मेरे इस ब्लॉग का उद्देश्य =

मेरे इस ब्लॉग का प्रमुख उद्देश्य सकारात्मकता को बढ़ावा देना हैं। मैं चाहे जिस मर्ज़ी मुद्दे पर लिखू, उसमे कही ना कही-कोई ना कोई सकारात्मक पहलु अवश्य होता हैं। चाहे वह स्थानीय मुद्दा हो या राष्ट्रीय मुद्दा, सरकारी मुद्दा हो या निजी मुद्दा, सामाजिक मुद्दा हो या व्यक्तिगत मुद्दा। चाहे जो भी-जैसा भी मुद्दा हो, हर बात में सकारात्मकता का पुट जरूर होता हैं। मेरे इस ब्लॉग में आपको कही भी नकारात्मक बात-भाव खोजने पर भी नहीं मिलेगा। चाहे वह शोषण हो या अत्याचार, भ्रष्टाचार-रिश्वतखोरी हो या अन्याय, कोई भी समस्या-परेशानी हो। मेरे इस ब्लॉग में हर बात-चीज़ का विश्लेषण-हल पूर्णरूपेण सकारात्मकता के साथ निकाला गया हैं। निष्पक्षता, सच्चाई, और ईमानदारी, मेरे इस ब्लॉग की खासियत हैं। बिना डर के, निसंकोच भाव से, खरी बात कही (लिखी) मिलेगी आपको मेरे इस ब्लॉग में। कोई भी-एक भी ऐसा मुद्दा नहीं हैं, जो मैंने ना उठाये हो। मैंने हरेक मुद्दे को, हर तरह के, हर किस्म के मुद्दों को उठाने का हर संभव प्रयास किया हैं। सकारात्मक ढंग से अभी तक हर तरह के मुद्दे मैंने उठाये हैं। जो भी हो-जैसा भी हो-जितना भी हो, सिर्फ सकारात्मक ढंग से ही अपनी बात कहना मेरे इस ब्लॉग की विशेषता हैं।
किसी को सुनाने या भावनाओं को ठेस पहुंचाने के लिए मैंने यह ब्लॉग लेखन-शुरू नहीं किया हैं। मैं अपने इस ब्लॉग के माध्यम से पीडितो की-शोषितों की-दीन दुखियों की आवाज़ पूर्ण-रूपेण सकारात्मकता के साथ प्रभावी ढंग से उठाना (बुलंद करना) चाहता हूँ। जिनकी कोई नहीं सुनता, जिन्हें कोई नहीं समझता, जो समाज की मुख्यधारा में शामिल नहीं हैं, जो अकेलेपन-एकाकीपन से झूझते हैं, रोते-कल्पते हुए आंसू बहाते हैं, उन्हें मैं इस ब्लॉग के माध्यम से सकारात्मक मंच मुहैया कराना चाहता हूँ। मैं अपने इस ब्लॉग के माध्यम से उनकी बातों को, उनकी समस्याओं को, उनकी भावनाओं को, उनके ज़ज्बातों को, उनकी तकलीफों को सकारात्मक ढंग से, दुनिया के सामने पेश करना चाहता हूँ।
मेरे इस ब्लॉग का एकमात्र उद्देश्य, एक मात्र लक्ष्य, और एक मात्र आधार सिर्फ और सिर्फ सकारात्मकता ही हैं। हर चीज़-बात-मुद्दे में सकारात्मकता ही हैं, नकारात्मकता का तो कही नामोनिशान भी नहीं हैं। इसीलिए मेरे इस ब्लॉग की पंचलाइन (टैगलाइन) ही हैं = "एक सशक्त-कदम सकारात्मकता की ओर..............." क्यूँ हैं ना??, अगर नहीं पता तो कृपया ज़रा नीचे ब्लॉग पढ़िए, ज्वाइन कीजिये, और कमेन्ट जरूर कीजिये, ताकि मुझे मेरी मेहनत-काम की रिपोर्ट मिल सके। मेरे ब्लॉग पर आने के लिए आप सभी पाठको को बहुत-बहुत हार्दिक धन्यवाद, कृपया अपने दोस्तों व अन्यो को भी इस सकारात्मकता से भरे ब्लॉग के बारे में अवश्य बताये। पुन: धन्यवाद।

Monday, August 30, 2010

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तेज़ाब का इस्तेमाल क्यों????

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आजकल बड़े-मेट्रो शहरों के साथ-साथ देश भर के सभी छोटे-बड़े शहरों में असामाजिक-आपराधिक तत्वों द्वारा तेज़ाब का धड़ल्ले से इस्तेमाल किया जा रहा हैं। अभी तक सुनारों और स्कूल-कॉलेजो की रसायन-शालाओं की शान रही तेज़ाब अब आम लोगो की ज़िन्दगी से खिलवाड़ करने का ज़रिया बन कर रह गयी हैं।

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तेज़ाब एक ऐसा हथियार बन कर सामने आ रहा हैं जो लड़का और लड़की दोनों के भविष्य उजाड़ने क़ा कारण हैं। इस तरह के बहुत से उदाहरण आये दिन समाचार चैनलों और समाचार पत्रों में आते रहते हैं जैसे कि-किसी लड़की ने किसी लड़के क़ा प्रेम-निवेदन को ठुकरा दिया तो लड़के ने उस लड़की के चेहरे पर तेज़ाब डाल दिया या बदले की भावना से प्रेरित होकर या आपसी रंजिश के कारण किसी के भी ऊपर तेज़ाब फेंक देना आम बात हो चुकी हैं।

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वैसे तो तेज़ाब क़ा नाजायज़-आपराधिक इस्तेमाल लडको द्वारा लड़कियों पर किया जाता रहा हैं, लेकिन इन दिनों लड़कियों द्वारा भी लडको पर तेज़ाब के इस्तेमाल की खबरे यदा-कदा आ ही जाती हैं। खैर मुद्दा ये नहीं हैं कि तेज़ाब क़ा इस्तेमाल कौन और किसपर करता हैं??? मुद्दा ये हैं कि-तेज़ाब क़ा इस्तेमाल क्यों किया जाता हैं???? लड़की की सारी ज़िन्दगी ही तबाह हो जाती हैं। ना वो कही आने-जाने योग्य रहती हैं ना कही पढ़ाई-लिखाई करने या काम-धंधा करने योग्य रहती हैं। शादी तो लगभग नामुमकिन हो जाती हैं। कोई भी लड़की चाहे कितनी भी बोल्ड-आधुनिक, खुले आचार-विचारों की क्यों ना हो, तेज़ाब के हादसे के बाद ज़िंदा लाश समान रह जाती हैं।

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कोई चाहे कितना भी अमीर क्यों ना हो तेज़ाब गिरने से झुलसे चेहरे को पुन: पुरानी अवस्था में नहीं ला सकता। आज क़ा विज्ञान चाहे कितना भी उन्नत होने क़ा दावा क्यूँ ना करे, तेज़ाब से हुए (बिगड़े) चेहरे को ठीक नहीं कर सकता। ऐसा नहीं हैं तेज़ाब गिरने से सिर्फ लड़की की ही ज़िन्दगी बर्बाद होती हो, तेज़ाब डालने वाले (लड़के) की भी ज़िन्दगी नरक बन जाती हैं। उसे कोई पांच-सात साल नहीं बल्कि सीधे उम्रकैद की सज़ा भोगनी पड़ती हैं। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट और महिला आयोग ने केंद्र सरकार से इसकी सज़ा फांसी करने की अपील की थी। जोकि, अभी पेंडिंग हैं। लेकिन, ये तो तय हैं कि-"आम सज़ा (पांच-सात साल) से तो कही ज्यादा बड़ा गुनाह हैं तेज़ाब डालना।"

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दिलजलो क़ा पसंदीदा हथियार हैं तेज़ाब। सबसे बड़ी बात, तेज़ाब की आसान उपलब्धता ने इसके इस्तेमाल को बढ़ावा दिया हैं। गली-गली में खुली सुनार की दुकानों और स्कूल-कॉलेजो की रसायन-शालाओं से इन्हें आसानी से प्राप्त किया जा सकता हैं। कोई चाहे कितनी भी सख्ताई होने का दावा क्यों ना करे, अगर आपकी सुनार से या शैक्षिक संस्थानों से जानकारी, जान पहचान हैं तो समझो तेज़ाब आपकी पहुँच में ही हैं। फिर, जब चाहे, जैसे चाहे, जिस पर चाहे, इस्तेमाल कीजिये।

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ऐसा नहीं हैं कि-"तेज़ाब का चलन सिर्फ भारत में ही होता हो, तेज़ाब का धड़ल्ले से इस्तेमाल पाकिस्तान, बांग्लादेश, ईरान, ईराक, और सउदी अरब में भी होता हैं।" ये महज़ एक संजोग ही हैं कि-"तेज़ाब का इस्तेमाल मुस्लिम बहुल देशो (मलेशिया क़ो छोड़कर) में ही बहुतायत में होता हैं। भारत के मामले में इसे संगति का असर ही माना जा सकता हैं, वरना भारत कोई मुस्लिम देश तो हैं नहीं।"

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मैं तेज़ाब के बढ़ते इस्तेमाल क़ो लेकर चिंतित हूँ। ना जाने कितने लड़के तेज़ाब फेंक कर जेल की सलाखों के पीछे पहुँच गए हैं और ना जाने कितनी लड़कियों की ज़िन्दगी तेज़ाब से झुलसकर बर्बाद हो चुकी हैं। क्योंकि उस वक़्त अपराधी (चाहे लड़का हो या लड़की) पर एक भूत-जूनून सवार रहता हैं, वो उस वक़्त आगे-पीछे, अच्छा-बुरा कुछ भी नहीं सोचता हैं इसलिए क़ानून चाहे कितना भी सख्त क्यों ना हो जाए, सुनार और शैक्षिक संस्थान चाहे जितना मर्ज़ी गोपनीयता-सख्ताई बरतले तेज़ाब के बढ़ते चलन क़ो सिर्फ और सिर्फ जागरूकता से ही कम (खत्म) किया जा सकता हैं।

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धन्यवाद।

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CHANDER KUMAR SONI,

L-5, MODEL TOWN, N.H.-15,

SRI GANGANAGAR-335001,

RAJASTHAN, INDIA.

