मेरे इस ब्लॉग का उद्देश्य =

मेरे इस ब्लॉग का प्रमुख उद्देश्य सकारात्मकता को बढ़ावा देना हैं। मैं चाहे जिस मर्ज़ी मुद्दे पर लिखू, उसमे कही ना कही-कोई ना कोई सकारात्मक पहलु अवश्य होता हैं। चाहे वह स्थानीय मुद्दा हो या राष्ट्रीय मुद्दा, सरकारी मुद्दा हो या निजी मुद्दा, सामाजिक मुद्दा हो या व्यक्तिगत मुद्दा। चाहे जो भी-जैसा भी मुद्दा हो, हर बात में सकारात्मकता का पुट जरूर होता हैं। मेरे इस ब्लॉग में आपको कही भी नकारात्मक बात-भाव खोजने पर भी नहीं मिलेगा। चाहे वह शोषण हो या अत्याचार, भ्रष्टाचार-रिश्वतखोरी हो या अन्याय, कोई भी समस्या-परेशानी हो। मेरे इस ब्लॉग में हर बात-चीज़ का विश्लेषण-हल पूर्णरूपेण सकारात्मकता के साथ निकाला गया हैं। निष्पक्षता, सच्चाई, और ईमानदारी, मेरे इस ब्लॉग की खासियत हैं। बिना डर के, निसंकोच भाव से, खरी बात कही (लिखी) मिलेगी आपको मेरे इस ब्लॉग में। कोई भी-एक भी ऐसा मुद्दा नहीं हैं, जो मैंने ना उठाये हो। मैंने हरेक मुद्दे को, हर तरह के, हर किस्म के मुद्दों को उठाने का हर संभव प्रयास किया हैं। सकारात्मक ढंग से अभी तक हर तरह के मुद्दे मैंने उठाये हैं। जो भी हो-जैसा भी हो-जितना भी हो, सिर्फ सकारात्मक ढंग से ही अपनी बात कहना मेरे इस ब्लॉग की विशेषता हैं।
किसी को सुनाने या भावनाओं को ठेस पहुंचाने के लिए मैंने यह ब्लॉग लेखन-शुरू नहीं किया हैं। मैं अपने इस ब्लॉग के माध्यम से पीडितो की-शोषितों की-दीन दुखियों की आवाज़ पूर्ण-रूपेण सकारात्मकता के साथ प्रभावी ढंग से उठाना (बुलंद करना) चाहता हूँ। जिनकी कोई नहीं सुनता, जिन्हें कोई नहीं समझता, जो समाज की मुख्यधारा में शामिल नहीं हैं, जो अकेलेपन-एकाकीपन से झूझते हैं, रोते-कल्पते हुए आंसू बहाते हैं, उन्हें मैं इस ब्लॉग के माध्यम से सकारात्मक मंच मुहैया कराना चाहता हूँ। मैं अपने इस ब्लॉग के माध्यम से उनकी बातों को, उनकी समस्याओं को, उनकी भावनाओं को, उनके ज़ज्बातों को, उनकी तकलीफों को सकारात्मक ढंग से, दुनिया के सामने पेश करना चाहता हूँ।
मेरे इस ब्लॉग का एकमात्र उद्देश्य, एक मात्र लक्ष्य, और एक मात्र आधार सिर्फ और सिर्फ सकारात्मकता ही हैं। हर चीज़-बात-मुद्दे में सकारात्मकता ही हैं, नकारात्मकता का तो कही नामोनिशान भी नहीं हैं। इसीलिए मेरे इस ब्लॉग की पंचलाइन (टैगलाइन) ही हैं = "एक सशक्त-कदम सकारात्मकता की ओर..............." क्यूँ हैं ना??, अगर नहीं पता तो कृपया ज़रा नीचे ब्लॉग पढ़िए, ज्वाइन कीजिये, और कमेन्ट जरूर कीजिये, ताकि मुझे मेरी मेहनत-काम की रिपोर्ट मिल सके। मेरे ब्लॉग पर आने के लिए आप सभी पाठको को बहुत-बहुत हार्दिक धन्यवाद, कृपया अपने दोस्तों व अन्यो को भी इस सकारात्मकता से भरे ब्लॉग के बारे में अवश्य बताये। पुन: धन्यवाद।

Thursday, March 11, 2010

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भावनाओं की अभिव्यक्ति बेहद जरूरी।

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भावनाओं की अभिव्यक्ति बेहद जरूरी हैं। हम में से ज्यादातर लोग अपनी भावनाओं को व्यक्त करने की बजाय दबाना शायद ज्यादा उचित समझते हैं। हम रोजाना जितने भी समस्याओं से दो-चार होते हैं, हमें जितनी भी परेशानियां उठानी पड़ती हैं, हमें जितने भी दुःख-तनाव झेलने पड़ते हैं, उन सबके मूल में भावनाओं को दबाना या व्यक्त ना करना ही हैं। हमने तो मानो अपनी भावनाओं को व्यक्त ना करने की मानो कसम ही खा ली हो। मन में क्या आ रहा हैं?, दिमाग में क्या उलझन चल रही हैं?, दिल में क्या बात हैं??, आदि कई बातों-भावनाओ को हम उभारने की बजाय दबाना ज्यादा मुफीद समझते हैं।

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चाहे कितना भी नुक्सान क्यों ना हो जाए?, चाहे कितना भी उलटफेर क्यों ना हो जाए?, हम भावनाओं को दबा देंगे, लेकिन व्यक्त नहीं करेंगे???, पता नहीं ऐसी कौनसी वजह, कौनसी मजबूरी हैं जो हम ऐसा करते हैं??, वो भी एक या दो बार नहीं बल्कि लगभग हर बार। अपने भावों को दबाना, अपनी भावनाओं को दबाना, अपना ही नुक्सान करता हैं, दुसरे का कुछ नहीं बिगड़ता, वो बेचारा तो आपके अन्दर भी नहीं झाँक सकता। जो आपकी भावनाओं को समझ सके, आपके विचारों को जान सके, जो आपके दिलोदिमाग में चल रही बातों-सवालों, उलझनों को भी देख सके। .


कुछ उदाहरण मैं यहाँ देना चाहूँगा, ताकि आपको पता चल सके कि-"भावनाओ की अभिव्यक्ति कितनी जरूरी हैं??" =

1. दो दोस्त थे, एकदम पक्के दोस्त। दोनों बचपन से ही साथ-साथ पढ़ते थे, स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद दोनों ने आपस में सलाह करके एक ही कॉलेज में पढ़ाई की। बाद में एक दोस्त को सट्टे-जुए की बुरी लत लग गयी। वो दुसरे दोस्त को भी सट्टे के अड्डे पर ले जाता था, लेकिन दुसरे दोस्त ने हमेशा उसे मना किया। लेकिन उसे ऐसी लत लग चुकी थी, उसको सिवा सट्टे-जुए के कुछ ना दिखता था। एक बार पुलिस ने वहाँ छापा मारा और उसे उसके साथियों सहित गिरफ्तार कर लिया। जमानत पर छूटने के बाद, उसने पहला काम यही किया कि-"अपने उस दोस्त को गद्दार करार देते हुए उसको थप्पड़ दे मारा और बचपन की भाई जैसी दोस्ती तोड़ दी।" यहाँ उस दोस्त की गलती यह थी कि-"उसने अपनी भावनाओं को व्यक्त नहीं किया यानी कोई अफ़सोस जाहिर नहीं किया। बस, थप्पड़ को याद रखने की बात कहकर चला गया।"

2. एक पति-पत्नी थे। दोनों में शादी के कुछ साल खूब प्रेम रहा, लेकिन बाद में हालात बदलने शुरू हो गए। दरअसल, पति को तगड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा था, लेकिन वह यह बात घर पर शो/प्रकट नहीं होने दे रहा था। उसकी पत्नी जब प्यार-रोमांस के मूड में होती, तो वह गुस्सा हो बैठता। और जब उसका मूड प्यार का होता तो उसकी पत्नी अपनी व्यस्तता जाहिर कर देती। यानी दोनों ही अपनी भावनाओं को व्यक्त नहीं कर पा रहे थे। धीरे-धीरे नौबत तलाक तक आ पहुंची। यह तो भला हो मैरिज कोंउन्सलर का, जो उन्होंने दोनों को साथ बिठाकर सारी बातें साफ़ की, तब कही जाकर उन दोनों के बीच पैदा हुई ग़लतफ़हमियाँ दूर हुई। और दोनों तलाक जैसी विभीषिका से बच सके। यहाँ गलती दोनों की थी, दोनों ही असली बात-अपनी परेशानियों को व्यक्त नहीं करते थे। दोनों में दुराव-छिपाव था, दोनों अगर चाहते तो खुलकर बातचीत करके मसला सुलझा सकते थे। पर दुर्भाग्य से ऐसा हुआ नहीं।

3. इसी तरह के एक मामले में एक पति को पत्नी के चरित्र पर शक था। उसने कई बार पूछा, पर उसकी पत्नी मज़ाक में टाल जाती। ऐसे ही एक बार पति को गुस्सा आ गया और उसने थप्पड़ दे मारा। तब उसकी पत्नी बोली-"मेरा कोई ऐसा चक्कर नहीं था, तभी तो मैं इसे आपका मज़ाक समझती थी।" तब कही जाकर, थोड़ी बहुत बहस के बाद, मामला शांत हुआ। यहाँ पति ने अपनी नाराजगी-गुस्से को स्पष्ट प्रकट ना करते हुए पत्नी से गंभीर होकर नहीं पूछा, वही पत्नी ने मामले को मज़ाक में लेते हुए, इसका सीरियसली (गंभीरता से) जवाब देना उचित नहीं समझा, जबकि एक औरत के लिए यह सवाल सबसे दुश्वार सवाल होता हैं।

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उपरोक्त दोनों मामले, कोई ख़ास मामले नहीं हैं। यह तो बिलकुल ही मामूली-आम मामले हैं, जिनका सामना शायद आपने या आपके किसी जान-पहचान वाले ने अवश्य किया होगा। इन मामलो में कुछ विशेष नहीं करना होता हैं, बस अपनी भावनाओं को समय-समय पर व्यक्त करते रहना चाहिए। भावनाएं नहीं दबेगी, तो सारी बातें-कहानियां साफ़ रहेगी। दुराव-छिपाव होने की शुरुआत भावनाओं को दबाने से ही होती हैं। कोई भी बात अपने अन्दर दबा कर नहीं रखनी चाहिए, वरना एक ना एक दिन मामला बिगड़ता हैं और भावनाएं ज्वालामुखी के लावे की तरह फट कर बाहर आती हैं।

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क्यों दबाते हैं अपनी भावनाओं को??, क्यों हम अपनी बात को कहकर अपने दिलोदिमाग को हल्का नहीं करते??, क्यों हम अन्दर ही अन्दर घुटते रहते हैं??, कितने ही डाक्टर-वैज्ञानिक कहते हैं कि-"दिल में कुछ दबाकर रखना, दिमाग में कोई ना कोई उलझन-परेशानी का लगातार चलते रहना, या अपने दिल की बात कहकर मन हल्का ना करना, कई बीमारियों की जड़ हैं। शुगर, ब्लडप्रैसर, दिल और दिमाग की कई बीमारियों को खुला न्यौता देता हैं तनाव और भावनाओं को दबाना।" फिर भी ना जाने हम क्यों भावनाओं को व्यक्त करने में कंजूसी करते है?? भावनाओं को खुलकर, निर्भीक होकर व्यक्त करना चाहिए। हाँ, कुछेक मामलो में (मजबूर होना, किसी के सम्मान की रक्षा के लिए, आदि कारणों से) भावनाओं को दबाना उचित, माना जा सकता हैं। लेकिन जहां नुक्सान होता हो, जहां परिवार में कलह/बिखराव पैदा होता हो, या कही ग़लतफहमी पैदा होती हो, तो भावनाओ को छिपाना कहाँ की समझदारी हैं??

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धन्यवाद।

FROM =

CHANDER KUMAR SONI,

L-5, MODEL TOWN, N.H.-15,

SRI GANGANAGAR-335001,

RAJASTHAN, INDIA.

CHANDERKSONI@YAHOO.COM

00-91-9414380969

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Friday, March 05, 2010

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भगदड़ कब तक??????

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हालांकि आज मेरे पास ब्लॉग लिखने का वक़्त नहीं था और नाही मैं आज ब्लॉग पोस्ट करने की सोच कर बैठा था। लेकिन वाकया ही ऐसा घटित हो गया की मुझे आज आपात-स्थिति में ब्लॉग लेखन करना पडा। मेरा ब्लॉग लेखन आज नहीं करना था, इसका सबसे बड़ा सबूत यही हैं कि-"यह मेरा अभी तक का सबसे छोटा ब्लॉग पोस्ट हैं और सबसे ज्यादा जल्दी में लिखा हुआ भी।"

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कल सभी खबरिया समाचार पत्र और समाचार चैनल एक दुखांत घटना से परिपूर्ण थे। बाबा कृपालु जी महाराज के आश्रम में मची भगदड़ में साठ से ज्यादा लोग मारे गए और असंख्य लोग घायल हो गए। मारे गए लोगो में बच्चो और महिलायों की संख्या ज्यादा हैं। यह बहुत ही दिल देहला देने वाला नज़ारा था, कमजोर दिल के लोगो की तो हालत ही बिगड़ गयी होगी। मैं तो कई देर तक गंभीर सोच में पड़ गया, लेकिन क्यूंकि यह ब्लॉग पोस्ट जल्दी में की गयी हैं, इसलिए ज्यादा लम्बा ना लिखते हुए सिर्फ अपनी चिंताओं और सवालों को व्यक्त कर रहा हूँ।

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मेरे मन में निम्नलिखित चिंताएं-सवाल व्याप्त थे =

कब तक मचती रहेगी ऐसी जानलेवा भगदड़???

