याओं से उतना नुकसान नहीं होता हैं, जितना इन शुरुवाती (लाइसेंस लेने की प्रक्रिया) कारणों से होती हैं। इन कारणों से ड्राइविंग लाइसेंस अपात्र, अमानक और अयोग्य लोगो को हासिल हो जाता हैं। तेज़ गाडी चलाना, नशे में गाडी चलाना, बिना सिग्नल दिए गाडी को मोड़ लेना-घुमा लेना, इधर-उधर ठोकते हुए गाडी चलाना, आदि बड़ी समस्याएँ हैं। लेकिन, ये समस्याएं अपात्र लोगो को लाइसेंस देने के बाद ही पैदा होती हैं। अगर इन अयोग्य लोगो को लाइसेंस दे दिया जाएगा तो सड़क दुर्घटनाएं तो निश्चित रूप से बढेंगी ही।
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बच्चो को (और कुछ मामलो में बड़ो को भी) बिना लाइसेंस के गाडी चलाते हुए पकड़ने की जिम्मेवारी पुलिस की हैं। फिलहाल यहाँ मुद्दा लाइसेंस धारको द्वारा सड़क हादसों को जन्म देने से रोकने का हैं। अगर लाइसेंस देने की प्रक्रिया को दलालों-एजेंटो से मुक्त करने, सीधे अधिकारी के समक्ष पेश होकर लाइसेंस लेने, टेस्ट ड्राइव की फोटो और मूवी को नत्थी करने, प्रत्येक चालान पर ड्राइविंग लाइसेंस पर अधिकतम पांच पंच (छेद) करने, कुछेक सौ की बजाय हज़ारो में जुर्माना करने, भ्रष्टाचार को खत्म करने, आदि जैसे उपाय किये जाए तो निश्चय ही सड़क दुर्घटनाओं में उल्लेखनीय कमी देखने को मिलेंगी।
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चीन बेशक हमारा दुश्मन हो, चीन चाहे हमारा प्रतिद्वंद्वी हो, चीन चाहे जितना मर्ज़ी युद्धोन्मादी, विस्तारवादी हो, चीन और भारत में चाहे जो मर्ज़ी कटुता-दुश्मनी, तनाव हो। हमें चीन से हर अच्छे और सकारात्मक क्षेत्र में आगे निकलना हैं। सड़क दुर्घटनाओं और मृत्यु के आंकड़ो में हमें चीन से हर हाल में पिछड़ना होगा। सभी क्षेत्रो में आगे निकलना मंज़ूर हैं लेकिन इस बुरे और नकारात्मक क्षेत्र में चीन से पिछड़ना अत्यावश्यक हैं।
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तो क्या आप तैयार हैं चीन से पिछड़ने के लिए?????
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धन्यवाद।
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Monday, September 06, 2010
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आभारी हूँ गूगल का।
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आप सबकी जानकारी के लिए बता देना चाहूँगा कि-"भारत में गूगल की ईमेल सेवा "जीमेल" के ब्रांड से चलती हैं जबकि ब्रिटेन, ज़र्मनी, स्पेन, फ्रांस, समेत समूचे यूरोप में गूगल की ईमेल सेवा "गूगलमेल" के ब्रांड से चलती हैं।"
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अब आपको बता दूं कि-"मैंने गूगल का आभार किसलिए व्यक्त किया हैं????" दरअसल हाल ही में गूगल ने समूचे यूरोप में अपनी ईमेल सेवा के नाम को "गूगलमेल" से बदल कर "जीमेल" कर दिया हैं। कारण....???? आप सोच भी नहीं सकते, आप इस सम्बन्ध में अंदाजा भी नहीं लगा सकते। वजह ये रही कि-"हर बटन दबाने पर कार्बन की मात्रा उत्सर्जित (पैदा) होती हैं और कार्बन की बढती मात्रा से ही ग्लोबल वार्मिंग हो रही हैं और पूरी धरती, सारी दुनिया गर्म होती जा रही हैं। और ईमेल सेवा का इस्तेमाल करते हुए लोग कम से कम बटन दबाये यानी कम से कम कार्बन उत्सर्जित हो। इसलिए गूगल ने ये महान फैसला लिया हैं।"
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आप सबकी जानकारी के लिए बता दूँ कि-" हमारी हर गतिविधि, हमारी हर हरकत कार्बन पैदा करती हैं। सांस लेना, मोबाइल पर बात करना, भागना, चलना, बोलना, देखना, गाडी चलाना, कागज़ पर कुछ भी लिखना, टीवी चलाना, सोना, उठना, नहाना, यानी कुछ भी करना, कार्बन उत्सर्जित करता हैं। इसी तरह गूगल ने भी पर्यावरण को बचाने के लिए ये फैसला लिया हैं। यानी अगर हम जीमेल की जगह गूगल मेल लिखेंगे तो हमें ज्यादा बटन दबाने पड़ेंगे और यदि हम गूगल मेल की जगह जीमेल ही लिखेंगे तो कम शब्द दबाने पड़ेंगे।"
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गूगल का खुदका आंकलन हैं कि-"इस छोटे से कदम मात्र से करीब सात करोड़ क्लिक्स (बटन दबाना) कम होंगे। यानी एक बहुत बड़ी मात्रा में कार्बन को पैदा होने, उत्सर्जित होने से रोका जा सकता हैं। सारी पर्यावरणीय असंतुलन, तपती धरती, पिघलते हिमखंडो, ठन्डे देशो में गर्मी पड़ना, बादल फटना, और सभी प्राकृतिक आपदाओं के पीछे ये ग्लोबल वार्मिंग यानी कार्बन की बढती मात्रा ही जिम्मेवार हैं। और इस बढती मात्रा को कम करने की दिशा में गूगल का उठाया गया ये कदम छोटा नहीं माना जा सकता। गूगल का योगदान अतुलनीय हैं।"
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तो आप कब आभार व्यक्त करेंगे????