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Monday, August 23, 2010

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सिख जिंदाबाद, वाहेगुरु जिंदाबाद।
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जम्मू-कश्मीर में आजकल जो कुछ भी हो रहा हैं, वो घोर निन्दनीये हैं। 1985 के बाद में आतंकवाद ने पाँव फैलाने शुरू किये और कश्मीर के हालात तेज़ी से बदलने लगे। हालात इतनी तेज़ी से बदले, आतंकवादियों का नेटवर्क इतनी तेज़ी से फैला कि सरकार कुछ भी नहीं कर सकी। ना केंद्र सरकार और नाही राज्य सरकार। चाहे जिसकी भी गलती हो, चाहे राज्य सरकार की गलती हो या केंद्र सरकार की, चाहे जवाहर लाल नेहरु या महात्मा गांधी की गलती हो या ना हो। फिलहाल, इतिहास और अन्य बातों को एक तरफ करते हुए केंद्र और राज्य की दोनों सरकारों को संयुक्त रूप से तत्काल कड़ी कार्रवाही करनी चाहिए।

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सोचिये, क्या हासिल हो जाएगा अगर नेहरु या गांधी गलत साबित हो जायेंगे और क्या बिगड़ जाएगा अगर नेहरु या गांधी निर्दोष, बेगुनाह, सही निकल जायेंगे???? राज्य सरकार के गलत साबित होने या केंद्र सरकार के गलत साबित होने से क्या होगा??? कुछ नहीं होगा, उलटे दोनों सरकारे आमने-सामने आ जायेगी या गेंद एक-दुसरे के पाले में डाले जाने की नयी कवायदें शुरू हो जायेगी। सभी पक्षों को विशेषकर आम जनता (सिर्फ कश्मीर की ही नहीं बल्कि पुरे देश की) को इतिहास और पुराने नेताओं-लोगो की गलतियों-भूलो की तरफ ध्यान देने की बजाय मौजूदा समस्याओं के तत्काल समाधान के सम्बन्ध में सोचना चाहिए।

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इन बीतें बीस वर्षों में कश्मीरी पंडितों को करीब-करीब बेदखल कर दिया गया हैं। आज के वक्त में, वर्तमान में कश्मीरी पंडित पूरी तरह से घाटी से पलायन कर चुकें हैं। बमुश्किल, तीस-पैंतीस प्रतिशत ही कश्मीरी पंडित शेष रह गए हैं। आतंकवाद की मार और दोनों (केंद्र व् राज्य) सरकारों की लगातार अनदेखी ने कश्मीरी पंडितों के बुलंद हौसलों को डिगा दिया हैं। दोहरी मार को आखिर कब तक झेलते???, कर गए पलायन। आज नाममात्र के कश्मीरी पंडित ही कश्मीर घाटी में शेष रह गए हैं। उनके केसर के बागानों, कश्मीर की शान दोनों शालीमार और निशात बागो, उनके घरो, दुकानों, खेतों, आदि सभी चीजों पर फिलहाल मुसलमानों का कब्ज़ा हैं। कश्मीरी पंडितों के पलायन के बाद घाटी का सौन्दर्य नष्ट हो गया हैं, अब कश्मीर भारत का स्वर्ग नहीं रहा हैं। ये बात मैं नहीं कह रहा हूँ, इस बात की पुष्टि कश्मीर जाकर, घूमकर लौटे देशी व विदेशी पर्यटकों-सैलानियों से भी की जा सकती हैं।

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कश्मीर से हिन्दू, कश्मीरी पंडितों के पलायन या यूँ कहिये मुसलमानों द्वारा भगाने के बाद अब बारी सिखों की हैं। कश्मीर घाटी को हिन्दू विहीन करने के बाद अब सिख विहीन करने की तैयारी चल रही हैं। पाकिस्तान के समर्थन वाले आतंकवादी और कश्मीर के कट्टरपंथी मुसलमान इस मुहीम में शामिल हैं। उन्हें घाटी पूरी तरह से मुस्लिम बहुल चाहिए। कश्मीर में बहुसंख्यक आबादी मुसलमानों की ही हैं, लेकिन वे कश्मीर घाटी को शत-प्रतिशत मुस्लिम बहुल बनाने में लगे हुए हैं। जहां रहने-बसने, खाने-पीने, कमाने-कामधंधे करने, आदि सभी चीज़ों पर वे (मुसलमान) अपना सार्वभौमिक हक़ समझने लगे हैं। और अन्य कोई धर्म, पंथ, जाति, समुदाय उन्हें कश्मीर में फूटी आँख नहीं सुहा रहा हैं। हिन्दू विहीन करने के बाद अब पूरी कश्मीर घाटी को सिख विहीन करने की साज़िश रची जा रही हैं।

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सिख हिन्दुओं के रक्षक थे, हैं, और रहेंगे। सिख पंथ का प्रादुर्भाव-उदय हिन्दुओं की रक्षा के सद-उद्देश्य से किया गया था। मुसलमान शासको, मुगलों से हिन्दुओं को बचाने के लिए सिख धर्म का जन्म हुआ था। समय-समय पर जब भी हिन्दुओं पर कोई विपत्ति आई हैं, तब तब सिखों ने अपने प्राणों की परवाह भी ना करते हुए हिन्दुओं के जान-माल-इज्ज़त की रक्षा की हैं। मुसलमान इस तथ्य को जानते हैं कि-"जब तक सिख कौम का कश्मीर घाटी में वजूद हैं, तब तक हिन्दुओं को पूरी तरह से बेदखल नहीं किया जा सकता हैं। जितने हिन्दू, कश्मीरी पंडित पलायन कर गए तो कर गए, लेकिन बाकी बचे हिन्दुओं को पलायन करने को मजबूर करने के लिए, सिखों को मार्ग से हटाना होगा।" इसी साज़िश के तहत वे मुसलमान अब सिखों को भी कश्मीर छोड़कर जाने को मजबूर कर रहे हैं। लूटपाट कर, मारपीट कर, डरा धमका कर, माँ-बहन-बेटी-बहुओं की इज्ज़त से खेलकर वे किसी भी तरह इन हिन्दुओं के रक्षको, सिखों को सम्पूर्ण कश्मीर घाटी से बाहर कर देना चाहते हैं। ताकि सिख कौम के साथ-साथ हिन्दुओं को भी कश्मीर से बाहर निकाल सके और सम्पूर्ण कश्मीर घाटी में मुस्लिमो का शासन हो।

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मकसद साफ़ हैं, पाकिस्तान और आतंकियों को इन सभी घटनाक्रमों से लाभ हैं। कश्मीर की आज़ादी के नाम पर हिन्दुस्तान के टुकड़े करने और कश्मीर यानी हिन्दुस्तान के ताज पर कब्ज़ा करना यानी पाकिस्तान बनाना। कई मर्तबा प्रत्यक्ष और परोक्ष युद्धों में मात खा चुका पाकिस्तान इस बार नए तरीके से अपने नापाक इरादों में कामयाब होना चाहता हैं। तभी तो पत्थरबाजों को ट्रक भर-भर कर पत्थर पाकिस्तान से भेजा जा रहा हैं और रैलियों और प्रदर्शनों में पाकिस्तान के झंडे लहराने और पाकिस्तान समर्थित नारे लगाए जाने, आम बात हैं। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि-"चुनाव करवाना कि-"जनता पाकिस्तान में रहना चाहती हैं या हिन्दुस्तान में??", खतरे से खाली नहीं हैं। कश्मीरी जनता भ्रमित हैं, आतंकित हैं, डरी हुई हैं। पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों और स्थानीय कश्मीरी कट्टरपंथियों के दबाव-धमकी में वो क्या फैसला सुना दे, कुछ कह नहीं सकते। तभी तो पाकिस्तान बारम्बार कश्मीर में इस सम्बन्ध में चुनाव चाहता हैं। ताकि चुनाव में गड़बड़ी फैला कर वो फैसला (चुनावी नतीजें) बदल दे। और ये संभव नहीं हैं, भला अपने देश के नागरिको से ही ये पूछना कि उन्हें पाकिस्तान रहना हैं या नहीं, निहायत ही बेवकूफी-बेतुका हैं।