कब तक लोग बाबाओं-साधू-संतो की भीड़ भरी और असुरक्षित समागमो में जाते रहेंगे???

कब तक बाबा लोगो की सेवा करने या आशीर्वाद लेने के चक्कर में लोग मरने जाते रहेंगे??

आये दिन ऐसे हादसे, ऐसी दुखद घटनाओं की खबरे आती रहती हैं। कब रुकेंगी ऐसी खबरे आनी???

लोग पुरानी मौतों को भूलते नहीं कि कोई नयी घटना हो जाती हैं। जिम्मेदार कौन??

किसी को जाने से मैं रोक नहीं रहा हूँ लेकिन सुरक्षा व्यवस्था की जानकारी भी तो भक्तो को होनी चाहिए।

लोगो को दीर्ध आयु, तरक्की का आशीर्वाद देने वाले बाबा के सामने ही लोग काल-कवलित क्यों हो जाते हैं??

आम दिनों की बजाय बड़े महोत्सवो में ही क्यों जाते हैं लोग??

जबकि लोगो को पहले से ही भीड़ होने, असुरक्षा और असुविधा होने की पूरी जानकारी होती हैं।

क्या बड़े दिनों में या महोत्सवो में बाबा ज्यादा दमदार-तगड़ा आशीर्वाद देते हैं??

ना जाने कितने लोग इन भगदड़ो में मारे जा चुके हैं, और आगे भी ना जाने कितने लोग मारे जाएँगे??

इन मौतों से बाबा या संत महात्मा कोई सबक लेंगे, इसमें तो मुझे शंशय हैं।

लेकिन इन मौतों से आम जनता और प्रशासन कब सबक लेगा??

मृतकों-घायलों को कुछेक हज़ार या लाख की आर्थिक मदद क्या सार्थक हैं???

कब तक मुआवजा बाँट कर लोगो का ध्यान भटकाने की कोशिश की जाती रहेगी??

जितनी इनकी कमाई हैं, उसके आगे तो ये मुआवजा ऊंट के मूंह में जीरे के सामान हैं।

मैं यहाँ मुआवजा राशि बढाने के लिए नहीं कह रहा हूँ, मैं यहाँ अनमोल जिंदगियों की कीमत समझने के लिए कह रहा हूँ।

वो अनमोल जिंदगी जिसका आंकलन आप रुपयों में करते हैं। जबकि वो अरबो रुपयों से भी कही ज्यादा कीमती हैं।

उन बच्चो, उन विधवाओं की कुछ सोचिये?? जिन्हें आप मुआवजा रुपी लोलिपॉप से बहलाना चाहते हैं।

उन बुजुर्गो के सम्बन्ध में सोचिये जिनका एकमात्र कमाऊ बेटा या बेटी आपकी भगदड़ में आपकी (भगवान् की) प्यारी हो गयी।

आदि-आदि।

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और भी बहुत सारे-कई सवाल मेरे मन में उठ रहे हैं, लेकिन क्यूंकि जल्दी में होने और वक़्त ना होने के कारण मैं आज इतना ही ब्लॉग में लिख रहा हूँ। सभी मृतकों और घायलों को मेरी, मेरे ब्लॉग, और मेरे ब्लॉग के सभी पाठको की तरफ से हार्दिक संवेदना।

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धन्यवाद।

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Saturday, February 27, 2010

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क़ानून के ऐसे सकारात्मक दुरूपयोग से मैं सहमत।
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हैरान रह गए ना, शीर्षक पढ़ कर। मैं किसी भी तरह के क़ानून का उल्ल्लंघन नहीं करता हूँ और ना ही किसी को ऐसा करने की सीख/प्रेरणा दे रहा हूँ। वैसे तो मैं नियम-कायदों और कानूनों का पालन करने वाला व्यक्ति हूँ, मैं जानबूझ कर क़ानून तोड़ने जैसा कार्य नहीं करता हूँ। जाने-अनजाने, भूलवश ऐसा हो तो और बात हैं। लेकिन इस बार बात ही कुछ ऐसी हैं, जो मैं कह रहा हूँ कि-"क़ानून के ऐसे सकारात्मक दुरूपयोग से मैं सहमत।" आप भी वाक्यांश जानेंगे तो आप भी कहेंगे-"क़ानून का ऐसा दुरूपयोग तो होना ही चाहिए।"
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वाक्यांश यह हैं = हमारे किसी काफी दूर के रिश्तेदार की बेटी (जिसे मैं जानता तो नहीं, पर सुना हैं) की शादी कुछेक साल पहले हुई थी। उसका पति खूब शराब पीया करता था, वो अव्वल दर्जे का शराबी था। कमाई करने, बीवी और घरवालो की तरफ ध्यान देने की तरफ से लापरवाह था। बीवी बहुत समझाती पर कमाई करने और शराब छोड़ने की उसने रत्ती भर भी कोशिश नहीं की। कालान्तर में एक बेटी भी हो गयी, बेटी के होने के बाद उसके सुधरने की उम्मीद जगी थी। पर अफ़सोस, ऐसा ना हो सका, सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया।
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वो शराबी सारे दिन घर पर पडा रहता या मोहल्ले में इधर-उधर ताश-जुआ खेलता रहता। सारा का सारा पैसा शराब में उड़ा डालता, अगर थोड़े-बहुत रुपये बच जाते तो उसे जुए-सट्टे में बर्बाद कर आता। पत्नी बहुत समझाती पर उसके कान में जू तक ना रेंगती, आये दिन घर में तनाव-क्लेश का माहौल बना रहता। जब उसकी बीवी बुरी तरह दुखी होकर उस पर ज्यादा दबाव बनाती या लताडती तो वो मारपीट पर उतारू हो जाता। उसके दिल में घर में छोटी नन्ही-बेटी की लिहाज़ करने जैसी कोई बात नहीं थी। उसे तो सिर्फ और सिर्फ शराब ही दिखती थी।
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बेहद दुखी हो गयी थी उसकी बीवी। समझा-समझा कर थक चुकी थी उसकी बीवी, दारु-दारु-और सिर्फ दारु ही उसके पति की ज़िन्दगी रह गयी थी। बहुत बार रिश्ते-नातेदारों की पंचायत भी बैठी, लेकिन उसके पति ने किसी भी पंचायत के फैसले को नहीं माना। अब उस औरत के ज़िन्दगी में आये दिन मारपीट-गालीगलौच होना, लड़ाई-झगडा, तनाव ही रह गया था। कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था उसे, एक तो कम पढीलिखी थी और दूसरा एकदम निम्न-वर्गीय परिवार से ताल्लुक रखती थी। दूसरी शादी करने या अपने पति को छोड़ कर चले जाने की बात तो स्वप्न में भी नहीं सोच सकती थी। यही वजह थी की-"किसी भी पंचायत में इन दो बातो की तरफ तो सोच-विचार ही नहीं किया गया।" बेचारी हर बार पंचायत के सफल होने की प्रार्थना करती लेकिन ना जाने कब भगवान् उसकी पुकार सुनता और कब पंचायत सफल होती???
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उसके माँ-बाप, परिजन, शुभचिंतक सभी दुखी थे। कुछ किया तो जा नहीं सकता था, इसलिए सभी उसका हौसला बढाते और भगवान् में आस्था बनाए रखने की नसीयत देते। लेकिन, इन हौसलों और आस्था मात्र से भला कभी कुछ हुआ हैं??? हौसला और आस्था भी तभी काम आते हैं, जब लगनपूर्वक प्रयास किये जाए। बैठे-बिठाए नातो हौसला काम देता हैं और नाही आस्था। उसका दिमाग खराब हो चुका था। आलसी और शराबी पति से छुटकारा तो पाया नहीं सकता था लेकिन सुधारा तो जा सकता था। बस, इसी दिशा में उसका दिमाग चल रहा था। दिमाग चल रहा था, दिमाग कोई रास्ता ढूँढने में लगा हुआ था, तभी..........तभी.........
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तभी उसके दिमाग में एक विचार कौंधा। यह विचार दिमाग में आते ही, उस दुखियारी की बांछे खिल उठी। बिना किसी को अपना विचार-उपाय बताये, बिना किसी से (यहाँ तक की अपने माँ-बाप से भी नहीं) चर्चा किये पहुँच गयी अपने आलसी पति के कमरे में। चढ़ी दोपहरी में उसका पति अपने कमरे में दारु पीने में लीन था, इस तरह बेधड़क अपनी बीवी को कमरे में घुसता देखना उसके लिए दुनिया के किसी आठवे अजूबे से कम ना था। कभी बिना दरवाज़ा खटखटाए उसकी बीवी उसके कमरे में कभी घुसी ही नहीं थी, आखिर शान्ति-तसल्ली के साथ दारु जो पीता था.....तभी तो वह हैरान होकर, अवाक होकर अपनी बीवी को कमरे में आते देख रहा था।
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उसकी बीवी आते ही उसको सुनाने लगी-"कोई काम-धाम तो करते नहीं, सारे दिन दारु पीते रहते हो। अपनी कमाई की दारु पियो तो मुझे कोई ऐतराज़ नहीं होता, लेकिन तुम तो मेरी मेहनत के पैसे दारु पर लगा रहे हो। बहुत हो लिया, अब और ऐसा नहीं चलेगा, कमाई करके लाओ तो मानु, मुफ्त की दारु अब और नहीं मिलेगी। यह भी भला कोई तरीका हैं मैं दिनभर सिलाई-कढाई करके पाई-पाई जोडू और तुम शाम को आकर मेरे पैसे दारु-सट्टे-जुए में लुटा दो। मेरा नहीं सोचा, कोई बात नहीं, सहन कर लिया। अब बेटी भी हैं, इसके भविष्य, इसकी पढ़ाई-लिखाई की अब तो सोचिये, पहले बच्ची थी अब स्कूल जाने लायक हो गयी हैं, इसको पढ़ाना भी तो हैं। कब तक सारे दिन घर पड़े-पड़े दारु पीते रहोगे???? अब ऐसा हरगिज नहीं होगा, कमाई करो तभी दारु पीने दूंगी, वरना....."
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अभी उसकी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि-तभी जोरदार चांटा उसके गाल पर पडा और उसके शराबी पति के यह शब्द उसके कान में गूंजे-"क्या वरना?, क्या कर लेंगी तू??, क्या औकात हैं तेरी??, तू (गाली-गाली-गाली) अपने आप को समझती क्या हैं??, तेरी कमाई और मेरी कमाई में कोई फर्क नहीं हैं, समझी??, मेरी मर्ज़ी जो चाहूँगा करूंगा तू (गाली) कौन होती हैं रोकने वाली??, अगर मैं तुझे ब्याह के ना लाता तो तू कही (गाली) पर बैठी होती। आदि-आदि।" आये दिन मारपीट सहने की आदि हो चुकी पत्नी ने शायद पूरी तैयारी कर रखी थी, तभी तो उस पर इस बार की मारकुटाई का कोई प्रभाव नहीं पडा और उसने कह डाला-"अगर तुमने शराब ना छोड़ी और कमाई करना शुरू नहीं किया तो मैं तुझे अन्दर करवा दूंगी।" उसके पति के तेवर अभी भी नरम नहीं पड़े थे, एक और चांटा उसे जड़ा और घर से निकल जाने का फरमान सुना दिया। उसकी पत्नी भी शायद आखिरी लड़ाई-आर या पार करने की ठान चुकी थी, तभी तो उसने अपना उपाय बेझिझक कह दिया-"मैं इस घर से निकलूं या ना निकलूं, तुझे जेल में डलवा दूंगी। मैं तेरे खिलाफ दहेज़ मांगने और मारपीट करने का मुकद्दमा दर्ज करा दूंगी, वहाँ बैठा चक्की पीसते रहना। ऐसी गत करुँगी, कि-"दुनिया के सारे पति शराब और आलस से कोसों दूर हो जायेंगे।" अभी भी मान जा, कमाई करने की और शराब छोड़ने की तरफ ध्यान दे ले, वरना अन्दर जाने के लिए तैयार हो जा।"
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ठीक ऐसी ही क्लास उसने अपने पति की दो-चार बार और लगाईं और लड़ाई जीतने में कामयाब रही। आज उसका पति ना सिर्फ आलस्य त्याग कर अच्छी-खासी कमाई कर रहा हैं, बल्कि उसने शराब भी लगभग छोड़ ही दी हैं। इतना ही नहीं अब उनके एक बेटा भी हैं, और दोनों बच्चे शहर के महंगे, जाने-माने स्कूल में पढ़ रहे हैं। उसके पति की आय अब इतनी हैं कि ना सिर्फ उनके घर का खर्च आराम से निकल जाता हैं बल्कि काफी पैसा बचत खातो और विभिन्न स्थानों पर निवेश भी कर रखा हैं। और जब इतना सब हो तो, पत्नी को काम करने कि क्या आवश्यकता हैं? बस, अब तो उसका एकमात्र काम घर संभालना, बच्चो को पढ़ाना, और "प्रिय" पतिदेव का ख्याल रखना ही रह गया हैं।
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अभी कुछ दिनों पहले उनका कई सालो बाद हमारे घर आना हुआ। मेरी मम्मी ने, हैरानी जताते हुए, जब उनके इस हौसले और कदम की तारीफ़ की, तो उनका जवाब और भी हैरानी पैदा कर गया। उनका जवाब था-"अरे भाभी जी, इसमें कोई हौसला-वौसला जैसा कुछ भी नहीं था। मैं गुस्से में थी, इसलिए उनसे लड़ पड़ी, और लड़ाई-लड़ाई में मैंने उन्हें अपने प्लान के मुताबिक़ लपेट लिया। अक्सर गुस्से में हम लड़ पड़ते थे, इसलिए इस बार भी गुस्सा होकर लड़ रहे थे। हर बार लड़ाई में मैं उन्हें कुछ-ना-कुछ कहती थी, इस बार भी मैंने यह सब कह दिया और काम बन गया।" अब तक मम्मी को सारी बात समझ में आ चुकी थी, मम्मी बोली-"इस बार की कही बात असर कर गयी, अगर हर बार की तरह यह बात भी काम ना आती तो तेरा घर-बार-परिवार सब छुट चुका होता। तू बर्बाद हो चुकी होती......"
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तो यह था वाक्यांश। अब तो आप सबको समझ में आ गया होगा कि-"कैसे क़ानून के दुरूपयोग ने एक औरत के जीवन को नरक-तबाह होने से बचा लिया???" दोस्तों मैं क़ानून के दुरूपयोग के सख्त खिलाफ हूँ, आये दिन सुनाने-पढने-देखने को मिलता हैं कि-"दहेज़-मारपीट, आदि कानूनों का दुरूपयोग हो रहा हैं, इस लड़की ने इसे फंसा दिया या इस औरत ने क़ानून का दुरूपयोग करके इस लड़के की ज़िन्दगी तबाह कर दी, आदि-आदि।" लेकिन कही भी मैंने दहेज़-मारपीट क़ानून के सदुपयोग की बात नहीं सुनी हैं। कुछेक जगह सदुपयोग बेशक हुआ हो, लेकिन अमूमन इस क़ानून का उपयोग दुसरे को दबाने-तबाह करने में ही किया जाता हैं। अपने हिन्दुस्तान की यही तो कमी हैं, इसके क़ानून में कई लूप-होल्स (छिपे-छिद्र) हैं, यहाँ क़ानून लागू तो कर दिए जाते हैं, लेकिन उस क़ानून के दुरूपयोग को रोकने के कोई प्रभावी उपाय नहीं किये गए है। यही वजह हैं कि-"यहाँ सभी कानूनों में से सबसे ज्यादा दुरूपयोग दहेज़ क़ानून का ही होता हैं।"
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मुझे डर हैं कि-"कही इन दहेज़ कानूनों का दुरूपयोग इतना ना बढ़ जाए कि-"सरकार को यह क़ानून रद्द ही ना करना पड़ जाए" और औरते फिर से बिन-क़ानून के लाचार हो जाए।" भगवान् करे ऐसा ना हो कि-"बिना क़ानून के औरते 19वीं सदी की स्थिति में पहुँच जाए और फिर औरतो पर जुल्मोसितम का युग लौट कर पुन: आ जाए।"
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मुझे दहेज़-मारपीट क़ानून का ऐसा सकारात्मक दुरूपयोग मंजूर हैं, मैं कानून के ऐसे दुरूपयोग से सहमत हूँ। तो आइये आप और मैं मिलकर औरतो से यह आह्वान करें कि-"कीजिये क़ानून का ऐसा सकारात्मक दुरूपयोग, तभी सभी बुरे-बिगडैल पति सुधर कर, हदों में रहेंगे। तभी यह क़ानून टिका-कायम रहेगा। वरना जिस हिसाब से इस क़ानून का दुरूपयोग बढ़ रहा हैं, उस हिसाब से यह क़ानून जल्द ही वापस-समाप्त होता लग रहा हैं।"
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धन्यवाद।
FROM =
CHANDER KUMAR SONI,
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Sunday, February 21, 2010