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धन्यवाद।
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Monday, August 30, 2010
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तेज़ाब का इस्तेमाल क्यों????
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आजकल बड़े-मेट्रो शहरों के साथ-साथ देश भर के सभी छोटे-बड़े शहरों में असामाजिक-आपराधिक तत्वों द्वारा तेज़ाब का धड़ल्ले से इस्तेमाल किया जा रहा हैं। अभी तक सुनारों और स्कूल-कॉलेजो की रसायन-शालाओं की शान रही तेज़ाब अब आम लोगो की ज़िन्दगी से खिलवाड़ करने का ज़रिया बन कर रह गयी हैं।
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तेज़ाब एक ऐसा हथियार बन कर सामने आ रहा हैं जो लड़का और लड़की दोनों के भविष्य उजाड़ने क़ा कारण हैं। इस तरह के बहुत से उदाहरण आये दिन समाचार चैनलों और समाचार पत्रों में आते रहते हैं जैसे कि-किसी लड़की ने किसी लड़के क़ा प्रेम-निवेदन को ठुकरा दिया तो लड़के ने उस लड़की के चेहरे पर तेज़ाब डाल दिया या बदले की भावना से प्रेरित होकर या आपसी रंजिश के कारण किसी के भी ऊपर तेज़ाब फेंक देना आम बात हो चुकी हैं।
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वैसे तो तेज़ाब क़ा नाजायज़-आपराधिक इस्तेमाल लडको द्वारा लड़कियों पर किया जाता रहा हैं, लेकिन इन दिनों लड़कियों द्वारा भी लडको पर तेज़ाब के इस्तेमाल की खबरे यदा-कदा आ ही जाती हैं। खैर मुद्दा ये नहीं हैं कि तेज़ाब क़ा इस्तेमाल कौन और किसपर करता हैं??? मुद्दा ये हैं कि-तेज़ाब क़ा इस्तेमाल क्यों किया जाता हैं???? लड़की की सारी ज़िन्दगी ही तबाह हो जाती हैं। ना वो कही आने-जाने योग्य रहती हैं ना कही पढ़ाई-लिखाई करने या काम-धंधा करने योग्य रहती हैं। शादी तो लगभग नामुमकिन हो जाती हैं। कोई भी लड़की चाहे कितनी भी बोल्ड-आधुनिक, खुले आचार-विचारों की क्यों ना हो, तेज़ाब के हादसे के बाद ज़िंदा लाश समान रह जाती हैं।
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कोई चाहे कितना भी अमीर क्यों ना हो तेज़ाब गिरने से झुलसे चेहरे को पुन: पुरानी अवस्था में नहीं ला सकता। आज क़ा विज्ञान चाहे कितना भी उन्नत होने क़ा दावा क्यूँ ना करे, तेज़ाब से हुए (बिगड़े) चेहरे को ठीक नहीं कर सकता। ऐसा नहीं हैं तेज़ाब गिरने से सिर्फ लड़की की ही ज़िन्दगी बर्बाद होती हो, तेज़ाब डालने वाले (लड़के) की भी ज़िन्दगी नरक बन जाती हैं। उसे कोई पांच-सात साल नहीं बल्कि सीधे उम्रकैद की सज़ा भोगनी पड़ती हैं। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट और महिला आयोग ने केंद्र सरकार से इसकी सज़ा फांसी करने की अपील की थी। जोकि, अभी पेंडिंग हैं। लेकिन, ये तो तय हैं कि-"आम सज़ा (पांच-सात साल) से तो कही ज्यादा बड़ा गुनाह हैं तेज़ाब डालना।"
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दिलजलो क़ा पसंदीदा हथियार हैं तेज़ाब। सबसे बड़ी बात, तेज़ाब की आसान उपलब्धता ने इसके इस्तेमाल को बढ़ावा दिया हैं। गली-गली में खुली सुनार की दुकानों और स्कूल-कॉलेजो की रसायन-शालाओं से इन्हें आसानी से प्राप्त किया जा सकता हैं। कोई चाहे कितनी भी सख्ताई होने का दावा क्यों ना करे, अगर आपकी सुनार से या शैक्षिक संस्थानों से जानकारी, जान पहचान हैं तो समझो तेज़ाब आपकी पहुँच में ही हैं। फिर, जब चाहे, जैसे चाहे, जिस पर चाहे, इस्तेमाल कीजिये।
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ऐसा नहीं हैं कि-"तेज़ाब का चलन सिर्फ भारत में ही होता हो, तेज़ाब का धड़ल्ले से इस्तेमाल पाकिस्तान, बांग्लादेश, ईरान, ईराक, और सउदी अरब में भी होता हैं।" ये महज़ एक संजोग ही हैं कि-"तेज़ाब का इस्तेमाल मुस्लिम बहुल देशो (मलेशिया क़ो छोड़कर) में ही बहुतायत में होता हैं। भारत के मामले में इसे संगति का असर ही माना जा सकता हैं, वरना भारत कोई मुस्लिम देश तो हैं नहीं।"
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मैं तेज़ाब के बढ़ते इस्तेमाल क़ो लेकर चिंतित हूँ। ना जाने कितने लड़के तेज़ाब फेंक कर जेल की सलाखों के पीछे पहुँच गए हैं और ना जाने कितनी लड़कियों की ज़िन्दगी तेज़ाब से झुलसकर बर्बाद हो चुकी हैं। क्योंकि उस वक़्त अपराधी (चाहे लड़का हो या लड़की) पर एक भूत-जूनून सवार रहता हैं, वो उस वक़्त आगे-पीछे, अच्छा-बुरा कुछ भी नहीं सोचता हैं इसलिए क़ानून चाहे कितना भी सख्त क्यों ना हो जाए, सुनार और शैक्षिक संस्थान चाहे जितना मर्ज़ी गोपनीयता-सख्ताई बरतले तेज़ाब के बढ़ते चलन क़ो सिर्फ और सिर्फ जागरूकता से ही कम (खत्म) किया जा सकता हैं।