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मेरे विचार से कश्मीर समस्या का एकमात्र समाधान यही हैं कि-"राज्य और केंद्र की दोनों सरकारें एकजुट होकर, आपसी मतभेदों को भुला कर, बिना गेंद एक-दुसरे के पाले में डाले, तुरंत इस समस्या से सख्ती से निपटें। सख्ती भूलकर भी आमजन के विरुद्ध नहीं होनी चाहिए, वरना वे और भी भड़क जायेंगे। सख्ती आमजनों की भीड़ में शामिल असामाजिक तत्वों के विरुद्ध होनी चाहिए। सख्ती कट्टरपंथियों के विरुद्ध होनी चाहिए। सख्ती पाकिस्तान के झंडे लहराने और पाकिस्तान समर्थित नारे लगाने वालो के विरुद्ध होनी चाहिए। इतना ही नहीं, अगर दोनों सरकारे एक ना होतो, कश्मीर की सरकार को तत्काल प्रभाव से भंग करते हुए वहाँ राष्ट्रपति शासन लगा देना चाहिए। देश के नेताओं में इच्छा शक्ति का नितांत अभाव हैं। इसलिए, क्योंकि राष्ट्रपति सेना के तीनो अंगो (जलसेना, थलसेना, और वायुसेना) का उच्चाधिकारी होता हैं इसलिए सीधे सैन्य कार्रवाही का हुक्म दिया जाना चाहिए। जब पाकिस्तान के लिए कोई नियम नहीं हैं तो भारत के लिए ही नियम क्यों???? पुरे कश्मीर को भारत में मिला लेना चाहिए। माना सीधे युद्ध में बहुत जान-माल का नुकसान होगा, लेकिन रोज़-रोज़ के क्लेश-तनाव से तो मुक्ति मिलेंगी।

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सिख कश्मीर में थे, हैं, और भविष्य में भी रहेंगे। सिख जिंदाबाद, वाहेगुरु जिंदाबाद। सिखों ने हमेशा हिन्दुओं की रक्षा की हैं, अब अगर जरुरत पड़ी तो सिखों की रक्षा हिन्दू करेंगे।

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आप अभी भी चुपचाप-शान्ति से बैठे हैं। क्या ये सब जानकर भी अब आपका खून नहीं खौल रहा हैं????

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धन्यवाद।

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Monday, August 16, 2010

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ये कैसा नारी सशक्तिकर्ण???
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आजकल हर ओर नारी सशक्तिकर्ण की बयार बह रही हैं। जिधर नज़र दौडाओ वही नारी सशक्तिकर्ण की बातें नज़र आ रही हैं। आज नारी सशक्तिकर्ण का इतना राग अलापा जा रहा हैं कि-"पुरुषो को हीन भावना महसूस होने लगी हैं।" सब और नारी की ही बात हो रही हैं, बेचारे पुरुषो को कोई पूछ ही नहीं रहा हैं। मानो, पुरुष वर्ग को कोई समस्या ही ना हो, सारी समस्याएं स्त्रियों की ही हो। ये भी भला कोई बात हुयी।

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तलाक के मामले भी शायद इन्ही कारणों से बढ़ रहे हैं। पहले पति-पत्नी में तनाव होने पर एक पक्ष (आमतौर पर पत्नी) शांत बना रहता था, जिससे तनाव नहीं बढ़ता था ओर वैवाहिक जीवन बचा रहता था। लेकिन, नारी अब सशक्त तो हुयी हैं, लेकिन शायद नकारात्मक रूप से। तभी तो सहनशक्ति समाप्त हो चली हैं, लड़ने को तो मानो तैयार ही रहती हो। मैं नारी जाति को सुना नहीं रहा हूँ, मैं तो उनकी एक कमी की तरफ ध्यान दिला रहा हूँ। पति कामधंधे के तनाव के साथ-साथ आर्थिक-सामाजिक रूप से भी परेशान रहता हैं। उनके गुस्से को शांत भाव से पी लेना चाहिए, बजाय लड़ने या बहस करने के।

(जहां पति-पत्नी दोनों कामकाजी हो वहाँ और बात हैं। क्योंकि उस स्थिति में दोनों ही तनावग्रस्त होते हैं, और दोनों को ही संयम, शांति से काम लेना होता हैं। यहाँ मुद्दा कामकाजी पति और घरेलु पत्नी का हैं।)

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मैं ये नहीं कह रहा हूँ कि--"औरत को पति की मार सहनी चाहिए या पति को परमेश्वर समान मानते हुए उनके जुल्मो को सहना चाहिए।" मैं तो सिर्फ सूझबूझ, ठन्डे दिमाग से काम लेने का सुझाव देना चाह रहा हूँ। पति को गुस्से के वक़्त समझाने की बजाय थोड़ी देर बाद मौके की नजाकत और माहौल के शांत होने के बाद समझाना चाहिए।

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आज नारी सशक्तिकरण के नाम पर औरत हर क्षेत्र में दाखिल हो चुकी हैं। जो क्षेत्र कल तक पुरुषो के वर्चस्व वाले क्षेत्र माने जाते थे, वहाँ अब औरतो ने पैठ बना ली हैं। जैसे कि-ड्राइवर, टेक्सी ड्राइवर, फायर ब्रिगेड में, खेतो में ट्रक्टर से जुताई करना, युद्ध क्षेत्र, लड़ाकू विमान चलाना, कल-कारखानों में मजदूरी व मनेज़री का कार्य करना, और तमाम खेलकूद आदि। ये बहुत अच्छी बात हैं, और मैं औरतो की इस तरक्की से खुश हूँ और समस्त नारी-जाति को बधाई भी देता हूँ।

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लेकिन ये भी एक दुर्भाग्य हैं कि-"नारी सशक्तिकरण, नारी को मज़बूत करने के नाम पर परिवार तोड़ा जा रहा हैं। समाज की सबसे छोटी, शुरुवाती, और सबसे मज़बूत इकाई--परिवार--को तोड़ा जा रहा हैं। जोकि अंतत: सामाजिक बिखराव के रूप में सामने आयेगा। मेरी महिलाओं से एक ही दरख्वास्त, अपील हैं कि-"आप चाहे जितनी भी मज़बूत हो जाइए, लेकिन परिवार की नींव को ना दरकने दीजिये। अपनी सूझ-बूझ से, और ठन्डे दिमाग से काम लेते हुए, परिवार को एकजुट रखिये। कोई भी वाद-विवाद होने पर पति को गुस्से के वक़्त समझाने की बजाय थोड़ी देर बाद मौके की नजाकत और माहौल के शांत होने के बाद समझाइये। अपने सशक्त होने के अहम् को त्यागिये, और अपने होश संभालते हुए परिवार और अंतत: समाज को टूटने से बचाइये।"
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मुझे एक बात समझ में नहीं आती हैं कि--
औरत तलाक क्यों लेती हैं???
औरत तलाक लेते वक़्त पति से भत्ता क्यों मांगती हैं???
शादी से पहले भी तो माता-पिता के पास रहती थी, अब क्यों नहीं रह सकती????
अगर माता-पिता नहीं हैं तो भाइयों के पास क्यों नहीं रहती?????
इतना ही हैं तो खुद कमाकर क्यों नहीं खाती??

खुद कमाकर किराए का घर क्यों नहीं लेती???

एक तो पति को तलाक देकर छोडो और फिर उसके पैसो (भत्तो) पर ऐश क्यों????

आदि-आदि।
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विशेष = मैंने ये ब्लॉग पोस्ट महिलायों के खिलाफ नहीं लिखी हैं और नाही मैंने स्त्रियों की तरक्की से जलभुन कर ये सब लिखा हैं। मैंने ये सब उन मामलो को लेकर लिखा हैं जहां कई औरतो ने अहंकारवश, अकड़ में, अहंभाव से प्रेरित होकर तलाक लिया हैं और पति को और दबाने के लिए उसकी कमाई पर भी गिद्ध दृष्टि गडाते हुए अदालत से गुज़ारा-भत्ता मांग लिया। ये मेरे मन का दर्द हैं, मैं तलाक के बढ़ते मामलो और समाज में टूटकर बिखरते परिवारों को देखकर बेहद दुखी-चिंतित हूँ। ये ब्लॉग पोस्ट मैंने सिर्फ उन दपत्तियों के लिए लिखा हैं जहां सिर्फ पति ही कामकाजी हैं। पति को समझते हुए पत्नी को संयम-धैर्य से काम लेना चाहिए। जहां दोनों पति-पत्नी कामकाजी हो वहाँ होनो की बराबर ज़िम्मेदारी बनती हैं।

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धन्यवाद।

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Monday, August 09, 2010

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नदियाँ जोड़ें, देश बचाएं।

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आपको शायद याद होगा कि-"केंद्र की पूर्ववर्ती सरकार ने देश भर की सभी नदियों को जोड़ने का अरबो रुपयों का एक मास्टर प्लान बनाया था।" और शायद ये भी एक तथ्य आपको मालूम होगा कि-"मौजूदा केंद्र सरकार ने उस प्रस्ताव को राजनितिक कारणों से ठण्डे बस्ते में डाला हुआ हैं।"

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देश भर में सिंचाई के लिए और पीने के लिए (पेयजल) पानी की जबरदस्त किल्लत हैं, लेकिन ये किल्लत विशेष रूप से समूचे उत्तर भारत में ही हैं। दक्षिण भारत में अलग नदियाँ हैं और पूर्वी राज्यों में पानी की कोई ख़ास किल्लत नहीं हैं। इसी किल्लत, इसी पानी की कमी को दूर करने के लिए पूर्ववर्ती केंद्र सरकार ने देश की सभी नदियों को जोड़ने का अरबो रुपयों का मास्टर प्लान बनाया था। लेकिन ये देश का दुर्भाग्य हैं कि-"मौजूदा सरकार ने इस अहम् जलीय मुद्दे को ठण्डे बस्ते में डाला हुआ हैं।"