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ग्रेडिंग सिस्टम सराहनीय।

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बच्चो अब आपकी परीक्षा को एक महीना भी नहीं बचा हैं। जाहिर हैं, आप भी खेल-कूद, मौज-मस्ती को भूल कर, खूब जोर-शोर से परीक्षा की तैयारियों में डूबे हुए हो। और डूबे भी क्यों ना, आखिर पूरे साल की मेहनत का फल जो मिलना हैं। और फिर नयी कक्षा में प्रवेश करने का जोश-उत्साह भी तो हैं।

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इस बार तो नहीं पर अगले सेशन (सत्र) से ग्रेडिंग सिस्टम लागू हो जाएगा। यह निश्चित तौर पर बच्चो-छात्रो का तनाव जरूर कम करेगा। कुछ लोग ग्रेडिंग सिस्टम का विरोध कर रहे हैं, विरोधियों का कहना हैं कि-"यह छात्रो के दिलो में से परीक्षा का डर समाप्त कर देगा। बच्चे वैसे ही साल भर नही पढ़ते हैं, कम से कम परीक्षा के दिनों में तो उन्हें पढने दो। ग्रेडिंग सिस्टम बच्चो के भविष्य को बिगाड़ने वाला मामला साबित होगा। जब छात्रो में परीक्षा का डर ही नहीं रहेगा, तो क्या वो ख़ाक पढेंगे?? और जब बच्चे पढेंगे ही नहीं तो वे अपना भविष्य कैसे संवारेंगे?? कैसे अपने पैरो पर खड़े हो सकेंगे?? कैसे अपने कंधो पर जिम्मेदारियों का बोझा उठा सकेंगे??, और कैसे अपना और अपने परिवार का पेट पालेंगे??? आदि-आदि।"

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लेकिन विरोधियों के लाख तर्कों और विरोध करने को दरकिनार करते हुए मैं ग्रेडिंग सिस्टम लागू करने को सराहनीय कदम मानता हूँ। मुझे यकीन हैं कि-"पढ़ाई-लिखाई का यह सिस्टम देश में शिक्षा के क्षेत्र में एक नयी क्रान्ति का सूत्रपात करेगा। अब तक देश में पढ़ाई-लिखाई का जो रट्टा मारने वाला ढर्रा रहा हैं, उसमे उल्लेखनीय बदलाव देखने को मिलेगा। क्योंकि ग्रेडिंग सिस्टम के साथ-साथ शिक्षा-सुधार कार्यक्रम भी लागू किया जा रहा हैं।"
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मुझे लगता हैं कि-"इस कदम से छात्रो, विद्यार्थियों पर से पढ़ाई का बोझ-परीक्षा का तनाव कम होगा। विद्यार्थियों पर पढ़ाई का, परीक्षा का अनावश्यक दबाव-तनाव-बोझ नहीं पडेगा।" मैं विरोधियों से पूछना चाहता हूँ कि-"क्या आपने कभी उन बच्चो के बारे में सोचा हैं, जो परीक्षा के भारी तनाव के कारण डीप्रेशन में आ जाते हैं??, जो एक बार नाकामी झेलने के बाद पढ़ाई से ही मुंह मोड़ लेते हैं??, जो आठवी, दसवी, या बारहवी की बोर्ड परीक्षाओं में फेल-अनुत्तीर्ण होने के बाद आत्मह्त्या जैसा खतरनाक कदम उठा बैठते हैं??" आपके बच्चे होशियार हैं, आपके बच्चे टॉप करते हैं, आपके बच्चे रैंक प्राप्त करते हैं, आपके लिए ग्रेडिंग सिस्टम गलत हैं, क्यों??? क्योंकि आपके बच्चे के आसपास जिस भी बच्चे के नंबर होंगे वो आपके बच्चे के समकक्ष माना जाएगा। क्योंकि अभी तक मार्क्स स्पष्ट सामने दिखते थे, जबकि अब ऐ, बी, सी, डी,..... की तरह ग्रेड मिलेंगे।

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हमेशा अपना-अपना ही नहीं सोचना चाहिए। दूसरो का भी, ज्यादा नहीं तो कुछ, सोचना ही चाहिए। सब बच्चे एक जैसे, एक जितने होशियार-इनटेलीजेंट नहीं हो सकते, कही ना कही-कोई ना कोई फर्क तो उनमे होगा ही। वैसे ग्रेडिंग सिस्टम का विरोध करने वालो को मैं एक बात साफ़-साफ़ कह देना चाहता हूँ कि-"आपके बच्चे अगर होशियार-तेज़ हैं तो कृपया अपने बच्चे के दिलोदिमाग पर पड़ रहे दबाव को अवश्य महसूस कर लीजिएगा।"

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वैसे तो मुख्य रूप से इसका विरोध पढने-लिखने वाले होशियार छात्रो के अभिभावक ही कर रहे हैं क्योंकि-"पुराने सिस्टम में एक-एक पॉइंट का फर्क पड़ता था, लेकिन इस नवीन सिस्टम में 10-10 प्रतिशत के ग्रुप बनाएं जायेंगे, और उसी के हिसाब से ग्रेड दी जायेगी। बस, यही कारण हैं इनके विरोध-तर्कों का। क्योंकि 10 प्रतिशत के अंको वालो को एक ही ग्रुप में शामिल किया जाएगा। और ये नहीं चाहते कि-"और कोई इनके बच्चो के समकक्ष आकर खडा हो।" दुर्भाग्य से इस क्रांतिकारी शिक्षा-प्रणाली का विरोध कमजोर-पिछड़े बच्चो के अभिभावक भी कर रहे हैं। यह अलग बात हैं कि-"उनका विरोध कुछ हलके स्वर में-दबी आवाज़ से हो रहा हैं क्योंकि यह इस बात को अपने पक्ष में ले रहे हैं कि-"इनके बच्चे बिना पढ़े-बिना मेहनत अपने अंक-प्रतिशत को बढ़ा सकते हैं। वो ऐसे, मान लीजिये इनके 61 प्रतिशत अंक आये हैं तो यह आसानी से यह कह सकते हैं कि इनके 70 प्रतिशत अंक आये हैं।" बस, इसी कारण से इन छात्रो के अभिभावकों का विरोध मुखर नहीं हैं।"

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कृपया मुझे आप यह बताइये कि-"ग्रेडिंग सिस्टम आने से क्या हो जाएगा?? क्यों आपने ग्रेडिंग सिस्टम का हौव्वा बना रखा हैं?? क्या इस नए सिस्टम के आने से आपका बच्चा पढ़ना बंद कर देगा?? बच्चे ग्रेडिंग सिस्टम का स्वागत कर रहे हैं, इसका मतलब यह नहीं हैं कि, वे पढ़ना नहीं चाहते और इस सिस्टम में उन्हें कम पढ़ना पडेगा। कही बच्चो का स्वागत ही आपके विरोध का कारण तो नहीं हैं?? सोचिये, इस नए सिस्टम के आने से आपका बच्चा क्या पढ़ना शुरू नहीं कर देगा?? क्या इस नए सिस्टम से आने से आपके बच्चे पर से पढ़ाई का, परीक्षा का तनाव कम नहीं होगा?? क्या इस नए सिस्टम से हमारी शिक्षा-प्रणाली में, देश में शिक्षा का स्तर ऊँचा नहीं होगा?? आदि।

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ऐसे तो आप अपने बच्चो को सुखी देखना चाहते हैं, लेकिन आपके बच्चो के चेहरे से झलकता परीक्षा-एग्जाम का तनाव आपको नहीं दिखता। बच्चो की ख़ुशी में ही आप अपनी ख़ुशी मानते हैं, लेकिन आपको बोझिल-ऊबाऊ पढ़ाई और रट्टा मार कर नंबर लेने, जैसी पढ़ाई से दुखी होते आपके अपने नौनिहाल नहीं दिखते। बच्चो को आप अपनी जान से भी चाहते हैं, लेकिन रटकर नंबर लाने के चक्कर में बच्चे की जान पर बन आती हैं, यह आप नहीं समझते। बच्चा जब अन्य कारणों से बीमार होता हैं तो आप अपना खाना-पीना भूल जाते हैं, लेकिन जब आपका बच्चा परीक्षा के अनावश्यक-भारी मानसिक दबाव-तनाव के कारण बीमार होता हैं, चिडचिडा हो जाता हैं, तनाव में खाना-पीना भूल जाता हैं, और खान-पान की अनियमितता के कारण जी घबराना-चक्कर आने जैसी दिक्कते आती हैं तो आप उसे चिकित्सक के पास ले जाने की बजाय महज थोड़ा आराम करने की सलाह दे डालते हैं। यह तो सरासर नाइंसाफी हैं इन छात्रो के साथ।

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यह सिस्टम-विस्तम के चक्कर में मत पड़िये, अपने दिल की आवाज़ सुनिए, दिमाग की हरगिज़ मत सुनिए, दिमाग नैतिक-अनैतिक, सही-गलत, आदि चीज़े नहीं देखता हैं, अपने ज़मीर-दिल की आवाज़ को ध्यान से सुनिए, दिल वही कहेगा जो आपके बच्चो के लिए, आपके बच्चो के भविष्य के लिए लाभदायक होगा। उसी सिस्टम का समर्थन कीजिये, जिससे आपका बच्चा मन लगाकर पढ़ सके, ताकि वो भविष्य में कुछ कर या बन सके। विरोध करना हैं, तो मौजूदा-पुराने सिस्टम का कीजिये, स्वागत करना हैं, तो नए प्रस्तावित सिस्टम का कीजिये, और विरोध ही करना हैं, तो इस नए-नवीन सिस्टम का विरोध करने वालो का कीजिये।