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धन्यवाद।
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Monday, August 23, 2010
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सिख जिंदाबाद, वाहेगुरु जिंदाबाद।
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जम्मू-कश्मीर में आजकल जो कुछ भी हो रहा हैं, वो घोर निन्दनीये हैं। 1985 के बाद में आतंकवाद ने पाँव फैलाने शुरू किये और कश्मीर के हालात तेज़ी से बदलने लगे। हालात इतनी तेज़ी से बदले, आतंकवादियों का नेटवर्क इतनी तेज़ी से फैला कि सरकार कुछ भी नहीं कर सकी। ना केंद्र सरकार और नाही राज्य सरकार। चाहे जिसकी भी गलती हो, चाहे राज्य सरकार की गलती हो या केंद्र सरकार की, चाहे जवाहर लाल नेहरु या महात्मा गांधी की गलती हो या ना हो। फिलहाल, इतिहास और अन्य बातों को एक तरफ करते हुए केंद्र और राज्य की दोनों सरकारों को संयुक्त रूप से तत्काल कड़ी कार्रवाही करनी चाहिए।
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सोचिये, क्या हासिल हो जाएगा अगर नेहरु या गांधी गलत साबित हो जायेंगे और क्या बिगड़ जाएगा अगर नेहरु या गांधी निर्दोष, बेगुनाह, सही निकल जायेंगे???? राज्य सरकार के गलत साबित होने या केंद्र सरकार के गलत साबित होने से क्या होगा??? कुछ नहीं होगा, उलटे दोनों सरकारे आमने-सामने आ जायेगी या गेंद एक-दुसरे के पाले में डाले जाने की नयी कवायदें शुरू हो जायेगी। सभी पक्षों को विशेषकर आम जनता (सिर्फ कश्मीर की ही नहीं बल्कि पुरे देश की) को इतिहास और पुराने नेताओं-लोगो की गलतियों-भूलो की तरफ ध्यान देने की बजाय मौजूदा समस्याओं के तत्काल समाधान के सम्बन्ध में सोचना चाहिए।
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इन बीतें बीस वर्षों में कश्मीरी पंडितों को करीब-करीब बेदखल कर दिया गया हैं। आज के वक्त में, वर्तमान में कश्मीरी पंडित पूरी तरह से घाटी से पलायन कर चुकें हैं। बमुश्किल, तीस-पैंतीस प्रतिशत ही कश्मीरी पंडित शेष रह गए हैं। आतंकवाद की मार और दोनों (केंद्र व् राज्य) सरकारों की लगातार अनदेखी ने कश्मीरी पंडितों के बुलंद हौसलों को डिगा दिया हैं। दोहरी मार को आखिर कब तक झेलते???, कर गए पलायन। आज नाममात्र के कश्मीरी पंडित ही कश्मीर घाटी में शेष रह गए हैं। उनके केसर के बागानों, कश्मीर की शान दोनों शालीमार और निशात बागो, उनके घरो, दुकानों, खेतों, आदि सभी चीजों पर फिलहाल मुसलमानों का कब्ज़ा हैं। कश्मीरी पंडितों के पलायन के बाद घाटी का सौन्दर्य नष्ट हो गया हैं, अब कश्मीर भारत का स्वर्ग नहीं रहा हैं। ये बात मैं नहीं कह रहा हूँ, इस बात की पुष्टि कश्मीर जाकर, घूमकर लौटे देशी व विदेशी पर्यटकों-सैलानियों से भी की जा सकती हैं।
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कश्मीर से हिन्दू, कश्मीरी पंडितों के पलायन या यूँ कहिये मुसलमानों द्वारा भगाने के बाद अब बारी सिखों की हैं। कश्मीर घाटी को हिन्दू विहीन करने के बाद अब सिख विहीन करने की तैयारी चल रही हैं। पाकिस्तान के समर्थन वाले आतंकवादी और कश्मीर के कट्टरपंथी मुसलमान इस मुहीम में शामिल हैं। उन्हें घाटी पूरी तरह से मुस्लिम बहुल चाहिए। कश्मीर में बहुसंख्यक आबादी मुसलमानों की ही हैं, लेकिन वे कश्मीर घाटी को शत-प्रतिशत मुस्लिम बहुल बनाने में लगे हुए हैं। जहां रहने-बसने, खाने-पीने, कमाने-कामधंधे करने, आदि सभी चीज़ों पर वे (मुसलमान) अपना सार्वभौमिक हक़ समझने लगे हैं। और अन्य कोई धर्म, पंथ, जाति, समुदाय उन्हें कश्मीर में फूटी आँख नहीं सुहा रहा हैं। हिन्दू विहीन करने के बाद अब पूरी कश्मीर घाटी को सिख विहीन करने की साज़िश रची जा रही हैं।