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उत्तर भारत में पानी का मुख्य और एकमात्र स्त्रोत पहाडो और हिमालय से आने वाला जल ही हैं। जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश में तो पानी पहाडो और हिमालय से आ जाता हैं। कई नदियाँ तो चीन से भी इन दोनों राज्यों में प्रवेश करती हैं। लेकिन राज़स्थान, हरियाणा, पंजाब, उत्तरप्रदेश, राजधानी दिल्ली, मध्यप्रदेश, आदि उत्तरी राज्यों में पानी हिमाचल और जम्मू-कश्मीर होकर ही आता हैं। लेकिन, सभी राज्यों में सबसे ज्यादा पानी की किल्लत राजस्थान में हैं। सब राज्यों से बड़ा और सब राज्यों से सबसे ज्यादा सूखा राज्य राज़स्थान ही हैं। सबसे ज्यादा सूखाग्रस्त और अकालग्रस्त और पानी का सबसे ज्यादा जरूरतमंद राज्य राज़स्थान हैं।

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यहाँ पानी सीधे नहीं आता हैं। राजधानी दिल्ली, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, पंजाब, और हरियाणा जैसे राज्य सीधे हिमाचल प्रदेश से जुड़े हुए हैं। लेकिन राजस्थान का पानी हिमाचल प्रदेश से वाया पंजाब और हरियाणा होकर आता हैं, इसलिए राज़स्थान को पानी कम मिल रहा हैं क्योंकि पंजाब और हरियाणा राज्य के हिस्से का पानी पी गए हैं यानी दे नहीं रहे हैं। पंजाब को कुछ कहो तो वो ये मुद्दा ये कहकर हरियाणा के ऊपर ड़ाल देता हैं कि-"हरियाणा पंजाब को पूरा पानी नहीं दे रहा हैं।" और जब हरियाणा को कुछ कहे तो वो गेंद केंद्र सरकार और हिमाचल प्रदेश के पाले में ड़ाल देता हैं। यानी राज़स्थान फिलहाल सूखा और अकाल के साथ-साथ पानी की किल्लत की दोहरी मार झेल रहा हैं।

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आप सभी पाठको की जानकारी के लिए बता दूं कि-"राजस्थान सरकार ने इस सम्बन्ध में काफी सालो से सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार की कई समितियों में विभिन्न याचिकाएं दाखिल कर रखी हैं। कोर्ट का तो आप जानते ही कितनी जल्दी फैसला आता हैं और केंद्र सरकार किसी भी राज्य पंजाब और राजस्थान के पक्ष में निर्णय नहीं ले पा रही हैं।"

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सूखा और अकाल तो दूर कई राज्यों में कमोबेश हर साल बाढ़ भी आती हैं। बिहार तो हर साल बाढ़ की चपेट में आ ही जाता हैं। कभी कोई नदी उफन उठती हैं तो कभी कोई, यानी हर साल किसी ना किसी नदी में बाढ़ आ ही जाती हैं। जान का नुकसान चाहे ना होता हो लेकिन संपत्ति और माल का नुकसान तो होता ही हैं। लाखो लोग बेघरबार हो जाते हैं, उनके रहने-सहने, ठहराव, पुर्नवास के लिए सरकार के करोडो रूपये स्वाहा हो जाते हैं। साथ ही जनजीवन अस्त-व्यस्त हो जाता हैं। वरना जितने समय बाढ़ के कारण ये लोग कोई कामधंधा नहीं कर पाते अगर ये समय बिना बाढ़ के हो तो लाखो-करोडो रूपये सरकार के खाते में टैक्स व अन्य मदों (राहत के कार्यो में जाया ना हो) में आ सकते हैं।

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इसी बाढ़ और अकाल-सूखे की समस्या के समाधान के लिए सभी नदियों को जोड़ा जाना था, ताकि जहां पानी ज्यादा हो वहाँ पानी का स्तर कम किया जा सके और जहां पानी की गंभीर कमी हो वहाँ इसकी पूर्ति की जा सके। लेकिन राजनीति कहलो या इच्छा-शक्ति की कमी, राज़स्थान सूखे, अकाल, और प्यास से तड़प रहा हैं और बिहार बाढ़ में डूब कर मर रहा हैं। सभी उत्तरी राज्यों को पानी सीधे पडोसी राज्य से मिल रहा हैं। लेकिन राज़स्थान को पानी दो-तीन राज्यों से होकर (गुजर कर) मिल रहा हैं, राजस्थान देश का सबसे ज्यादा सूखा और अकालग्रस्त राज्य हैं। उसे पानी की तत्काल आवश्यकता हैं। लेकिन पंजाब राज़स्थान का पानी रोके बैठा हैं, पंजाब झूठ बोलकर, बेबुनियाद बात (हरियाणा पर आरोप लगाना) कर रहा हैं। राज्य सरकार ने कई सालो से, काफी सालो से केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट में विभिन्न याचिकाएं दायर कर रखी हैं। लेकिन न्याय नहीं मिला। कब मिलेगा, कैसे मिलेगा कुछ कह नहीं सकते।

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इसलिए अब वक़्त आ गया हैं = देश भर की सभी नदियों को तत्काल जोड़ा जाए और पानी पर राज्यों की बजाय केंद्र का हक़-अधिकार दिया जाए। राज्यों की आपसी लड़ाई, मतभेदों को समाप्त करने का यही एक कारगर और सफल उपाय हैं कि-"सभी नदियों को जोड़ दिया जाए और पानी पर राज्यों का हक़/अधिकार समाप्त करते हुए सभी ताकत केंद्र सरकार को दे दी जाए।"

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एक अति-महत्तवपूर्ण सूचना = सभी पाठको को बता देना चाहता हूँ कि-"मौजूदा सरकार ने सत्ता में आने के बाद इस दिशा में सकारात्मक कदम उठाया (या तैयारी) था, लेकिन तत्कालीन सत्ताधारी दल और मौजूदा विपक्षियों ने ये कहकर उपहास / मज़ाक उड़ाया कि-"तुम कौनसा नया काम कर रहे हो???, तुम कर क्या रहे हो??, हमारा ही कार्य तुम कर रहे हो, ताकि जनता तुम्हे इस कार्य का श्रेय दे।" हम आम जनता के द्वार पर जायेंगे और उन्हें बता देंगे कि-"तुमने कुछ नहीं किया हैं, ये प्रोजेक्ट तो हमारा बनाया हुआ, हमारा फाइनल किया हुआ हैं। इस कार्य का श्रेय हमारा हैं और हम ही लेंगे।" बस उसके बाद मौजूदा सरकार ने इस अहम् मुद्दे को ठण्डे बस्ते में ड़ाल दिया, जो दुर्भाग्य से अब तक ठण्डे बस्ते में ही पडा हैं।"