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वैसे लोग जो भी कहे, अभिभावकों को जो मर्ज़ी डर सता रहा हो, विरोधियों के जो भी-जैसे भी तर्क-वितर्क हो में तो सिर्फ एक ही बात जानता/मानता हूँ कि-"जिन बच्चो को पढ़ना होता हैं, वो किसी भी दुरूह हालात-विषम परिस्थितियों में, और किसी भी सिस्टम में पढ़ सकते हैं। और जिन बच्चो को पढ़ना ही नहीं होता, उन्हें आप किसी भी सुख-सुविधा, ऐशोआराम से, और कैसे भी सिस्टम में नहीं पढ़ा सकते।"

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धन्यवाद।


FROM =

CHANDER KUMAR SONI,
L-5, MODEL TOWN, N.H.-15,

SRI GANGANAGAR-335001,
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Tuesday, February 16, 2010

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भजभज मंडलियों, भगवाधारियों को हैप्पी वैलेंटाइन डे।
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सर्वप्रथम मैं आपसे माफ़ी चाहूँगा कि-"इंटरनेट की किसी तकनीकी खराबी/खामी के कारण मैं यह लेख ठीक वैलेंटाइन डे के दिन पोस्ट नहीं कर पाया, लेकिन फिर भी मेरा लगातार यह प्रयास रहा कि-"जल्द से जल्द यह लेख पोस्ट कर सकू।" लगातार कोशिशो के बाद भी मैं यह पोस्ट वैलेंटाइन डे के दो दिन बाद पोस्ट कर पाया हूँ। देरी के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ। वैसे तो यह मेरा अपना निजी ब्लॉग हैं, लिखू ना लिखू, लेकिन मेरी ऐसी सोच नहीं हैं। मैं अपने पाठको के लिए ही लिखता था, लिखता हूँ, और लिखता रहूंगा। अगर मेरे पाठक ही नहीं होते तो मेरा लिखना व्यर्थ होता, इसलिए मेरे ब्लॉग पर मुझसे कहीं ज्यादा हक़-अधिकार मेरे ब्लॉग के पाठको का हैं। देरी के लिए मैं अपने ब्लॉग के पाठको से पुन: क्षमाप्रार्थी हूँ।"
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सभी प्रेमियों (सच्चे और पवित्र प्रेमी लोग ही) को और वैलेंटाइन डे मनाने वालो को मेरी तरफ से हार्दिक शुभकामनाएं। आज के दिन का सभी लोगो को बेसब्री से इंतज़ार रहता हैं, और रहे भी क्यों ना आखिर प्रेम का जो दिन हैं। लेकिन, ना जाने क्यों कुछ लोगो को इस दिन से नफरत-चिद्द सी हैं?? जब देखो प्रेम के इस पवित्र पर्व का विरोध करते रहते हैं, प्रेमियों की जान के पीछे हाथ धोकर पड़े रहते हैं।
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इनका यह विरोध किसी नाटक-नौटंकी से कम नहीं हैं। साल भर घर बैठे रहते हैं, और ठीक वैलेंटाइन डे के दिन ना जाने विरोध-प्रदर्शन करने कहाँ से निकल आते हैं???? कुछ उदाहरण जो मेरी इस बात की सच्चाई की पुष्टि करेंगे =
1. आज से तीन-चार साल पहले की बात हैं, इन्ही भजभज मंडली वालो ने शहर के कई रेस्तरां में तोड़फोड़ की और वहाँ बैठे प्रेमियों को डरा-धमका कर (कुछेक को मारपीट कर) भगा दिया। और शायद आप लोगो को यकीन नहीं होगा कि-"इस घटना के कुछ ही दिनों बाद अपने आप को नेता कहने वाला यह भगवाधारी राजधानी (जयपुर) के पंचसितारा होटल में एक युवती के साथ गुलछर्रे उड़ा रहा था।" यहाँ साफ़ कर दूं कि-"इस कथित नेता के भाई ने ही मुझे सारी बाते बताई थी, इतना ही नहीं उसने कुछ फोटोग्राफ्स भी मुझे दिखाए थे।"
2. ठीक इसी तरह, पिछले साल भी बाज़ार में विरोध-प्रदर्शन कर रहे एक भगवा दल के कार्यकर्ता (जोकि मेरे दोस्त का छोटा भाई था) से मैंने जब वैलेंटाइन का मतलब और विरोध करने का कारण पूछा तो उसका ज़रा जवाब देखिये-"ओह भैया, मैं तो ऐसे ही इनके (किसी की तरफ इशारा करते हुए) साथ आ गया, ये मेरे मोहल्ले में ही रहते हैं।"
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तो यह हैं इन सबकी हकीकत। दोस्तों कुछ समझ में आया??? पहले उदाहरण में एक नेता संकीर्ण-तुच्छ विचारों और हिंसा से अपनी राजनीति को चमकाना चाहता हैं और जब मूड करे शहर से बाहर (जहां कोई जानने-पहचानने, और देखने वाला न हो) आराम से गुलछर्रे उड़ा सके। दुसरे उदाहरण में विरोध-प्रदर्शन करने वाले कार्यकर्ता भाड़े के हैं, जिन्हें रत्ती भर भी जानकारी नहीं होती हैं। इस दुसरे उदाहरण से यह भी साफ हो जाता हैं कि-"ये लोग कैसे-कैसे तिकड़म भिड़ा कर भीड़ जुटाते हैं और ये भीड़ इनकी रीति-नीतियों के प्रति कितनी वफादार होती हैं???"
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दोस्तों, उपरोक्त दोनों या इनसे मिलतेजुलते उदाहरण आप लोगो ने भी देखे-सुने होंगे। इन लोगो के विरोध कोई मकसद या महत्तव के लिए नहीं होता हैं, इनका लक्ष्य तो हिंसा और ऐसे कारनामो से खुद को हाईलाईट करना होता हैं। ये चाहते हैं कि-"इनकी फोटो-नाम-खबर अखबारों में छपे और लोगो में इनके प्रति खौफ पैदा हो। भारतीय संस्कृति-मूल्यों से इनका कोई वास्ता नहीं होता हैं, इनका वास्ता तो भारत के नाम पर, संस्कृति-मूल्यों के नाम पर वोट लेना या अपनी नेतागिरी चमकाना होता हैं।"

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कुछ सवाल जो मैं इन भजभज मंडलियों और भगवाधारियों से आपके-अपने इस ब्लॉग के माध्यम से पूछना चाहूँगा =
आप वैलेंटाइन डे का विरोध क्यों करते हैं??
आप प्रेम करने को बुरा मानते हैं या नहीं??
अगर हाँ तो फिर शास्त्रों को, कृष्ण जी को नहीं मानना चाहिए, क्योंकि वे तो प्रेम का सन्देश देते हैं।
अगर नहीं तो फिर आप प्रेमियों को हिंसा करके डराते-धमकाते-भगाते क्यों हैं??
अश्लीलता का विरोध कीजिये, शालीनता से बैठे लोगो पर हमला क्यों???
लड़का-लड़की का साथ बैठना, घूमना क्या गलत हैं??
मुसलमानों की कट्टरता का आप विरोध करते हैं, और अब आपका कट्टरता पर उतरना सही हैं??
साल भर सडको पर, स्कूल-कालेजो के आसपास मजनू टाइप लड़के घुमते रहते हैं तब आप कहाँ होते हैं??
सरेआम लड़कियों-युवतियों के साथ छेड़छाड़ होती रहती हैं, तब आप क्या कुम्भकरणी नींद सो रहे होते हैं??

देशभर के सभी शहरो में अश्लील फ़िल्मी पोस्टर लगे होते हैं तो क्या वो आपके अपने अंदाज़ में शहर का सौन्द्रयिकर्ण हैं??
इन अश्लील पोस्टरों से क्या आपका सिर गर्व से ऊंचा उठ जाता हैं???
प्रेम दिवस का विरोध आप किस मुंह से करते हैं?? आपके अपने नेता-कार्यकर्ता दागी हैं।
सच्चे प्रेम और वासना भरे प्रेम में क्या आप फर्क जान सकते हैं??
क्या आप किसी के अन्दर झाँक कर देख सकते हैं, कि-वहाँ सच्चा प्यार हैं या वासना का प्यार???
अगर देख सकते हैं तो इस बात की क्या गारंटी हैं कि-वर्तमान का सच्चा प्यार आगे चलकर वासना में नहीं बदलेगा??

कही ऐसा तो नहीं, इन प्रेमियों के हँसते-मुस्कुराते चेहरों को देखकर आपको जलन होती हो??
खजुराहो के मंदिरों को स्थापत्य-कला का बेजोड़ नमूना बताते हुए, आप क्यों इन्हें पर्यटक स्थलों के रूप में विकसित/पेश करते हैं??
जबकि खजुराहो (मध्यप्रदेश) में आपकी ही सरकार हैं, तोड़ क्यों नहीं देते इन कथित रूप से अश्लीलता परोस रहे मंदिरों को????

क्यों आप इन पर्यटक स्थलों को बंद नहीं कर देते??
क्यों आप इनके रखरखाव, सुरक्षा, आदि मदों में लाखो रूपये खर्च करते हैं??

लेकिन दुर्भाग्य से आप ऐसा नहीं कर सकते, आखिर वहाँ आपकी अपनी सरकार जो हैं।

वैलेंटाइन को पाश्चात्य त्यौहार बताते हुए आपका विरोध करना कितना उचित हैं???

राष्ट्रीय त्यौहारों (होली-दिवाली-नववर्ष-बैसाखी-आदि) के प्रति लोगो के घटते रुझान को लेकर आप कुछ क्यों नहीं करते??

आप लोग वैलेंटाइन का विरोध विदेशी परम्परा बताते हुए करते हैं, तो फिर विदेशो में रह रहे भारत-वंशियों को होली-दिवाली, आदि मनाने का क्या हक़ हैं??

अगर आपकी तरह सब लोग करने लग जायेंगे तो कनाडा, अमेरिका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, आदि देशो में बसे सिखों को बैसाखी, गुरुपर्व वहाँ कौन मनाने देंगा??

आप भारतीय संस्कृति के ठेकेदार बनते-फिरते हैं, लेकिन आप ही संस्कृति के लिए किसी अभिशाप से कम नहीं हैं।

भारत में तेज़ी से बढ़ रहे बलात्कार, यौन शोषण के आंकड़ो से क्या संस्कृति और मूल्यों में गिरावट नहीं आती हैं???

सरेआम लड़के-लड़कियों को भाई-बहन बनाकर राखी बंधवा देना कहाँ का तरीका हैं???
कोई अश्लीलता या असभ्य व्यवहार अगर कही होता मिले, तो पुलिस किसलिए हैं??

सार्वजनिक स्थानों पर अश्लीलता फैलाने का मुकद्दमा क्यूँ नहीं दर्ज करा देते??

प्रेम-प्यार का उलटा मतलब प्रेमी लोग निकाले या ना निकाले लेकिन आप जरूर निकालेंगे।

ये भी कहाँ का तरीका हुआ, लड़के के हाथो लड़की की मांग में जबरन सिन्दूर भरवा देना??

हो सकता हैं, उन्होंने भविष्य में शादी करने की सोच रखी हो??

ये भी हो सकता हैं, वे अपने-अपने माता-पिता को शादी के लिए मनाने की कोशिशे कर रहे हो??

कर दिया ना आपने गुड-गोबर??

अच्छा भला, उनके माँ-बाप सहमत होने वाले थे, कि-"आपके कारण वे अपने निर्णय से पलट गए, यह कहते हुए-तुमने तो सारे शहर में नाक कटवा दी।"

किसी लड़के-लड़की के मिलनेजुलने से क्या पाप हो जाता हैं??

हकीकत में आप लोग लडको को तो मारपीट कर भगा देते हैं और लड़कियों के साथ छेड़छाड़ करते हुए आनंदित होते हैं। रोती-बिलखती-कलपती हुयी और हाथ जोडती लड़कियों से आप आत्म-संतुष्टि महसूस करते हैं।

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आपका विरोध एकदम झूठा-थोथा हैं, शर्म आनी चाहिए आपको विरोध करते हुए। आपके आगे (मंदिरों में) कोई चढ़ावा चढाते हुए अपने प्यार के लिए दुआ मांगे तो आप बड़े खुश होते हैं। चुनावों में आप लोगो को सुशाषण, क़ानून की सख्ती से पालना कराने, आदि बातों, लच्छेदार भाषणों से मतदाताओं को बरगलाते हैं और बाद में आप लोग ही वैलेंटाइन डे आदि मौको पर कार्डो, गिफ्ट आइटमो की दुकानों पर तोड़फोड़ करना, कार्डो की होली जलाना, रेस्तरां-होटल आदि स्थानों पर जा कर प्रेमियों के साथ अभद्र-हिंसक व्यवहार करना, लड़कियों के बाल खींचना और गालीगलौच करना, लडको के साथ मारपीट करना, होटल/रेस्तरां का नुकसान कर देना, आदि कृत्य करते हैं। तब क्या क़ानून व्यवस्था बहुत अच्छी हो जाती हैं??