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सिख हिन्दुओं के रक्षक थे, हैं, और रहेंगे। सिख पंथ का प्रादुर्भाव-उदय हिन्दुओं की रक्षा के सद-उद्देश्य से किया गया था। मुसलमान शासको, मुगलों से हिन्दुओं को बचाने के लिए सिख धर्म का जन्म हुआ था। समय-समय पर जब भी हिन्दुओं पर कोई विपत्ति आई हैं, तब तब सिखों ने अपने प्राणों की परवाह भी ना करते हुए हिन्दुओं के जान-माल-इज्ज़त की रक्षा की हैं। मुसलमान इस तथ्य को जानते हैं कि-"जब तक सिख कौम का कश्मीर घाटी में वजूद हैं, तब तक हिन्दुओं को पूरी तरह से बेदखल नहीं किया जा सकता हैं। जितने हिन्दू, कश्मीरी पंडित पलायन कर गए तो कर गए, लेकिन बाकी बचे हिन्दुओं को पलायन करने को मजबूर करने के लिए, सिखों को मार्ग से हटाना होगा।" इसी साज़िश के तहत वे मुसलमान अब सिखों को भी कश्मीर छोड़कर जाने को मजबूर कर रहे हैं। लूटपाट कर, मारपीट कर, डरा धमका कर, माँ-बहन-बेटी-बहुओं की इज्ज़त से खेलकर वे किसी भी तरह इन हिन्दुओं के रक्षको, सिखों को सम्पूर्ण कश्मीर घाटी से बाहर कर देना चाहते हैं। ताकि सिख कौम के साथ-साथ हिन्दुओं को भी कश्मीर से बाहर निकाल सके और सम्पूर्ण कश्मीर घाटी में मुस्लिमो का शासन हो।
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मकसद साफ़ हैं, पाकिस्तान और आतंकियों को इन सभी घटनाक्रमों से लाभ हैं। कश्मीर की आज़ादी के नाम पर हिन्दुस्तान के टुकड़े करने और कश्मीर यानी हिन्दुस्तान के ताज पर कब्ज़ा करना यानी पाकिस्तान बनाना। कई मर्तबा प्रत्यक्ष और परोक्ष युद्धों में मात खा चुका पाकिस्तान इस बार नए तरीके से अपने नापाक इरादों में कामयाब होना चाहता हैं। तभी तो पत्थरबाजों को ट्रक भर-भर कर पत्थर पाकिस्तान से भेजा जा रहा हैं और रैलियों और प्रदर्शनों में पाकिस्तान के झंडे लहराने और पाकिस्तान समर्थित नारे लगाए जाने, आम बात हैं। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि-"चुनाव करवाना कि-"जनता पाकिस्तान में रहना चाहती हैं या हिन्दुस्तान में??", खतरे से खाली नहीं हैं। कश्मीरी जनता भ्रमित हैं, आतंकित हैं, डरी हुई हैं। पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों और स्थानीय कश्मीरी कट्टरपंथियों के दबाव-धमकी में वो क्या फैसला सुना दे, कुछ कह नहीं सकते। तभी तो पाकिस्तान बारम्बार कश्मीर में इस सम्बन्ध में चुनाव चाहता हैं। ताकि चुनाव में गड़बड़ी फैला कर वो फैसला (चुनावी नतीजें) बदल दे। और ये संभव नहीं हैं, भला अपने देश के नागरिको से ही ये पूछना कि उन्हें पाकिस्तान रहना हैं या नहीं, निहायत ही बेवकूफी-बेतुका हैं।
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मेरे विचार से कश्मीर समस्या का एकमात्र समाधान यही हैं कि-"राज्य और केंद्र की दोनों सरकारें एकजुट होकर, आपसी मतभेदों को भुला कर, बिना गेंद एक-दुसरे के पाले में डाले, तुरंत इस समस्या से सख्ती से निपटें। सख्ती भूलकर भी आमजन के विरुद्ध नहीं होनी चाहिए, वरना वे और भी भड़क जायेंगे। सख्ती आमजनों की भीड़ में शामिल असामाजिक तत्वों के विरुद्ध होनी चाहिए। सख्ती कट्टरपंथियों के विरुद्ध होनी चाहिए। सख्ती पाकिस्तान के झंडे लहराने और पाकिस्तान समर्थित नारे लगाने वालो के विरुद्ध होनी चाहिए। इतना ही नहीं, अगर दोनों सरकारे एक ना होतो, कश्मीर की सरकार को तत्काल प्रभाव से भंग करते हुए वहाँ राष्ट्रपति शासन लगा देना चाहिए। देश के नेताओं में इच्छा शक्ति का नितांत अभाव हैं। इसलिए, क्योंकि राष्ट्रपति सेना के तीनो अंगो (जलसेना, थलसेना, और वायुसेना) का उच्चाधिकारी होता हैं इसलिए सीधे सैन्य कार्रवाही का हुक्म दिया जाना चाहिए। जब पाकिस्तान के लिए कोई नियम नहीं हैं तो भारत के लिए ही नियम क्यों???? पुरे कश्मीर को भारत में मिला लेना चाहिए। माना सीधे युद्ध में बहुत जान-माल का नुकसान होगा, लेकिन रोज़-रोज़ के क्लेश-तनाव से तो मुक्ति मिलेंगी।
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सिख कश्मीर में थे, हैं, और भविष्य में भी रहेंगे। सिख जिंदाबाद, वाहेगुरु जिंदाबाद। सिखों ने हमेशा हिन्दुओं की रक्षा की हैं, अब अगर जरुरत पड़ी तो सिखों की रक्षा हिन्दू करेंगे।
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आप अभी भी चुपचाप-शान्ति से बैठे हैं। क्या ये सब जानकर भी अब आपका खून नहीं खौल रहा हैं????
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धन्यवाद।
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Monday, August 16, 2010
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ये कैसा नारी सशक्तिकर्ण???