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धन्यवाद।

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Monday, August 02, 2010

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ये किसी सौतन से कम नहीं।
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आज तक आपने जितनी भी सौतनों के बारे में सुना होगा, उन सभी सौतनो से ज्यादा खतरनाक और घातक सौतन हैं ये कामधंधा, नौकरी। हैरान ना होइए मैं सौ प्रतिशत सच, सोलह आने सत्य कह रहा हूँ। आजकल की भागती-दौड़ती, व्यस्त और तेजरफ्तार ज़िन्दगी में सब और धन का ही बोलबाला हैं। जिसे देखो वो पैसे के पीछे भाग रहा हैं। मानो, पैसा ही सब कुछ हो, पैसा ही पानी और प्राणवायु की तरह महत्तवपूर्ण हो।
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नौकरी, कामधंधा, व्यापार आदि अब सौतन का रूप धरते जा रहे हैं। एक ऐसी सौतन जिससे कमोबेश हर औरत जूझ रही हैं। हर व्यक्ति अपनी बीवी और बच्चो से दूर होता जा रहा हैं। जब देखो पैसा, पैसा, और पैसा की ही रट लगाए रखता हैं व्यक्ति। चाहे कोई नौकरी करता हो या बिजनेस करता हो, या दुकानदारी या कामधंधा करता हो, सब इतने व्यस्त हो चुके हैं की उन्हें अपने परिवार का ही ख्याल नहीं रहा हैं। नज़र बस अपनी ड्यूटी पर ही लगी रहती हैं। परिवार की तरफ से तो नज़र ही फेर ली गयी हैं।
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जिन परिवारों में पति के साथ-साथ पत्नी भी नौकरी करती हो वहाँ तो हालात विकट हो जाते हैं। वहाँ बच्चो का और बूढ़े/उम्रदराज माता-पिता का ख्याल ईश्वर ही रखता हैं। सुबह दोनों पति-पत्नी दफ्तर के लिए तैयार होने और बच्चो को स्कूल भेजने (यदि स्कूल जाने लायक हो तो) में ही व्यस्त हो जाते हैं और फिर शाम को (अक्सर देर रात) को घर आने के बाद खाना-वाना खा-पीकर सो जाते हैं। माँ-बाप के लिए तो बस दुआ-सलाम ही शेष रह जाती हैं।
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खैर बात करते हैं, जहां सिर्फ पति या पुरुष नौकरी करता हो। पुरुष अब काफी व्यस्त हो गया हैं, जल्दी पैसा कमाने की धुन, जल्द से जल्द अमीर बनने की ललक, और बाज़ार में मौजूद गला-काटूँ कम्पीटीशन ने व्यक्ति को उलझा दिया हैं। जब देखो काम-काम-काम, पैसा-पैसा-पैसा, बस यही एक आदमी की ज़िन्दगी और ज़ीने का मकसद रह गया हैं। परिवार में बीवी तो बस घर लायक ही हैं जो खाना बना दे, कपडे धो/प्रेस करदे, आदि-आदि। बच्चे सिर-हाथ-पैर दबा दे, या कोई छोटे-मोटे काम करदे आदि-आदि।
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अब ये नौकरी, कामधंधा क्या किसी सौतन से कम हैं?? माना कामकाज करना, नौकरी करनी जरुरी हैं लेकिन इतनी भी क्या जरुरी कि-"व्यक्ति अपने परिवार, अपने बीवी-बच्चो को ही भुला दे??" चलिए जो भी हो, अब तो स्थिति ये हो गयी हैं कि-"वर्किंग डेज़ के साथ-साथ अब व्यक्ति ओवर-टाइम भी देने लगा हैं, ताकि थोड़ा ज्यादा धन कमा सके। इसके साथ-साथ अब व्यक्ति छुट्टी के दिन भी व्यस्त रहने लगा हैं। कभी दफ्तर के तनाव के कारण छुट्टी का दिन बेकार हो जाता हैं तो कभी दफ्तर का कार्य पुरुष छुट्टी के दिन घर ले आता हैं। छुट्टी के दिन भी एन्जॉय करने कि बजाय चिंताग्रस्त पति/पुरुष अगले दिन की रूपरेखा बनाने लगता हैं। जिससे पुरे परिवार का मज़ा किरकिरा हो जाता हैं।
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बच्चे भले ही अपने दोस्तों के साथ या पड़ोस/गली के बच्चो से मिल ले, खेल ले लेकिन पत्नी...??? अगर पत्नी किट्टी-पार्टी या पड़ोसनो से गप्पे लड़ा ले तो भी कब तक और कितना??? पत्नी और बच्चो को पति=पापा का तो साथ नहीं मिला। परिवार पति/पुरुष के बिना अधूरा होता हैं, पड़ोस के लोग, पडोसने, गली-मोहल्लो के बच्चे परिवार का हिस्सा कदापि नहीं हो सकते। सब कुछ जरुरी हैं, पैसा कमाना जरूरी हैं, नौकरी-कामधंधा सब जरुरी हैं, लेकिन परिवार भी जरुरी हैं। आपके बीवी-बच्चो को आपकी आवश्यकता हैंउन्हें समय दीजिये, उनके साथ वक़्त गुज़ारिये। उनके साथ-साथ आपको भी सुकून मिलेगा, सारी चिंताएं, सारी टेंशन, सब दूर भाग जायेंगी। चाहे कितना भी जरुरी क्यों ना हो, चाहे कितनी भी तनख्वाह क्यों ना हो, छुट्टी का दिन परिवार को दीजिये। बाकी दिन / कार्यदिवस को चाहे हाड़तोड़ मेहनत कीजिये, खूब खून-पसीना बहाइये, लंबा ओवरटाइम कीजिये, लेकिन छुट्टी के दिन परिवार के साथ रहिये।
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तो आप कबसे छुट्टियों का परिवार के लिए उपयोग करेंगे और इस सौतन से छुटकारा दिलाएंगे???
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Monday, July 26, 2010

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प्रोत्साहित किया क्या??

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ना जाने क्यों लोग किसी को प्रोत्साहित करने को अपनी बेईज्ज़ती समझते हैं??? पता नहीं लोगो की क्या फितरत हैं कि-"प्रोत्साहित करने में तो सबसे पीछे रहते हैं, लेकिन हतोत्साहित करने को सबसे आगे रहते हैं??? मानो हतोत्साहित यूनियन के प्रधान हो।" मैं हमेशा अच्छे कार्य करने वालो को, नेकी या ईमानदारी या सच्चाई के रास्ते पर चलने वाले को यथासंभव प्रोत्साहित करता हूँ। अगर किसी कारणवश, या मजबूरीवश किसी को प्रोत्साहित नहीं भी कर पाता हूँ तो कम से कम हतोत्साहित तो कदापि नहीं करता।

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कुछ उदाहरण =

1. जब कोई कर/टैक्स की चोरी नहीं करता हैं, तो आप उसे प्रोत्साहित करने की बजाय हतोत्साहित करते हैं। इतना ही नहीं आप उसे करचोरी करने के कई उपाय भी बता डालते हैं।

2. जब कोई सावधानीपूर्वक, नियमपूर्वक, निर्धारित रफ़्तार से वाहन (दुपहिया, तिपहिया, या चौपहिया) चलाता हैं, तो आप उसे प्रोत्साहित करने की बजाय अनगिनत गालियाँ निकालते हैं। जैसे--कितना धीरे चला रहा हैं, चलाना ही नहीं आता, सड़क जाम करके रख दी, गाडी थोड़ी तेज़ चला, कछुआ चाल से चल रहा हैं, आदि-आदि।

3. जब कोई सड़क के बीचो-बीच घायल-चोटिल पडा हो और कोई भलामानस उसे संभाले तो आप मदद करने की बजाय उसे हतोत्साहित करते हैं। ये कहकर--छोड़ ना क्यों पंगे में पड़ रहा हैं??, क्यों पुलिस के लफड़े में आने पर तुला हैं??, ये रोज़-रोज़ का काम हैं तू चल एम्बुलेंस आ जायेगी, आदि-आदि।

4. जब कोई बिजली की चोरी नहीं करता हैं तो आप उसे प्रोत्साहित करने की बजाय हतोत्साहित करते हैं। ये कहकर--बिजली महेंगी हो गयी हैं क्यों पूरा बिल भरते हो??, हमें देखो हम ऐश कर रहे हैं, या डरो मत बिजली निगम के अधिकारियों से मेरी सेटिंग हैं कोई कुछ नहीं बोलेगा, या कुण्डी मैं ला देता हूँ या लगा देता हूँ, आदि-आदि।

5. जब कोई पानी की वेस्टेज करता हैं तो भी आप उसको पानी की कीमत बताने की बजाय उसे प्रोत्साहित करते हैं। जैसे-वाह गाडी चमक गयी हैं, आप पुरानी गाडी को भी नयी बताने लगेंगे, बढ़िया हैं सड़क की मिटटी दूकान में नहीं घुसेंगी, या पानी की कोई कमी नहीं हैं करो जैसे मर्जी इस्तेमाल, आदि-आदि।

यानी प्रोत्साहन भी नकारात्मक बात को। प्रोत्साहन सकारात्मकता को ही देना चाहिए। याद रखिये--अगर आप नकारात्मकता को प्रोत्साहित कर रहे हैं तो आप सीधे-सीधे अच्छाई को हतोत्साहित कर रहे हैं।

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याद रखिये--बूँद-बूँद से ही घड़ा भरता हैं। उसी तरह एक-एक व्यक्ति के सम्मिलित प्रयास से ही मकसद-लक्ष्य हल हो सकते हैं। अगर आप किसी को उसकी सच्चाई, ईमानदारी, नेकी या किसी अन्य अच्छाई-भलाई के लिए प्रोत्साहित नहीं कर सकते तो कम से कम उन्हें हतोत्साहित करके उनका हौसला तो मत डिगाइए।

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तो प्रोत्साहित किया क्या??

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धन्यवाद।

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Monday, July 19, 2010

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कुछ नकारात्मकता भी आवश्यक।

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अरे नहीं-नहीं, मैं किसी को नकारात्मक विचारों को अपनाने या सकारात्मकता को छोड़ने को नहीं कह रहा हूँ। मैं तो कुछ हद तक नकारात्मकता को सही ठहरा रहा हूँ।

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अब आप कहेंगे, कि-"ये क्या बात हुई??, मेरा ब्लॉग सकारात्मकता का पर्याय रहा हैं, मैंने अपने ब्लॉग में सकारात्मकता को प्रोत्साहित किया हैं। आज क्या हो गया मुझे??, जो मैं नकारात्मकता को कुछ हद तक जायज़-उचित ठहरा रहा हूँ।" जी नहीं, मुझे कुछ नहीं हुआ हैं, और नाही मैं अपने असल और आधारभूत मुद्दे (सकारात्मकता) से भटक गया हूँ। मैं आज भी सकारात्मकता को लेकर दृढ़ संकल्पित-अडिग हूँ, लेकिन कुछ हद तक (ज्यादा नहीं) नकारात्मकता भी आवश्यक हैं। कैसे??? अब ये जानिये।

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एक = जब हम कोई गाडी या अन्य कोई नया वाहन चलाना सीखते हैं, तो हमारे मन में कई तरह के अंत-शंट, उलटे-सीधे ख्याल (गिर जाना, चोट लगना, या एक्सीडेंट) आते हैं, जिसे हम भुलाकर कोई गाडी चलाना सीख पाते हैं। दोस्तों, वैसे तो ऐसे ख्यालो को नकारात्मक मानते हुए बचने की सलाह दी जाती हैं। लेकिन, ये बुरे-नकारात्मक ख्याल ही असल में हमारे गुरु साबित होते हैं। अगर कोई इन सबके बारे में नहीं सोचेगा, तो निश्चित रूप से वो गिरेगा या चोट खायेगा। संभावित खतरे का आभास होगा तभी तो प्रशिक्षु सावधानी बरतते हुए वाहन चलाना सीख पायेगा।

दो = जब हम कोई नया व्यवसाय-व्यापार शुरू करते हैं, तो हमारे जेहन-मन में कई आशंकाएं (काम-धंधा चलने या ग्राहकी आने, आदि) भी पनपने लगती हैं। और जैसे ही ये आशंकाएं हमारे मन में उभरने लगती हैं, तभी से हम उन आशंकायों को झुठलाने-निर्मूल साबित करने की कोशिशे करने लगते हैं। सोचिये, अगर आदमी के मन में व्यापार के फ़ैल होने, या ग्राहक के ना आने, या प्रतिस्पर्धा में पिछड़ने, आदि के नकारात्मक विचार नहीं आयेंगे तो वो बचाव के उपाय कैसे और क्यों करेगा???