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एक तरफ आप लोग (साधू-संत-महात्मा) ही लोगो को प्रेम करने, प्रेम से रहने के उपदेश देते हैं, और दूसरी तरफ आप लोग ही प्रेमियों पर बाज़-चील की तरह टूट पड़ते हैं। लोग बेचारे करे भी तो क्या करे?? लड़का-लड़की का साथ बैठना आपको सुहाता नहीं हैं, और आपके आश्रमों-मस्जिदों-चर्चो में सारी हदे पार करदी जाती हैं। अश्लीलता आपके विचारों में हैं, अश्लीलता आपके अपने अन्दर हैं, जिसे आप निकालना ही नहीं चाहते। आप लोग कहते हैं कि-"प्रेम का कोई एक दिन नहीं होता, यह भी कोई तरीका हुआ??, प्रेम तो साल भर होना चाहिए।" लेकिन में आप लोगो से कहना चाहता हूँ कि-"आजकल की भागदौड़ भरी, तनाव भरी, व्यस्त से व्यस्तम जिंदगी में अगर किसी को पल-दो पल प्यार करने का मौक़ा मिले तो क्या बुरा हैं?? इसी बहाने लोगबाग अपनी ज़िन्दगी को तनाव, टेंसन, आदि मानसिक परेशानियों से मुक्त कर पाते हैं।"
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वैसे मेरा तो दिल करता हैं कि-"काश वैलेंटाइन डे साल में एक बार आने की बजाय कम से कम महीने में एक बार जरूर आये, ताकि मैं, आप, और हम सब इसी बहाने ज़िन्दगी को नए ढंग से, ख़ुशी से, हँसते-मुस्कुराते हुए, प्रेम-प्यार से जी सके।"

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विशेष अपील = "वैसे इन भजभज मंडलियों, भगवाधारियों से नफरत ना करे, इन्हें भी भरपूर प्रेम करे। आखिर मैं, आप, और हम सब प्रेम दिवस जो मना रहे हैं। और जब प्यार-प्रेम का पर्व यानी वैलेंटाइन डे मना ही रहे हैं तो फिर क्यों ना हम अपने दुश्मनों (भजभज मंडलियों, भगवाधारियों) से भी नफरत कि जगह प्यार करे?? क्या पता अपना प्यार देखकर इन्हें कुछ भूल का एहसास हो और कल तक जो प्रेमियों के भक्षक थे वे अब रक्षक (विरोधियों से बचाने वाला) बन जाए??? और वैसे भी प्रेम सबसे किया जाना चाहिए, ना कि किसी एक से। तो फिर आइये इन भजभज मंडलियों और भगवाधारियों को हैप्पी वैलेंटाइन डे कहे।"

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धन्यवाद।

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Wednesday, February 10, 2010

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नफरत मत कीजिये, गले लगाइए उन्हें।
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दोस्तों, जब भी कोई हमें हमारी गलती बताता हैं या हमारा झूठ पकड़ता हैं, तो हम उसे नज़रअंदाज़-इग्नोर करना शुरू कर देते हैं। हमें ऐसा कदापि नहीं करना चाहिए, जो कोई भी हमें हमारी गलती बताता हैं या हमारा झूठ पकड़ता हैं, वो हमारा सच्चा हितेषी होता हैं। हमें उसे गले लगाना चाहिए, उसे अपना सच्चा मित्र मानना चाहिए। लेकिन, हम अक्सर इसके उलट ही करते हैं, हम उसे अपना विरोधी-प्रतिद्वंद्वी-दुश्मन समझने लगते हैं। हमें उससे नफरत होने लगती हैं, हम उससे बचने-दूर जाने का हरसंभव प्रयास करने लगते हैं। जोकि, मेरी नज़र में, मेरे विचारों में गलत हैं। हमें इस प्रवृति से बचना चाहिए।
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हम यह नहीं सोचते कि-"ऐसा कर वो हमें हमारी भूल का अहसास कराना चाहता हैं। झूठ बोलना हमें उस क्षण-उस वक़्त तो तात्कालिक लाभ पहुंचा सकता हैं, लेकिन इसके दूरगामी नुक्सान बहुत हैं।" हम यह क्यों नहीं सोचते कि-"जब कोई हमारा झूठ नहीं पकड़ पाता या कोई हमें झूठ बोलने से नहीं रोकता तो हमें झूठ बोलने की आदत पड़ जाती हैं। बात-बात पर, मौके-बेमौके हम झूठ-पर-झूठ बोलने लगते हैं।" उस वक़्त हमें बहुत आनंद की अनुभूति होती हैं, हम मन ही मन खुश होने लगते हैं कि-"कोई हमें झूठ बोलते पकड़ ही नहीं पाया" और देखते ही देखते हम झूठे कब कहलाने लगते हैं, इसका हमें पता ही नहीं चलता।
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और झूठे साबित हम कब हो गए??, इसका पता हमें बहुत देरी से लगता हैं, और जिस वक़्त हमें इस कटु-सत्य का पता चलता हैं, तब तक सब कुछ समाप्त हो चुका होता हैं। हम पर कोई अपना भी भरोसा-विश्वास नहीं करता हैं, पराया तो दूर की बात हैं। झूठे घोषित होने के बाद हम कुछ भी नहीं कर सकते हैं, सब कुछ हमारे हाथो से निकल चुका होता हैं। हम व्यापार नहीं कर सकते, क्योंकि लोग हमपर हमारे झूठ की वजह से विश्वास नहीं करेंगे, जोकि व्यापार के लिए परम-आवश्यक हैं। हम आपात-स्थिति में किसी की मदद भी नहीं मांग सकते, क्योंकि हम हमारे झूठ के कारण सभी से कट चुके होते हैं। हम रिश्ते-नातों-संबंधो को आगे बढाने की-मजबूत करने की बात नहीं कर सकते, क्योंकि सच सभी रिश्तो का आधार हैं, सच सभी रिश्तो-नातों-संबंधो में मजबूती लाने की रामबाण औषधि हैं। जिसका झूठे लोगो के पास नितांत अभाव होता हैं। झूठा व्यक्ति अकेला रह जाता हैं, यहाँ तक कि-"झूठे लोग भी उसका साथ नहीं देते।"
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आपको शायद बचपन में पढ़ा एक पाठ याद होगा, जिसमे एक गडरिया (बकरियां चराने वाला) भेड़िया आया-भेड़िया आया कह कर रोज़ झूठ बोलता था, और एक दिन जब सच में भेड़िया आ गया तो उसका चिल्लाना काम ना आया। क्योंकि वो अन्य लोगो में झूठा व्यक्ति साबित हो चुका था, इसलिए लोगो ने उसके चिल्लाने को हल्क़े में लिया, और भेड़िया उसकी सारी बकरियों को अपना भोजन बना गया।" दोस्तों, यह तो सिर्फ एक कहानी थी, लेकिन ऐसा आपके साथ सच में भी हो सकता हैं। अगर आपकी छवि एक बार झूठे की बन गयी, तो उसे बदलना आपके लिए नामुमकिन हो जाएगा।
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याद रखिये-"अच्छी छवि बनाना बेहद मुश्किल हैं और छवि बिगाड़ना बेहद आसान। आप दो-चार झूठ बोलने मात्र से झूठे घोषित हो जायेंगे, लेकिन पचास-सौ सच बोलने के बाद ही आपकी छवि सच्चे आदमी की बन सकेगी।" सच बोलना एक-दो बार मुश्किल लगेगा, लेकिन जब आपको सच की आदत पड़ जायेगी तो आप खुद को बहुत अच्छा और हल्का महसूस करेंगे। झूठे आदमी को कोई चैन नहीं होता हैं, उसे पलपल झूठ के सामने आने का डर सताता रहता हैं। लेकिन, इसके उलट सच्चे व्यक्ति को कोई भी-किसी भी प्रकार का डर नहीं होता हैं, वह चैन की नींद सोता हैं। झूठे आदमी को हर वक़्त सबकुछ दिमाग में बिठा कर रखना होता हैं कि-कोई यह पूछेगा तो यह बताना हैं, और यदि वह पूछेगा तो वह बताना हैं। बिना वजह उसके दिमाग में फ़ालतू का बोझ पडा होता हैं। जबकि सच्चे आदमी को कोई मानसिक-दिमागी बोझ नहीं रखना होता हैं, उसे तो बस सच का दामन थामे रखना होता हैं, जो कोई भी-कुछ भी पूछेगा उसे जस का तस बता देना हैं। उसे किसी भी तरह की प्लानिंग या चालाकी की जरुरत नहीं पड़ती हैं। अगर आपको सरल-सरस-और सहज जीवन जीना हैं, तो झूठ का दामन छोड़कर सच का दामन थामना ही होगा।
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यह तो थी झूठ और सच की बात, अब बात करते हैं गलती की। गलतियां करना मानव का स्वाभाविक गुण हैं या यूँ कहिये कि-"इंसान गलतियों का पुतला हैं, और जो गलतियां ही ना करे वो इंसान कैसा???" गलतियां बुरी या बड़ी नहीं होती हैं, गलतियां करना बुरा नहीं होता हैं, बुरा होता हैं गलतियों को ना मानना या ना सुधारना। सीखने की पहली सीढ़ी गलतियां करना ही हैं। बल्ब का आविष्कार करने वाले अल्बर्ट आइन्स्टीन ने बल्ब के आविष्कार करने से पहले दो हज़ार गलतियां की थी। अब क्या कहेंगे इसे??, क्या दो हज़ार गलतियां करना उनकी बेवकूफी थी?? नहीं बिलकुल नहीं, पहली बात तो उन्होंने अलग-अलग गलतियां की थी, दूसरी बात जन-जन के लोकप्रिय और उपयोगी आविष्कार के लिए दो तो क्या दस हज़ार गलतियां भी माफ़ की जा सकती हैं। अगर वे बार-बार एक ही गलती को दोहराते तो निश्चित रूप से बेवक़ूफ़ कहलाते।
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बार बार गलती करने वाला व्यक्ति कामयाबी भी हासिल नहीं कर सकता हैं, अलग-अलग गलतियां हो तो अलग बात हैं। गलतियां करना बुरा नहीं हैं, गलतियों को दोहराना-गलतियों को ना मानना बुरा हैं। आपकी बार-बार होने वाली एक ही गलती, आपकी तरक्की की राह में बाधा-रोड़ा हैं। झूठा आदमी भी अपनी नकारात्मक छवि के कारण कामयाबी हासिल करने में नाकाम रहता हैं। झूठा आदमी किसी के भरोसे को नहीं जीत सकता हैं, विश्वास होना-भरोसा होना आजकी सबसे बड़ी आवश्यकता हैं। बिना भरोसे के आप कुछ भी नहीं कर सकते हैं, बिना सच के आप कुछ भी नहीं कर सकते हैं। जीवन के हर क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए, तरक्की के लिए आपको झूठ और गलतियों से बचना होगा। आपकी सफलता का एकमात्र मूलमंत्र यही हैं कि-"आप कभी झूठ ना बोले, आप हमेशा हर स्थिति-परिस्थिति में सच का दामन थामे रखे, आप गलतियां करे लेकिन उन गलतियों को सहर्ष माने ही नहीं बल्कि सुधारे भी, और एक ही गलतियों की बारम्बार पुनरावर्ति बिल्कुल भी ना करे।"
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गलतियां और झूठ हमारे असली-पक्के दुश्मन हैं। हमें झूठ बोलने से रोकने वाला, हमारे झूठ को पकड़ने वाला, हमें गलतियां करने से रोकने वाला, हमें हमारी गलतियां बताने वाला तो हमारा सच्चा हितेषी हैं। हमारा असली मित्र, हमारा सच्चा साथी, हमारा हमदर्द, ये लोग ही हैं। जो लोग हमारे झूठ बोलने पर हमारी वाहवाही करे, हमारा साथ दे और हमारे गलतियां करने पर हमें ना बताये/रोके वो हमारा सच्चा दोस्त कैसे हो सकता हैं??? उससे बड़ा हमारा बैरी-दुश्मन तो कोई और दुनिया में हो ही नहीं सकता। अरे कोई कुँए/खाई कि तरफ बढ़ रहा हो, तो उसे रोकना/बचाना दोस्त का फ़र्ज़/कर्त्तव्य होता हैं। झूठ और गलतियां हमारे लिए किसी कुएं/खाई से कम नहीं हैं, और जो हमें झूठ और गलतियों से ना बचाए, वो हमारा मित्र-हितेषी कैसे हो सकता हैं??
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हाँ, झूठ पकड़ने और गलती बताने का तरीका हर किसी का अलग-अलग हो सकता हैं। कुछ लोग आपका मज़ाक उड़ा सकते हैं, कुछ लोग आपकी गलतियों को देखकर हंस सकते हैं, या कुछ लोग आपके साफ़-सफ़ेद झूठ को पकड़ कर आपका मखौल बना सकते हैं। हो सकता हैं कि-"आपको किसी का झूठ पकड़ना या गलती बताने का तरीका पसंद ना आये, लेकिन अपनी भलाई-अपने सुखद भविष्य के लिए आप इसे नज़रअंदाज़ कर सकते हैं। कर सकते हैं????, करना ही चाहिए।" आपका सच्चा मित्र हैं वो, आपके जीवन-आपकी तरक्की की राह में मौजूद झूठ-गलतियों रुपी इन रुकावटों-बाधाओं-और रोडो को हटाना चाहता हैं वो। आपका ध्यान आपकी गलतियों और झूठ की तरफ दिलाना चाहता हैं आपका यह हितेषी-सच्चा दोस्त। इसलिए इनसे नफरत करने, इग्नोर करने, दूर भागने, या अपना दुश्मन समझने की बजाय इनका खुले दिल से आभार व्यक्त कीजिये, इन्हें अपने गले लगाइए। फिर देखिये, ये कैसे आपकी पूरी ज़िन्दगी को बदल देते हैं, कैसे आपके राह को आसान (कांटो-रहित) बनाते हैं........
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क्या आप लगायेंगे इन्हें गले?????
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धन्यवाद।
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Thursday, February 04, 2010