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आजकल हर ओर नारी सशक्तिकर्ण की बयार बह रही हैं। जिधर नज़र दौडाओ वही नारी सशक्तिकर्ण की बातें नज़र आ रही हैं। आज नारी सशक्तिकर्ण का इतना राग अलापा जा रहा हैं कि-"पुरुषो को हीन भावना महसूस होने लगी हैं।" सब और नारी की ही बात हो रही हैं, बेचारे पुरुषो को कोई पूछ ही नहीं रहा हैं। मानो, पुरुष वर्ग को कोई समस्या ही ना हो, सारी समस्याएं स्त्रियों की ही हो। ये भी भला कोई बात हुयी।
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तलाक के मामले भी शायद इन्ही कारणों से बढ़ रहे हैं। पहले पति-पत्नी में तनाव होने पर एक पक्ष (आमतौर पर पत्नी) शांत बना रहता था, जिससे तनाव नहीं बढ़ता था ओर वैवाहिक जीवन बचा रहता था। लेकिन, नारी अब सशक्त तो हुयी हैं, लेकिन शायद नकारात्मक रूप से। तभी तो सहनशक्ति समाप्त हो चली हैं, लड़ने को तो मानो तैयार ही रहती हो। मैं नारी जाति को सुना नहीं रहा हूँ, मैं तो उनकी एक कमी की तरफ ध्यान दिला रहा हूँ। पति कामधंधे के तनाव के साथ-साथ आर्थिक-सामाजिक रूप से भी परेशान रहता हैं। उनके गुस्से को शांत भाव से पी लेना चाहिए, बजाय लड़ने या बहस करने के।
(जहां पति-पत्नी दोनों कामकाजी हो वहाँ और बात हैं। क्योंकि उस स्थिति में दोनों ही तनावग्रस्त होते हैं, और दोनों को ही संयम, शांति से काम लेना होता हैं। यहाँ मुद्दा कामकाजी पति और घरेलु पत्नी का हैं।)
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मैं ये नहीं कह रहा हूँ कि--"औरत को पति की मार सहनी चाहिए या पति को परमेश्वर समान मानते हुए उनके जुल्मो को सहना चाहिए।" मैं तो सिर्फ सूझबूझ, ठन्डे दिमाग से काम लेने का सुझाव देना चाह रहा हूँ। पति को गुस्से के वक़्त समझाने की बजाय थोड़ी देर बाद मौके की नजाकत और माहौल के शांत होने के बाद समझाना चाहिए।
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आज नारी सशक्तिकरण के नाम पर औरत हर क्षेत्र में दाखिल हो चुकी हैं। जो क्षेत्र कल तक पुरुषो के वर्चस्व वाले क्षेत्र माने जाते थे, वहाँ अब औरतो ने पैठ बना ली हैं। जैसे कि-ड्राइवर, टेक्सी ड्राइवर, फायर ब्रिगेड में, खेतो में ट्रक्टर से जुताई करना, युद्ध क्षेत्र, लड़ाकू विमान चलाना, कल-कारखानों में मजदूरी व मनेज़री का कार्य करना, और तमाम खेलकूद आदि। ये बहुत अच्छी बात हैं, और मैं औरतो की इस तरक्की से खुश हूँ और समस्त नारी-जाति को बधाई भी देता हूँ।
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लेकिन ये भी एक दुर्भाग्य हैं कि-"नारी सशक्तिकरण, नारी को मज़बूत करने के नाम पर परिवार तोड़ा जा रहा हैं। समाज की सबसे छोटी, शुरुवाती, और सबसे मज़बूत इकाई--परिवार--को तोड़ा जा रहा हैं। जोकि अंतत: सामाजिक बिखराव के रूप में सामने आयेगा। मेरी महिलाओं से एक ही दरख्वास्त, अपील हैं कि-"आप चाहे जितनी भी मज़बूत हो जाइए, लेकिन परिवार की नींव को ना दरकने दीजिये। अपनी सूझ-बूझ से, और ठन्डे दिमाग से काम लेते हुए, परिवार को एकजुट रखिये। कोई भी वाद-विवाद होने पर पति को गुस्से के वक़्त समझाने की बजाय थोड़ी देर बाद मौके की नजाकत और माहौल के शांत होने के बाद समझाइये। अपने सशक्त होने के अहम् को त्यागिये, और अपने होश संभालते हुए परिवार और अंतत: समाज को टूटने से बचाइये।"
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मुझे एक बात समझ में नहीं आती हैं कि--
औरत तलाक क्यों लेती हैं???
औरत तलाक लेते वक़्त पति से भत्ता क्यों मांगती हैं???
शादी से पहले भी तो माता-पिता के पास रहती थी, अब क्यों नहीं रह सकती????
अगर माता-पिता नहीं हैं तो भाइयों के पास क्यों नहीं रहती?????
इतना ही हैं तो खुद कमाकर क्यों नहीं खाती??
खुद कमाकर किराए का घर क्यों नहीं लेती???
एक तो पति को तलाक देकर छोडो और फिर उसके पैसो (भत्तो) पर ऐश क्यों????
आदि-आदि।
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विशेष = मैंने ये ब्लॉग पोस्ट महिलायों के खिलाफ नहीं लिखी हैं और नाही मैंने स्त्रियों की तरक्की से जलभुन कर ये सब लिखा हैं। मैंने ये सब उन मामलो को लेकर लिखा हैं जहां कई औरतो ने अहंकारवश, अकड़ में, अहंभाव से प्रेरित होकर तलाक लिया हैं और पति को और दबाने के लिए उसकी कमाई पर भी गिद्ध दृष्टि गडाते हुए अदालत से गुज़ारा-भत्ता मांग लिया। ये मेरे मन का दर्द हैं, मैं तलाक के बढ़ते मामलो और समाज में टूटकर बिखरते परिवारों को देखकर बेहद दुखी-चिंतित हूँ। ये ब्लॉग पोस्ट मैंने सिर्फ उन दपत्तियों के लिए लिखा हैं जहां सिर्फ पति ही कामकाजी हैं। पति को समझते हुए पत्नी को संयम-धैर्य से काम लेना चाहिए। जहां दोनों पति-पत्नी कामकाजी हो वहाँ होनो की बराबर ज़िम्मेदारी बनती हैं।
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धन्यवाद।
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Monday, August 09, 2010
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नदियाँ जोड़ें, देश बचाएं।
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आपको शायद याद होगा कि-"केंद्र की पूर्ववर्ती सरकार ने देश भर की सभी नदियों को जोड़ने का अरबो रुपयों का एक मास्टर प्लान बनाया था।" और शायद ये भी एक तथ्य आपको मालूम होगा कि-"मौजूदा केंद्र सरकार ने उस प्रस्ताव को राजनितिक कारणों से ठण्डे बस्ते में डाला हुआ हैं।"