तीन = जब कोई शेयर बाज़ार, म्युचुअल फंड, या अन्य कही अपना पैसा लगाता-निवेश करता हैं, तो वहाँ भी मन में नकारात्मक ख्याल (कितनी रिटर्न आएगी?, पैसा डूबेगा तो नहीं?, पैसा बढ़ने की बजाय घटेगा तो नहीं, या कही मैं जोखिम तो नहीं ले रहा?? आदि-आदि) आते हैं। लेकिन, नकारात्मकता को कही पीछे छोड़ते हुए निवेशक पूरी सुरक्षा-गारंटी के साथ अपना पैसा लगाता हैं। अगर ये ख्याल ना आये तो निवेशक अव्वल तो पैसा ही नहीं लगाएगा और अगर लगा भी लिया तो दुसरे को डूबता देख या तो मुडके शेयर बाज़ार की तरफ रुख ही नहीं करेगा या फिर आत्म-ह्त्या जैसा घातक कदम उठा बैठेगा।

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दोस्तों, उपरोक्त उदाहरणों मैं आप या आपका कोई जानकार भी हो सकता हैं। लेकिन, ये उदाहरण बेहद आम हैं। हर वक़्त सकारात्मकता उचित नहीं हैं, कुछ हद तक नकारात्मकता भी आवश्यक हैं, बशर्ते नकारात्मकता आप पर हावी ना हो। ज़िन्दगी का कोई भी क्षेत्र हो, नकारात्मक और सकारात्मक दोनों ही पहलु आवश्यक हैं। जीवन में दोनों ही बातें होनी चाहिए लेकिन पलड़ा-वजन सकारात्मकता का ही भारी होना चाहिए।

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कभी-कभी अनर्गल-नकारात्मक भी सोचना चाहिए, लेकिन सिर्फ उतना जितना आवश्यक हो। हद से ज्यादा या सकारात्मकता से ज्यादा सोचना निश्चित रूप से नुकसानदेह हैं। हर विषय में सोचना जरुरी हैं।

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धन्यवाद।

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Monday, July 12, 2010

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कहाँ गए प्राचीन खेल???

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गिल्ली डंडा, जंजीर, छुपनछुपाई, लूडो, सांप-सीढ़ी, कैरम, पकड़म-पकडाई, मार दडी, चौसर, शतरंज, कुश्ती, कबड्डी, खोखो, दौड़, आदि-आदि सभी प्राचीन खेल आज दुर्लभ (ग्रामीण क्षेत्रो को छोड़कर) होते जा रहे हैं। आज इन पुराने (लेकिन आधुनिक युग की परम-आवश्यकता) खेलो की तरफ से लोगो का रुझान दिन-प्रतिदिन घटता जा रहा हैं। युवापीढ़ी और किशोर वर्ग की रूचि भी इन खेलो की बजाय अन्य और आज के खेलो में ज्यादा नज़र आ रही हैं।

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खेल कोई भी बुरा नहीं हैं, किसी भी खेल (चाहे वो देश का हो या विदेश का) को खेलने में कोई बुराई या आपत्ति नहीं हैं। मसला ये हैं कि-"इन आजकल के खेलो में प्राचीन खेलो जैसी बात नहीं हैं। जो गुण, जो शिक्षा, प्राचीन-पुराने खेलो में हैं, वो आजकल के आधुनिक खेलो में नहीं हैं।" आजकल के युवाओं की, किशोरवय उम्र के लोगो की रूचि क्रिकेट, बास्केटबॉल, फुटबॉल, रग्बी, वॉलीबॉल, जूडो-कराटे, कुंग फु, वीडियो गेम, आदि खेलो में ही रह गयी हैं।

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ये बहुत ही गलत बात और दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति हैं। आप पाठक-गण इसे दुर्भाग्य माने या ना माने लेकिन मैं इसे मानता हूँ, और देर सवेर आप भी मानेंगे। जो दिमागी-शारीरिक मेहनत, जो कौशल, जो रणनीति, जो शिक्षा, इन आधुनिक खेलो में तलाशी जा रही हैं, वो दरअसल इनमें प्राचीन खेलो में आज भी मौजूद हैं।

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व्यक्तिगत रूप से भले ही ये आधुनिक खेल अच्छे हो लेकिन सामाजिक रूप से कतई अच्छे नहीं माने जा सकते। कुछ उदाहरण =

01. जूडो-कराटे और कुंग फु आत्म-रक्षा और व्यायाम के लिए अच्छे जरूर हैं लेकिन कुश्ती और कबड्डी जितने नहीं। कुछ लोग इन दोनों में फर्क समझते हैं, लेकिन वे भूल जाते हैं कि-"इन दोनों खेलो का मकसद आत्म-रक्षा ही हैं।" लेकिन इन दोनों खेलो में दिन-रात का फर्क हैं। जिस शारीरिक दमखम और फुर्ती का परिचय कुश्ती-कबड्डी में देना होता हैं, वो जूडो-कराटे, और कुंग फु में कहाँ??

02. चौसर और शतरंज में जो दिमागी कौशल, सोच-समझ और तीव्र बुद्धि का प्रदर्शन होता हैं वो आजकल के विडियो गेम में कहाँ?? वीडियो गेम में दिमाग लगाना होता हैं, लेकिन तुलनात्मक रूप से कम। ये दोनों (चौसर और शतरंज) बौद्धिक खेल हैं, इन खेलो से धैर्य, एकाग्रता, और अनुशासन में बढ़ोतरी होती हैं।

03. जंजीर, छुपनछुपाई, दौड़, खोखो, और गिल्ली डंडा, आदि खेलो में जो भागना-बचना, छुपना-ढूंढना, और हाथ को कसकर मजबूती से पकड़कर भागना, आदि होता हैं वो आजकल के खेलो में कहाँ हैं??? क्रिकेट, बास्केटबॉल, फुटबॉल, रग्बी, वॉलीबॉल, आदि आधुनिक खेल एकाकी भावना पैदा करते हैं।

04. क्रिकेट, बास्केटबॉल, फुटबॉल, रग्बी, वॉलीबॉल, आदि खेल परोक्ष रूप से स्वहित साधने की शिक्षा देते हैं। इनमें शारीरिक मेहनत भी काफी कम होती हैं। जो गेंदबाज़ हैं या बल्लेबाज़ हैं वो ही क्रियाशील रहता हैं बाकी सब तो खेल का हिस्सा होते हुए भी मूक-दर्शक बने रहते हैं। जबकि जंजीर, छुपनछुपाई, दौड़, खोखो, और गिल्ली डंडा, आदि खेलो में सभी खिलाड़ी ना सिर्फ क्रियाशील रहते हैं वरन अहम् रोल भी निभाते हैं।

05. क्रिकेट में सिर्फ रन बनाने और आउट करने का ही महत्तव हैं, जो बल्लेबाज़ हैं वो रन को ही अहमियत देता हैं और जो गेंदबाज़ या फिल्डर हैं वो कैच करने तथा आउट करने को ही महत्तव देता हैं। सब का रोल एक समय में एक बार ही होता हैं। एक गेंदबाज़ और दो बल्लेबाजों के अलावा सभी खिलाड़ी (फिल्डर-क्योंकि वे बल्लेबाज़ का हाथ और गेंद की दिशा को देखकर ही एक्टिव होते हैं) करीब-करीब मूक-दर्शक ही होते हैं। लेकिन जंजीर, छुपनछुपाई, दौड़, खोखो, और गिल्ली डंडा, आदि खेलो में सभी का रोल बराबर और महत्तवपूर्ण होता हैं।

06. जंजीर, छुपनछुपाई, दौड़, खोखो, और गिल्ली डंडा, आदि खेलो में जो खेल भावना और टीम के प्रति फ़र्ज़ होते हैं वो आजकल के खेलो में कहाँ?? जो दिमागी कौशल का इस्तेमाल पुरातन और प्राचीन खेलो में होता हैं वो आजकल के खेलो में कहाँ होता हैं?? रणनीति आजकल के आधुनिक खेलो में भी बनाई जाती हैं लेकिन उसमे वो बात नहीं होती हैं।

07. खोखो को ही लीजिये हर खिलाड़ी एक्टिव रहता हैं, भागने-पकड़ने, और उठने-बैठने के इस खेल में अच्छी-खासी कसरत हो जाती हैं। क्या ऐसी कसरत आजकल के, आधुनिक खेलो में हैं??? बस खड़े रहो और जब गेंद पास आये तो थोड़ा सा हिल-डुल लो। वो भी मन हो तब। ये भी भला कोई आधुनिक खेल हुए???