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कृपया किन्नरों (हिजडो) की तरफ भी देखिये।
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हमारी नज़रे समाज के, देश के कोने-कोने में मौजूद दुखियों-पीडितो की तरफ तो चली जाती हैं। लेकिन, समाज के ही एक भाग किन्नरों की तरफ नहीं जाती हैं। किन्नरों का दुर्भाग्य देखिये, सरकार भी किन्नरों को एक प्रकार से देश के नागरिको का भाग ही नहीं मानती हैं। हिजड़े वैसे ही प्राकृतिक आपदा के मारे हुए हैं, ऊपर से समाज इन्हें मुख्यधारा में स्वीकार नहीं करता।
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मुझे समझ में नहीं आता हैं कि-"लोग/कम्पनियां उन्हें नौकरियों पर क्यों नहीं रखती हैं??? नौकरियों के लिए दिमाग चाहिए, नाकि लिंग। फिर क्यों इन्हें उनके हक़ से वंचित रखा जाता हैं??" सरकारी या निजी नौकरियां तो दूर इन्हें आम दुकानों या मजदूरी करने के लिए भी नहीं रखा जाता। उन्हें मजदूरी करने तक से रोकने वालो से पूछा जाना चाहिए कि-"उन्हें मजदूरी करानी हैं, माल/बोझा उठवाना हैं या बच्चे पैदा कराने हैं, यौन संतुष्टि प्राप्त करनी हैं???" यह सरासर हिजड़े लोगो के साथ अन्याय हैं, कब तक चलता रहेगा ऐसा अन्याय का खेल???
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अरे बेचारों के साथ ऐसा सलूक/जुल्म तो ना करो, कुछ तो रहम कीजिये। ऐसे तो आप गुड-हरा खिला कर पुण्य कमाने के लिए गली-गली गायो-गौधो को ढूंढते फिरते हैं, और जब जरूरतमंद (हिजड़े) खुद चलकर आपके द्वार पर आते हैं, तो आप ही उन्हें दुत्कार-फटकार कर भगा देते हैं। सरकार भी इनके प्रति उदासीन हैं, सरकार के लिए तो हिजड़े होना ना होना एक बराबर हैं। अरे आरक्षण की बात कौन कह रहा हैं, पर यह तो बताओ किस अधिकार से आपने किन्नरों को नौकरियों से दूर रखा हुआ हैं???? किन्नर भी भारत के ही नागरिक हैं, उन्हें भी संविधान के प्रावधानों के तहत मौलिक अधिकार उपलब्ध हैं। सरकार सरकारी नौकरियों में तो अल्पसंख्यको (मुसलमानों) की स्थिति का सर्वे/आंकलन कराती रहती हैं, लेकिन हिजडो के लिए ऐसा कुछ नहीं किया जाता हैं।
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सरकार तो सरकार, आम आदमी भी हिजडो के साथ नाइंसाफी कर रहा हैं। बाज़ार में हिजडियाँ जब निकलती हैं, तो आम लड़कियों से कही ज्यादा स्मार्ट-सुंदर लगती हैं। उनके हिजड़े होने का एहसास उनके ताली पीटने और पहनावे से होता हैं। अगर हिजडियाँ ताली ना पीटे और पहनावा बदल दे तो आम आदमी धोखा ही ना खाए वरण उनपर लट्टू भी हो जाए। इसलिए मैं जानना चाहता हूँ कि-"आम दुकानदार सेल्सगर्ल लड़की की बजाय हिजड़ी क्यों नहीं रख सकते???" यह हंसने की बात नहीं हैं, यह एक गंभीर सवाल हैं। लड़कियों को भी ट्रेन्ड-सिखाया जाता हैं, वे कोई ऊपर से सीख कर नहीं आती हैं। इसी तरह अगर हिजडो को भी सिखाया जाए तो वे भी बहुत कुछ सीख सकते हैं, काम-धंधा करके अपना पेट भर सकते हैं।
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रही बात इनके गुंडागर्दी करने और जबरन वसूली करने की, तो इसके ज़िम्मेदार भी हम ही हैं। हमने इन्हें मजदूरी तक नहीं करने दी, हमने इन्हें नौकरियों से ही वंचित रखा। तो क्यों यह अपराधी नहीं बनेंगे?? इनकी कमाई का साधन एक मात्र यही हैं कि-"जब किसी के घर लड़का हो तो बधाई लेले या होली-दिवाली बधाई लेले।" और अब तो वो भी नहीं रहा, आखिर लोगो ने "हम दो हमारे दो" जैसी नीति जो अपना ली हैं। कई जगहों (बड़े-मेट्रो शहरों में) तो "हम दो हमारा एक" जैसी नीति भी अपना ली गयी हैं। इनका धंधा मंदा पड़ रहा हैं, ऊपर से सरकार और हम इन्हें मजदूरी, नौकरियों और अन्य कमाने के साधनों से वंचित रखे हुए हैं। मरता आदमी क्या नहीं करता???, अरे लोग तो राह चलते-फिरते लोगो को लूट लेते हैं, लोग चोरी करते हैं, डाका डालते हैं। यह बेचारे (किन्नर-हिजड़े) ऐसा कुछ तो करते ही नहीं हैं, बस होली-दिवाली त्यौहार पर या लड़का होने पर जबरन वसूली करते हैं। वो भी हर कोई नहीं करता हैं, कोई-कोई हिजड़ा ऐसा करता हो, तो कह नहीं सकते।
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लेकिन इसके भी ज़िम्मेदार हम ही हैं, अगर हम उन्हें (हिजडो को) मेहनत-मजदूरी करने दे, सरकार व अन्य निजी कम्पनियां इन्हें नौकरियां देने लग जाए, और इन्हें अन्य साधनों से कमाने दिया जाए, तो क्यों ये अपराध करेंगे??? इनकी मजबूरियां ही इनसे (किन्नरों से) जबरन-वसूली कराती हैं। यह ख़ुशी के मारे धन वसूलने नहीं जाते हैं, यह देश-समाज-और सरकार की उदासीनता से हताश-निराश होकर ऐसा कार्य करने को विवश होते हैं।
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मेरा दिल कहता हैं कि-"अगर हम इन्हें मुख्यधारा में शामिल कर लेंगे, तो यह समाज के लिए बहुत कुछ कर सकते हैं, यह अपना काम-धंधा करके, मेहनत-मजदूरी-नौकरी करके अपना पेट पाल सकते हैं। हो सकता हैं कि-"इनकी इतनी कमाई हो की, इन्हें सरकार को टैक्स तक अदा करना पड़े।" दान-दक्षिणा करके भी यह अन्यो की मदद कर सकते हैं, अगर हम (देश-समाज-सरकार) इन्हें अपना ही भाग माने। अगर हम इन्हें अपना मानेंगे, ये आम व्यक्ति की तरह सामान्य जीवन जीने लगेंगे, तो ये अपने बलबूते बहुत कुछ कर गुजरेंगे। तब ये धन की जबरन वसूली जैसा अपराध नहीं करेंगे, और हमारे बीच ही मौजूद कुछ ख़ास लेकिन अच्छे लोग माने जायेंगे।"
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धन्यवाद।
FROM =
CHANDER KUMAR SONI,
L-5, MODEL TOWN, N.H.-15,
SRI GANGANAGAR-335001,
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Friday, January 29, 2010

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धर्म के नाम पर मची लूट, पर सब मौन।

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सुना आपने?? शिरड़ी के सत्य साईं मंदिर संस्थान ने भी धर्म के नाम पर लूट मचाने की पूरी तैयारी कर ली हैं। अब तक जो दर्शन लोगो को फ्री में होते थे, अब उन्ही दर्शनों के लिए जेब ढीली करनी पड़ेगी। लोगो को अपने आराध्य देव के, भगवान् के दर्शन मुफ्त में नहीं हो सकेंगे। यह फैसला घोर निंदनीय हैं, इस फैसले की जितनी निंदा की जाए, कम होगी। यह कोई अनोखा फैसला नहीं हैं और नाही यह कोई पहला मौक़ा हैं। ठीक इसी तरह का फैसला सन 2008 में वैष्णौ देवी मंदिर, जे&के में भी लिया गया था। ऐसा नहीं हैं की उस दफा विरोध-आलोचना नहीं की गयी थी, खूब की गयी थी, खूब हँगामा भी मचा था, लेकिन.........धर्म का मामला था, इसलिए आसानी से दबा दिया गया।

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वैष्णौ देवी मंदिर में तब विआईपी लोगो के लिए हेलीकाप्टर सुविधा शुरू की गयी थी, ताकि भक्तो को सीधा माता के गुफा के बाहर उतारा जा सके। यानी जो अमीर-धनवान और पहुँच वाला हैं, वो बिना चढ़ाई किये और बिना समय गंवाए सीधा माता के चरणों में शीश नवां सके और आमजन, गरीब आदमी पहले घंटो दुर्गम चढ़ाई करे और फिर लाइन में लगे। हेलीकाप्टर सुविधा शुरू करना बुरा या निंदनीय नहीं हैं, बुरा हैं उस सुविधा के इस्तेमाल करने की ऊँची कीमत, जोकि आम जन के हाथ में नहीं हैं। इस सुविधा की शुरुआत ही पैसा कमाने और अमीर लोगो को आकर्षित करने के लिए की गयी हैं। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण हैं, जब भगवान् ही भक्तो-भक्तो में भेद नहीं करता हैं, तो हम कौन होते हैं, ऐसा नीच-कर्म करने वाले?? ठीक हैं, हेलीकाप्टर का संचालन घाटा उठाकर नहीं किया जा सकता, लेकिन दाम???? दाम तो ऐसा तय करना चाहिए जो सबके लिए एक-समान हो। यह भी कोई बात हुई कि-दाम इतने ऊँचे रखे जाए जो आमजन के बूते की ही बात ना हो??

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यह तो थी वैष्णौ देवी मंदिर की बात, शिरड़ी के साईं बाबा मंदिर संस्थान ने तो हद ही पार कर दी हैं। मैंने तो यह बात कभी सपने में भी नहीं सोची थी। आप जानेंगे तो आप भी हैरान हुए बिना नहीं रह सकेंगे?? शिरड़ी के साईं बाबा संस्थान ने सुबह और दोपहर की आरती के तीन सौ रूपये, शाम की आरती के लिए पांच सौ रूपये, और मंदिर में प्रवेश करने या साईं बाबा के दर्शन मात्र करने के लिए प्रति व्यक्ति एक सौ रूपये तय किये हैं। क्या यह उचित हैं???

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हिन्दुस्तान मंदिरों का देश हैं, यहाँ गली-गली, मोहल्ले-मोहल्ले में मंदिर या कोई अन्य धार्मिक-स्थल मिल जाएगा। इक्का-दुक्का मंदिरों को छोड़कर सभी मंदिर बम्पर कमाई कर रहे हैं, खूब चांदी कूट रहे हैं, देश भर के धार्मिक स्थल, आखिर धार्मिक देश जो हैं। देश भर के मंदिरों में टॉप 10 स्थानों पर उपरोक्त दोनों मंदिर (साईं बाबा और वैष्णौ देवी मंदिर) आते हैं। दोनों मंदिरों की कमाई देश भर में व्याप्त सभी मंदिरों की कुल कमाई से भी ज्यादा हैं, आये दिन इनका कोई ना कोई भक्त चांदी या सोने का सिंहासन या छत्र चढ़ाता रहता हैं। शुद्ध से शुद्धतम चांदी/सोने से निर्मित सिंहासन/छत्र के साथ-साथ इन्हें भारी मात्रा में दान-चढ़ावा भी तो प्राप्त होता हैं।

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यह बहुत ही बुरी बात हैं। जब ऐसे बड़े-बड़े, प्रसिद्ध मंदिर ही ऐसा करेंगे, तो देश के कोने-कोने में फैले छोटे-बड़े मंदिर ऐसा कौनसा कदम नहीं उठाएंगे?? भक्तो का तो जीना ही दुर्भर हो जाएगा, साधू-संत-महात्मा इन भोले-भाले भक्तो को अपनी चिकनी-चुपड़ी बातों से आये दिन बरगलाते रहते हैं। जब भगवानो के दर्शन बिना धन के संभव नहीं होगा तो आम आदमी-गरीब व्यक्ति क्या करेगा?? साधू-महात्मा आम जनता को ऐसी पट्टी/पाठ पढ़ाते हैं कि-"भक्तो को मंदिर ना जाना, घोर पाप, जीवन व्यर्थ जाना, आदि लगने लगता हैं।" उन्हें लगने लगता हैं कि-"अगर फला-फला मंदिर ना गए तो उनका जीवन ऐसे ही व्यर्थ चला जाएगा। अपने आराध्य देव-भगवान् से मुलाक़ात करना निहायत ही जरूरी हैं, चाहे उसके लिए कितने भी कष्ट (दुर्गम चढ़ाई करना, खतरनाक मोड़ से गुज़रना, खाने को अन्न ना हो लेकिन प्रसाद के लिए पैसा जरूर हो, आदि-आदि) क्यों ना सहने पड़े??"