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देश भर में सिंचाई के लिए और पीने के लिए (पेयजल) पानी की जबरदस्त किल्लत हैं, लेकिन ये किल्लत विशेष रूप से समूचे उत्तर भारत में ही हैं। दक्षिण भारत में अलग नदियाँ हैं और पूर्वी राज्यों में पानी की कोई ख़ास किल्लत नहीं हैं। इसी किल्लत, इसी पानी की कमी को दूर करने के लिए पूर्ववर्ती केंद्र सरकार ने देश की सभी नदियों को जोड़ने का अरबो रुपयों का मास्टर प्लान बनाया था। लेकिन ये देश का दुर्भाग्य हैं कि-"मौजूदा सरकार ने इस अहम् जलीय मुद्दे को ठण्डे बस्ते में डाला हुआ हैं।"
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उत्तर भारत में पानी का मुख्य और एकमात्र स्त्रोत पहाडो और हिमालय से आने वाला जल ही हैं। जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश में तो पानी पहाडो और हिमालय से आ जाता हैं। कई नदियाँ तो चीन से भी इन दोनों राज्यों में प्रवेश करती हैं। लेकिन राज़स्थान, हरियाणा, पंजाब, उत्तरप्रदेश, राजधानी दिल्ली, मध्यप्रदेश, आदि उत्तरी राज्यों में पानी हिमाचल और जम्मू-कश्मीर होकर ही आता हैं। लेकिन, सभी राज्यों में सबसे ज्यादा पानी की किल्लत राजस्थान में हैं। सब राज्यों से बड़ा और सब राज्यों से सबसे ज्यादा सूखा राज्य राज़स्थान ही हैं। सबसे ज्यादा सूखाग्रस्त और अकालग्रस्त और पानी का सबसे ज्यादा जरूरतमंद राज्य राज़स्थान हैं।
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यहाँ पानी सीधे नहीं आता हैं। राजधानी दिल्ली, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, पंजाब, और हरियाणा जैसे राज्य सीधे हिमाचल प्रदेश से जुड़े हुए हैं। लेकिन राजस्थान का पानी हिमाचल प्रदेश से वाया पंजाब और हरियाणा होकर आता हैं, इसलिए राज़स्थान को पानी कम मिल रहा हैं क्योंकि पंजाब और हरियाणा राज्य के हिस्से का पानी पी गए हैं यानी दे नहीं रहे हैं। पंजाब को कुछ कहो तो वो ये मुद्दा ये कहकर हरियाणा के ऊपर ड़ाल देता हैं कि-"हरियाणा पंजाब को पूरा पानी नहीं दे रहा हैं।" और जब हरियाणा को कुछ कहे तो वो गेंद केंद्र सरकार और हिमाचल प्रदेश के पाले में ड़ाल देता हैं। यानी राज़स्थान फिलहाल सूखा और अकाल के साथ-साथ पानी की किल्लत की दोहरी मार झेल रहा हैं।
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आप सभी पाठको की जानकारी के लिए बता दूं कि-"राजस्थान सरकार ने इस सम्बन्ध में काफी सालो से सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार की कई समितियों में विभिन्न याचिकाएं दाखिल कर रखी हैं। कोर्ट का तो आप जानते ही कितनी जल्दी फैसला आता हैं और केंद्र सरकार किसी भी राज्य पंजाब और राजस्थान के पक्ष में निर्णय नहीं ले पा रही हैं।"
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सूखा और अकाल तो दूर कई राज्यों में कमोबेश हर साल बाढ़ भी आती हैं। बिहार तो हर साल बाढ़ की चपेट में आ ही जाता हैं। कभी कोई नदी उफन उठती हैं तो कभी कोई, यानी हर साल किसी ना किसी नदी में बाढ़ आ ही जाती हैं। जान का नुकसान चाहे ना होता हो लेकिन संपत्ति और माल का नुकसान तो होता ही हैं। लाखो लोग बेघरबार हो जाते हैं, उनके रहने-सहने, ठहराव, पुर्नवास के लिए सरकार के करोडो रूपये स्वाहा हो जाते हैं। साथ ही जनजीवन अस्त-व्यस्त हो जाता हैं। वरना जितने समय बाढ़ के कारण ये लोग कोई कामधंधा नहीं कर पाते अगर ये समय बिना बाढ़ के हो तो लाखो-करोडो रूपये सरकार के खाते में टैक्स व अन्य मदों (राहत के कार्यो में जाया ना हो) में आ सकते हैं।
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इसी बाढ़ और अकाल-सूखे की समस्या के समाधान के लिए सभी नदियों को जोड़ा जाना था, ताकि जहां पानी ज्यादा हो वहाँ पानी का स्तर कम किया जा सके और जहां पानी की गंभीर कमी हो वहाँ इसकी पूर्ति की जा सके। लेकिन राजनीति कहलो या इच्छा-शक्ति की कमी, राज़स्थान सूखे, अकाल, और प्यास से तड़प रहा हैं और बिहार बाढ़ में डूब कर मर रहा हैं। सभी उत्तरी राज्यों को पानी सीधे पडोसी राज्य से मिल रहा हैं। लेकिन राज़स्थान को पानी दो-तीन राज्यों से होकर (गुजर कर) मिल रहा हैं, राजस्थान देश का सबसे ज्यादा सूखा और अकालग्रस्त राज्य हैं। उसे पानी की तत्काल आवश्यकता हैं। लेकिन पंजाब राज़स्थान का पानी रोके बैठा हैं, पंजाब झूठ बोलकर, बेबुनियाद बात (हरियाणा पर आरोप लगाना) कर रहा हैं। राज्य सरकार ने कई सालो से, काफी सालो से केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट में विभिन्न याचिकाएं दायर कर रखी हैं। लेकिन न्याय नहीं मिला। कब मिलेगा, कैसे मिलेगा कुछ कह नहीं सकते।
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इसलिए अब वक़्त आ गया हैं = देश भर की सभी नदियों को तत्काल जोड़ा जाए और पानी पर राज्यों की बजाय केंद्र का हक़-अधिकार दिया जाए। राज्यों की आपसी लड़ाई, मतभेदों को समाप्त करने का यही एक कारगर और सफल उपाय हैं कि-"सभी नदियों को जोड़ दिया जाए और पानी पर राज्यों का हक़/अधिकार समाप्त करते हुए सभी ताकत केंद्र सरकार को दे दी जाए।"