08. आजकल के खेलो में आपसी सामंजस्य का नितांत अभाव हैं, जबकि प्राचीन खेलो में आपसी सदभाव, आपसी सहयोग, आपसी प्रेम-प्यार, भाईचारा, और आपसी तालमेल की भावना कूट-कूट कर भरी हुई हैं। आजकल के खेल मनोरंजक और अच्छे जरूर हो सकते हैं लेकिन प्राचीन खेलो के मुकाबले नहीं।

09. वीडियो गेम खेल-खेल कर बच्चे मोटे और थुल-थुल होते जा रहे हैं, साथ ही मोटापा-जनित रोगों से भी घिरते जा रहे हैं। साथ-साथ आँखों को भी नुकसान पहुंचा रहा हैं, जैसे धुंधला दिखना, आँखें दुखना, आँखें भारी होना, आँखों का पानी सूखना, आदि-आदि। अगर वीडियो गेम की बजाय अन्य घरेलु खेल (सांप-सीढ़ी, लूडो, चौसर, शतरंज, और कैरम, आदि) खेले जाए तो कम से कम आँखें तो बचेगी।

10. वीडियो गेम में खेलने वाला अपना ध्यान सिर्फ मोबाइल या कम्पयूटर में लगा कर रखता हैं, जबकि अन्य घरेलु खेलो में खिलाड़ी ना सिर्फ एक्टिव-क्रियाशील रहता हैं बल्कि उसका अन्य खिलाड़ियों के साथ संवाद भी कायम रहता हैं। जबकि वीडियो गेम में उसका किसी से, किसी भी रूप में संवाद नहीं होता हैं। इस तरह वीडियो गेम सामाजिक रूप से भी तोड़ रहा हैं। जबकि घरेलु खेलो से खिलाड़ी विशेषकर बच्चो का जुडाव समाज से होता हैं।

11. याद रखिये--"जितने भी आधुनिक, आजकल के खेल हैं उन सभी खेलो में खिलाड़ियों और मैदानों का पैमाना-साइज तय हैं, जिसे घटाया या बढाया नहीं जा सकता। जबकि पुराने खेलो की ऐसी कोई शर्त-बाध्यता नहीं हैं।" जब आपका बच्चा आज के, आधुनिक खेलो को खेल रहा हो तो समझ जाइए कि-"आपका बच्चा आसानी से मिलनसार, घुलने-मिलने वाला, सामाजिक नहीं बन सकता क्योंकि वो एक निश्चित सीमा से अधिक खिलाड़ियों को शामिल नहीं कर सकता।" यानी एक निश्चित सीमा के बाद वो किसी को अपना दोस्त नहीं बना सकता क्योंकि उसे जरुरत ही नहीं होगी।"

12. जबकि अगर आपका बच्चा पुरातन-पारंपारिक खेलो को खेल रहा हो तो बेफिक्र हो जाइए। आपका बच्चा सामाजिक भी होगा, मिलनसार भी होगा, देश-समाज-शहर के प्रति जागरूक भी होगा, और निश्चित रूप से उसका भविष्य सुखद भी होगा। क्योंकि पारम्पारिक खेलो में जितने खिलाड़ी-सदस्य होते हैं, उतना ही आनंद-ख़ुशी की अनुभूति होती हैं, कोई बाध्यता-कोई पाबंदी ना होने के कारण आपका बच्चा सहज रूप से उत्साहपूर्वक अन्य-अनजान (गली-मोहल्ले, अन्य कक्षायों आदि के) बच्चो को भी शामिल करना चाहेगा। जोकि, उसके सामाजिक दायरे को बढाते हुए उसे सामाजिकता का पाठ पढ़ायेगा।

13.आदि-आदि।

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सबसे बड़ी और महत्तवपूर्ण बात-->"खेल कोई भी बुरा नहीं हैं, किसी भी खेल (चाहे वो देश का हो या विदेश का) को खेलने में कोई बुराई या आपत्ति नहीं हैं। जो दिमागी-शारीरिक मेहनत, जो कौशल, जो रणनीति, जो शिक्षा, इन आधुनिक खेलो में तलाशी जा रही हैं, वो दरअसल इनमें प्राचीन खेलो में आज भी मौजूद हैं। व्यक्तिगत रूप से भले ही ये आधुनिक खेल अच्छे हो लेकिन सामाजिक रूप से कतई अच्छे नहीं माने जा सकते। अगर आप अपने बच्चो को सुखद भविष्य देना चाहते हैं, अगर आप अपने बच्चो को मिलनसार और सामाजिक बनाना चाहते हैं, अगर आप अपने बच्चो को देश-समाज-शहर के प्रति जागरूक करना चाहते हैं, तो अपने बच्चो को पारंपरिक, प्राचीन, पुरातन खेलो की तरफ मोड़िये, उन्हें इन खेलो में निहित फायदों और गुणों से अवगत कराते हुए, इन खेलो को खेलने की प्रेरणा दीजिये।"

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अब आपके बच्चो का, आपकी पीढ़ियों का फैसला आपके हाथो में हैं।