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इसी बात का नाजायज लाभ, ये पण्डे-पुजारी, साधू-संत, और मंदिरों के मालिक उठाते हैं। भक्तो को भेड़ो की तरह हांकना कोई इनसे सीखें। भक्तो को किस तरह सत्संगों-समागमो में लाना हैं, भक्तो को किस तरह किसी विशेष मंदिर की और भेजना हैं, और भक्तो से मंदिरों में किस तरह से पैसा निकलवाना, दान कराना हैं, आदि मामलो के तो यह लोग विशेषज्ञ होते है। भगवान् ने अपने हर अवतारों में अपने भक्तो को भरपूर स्नेह दिया हैं। कही भी, कभी भी, किसी भी वक़्त, भगवान् ने भक्तो-भक्तो को अलग-अलग नहीं समझा हैं। उन्होंने सैदेव अपने सभी भक्तो को एकसमान माना हैं। फिर ना जाने क्यों, ये लोग भक्त-भक्त को आम और ख़ास, सामान्य और विआईपी, अमीर और गरीब, आदि भेदो में बाँट रहे हैं?? भक्त, भक्त होता हैं, भक्त भगवान् का होता हैं नाकि किसी मंदिर-देवालय का। ना जाने क्यों ये लोग ऐसा नीच-कर्म, घोर पाप कर रहे हैं???

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भगवान् और भक्तो के बीच की कड़ी (साधू-संत-महात्मा) भक्तो और भगवान् के बीच जानबूझ कर दूरियां पैदा कर रही हैं। जहां निश्छल प्रेमभाव होना चाहिए था, वहाँ ये लोग धन की दिवार खड़ी कर रहे हैं। भक्तो में भगवान् के प्रति मन के समर्पण की भावना होनी चाहिए, लेकिन दुर्भाग्य से ये लोग मन की बजाय धन के समर्पण की भावना पैदा कर रहे हैं। जब देश के सबसे ज्यादा कमाऊ-प्रसिद्ध मंदिर ऐसा कर रहे हो तो बाकी छोटे-बड़े मंदिर उनके नक्शेकदम पर नहीं चलेंगे?, इस बात की क्या गारंटी हैं???? मुझे समझ में नहीं आता कि-"एक तरफ हम कहते हैं कि-"भगवान् हमारे दिलो में ही हैं नाकि किस अन्य स्थान पर।" तो फिर क्यों इन मंदिरों में भगवान् को ढूंढते फिरते हैं?? क्यों हम भगवान् को घर में, मन में ही याद करने की बजाय मंदिर जाना ज्यादा पसंद करते हैं??"

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एक बात तो तय हैं कि-"हम चाहे जितना मर्ज़ी ऐतराज करले, चाहे जितना भी विरोध करले, ये लोग कभी नहीं सुधरेंगे। हम सब चाहे जितना भी, जैसा भी करले, ये लोग अपने खुले मुंह (ताकि धन-चढ़ावा, दान-दक्षिणा, आदि आये) को बंद नहीं करेंगे। इनसे किसी भी तरह की उम्मीद लगाना व्यर्थ हैं। चाहे ये लोग या मंदिर जितना मर्ज़ी कमाले, इनकी भूख नहीं मिटेगी। देश के बड़े लोग, बड़े लेखक-साहित्यकार, बड़े नेता-अभिनेता, देश के कर्णधार-राजनेता, आदि बड़े-बड़े, प्रभावशाली लोग इस मुद्दे पर कुछ नहीं बोलेंगे। इन लोगो की चुप्पी ऐसी होगी, मानो ये जन्मजात गूंगे हो। इसके लिए हमें ही कुछ करना होगा, कुछ नहीं बहुत कुछ। वैसे तो यह सब देना-ना देना, जाना-ना जाना, अपनी-अपनी आस्था का मामला हैं, लेकिन मेरे विचारों से भगवान् को कही कुछ देकर या जाकर पूजने की बजाय मन में या अपने-अपने घरो में ही पूज लेना ज्यादा उचित हैं। ना तो धन लगेगा, ना किसी पण्डे-पुजारी को कोई दान-दक्षिणा देना पड़ेगी, और ना ही किसी को किसी मंदिर में कोई चढ़ावा-दान आदि करना पडेगा। बस, घर में ही सच्चे मन से भगवान् को याद कीजिये, भगवान् खुद चल कर आपके पास आयेगा। आपको कही जाना नहीं पडेगा और ना ही कही कुछ खर्चना पडेगा। और शायद यही इन लोगो (पण्डे-पुजारी, साधू-संत-महात्मा, मंदिर-देवालय संस्थान, आदि) के लिए एक करारा तमाचा होगा।"

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धन्यवाद।

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Friday, January 22, 2010

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क्यों लौटे स्वदेश???
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पिछले कई दिनों से भारत छोड़ कर विदेश नौकरी करने गए या विदेश में ही बस चुके (सैटल हो चुके) लोगो से स्वदेश लौटने की अपील की जा रही हैं। कभी विदेश मंत्रालय तो कभी वित्त मंत्रालय देशहित में स्वदेश लौट आने की अपील कर रहा हैं। कभी यह अपील प्रधानमन्त्री की तरफ से की जा रही हैं, तो कभी राष्ट्रपति की ओर से। प्रधानमन्त्री जी पिछले महीने पहले अमेरिका गए हुए थे, वहाँ हुए "प्रवासी भारतीय सम्मलेन" में उन्होंने यह अपील वहाँ मौजूद भारतवंशियों से की। इसी तरह की अपील भारत के उप-राष्ट्रपति ने भी दक्षिण अफ्रीका और उसके आसपास स्थित देशो में नौकरी कर रहे या बस चुके लोगो से की।
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कुछ सवाल जिनके जवाब मुझे भारत सरकार से चाहिए =
क्यों की जा रही हैं उनसे ऐसी अपील??,
क्यों उन्हें अपनी जमी-जमाई नौकरी छोड़कर भारत लौट आने की प्रेरणा दी जा रही हैं??,
ऐसा क्या मिल जाएगा उन्हें भारत आकर??,
क्या करेगी सरकार उन्हें भारत वापस लाकर??,
देश में नौकरी मांग रहे लोगो को तो नौकरी दे नहीं सकते, उन्हें क्या "मूंगफली" देना चाहते हैं??,
ऐशोआराम की जिंदगी जी रहे लोग क्यों आयेंगे भारत??,
यह देखने आये कि-"यहाँ आधी आबादी (47% से ज्यादा) रोजाना एक डॉलर (पचास रूपये) से भी कम कमाती हैं??"
यह देखने कि-"18-25% लोगो को "एक समय का भोजन" ही नसीब होता हैं??"
या यह देखने कि-"लोग नशा करके सडको पर "लावारिश" पड़े रहते हैं??"
यह देखने आये कि-"यहाँ सड़को की हालत "बेहतरीन" हैं??"
यह देखे कि-"यहाँ रेल लाईने बेहद "सुरक्षित" हैं??"
वहाँ पांच दिन ही काम करना होता हैं, वो भी बिना ओवर टाइम के। यहाँ ओवर टाइम के साथ सारे हफ्ते काम करे??
वहाँ सुरक्षित, अपराधमुक्त और खुले समाज को छोड़ कर यहाँ बेहद असुरक्षित, अपराध-भरा और संकीर्ण विचारों वाले देश में आये??
जितनी कमाई वहाँ एक महीने में हो, यहाँ एक साल में आकर कमाए??
या फिर इसलिए कि-"यहाँ का पानी "अमृत-तुल्य" हैं??"
यह देखने कि-"बिजली की आपूर्ति "निर्बाध" रूप से होती हैं??"
यह देखने कि-"बिजली की दरे "न्यूनतम" हैं??"
यह देखने कि-"बिजली "चौबीसों घंटे" उपलब्ध होती हैं??"
यह देखने कि-"राशन की दुकानों पर "लाईने" ही नहीं लगती??"
यह देखने कि-"रसोई गैस सिलेंडर "घर" ही आ जाता हैं??"
यह देखने कि-"समय पर सिलेंडर की "आपूर्ति" मिल जाती हैं??"
यह देखने कि-"यहाँ का प्रशासन "चुस्त-स्फूर्त" हैं??"
यह देखने कि-"यहाँ के सरकारी विभागों में "आमजन की सुनवाई" हैं??"
यह देखने कि-"सरकारी कामकाज "बिना किसी कागजी औपचारिकता" के साथ होता हैं??"
या यह देखने कि-"सरकारी बाबू-अफसर "ईमानदार" हैं??"
यह देखने कि-"रिश्वतखोरी "गंभीर अपराध" हैं और रिश्वतखोरी का तो "नामोनिशान" ही नहीं हैं??"
यह देखने कि-"अदालते "जल्द-से-जल्द" फैसला सुनाती हैं??"
यह देखने कि-"अदालते "तारीख-पर-तारीख" नही देती हैं??"
यह देखने कि-"यहाँ की अदालतों में मुकद्दमे "लम्बे नहीं" खींचे जाते हैं व प्रकरणों का निपटारा "तुरंत" होता हैं??"
यह देखने कि-"मोबाइल सेवायें "आला दर्जे" की हैं??"
यह देखने कि-"फ़ोन मिलाते ही "मिल जाता हैं" और बात "बीचमे कटने" का तो सवाल ही नहीं??"
यह देखने कि-"बाढ़-भूकंप, आदि प्राकृतिक आपदा में सरकार तुरंत "जागती" हैं??"
यह देखने कि-"बाढ़-भूकंप, आदि में किसी की "जान नहीं जाती", कोई "हताहत" नहीं होता??"
यह देखने कि-"यहाँ कही भी "भ्रष्टाचार" नहीं हैं??"
यह देखने कि-"यहाँ "लाल-फीताशाही" नहीं हैं??"
या यह देखने कि-"यहाँ उधोगो की स्थापना करना "बेहद आसान" हैं??"
यह देखने कि-"उधोगो की स्थापना करवाने में सरकारी अफसरों-बाबुओं की "विशेष रुचि" रहती हैं??"
यह देखने कि-"बिना रिश्वत दिए, बिना घूस खिलाये, लाल-फीताशाही से दूर रहते हुए, उधोगो की स्थापना करना "बेहद सरल" हैं??"
यह देखने कि-"पुलिस बिना आना-कानी किये "फ़ौरन केस दर्ज" कर लेती हैं??"
यह देखने कि-"पुलिस अदालती फरमान का पालन "त्वरित गति" से करती हैं??"
यह देखने कि-"पुलिस मुजरिमों-अपराधियों की गिरफ्तारी "हाथो-हाथ" कर लेती हैं??"
या यह देखने कि-"क़ानून के हाथ "बहुत लम्बे" हैं??"
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उपरोक्त कारणों से बुला रहे हैं ना उन्हें स्वदेश???, नहीं??? अच्छा-अच्छा अब मैं समझा, आप उन्हें यह सब भी देखने के लिए बुला रहे हैं =
यह देखने कि-"बीपीएल लोगो को कार्ड "प्राथमिकता के साथ" प्रदान किया जाता हैं??"
यह देखने कि-"सरकारी हॉस्पिटल में "बेहतरीन" चिकित्सा सुविधा मिलती हैं??"
यह देखने कि-"इलाज़ में कोई लापरवाही-कोताही "नहीं बरती" जाती हैं??"
यह देखने कि-"लापरवाही होने कि दशा में मरीजों को "तत्काल राहत" दी जाती हैं??"
यह देखने कि-"बिना "कागजी औपचारिकता" के भर्ती भी कर लिया जाता हैं??"
यह देखने कि-"खांसी-जुकाम-सरदर्द, आदि की सामान्य दवाइयों में हर चौथी दवा "नकली-मिलावटी" हैं??"
यह देखने कि-"एड्स, कैंसर, आदि गंभीर बीमारियों की दवाइयों में हर छठी दवा "नकली-मिलावटी हैं??"
यह देखने कि-"यहाँ के नेता "सच्चे और वादों के पक्के" हैं??"
यह देखने कि-"यहाँ के नेता विकासदूत हैं??"
या यह देखने कि-"झूठ बोलना, बेईमानी करना, दल बदलना, आदि नेताओं के "ईश्वर-प्रदत्त वरदान" हैं??"
या यह देखने कि-"यहाँ के नेताओं के सफ़ेद-चमकते हुए-और झकाझक कपड़ो के पीछे उनकी काली करतूते और उनकी रंगीन-आशिक मिजाजी छूपी होती हैं??"
यह देखने कि-"यहाँ की पढ़ाई-लिखाई "उम्दा-किस्म" की हैं??"
यह देखने कि-"परीक्षा परिणाम "उल्लेखनीय" होते हैं??"
यह देखने कि-"यहाँ अध्यापको कि ही नहीं वरन विद्यार्थियों कि भी "शत-प्रतिशत" हाजिरी होती हैं??"