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एक अति-महत्तवपूर्ण सूचना = सभी पाठको को बता देना चाहता हूँ कि-"मौजूदा सरकार ने सत्ता में आने के बाद इस दिशा में सकारात्मक कदम उठाया (या तैयारी) था, लेकिन तत्कालीन सत्ताधारी दल और मौजूदा विपक्षियों ने ये कहकर उपहास / मज़ाक उड़ाया कि-"तुम कौनसा नया काम कर रहे हो???, तुम कर क्या रहे हो??, हमारा ही कार्य तुम कर रहे हो, ताकि जनता तुम्हे इस कार्य का श्रेय दे।" हम आम जनता के द्वार पर जायेंगे और उन्हें बता देंगे कि-"तुमने कुछ नहीं किया हैं, ये प्रोजेक्ट तो हमारा बनाया हुआ, हमारा फाइनल किया हुआ हैं। इस कार्य का श्रेय हमारा हैं और हम ही लेंगे।" बस उसके बाद मौजूदा सरकार ने इस अहम् मुद्दे को ठण्डे बस्ते में ड़ाल दिया, जो दुर्भाग्य से अब तक ठण्डे बस्ते में ही पडा हैं।"
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धन्यवाद।
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Monday, August 02, 2010
ये किसी सौतन से कम नहीं।
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आज तक आपने जितनी भी सौतनों के बारे में सुना होगा, उन सभी सौतनो से ज्यादा खतरनाक और घातक सौतन हैं ये कामधंधा, नौकरी। हैरान ना होइए मैं सौ प्रतिशत सच, सोलह आने सत्य कह रहा हूँ। आजकल की भागती-दौड़ती, व्यस्त और तेजरफ्तार ज़िन्दगी में सब और धन का ही बोलबाला हैं। जिसे देखो वो पैसे के पीछे भाग रहा हैं। मानो, पैसा ही सब कुछ हो, पैसा ही पानी और प्राणवायु की तरह महत्तवपूर्ण हो।
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नौकरी, कामधंधा, व्यापार आदि अब सौतन का रूप धरते जा रहे हैं। एक ऐसी सौतन जिससे कमोबेश हर औरत जूझ रही हैं। हर व्यक्ति अपनी बीवी और बच्चो से दूर होता जा रहा हैं। जब देखो पैसा, पैसा, और पैसा की ही रट लगाए रखता हैं व्यक्ति। चाहे कोई नौकरी करता हो या बिजनेस करता हो, या दुकानदारी या कामधंधा करता हो, सब इतने व्यस्त हो चुके हैं की उन्हें अपने परिवार का ही ख्याल नहीं रहा हैं। नज़र बस अपनी ड्यूटी पर ही लगी रहती हैं। परिवार की तरफ से तो नज़र ही फेर ली गयी हैं।
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जिन परिवारों में पति के साथ-साथ पत्नी भी नौकरी करती हो वहाँ तो हालात विकट हो जाते हैं। वहाँ बच्चो का और बूढ़े/उम्रदराज माता-पिता का ख्याल ईश्वर ही रखता हैं। सुबह दोनों पति-पत्नी दफ्तर के लिए तैयार होने और बच्चो को स्कूल भेजने (यदि स्कूल जाने लायक हो तो) में ही व्यस्त हो जाते हैं और फिर शाम को (अक्सर देर रात) को घर आने के बाद खाना-वाना खा-पीकर सो जाते हैं। माँ-बाप के लिए तो बस दुआ-सलाम ही शेष रह जाती हैं।
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खैर बात करते हैं, जहां सिर्फ पति या पुरुष नौकरी करता हो। पुरुष अब काफी व्यस्त हो गया हैं, जल्दी पैसा कमाने की धुन, जल्द से जल्द अमीर बनने की ललक, और बाज़ार में मौजूद गला-काटूँ कम्पीटीशन ने व्यक्ति को उलझा दिया हैं। जब देखो काम-काम-काम, पैसा-पैसा-पैसा, बस यही एक आदमी की ज़िन्दगी और ज़ीने का मकसद रह गया हैं। परिवार में बीवी तो बस घर लायक ही हैं जो खाना बना दे, कपडे धो/प्रेस करदे, आदि-आदि। बच्चे सिर-हाथ-पैर दबा दे, या कोई छोटे-मोटे काम करदे आदि-आदि।
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अब ये नौकरी, कामधंधा क्या किसी सौतन से कम हैं?? माना कामकाज करना, नौकरी करनी जरुरी हैं लेकिन इतनी भी क्या जरुरी कि-"व्यक्ति अपने परिवार, अपने बीवी-बच्चो को ही भुला दे??" चलिए जो भी हो, अब तो स्थिति ये हो गयी हैं कि-"वर्किंग डेज़ के साथ-साथ अब व्यक्ति ओवर-टाइम भी देने लगा हैं, ताकि थोड़ा ज्यादा धन कमा सके। इसके साथ-साथ अब व्यक्ति छुट्टी के दिन भी व्यस्त रहने लगा हैं। कभी दफ्तर के तनाव के कारण छुट्टी का दिन बेकार हो जाता हैं तो कभी दफ्तर का कार्य पुरुष छुट्टी के दिन घर ले आता हैं। छुट्टी के दिन भी एन्जॉय करने कि बजाय चिंताग्रस्त पति/पुरुष अगले दिन की रूपरेखा बनाने लगता हैं। जिससे पुरे परिवार का मज़ा किरकिरा हो जाता हैं।
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बच्चे भले ही अपने दोस्तों के साथ या पड़ोस/गली के बच्चो से मिल ले, खेल ले लेकिन पत्नी...??? अगर पत्नी किट्टी-पार्टी या पड़ोसनो से गप्पे लड़ा ले तो भी कब तक और कितना??? पत्नी और बच्चो को पति=पापा का तो साथ नहीं मिला। परिवार पति/पुरुष के बिना अधूरा होता हैं, पड़ोस के लोग, पडोसने, गली-मोहल्लो के बच्चे परिवार का हिस्सा कदापि नहीं हो सकते। सब कुछ जरुरी हैं, पैसा कमाना जरूरी हैं, नौकरी-कामधंधा सब जरुरी हैं, लेकिन परिवार भी जरुरी हैं। आपके बीवी-बच्चो को आपकी आवश्यकता हैंउन्हें समय दीजिये, उनके साथ वक़्त गुज़ारिये। उनके साथ-साथ आपको भी सुकून मिलेगा, सारी चिंताएं, सारी टेंशन, सब दूर भाग जायेंगी। चाहे कितना भी जरुरी क्यों ना हो, चाहे कितनी भी तनख्वाह क्यों ना हो, छुट्टी का दिन परिवार को दीजिये। बाकी दिन / कार्यदिवस को चाहे हाड़तोड़ मेहनत कीजिये, खूब खून-पसीना बहाइये, लंबा ओवरटाइम कीजिये, लेकिन छुट्टी के दिन परिवार के साथ रहिये।
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तो आप कबसे छुट्टियों का परिवार के लिए उपयोग करेंगे और इस सौतन से छुटकारा दिलाएंगे???