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Monday, July 05, 2010

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जहर का सेवन क्यों???
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क्या आप जानते हैं कि--
आप जाने-अनजाने जहर खा रहे हैं??
आप जिस अनाज-दाल, फल-सब्जी को शुद्ध मान रहे हैं उस पर जहर लगा हुआ हैं??
जिस खाद्य पदार्थ को आप पौष्टिक मान कर खाते हैं, वो जहरीला हैं??
अपने शरीर को बनाने के लिए आप जो कुछ भी ले रहे हैं, वो बनाना तो दूर शरीर को बिगाड़ रहा हैं??
आदि-आदि।
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नहीं-नहीं आप कुछ भी नहीं जानते हैं। आपको तो बस खा-पी कर हज़म करने से मतलब हैं, बाकी क्या हैं, क्या नहीं हैं, आप कुछ भी नहीं जानते हैं। खाया-पीया-पचाया बस यही तीन लफ्ज आप जानते हैं, और तो कुछ आपको पता ही नहीं।
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आज अनाजो से लेकर दालो-चनो तक, फलो से लेकर सब्जियों तक हर चीज़ जहर से भरी हुई हैं। इन चीजो को जितना मर्ज़ी धो लो, रगड़ लो, चाहे कुछ भी कर लो, थोड़ा-बहुत जहरीला पदार्थ तो रह ही जाएगा। कारण......इन चीजो का उत्पादन ही जहर से किया जा रहा हैं। रासायनिक खाद ड़ाल-ड़ाल कर सारा नक्शा ही बिगाड़ दिया गया हैं। कल तक जिस रासायनिक खाद को जरुरत, मज़बूरी बता कर इस्तेमाल किया जाता था, उसी रासायनिक खाद को आज फैशन, तेज़ी से उत्पादन के लिए धड़ल्ले से उपयोग किया जा रहा हैं।
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ज्यादा से ज्यादा और तेज़ी से उत्पादन करने के लिए सम्पूर्ण मानव-जाति के जीवन से ही खिलवाड़ किया जा रहा हैं। रासायनिक खाद फायदे कम नुकसान ज्यादा देती हैं, रासायनिक खाद के नुकसान ही नुकसान हैं, और लोग (किसान) सब कुछ जानते-समझते हुए भी बेरोकटोक इनका इस्तेमाल बेतहाशा कर रहे हैं।
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रासायनिक खाद कृत्रिम तत्त्व हैं नाकि भूमि की खुराक। रासायनिक खाद भूमि को दूरगामी नुकसान पहुंचा रही हैं, किसान भले ही तात्कालिक-अल्पकालिक लाभ प्राप्त करता हो। लालचवश या देखा-देखी किसान रासायनिक खाद उपयोग में तो ला रहे हैं, लेकिन इसके अत्यधिक इस्तेमाल से जमीन कमजोर होकर बंजर हो जाती हैं। दूसरा, जल की कमी का मुख्य कारण भी रासायनिक खेती साबित हो सकती हैं, क्योंकि रासायनिक खेती से जल की आवश्यकता ज्यादा और बार-बार पड़ती हैं।
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किसान रासायनिक खेती से उत्पादन भले ही ज्यादा लेले लेकिन होता फिर भी घाटे में ही हैं। क्योंकि रासायनिक खेती के लम्बे इस्तेमाल के कारण जमीन कठोर हो जाती हैं, जिसकी वजह से जोत-खर्च भी बढ़ जाता हैं। रासायनिक खाद से तैयार अनाज-सब्जी-फल का स्वाद काफी अलग होता हैं। जैविक खाद के मुकाबले इस खाद से तैयार सब्जी-फल आदि काफी बेस्वाद और कम पौष्टिक होने के साथ-साथ स्वास्थ्य के लिए हानिकारक भी होते हैं। कृषक को तात्कालिक लाभ भले ही हो, लेकिन इसका नुकसान भी उर्वरा शक्ति बढाने वाले जीवाणुओं के नष्ट होने के रूप में सामने आता हैं।
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धुप और ठण्ड से बचाव भी रासायनिक खाद लेने वाले पौधे-फसल कम ही कर पाते हैं। पर्यावरण के लिए तो रासायनिक खाद हैं ही नुकसानदेह, इसमें तो रत्ती भर भी कोई शक नहीं हैं। रासायनिक खाद के हानिकारक कैमिकल लोगो को जिगर, गुर्दे, और हर्दय रोगों के साथ-साथ जाने-अनजाने कैंसर भी दे रहे हैं। जैविक खाद के तो फायदे ही फायदे हैं, कही भी, कभी भी, किसी भी रूप में जैविक खाद नुकसान नहीं पहुंचाते हैं। साथ ही, रासायनिक खाद के मुकाबले जैविक खाद काफी सस्ते, किफायती, कामयाब, और लम्बे समय तक असरकारक होते हैं। जैविक खाद के कई फायदे इस तरह हैं--
पर्यावरण की रक्षा होती हैं,
मिटटी भुरभुरी होने से उसमे हवा, पानी, और प्रकाश का संचार उचित ढंग से होता हैं,
कम बारिश में पानी लम्बे समय तक सोख कर रखती हैं और ज्यादा बारिश में पानी की निकासी करती हैं,
मिटटी का कलेवर अच्छा रहता हैं,
उर्वरा शक्ति बढती हैं,
उर्वरा शक्ति बढाने वाले जीवाणुओं की पैदावार प्राकृतिक रूप से बढती हैं,
अनाज-फल-सब्जी पौष्टिक और स्वादिष्ट होते हैं,
एक बार की सिंचाई लम्बे समय तक चलती हैं,
बार-बार सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती,
कम सिंचाई के कारण पानी भी बचता हैं,
जमीन सख्त नहीं होती इससे जोत-खर्च बचता हैं,
फसल के धुप और ठण्ड से बचाव के लिए कोई ख़ास इंतजामात नहीं करने पड़ते,
प्राकृतिक रूप से भूमि की खुराक भी हैं जैविक खाद,
आदि-आदि।
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तो क्यों किसान अपने देश के ही लोगो को जहर परोसना चाहते हैं??
रासायनिक खाद और जैविक खाद के फायदों-नुकसानों को जानते हुए भी किसान चुप क्यों हैं??
चंद लाभ के लिए, लोगो के जीवन से खिलवाड़ करना क्या उचित हैं??
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मेरी इस ब्लॉग के माध्यम से सभी किसान भाइयो से निवेदन हैं कि-"जहां तक हो सके अपनी खेती-फसल में जैविक खाद का ही इस्तेमाल करे, और रासायनिक खाद का इस्तेमाल ना के बराबर करते हुए रासायनिक खाद के उपयोग को हतोत्साहित करे।"
साथ ही मेरी आम जनता से निवेदन हैं कि-"हमेशा यथासंभव जैविक खाद से तैयार फसल (फल-सब्जी-अनाज) ही खरीदें, इसके लिए आप सीधे उन खेतो से खरीद करे जो जैविक खाद का इस्तेमाल करते हैं। इससे रासायनिक खाद का इस्तेमाल करने वाले हतोत्साहित होंगे।
और यदि आप किसी जैविक खाद का उपयोग करने वाले खेत या किसान के बारे में नहीं जानते तो बेहतर हैं आप उन दुकानों से खरीदी करे जिनके पास शत-प्रतिशत जैविक-प्राकृतिक खाद से तैयार माल मिले। (महानगरो-बड़े शहरों में कई दुकाने इस तरह की खुली हैं जो लिखित में, शुद्ध रूप से जैविक खाद से तैयार खाद्य पदार्थ रखती हैं।)"
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धन्यवाद।
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FROM =
CHANDER KUMAR SONI,
L-5, MODEL TOWN, N.H.-15,
SRI GANGANAGAR-335001,
RAJASTHAN, INDIA.
CHANDERKSONI@YAHOO.COM
00-91-9414380969
CHANDERKSONI.BLOGSPOT.COM

Monday, June 28, 2010

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ये ऐसे हैं तो बाकी कैसे होंगे???
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इस बार मैं ऐसी बात लिख रहा हूँ, जो सुखद तो नहीं हैं लेकिन हैं कडवी सच्चाई। बहुत ही भारी मन से मैंने ये पोस्ट लिखी हैं। एक ऐसे मुद्दे पर मैं लिख रहा हूँ, जो समाज से काफी करीब से, गहराइयों से जुड़ा हुआ हैं।
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मेरा एक दोस्त हैं (गोपनीयता रखते हुए मैं उसका नाम नहीं लिख सकता) जोकि एक टांग से विकलांग हैं। पांच-छः साल तक वो एकदम ठीक था, लेकिन तभी अचानक उसे पोलियो हो गया और बड़ी मुश्किल से उसे पूर्ण-रूप से अपंग होने से बचाया जा सका। आज उसकी उम्र 24 साल हैं, वो लंगडा-लंगडा कर चलता हैं और लम्बी दुरी तय करने के लिए ट्राय-साइकल का उपयोग करता हैं। यह ट्राय-साइकल उसे बीकानेर की एक संस्था ने नि-शुल्क प्रदान की थी। अब उसकी करतूत भी जान लीजिये =
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जैसा की मैं पहले ही बता चूका हूँ कि-"वो मेरा पुराना दोस्त हैं और ट्राय-साइकल उपयोग करता हैं।" हाल ही में, वो मेरे घर आया एकदम नयी चमचमाती ट्राय-साइकल पर। मैंने उसे नयी साइकल लेने पर बधाई देते हुए उसकी चमकती-दमकती सायकल की तारीफ़ की। उसके बाद उसने मुझे जो बताया, उसने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया।
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उसने कहा-"अरे नहीं-नहीं यार, ये सायकल मैंने खरीदी नहीं हैं। ये ट्रायसायकल तो मैंने हाल ही में लगे एक विकलांग शिविर से नि-शुल्क प्राप्त की हैं। तुझे शायद याद होगा, वो शिविर पिछले दो महीने पहले लगा था।" मैंने उससे पूछा कि-तेरे पास तो पहले से ही ट्रायसाइकल थी फिर तुने नयी क्यों ली?? और वो थी भी सही-दुरुस्त कंडीशन में??" तो वो हँसते हुए बोला-"यार वो सायकल तो मैंने दो हज़ार रूपये में किसी और विकलांग को बेच दी। दरअसल मुझे पैसो की सख्त आवश्यकता थी, तो मैंने वो सायकल अन्य विकलांग को सस्ते में दो हज़ार रूपये में ही बेच दी, नयी तीन हज़ार से ज्यादा की ही आती हैं। और हाल ही में लगे जयपुर वालो के शिविर में जाकर मैं ये नयी ट्राय-साइकल ले आया। बस इतनी सी ही बात हैं।"
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मैं बोला तो कुछ नहीं, लेकिन उसने मेरे मन में कई-अनुत्तरित सवाल छोड़ दिए। जैसे कि--
मुफ्त में मिली सायकल को इस तरह देकर उसने क्या साबित किया??
मुफ्त की सायकल को दो हज़ार में बेचकर वो सस्ती देने की बात कैसे कह सकता हैं??
जो सामाजिक-धार्मिक संस्थाएं विकलांगो की सहायता करती हैं उन्हें यह बात जानकर क्या झटका नहीं लगेगा??
इससे बेहतर तो वो किसी से उधार या क़र्ज़ ले लेता या अपनी ट्राय साइकल को गिरवी रख देता।
आजकल के घोर-कलयुगी, पापी जमाने में मुट्ठी भर लोग विकलांगो के लिए कुछ कर रहे हैं, क्या ये घटनाक्रम उन्हें हतोत्साहित नहीं करेगा???
अगर हरेक विकलांग ऐसा करने लग जायेंगे तो ये तो एक व्यापार का रूप ले लेगा। जोकि दुर्भाग्य होगा।
उन संस्थायों का क्या होगा, जो इस तरह के लोगो (विकलांगो) द्वारा आये दिन लुटते जायेंगे????
आज आम आदमी का विश्वास आये दिन झूठे-ढोंगी साधू-महात्माओं-बाबाओं द्वारा तोड़ा जा रहा हैं, तो क्या लोग विकलांगो पर विश्वास कर पायेंगे???
भिखारियों पर से लोगो का विश्वास-भरोसा पूरी तरह से तो नहीं लेकिन काफी हद तक कम जरूर हो गया हैं। कारण उनका झूठ-मूठ लंगडाना या हाथ मोड़ना या पट्टियां बांधकर कोढ़ी होने का नाटक करना, आदि।

भगवान् की दया से लोगो का विश्वास साधू-महात्माओं पर से जरूर उठ गया हैं, लेकिन विकलांगो पर अभी भी बना हुआ हैं।
बाहरी लोग या नकली लोग ऐसा करे तो और बात हैं, लेकिन जब असली लोग (विकलांग) ही ऐसा करने लगेंगे तो लोग कैसे उनपर विश्वास-भरोसा कायम रख पायेंगे???
आदि-आदि।
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मन में और भी ढेर सारे सवाल अनुत्तरित रह गए हैं, लेकिन फिलहाल इतना ही।
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धन्यवाद।
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CHANDER KUMAR SONI,
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