यह देखने कि-"यहाँ नक़ल तो हो ही नहीं सकती, "असंभव" हैं नक़ल करना??"
यह देखने कि-"नकलचियों को "कड़ी-सख्त सज़ा" दी जाती हैं??"
यह देखने कि-"यातायात "बेहद सुरक्षित और व्यवस्थित" हैं, सड़क हादसे तो "नाममात्र" ही होते हैं??"

यह देखने कि-"सड़क हादसों में तो मौत होने का सवाल ही नहीं उठता??"
यह देखने कि-"यहाँ यातायात नियमो की पालना "कठोरता से" की जाती हैं??"
यह देखने कि-"यहाँ हर व्यक्ति सीट बेल्ट और हेलमेट का प्रयोग "अनिवार्य रूप से" करता हैं??"
यह देखने कि-"ड्राइविंग लाइसेंस "कड़ी परीक्षा" देने के बाद ही मिलता हैं??"
यह देखने कि-"यहाँ सड़के "हेमामालिनी के गालो" कि तरह चमकती हैं??"
यह देखने कि-"यहाँ के लोग साफ़-सफाई "पसंद" हैं??"
यह देखने कि-"कूड़ा गिराने-कचरा फैलाने वाले को "भारी अर्थ-दंड" भुगतना पड़ता हैं??"
यह देखने कि-"सफाई कर्मचारी "वक़्त का पाबन्द" हैं??"
यह देखने कि-"नाले-नालियों-सीवरेज की "नियमित रूप से" पूरी सफाई की जाती हैं??"
या यह देखने कि-"लोग "समय पर और पूरा" टैक्स भरते हैं??"
यह देखने कि-"भारत में "सबसे कम" कर की चोरी होती हैं??"
यह देखने कि-"लोगो में प्रेम-प्यार-मोहब्बत कूट-कूट कर भरी हैं??"

यह देखने कि-"हिन्दू-मुसलमान "परस्पर प्रेमभाव से सगे भाई" की तरह रहते हैं??"
यह देखने कि-"हिन्दुओ-मुसलमानों में दंगा-फसाद होना "अत्यंत दुर्लभ" ही हैं??"
यह देखने कि-"मंदिरों के बाहर (दीवारों पर या खम्भों पर) हरा रंग लगाने और मस्जिदों के बाहर केसरिया रंग पोतने से "कुछ भी नहीं" होता हैं??"
या यह देखने कि-"मुसलमान गायो की और हिन्दू सुअरो की "पूरी इज्ज़त" करते हैं??"
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अगर इन्ही उपरोक्त कारणों से उन्हें विदेश छोड़कर स्वदेश लौट आने को कहा जा रहा हैं, तो फिर तो वे आ लिए......... फिर तो वे जरूर ही आ लेंगे......... किसलिए आये स्वदेश??, क्या हैं भारत में??, उन्हें निमंत्रण देने मात्र से क्या वे स्वदेश आ जायेंगे?? कोई शादी का निमंत्रण थोड़ी ना हैं, जो दौड़े चले आये कि-"चलिए, हिन्दुस्तान में खातिरदारी की जायेगी।" कोई ठोस कारण भी तो होना चाहिए, तभी तो हम उन्हें भारत वापस बुलाने का कारण बता पायेंगे। माना कि-"जिन हालातो में वे भारत छोड़कर गए थे, अब वो हालात भारत के नहीं हैं।" लेकिन, फिर भी अभी भारत इतना आकर्षण भी पैदा नहीं कर सका हैं जो वे भारत की तरफ रुख करे। आई.टी. उधोग, कम्प्यूटर उधोग, सूचना-दूरसंचार उधोग, स्टील-लोहा-इस्पात उधोग, आदि कुछ ही उधोग हैं, जिनकी प्रगति तेज़ मानी जा सकती हैं, और जो भारत वंशियों को पुन: लौट आने की प्रेरणा दे सकते हैं।
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लेकिन, सोचने वाली बात यह हैं कि-"क्या इन गिने-चुने, चुनिन्दा उधोगो के सहारे भारत को आकर्षित देश माना जा सकता हैं??? ऊंगली पर गिनने लायक इन उपक्रमों, उधोगो से क्या भारत छोड़ कर जा चुके लोग वापस आ सकते हैं????" अगर सच में ही, उन्हें पुन: स्वदेश में ही देखना, उन्हें देश के लिए कुछ करते देखना, चाहते हैं-"तो कुछ सार्थक करना होगा। हमें (सरकार, निजी कम्पनियां और आमजन) आंकड़ो के मकड़जाल से बाहर निकलना होगा, कुछ ऐसा करना होगा, जो हमारे साथ-साथ उन्हें (नौकरी करने या बसने के लिए विदेश जा चुके और विदेश में मौजूद भारत-वंशियों को) भी दिखे। हमें तो आप (सरकार) जो दिखाएँगे, हम आँख मूँद कर मान लेंगे, लेकिन फायदा तभी हैं, जब विदेश में नौकरी कर रहे या बस चुके भारत-वंशियों को भी कुछ दिखे। उन्हें कुछ नज़र आयेगा तभी तो वे भारत आने की सोचेंगे, और हमारा मकसद हल हो सकेगा।"
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धन्यवाद।
FROM =
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Saturday, January 16, 2010

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कुछ सीखो अपने दुश्मन चीन से।
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हाल ही में एक फैसले के अनुसार चीन में सार्वजनिक स्थानों पर थूकने की बुरी आदत वालो सरकारी मकान छोडना पड़ सकता हैं। चीन के समृद्ध माने जाने वाले शहर गुआन्ग्झाओ के भूमि एवं आवास प्रबंधन विभाग की नई योजना के मुताबिक़ सार्वजनिक स्थानों पर जहां-तहां थूकने वाले, कूड़ा-करकट फैलाने वाले, ज्यादा शोर-शराबा, हल्ला मचाने वाले, और जुआ खेलने वाले लोगो को सरकारी मकान की सुविधा छोड़ने का दंड भुगतना पडेगा। अगले हफ्ते तक यह योजना लागू कर दी जाएगी।
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क्या भारत के पास लागू करने के लिए ऐसी कोई योजना हैं???? हम हर राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मंच से, हर बार यही राग अलापते रहते हैं कि-"2020 तक भारत विकासशील देश से विकसित देश में तब्दील हो जाएगा। हम तब चीन के समकक्ष होंगे।" और इस दावे को सच दिखाने के लिए यह तर्क दिया जाता हैं कि-"2020 तक भारत की आधी आबादी युवा (45 साल से कम उम्र की होगी) और चीन बुढ़ा देश ही रह जाएगा क्योंकि चीन की आबादी बढ़नी अब धीमी हो गयी हैं और तब ज्यादातर जनसंख्या बूढी ही होगी। जबकि भारत की आबादी युवा और ऊर्जावान होगी।"
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लेकिन मैं भारत के इस दावे को सिरे से खारिज करता हूँ। अगर के भारत के तर्क को मान भी लिया जाए, क़ुबूल भी कर लिया जाए, तो भी बहुत से सवाल अनुत्तरित ही रह जाते हैं। जिनके जवाब मेरे हिसाब से भारत सरकार के पास हैं ही नहीं और अगर हैं तो जनता को देना नहीं चाहेगी, वोट बैंक का मसला जो ठहरा। कुछ जवाब मांगते सवाल, जो मैं आम जनता की ओर से सरकार से पूछना चाहूँगा =
01. जनसंख्या चीन की बढ़नी रुकेगी या हमारी????
02. जैसे-जैसे भारत के लोगो के पास काम आ रहा हैं, पैसा आ रहा हैं, जागरूकता आ रही हैं, ऐसे मैं कैसे माना जा सकता हैं कि"लोग पहले की तरह ही बच्चे करेंगे??
03. बढती महंगाई, बढ़ते खर्चो को देखकर आम आदमी खुद की जरूरतें पूरी नहीं कर पा रहा हैं, क्या आप कहेंगे उनसे-"घबराइये नहीं खर्चे हम उठाएंगे, आप बस बच्चे जनिये, आखिर चीन को जो पछाड़ना हैं।"
04. लोगबाग़ अब जागरूक हो गए हैं, उन्हें अहसास हो गया हैं कि-"बच्चे पालना अब बहुत खर्चीला काम हो गया हैं।"

05. ग्रामीण क्षेत्रो में भी अब तेजी से जागरूकता आ रही हैं, शहरी क्षेत्रो में तो अधिकाँश लोग अब दो नहीं बल्कि "हम दो हमारा एक" की नीति अपना चुके हैं।
06. ज्यादा बच्चे होने से क्या उनके लालन-पालन पर खर्चा नहीं होगा, बच्चे जब बड़े हो जायेंगे तब क्या उनकी पढ़ाई-लिखाई, ट्युशन-किताबो, और खाने-पीने पर खर्चा नहीं आयेगा???
07. अगर सरकार इन बच्चो और युवाओं का खर्चा खुद वहन करेंगी (हालांकि ऐसा हो नहीं सकता), तब क्या राजकोष-खजाने पर बोझ नहीं पडेगा??
08. तब (2020 में) आम लोगो के खाने-पीने के लिए इतना अनाज उत्पादन कहाँ से कर पाएगी भारत सरकार???
09. क्या भारत सरकार ने इतनी नौकरियों की प्लानिंग कर रखी हैं, कि-"भविष्य में उनकी बेरोजगारी को दूर किया जा सके??
10. अगर नहीं, तो बेरोजगारी से पैदा होने वाले सामाजिक-आर्थिक अपराधो से सरकार कैसे निपटेंगी??
जनसंख्या के हिसाब से भारत विश्व में दुसरे नंबर पर हैं और क्षेत्रफल के लिहाज़ से सातवे स्थान पर।

11. अभी यह स्थिति हैं, तो क्या आगे की कल्पना क्या भारत सरकार ने नहीं की हैं????
12. आज भारत में इतनी भूखमरी, अकाल, महंगाई, गरीबी, बेरोजगारी, आदि हैं। 2020 में, जब जनसंख्या आज के मुकाबले काफी अधिक होगी, तब क्या होगा इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता हैं???
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हालांकि चीन के साथ हमारा एक बार भीषण युद्ध भी हो चुका हैं। चीन ने हमारे एक विशाल भू-भाग पर कब्ज़ा भी ज़माया हुआ हैं। चीन भारत के दुश्मनों का मित्र हैं, चीन भारत की तरक्की, भारत के अमन-चैन का दुश्मन हैं। चीन भरोसे लायक नहीं हैं, चीन भारत को तोड़ना चाहता हैं, चीन की कुदृष्टि भारत के दूर-दराज़ के राज्यों पर कब्ज़ा करने की हैं।
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लेकिन फिर भी में एक बात कहना चाहूँगा-"चीन हमारा दुश्मन भले ही हो, लेकिन दुश्मन को पराजित करने के लिए यह आवश्यक हैं कि-"हम उसकी ताकत को अपनी ताकत बनाए, उसकी अच्छी आदतों को अपनाए। तभी हम उसका मुकाबला कर सकेंगे।" अपनी बुराइयों को त्यागने और दूसरो की अच्छाइयो को अपनाने में कैसी शर्म??? दुनिया के अन्य विकसित देशो के समकक्ष आने के लिए हमारा स्वयं का विकसित होना अतिआवश्यक हैं। अगर चीन विकसित देशो की कतार में शामिल होने के लिए एक कदम उठाता हैं, तो हमें दो कदम उठाने चाहिए। भारत को यह नहीं भूलना चाहिए कि-"अब तक जो लड़ाई हमने लड़ी हैं, वो सिर्फ ट्रेलर ही था। असली लड़ाई तो अब शुरू होनी हैं, जिसमे जीत के लिए हमें कई अन्य देशो की जरूरत पड़ेगी। अब तक की लड़ाई दो-तीन देशो के सामने ही थी, अब लड़ाई विश्व समुदाय के समक्ष लड़ी जानी हैं। इसलिए हमें स्वयं का विकसित होना जरुरी हैं। चाहे भले ही हमें इसके लिए अपने दुश्मन की अच्छाइयों को ही क्यों ना अपनाना पड़े??

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मेरी भारत सरकार से एक ही गुजारिश हैं कि-"चीन से हमारी लड़ाई युवा-ऊर्जावान जनसंख्या जैसे झूठे-भ्रामक आंकड़ो के दलदल में फंस कर लड़ने की बजाय, सार्थक आंकड़ो (शिक्षा, रोजगार, टैलेंट, सामर्थ्य, भरपेट व पौषटिक भोजन, न्यूनतम अपराध दर, कम से कम महंगाई दर, न्यूनतम गरीबी, बढ़ी हुई सकल घरेलु/प्रति व्यक्ति आय, भ्रष्टाचार मुक्त शासन-प्रशासन, कड़ी-सख्त व तीव्र रफ़्तार क़ानून-न्यायिक प्रणाली, आदि) के सहारे लड़ी जाए।"

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और सबसे बड़ी बात-"चीन के चक्कर में उलझने की बजाय, सारा ध्यान अपनी तरफ, अपने लोगो के विकास और समस्या-समाधान की तरफ लगाइए। ताकि हम विकसित देशो की कतार में 2020 तक शामिल ही नहीं बल्कि सबसे अग्रिम पंक्ति में खड़े हो। और........और........चीन हमसे कोसो दूर हो।"

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धन्यवाद।

FROM =

CHANDER KUMAR SONI,

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