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Monday, July 26, 2010
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प्रोत्साहित किया क्या??
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ना जाने क्यों लोग किसी को प्रोत्साहित करने को अपनी बेईज्ज़ती समझते हैं??? पता नहीं लोगो की क्या फितरत हैं कि-"प्रोत्साहित करने में तो सबसे पीछे रहते हैं, लेकिन हतोत्साहित करने को सबसे आगे रहते हैं??? मानो हतोत्साहित यूनियन के प्रधान हो।" मैं हमेशा अच्छे कार्य करने वालो को, नेकी या ईमानदारी या सच्चाई के रास्ते पर चलने वाले को यथासंभव प्रोत्साहित करता हूँ। अगर किसी कारणवश, या मजबूरीवश किसी को प्रोत्साहित नहीं भी कर पाता हूँ तो कम से कम हतोत्साहित तो कदापि नहीं करता।
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कुछ उदाहरण =
1. जब कोई कर/टैक्स की चोरी नहीं करता हैं, तो आप उसे प्रोत्साहित करने की बजाय हतोत्साहित करते हैं। इतना ही नहीं आप उसे करचोरी करने के कई उपाय भी बता डालते हैं।
2. जब कोई सावधानीपूर्वक, नियमपूर्वक, निर्धारित रफ़्तार से वाहन (दुपहिया, तिपहिया, या चौपहिया) चलाता हैं, तो आप उसे प्रोत्साहित करने की बजाय अनगिनत गालियाँ निकालते हैं। जैसे--कितना धीरे चला रहा हैं, चलाना ही नहीं आता, सड़क जाम करके रख दी, गाडी थोड़ी तेज़ चला, कछुआ चाल से चल रहा हैं, आदि-आदि।
3. जब कोई सड़क के बीचो-बीच घायल-चोटिल पडा हो और कोई भलामानस उसे संभाले तो आप मदद करने की बजाय उसे हतोत्साहित करते हैं। ये कहकर--छोड़ ना क्यों पंगे में पड़ रहा हैं??, क्यों पुलिस के लफड़े में आने पर तुला हैं??, ये रोज़-रोज़ का काम हैं तू चल एम्बुलेंस आ जायेगी, आदि-आदि।
4. जब कोई बिजली की चोरी नहीं करता हैं तो आप उसे प्रोत्साहित करने की बजाय हतोत्साहित करते हैं। ये कहकर--बिजली महेंगी हो गयी हैं क्यों पूरा बिल भरते हो??, हमें देखो हम ऐश कर रहे हैं, या डरो मत बिजली निगम के अधिकारियों से मेरी सेटिंग हैं कोई कुछ नहीं बोलेगा, या कुण्डी मैं ला देता हूँ या लगा देता हूँ, आदि-आदि।
5. जब कोई पानी की वेस्टेज करता हैं तो भी आप उसको पानी की कीमत बताने की बजाय उसे प्रोत्साहित करते हैं। जैसे-वाह गाडी चमक गयी हैं, आप पुरानी गाडी को भी नयी बताने लगेंगे, बढ़िया हैं सड़क की मिटटी दूकान में नहीं घुसेंगी, या पानी की कोई कमी नहीं हैं करो जैसे मर्जी इस्तेमाल, आदि-आदि।
यानी प्रोत्साहन भी नकारात्मक बात को। प्रोत्साहन सकारात्मकता को ही देना चाहिए। याद रखिये--अगर आप नकारात्मकता को प्रोत्साहित कर रहे हैं तो आप सीधे-सीधे अच्छाई को हतोत्साहित कर रहे हैं।
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याद रखिये--बूँद-बूँद से ही घड़ा भरता हैं। उसी तरह एक-एक व्यक्ति के सम्मिलित प्रयास से ही मकसद-लक्ष्य हल हो सकते हैं। अगर आप किसी को उसकी सच्चाई, ईमानदारी, नेकी या किसी अन्य अच्छाई-भलाई के लिए प्रोत्साहित नहीं कर सकते तो कम से कम उन्हें हतोत्साहित करके उनका हौसला तो मत डिगाइए।
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तो प्रोत्साहित किया क्या??
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धन्यवाद।
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CHANDER KUMAR SONI,
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RAJASTHAN, INDIA.
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